क्या निराश हुआ जाए ?

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क्या निराश हुआ जाए ?
Kya Nirash Hua Jaye ?

क्या निराश हुआ जाए ? पाठ का सार kya nirash hua jaye summary - क्या निराश हुआ जाए ? , हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा लिखित एक प्रेरणात्मक निबंध है।  इस निबंध में लेखक ने प्राचीन मूल्यों एवं सिद्धांतों के प्रति अपनी गहरी आष्टा प्रकट किया है।  आज की विघटन पूर्ण  सामाजिक अवस्था को देखकर वह दुःखी है ,परन्तु निराश नहीं है।  लेखक के अनुसार अच्छाई एवं बुराई तो मानव जीवन के दो पहलु हैं।  वे क्रमशः समयानुसार आते - जाते रहते हैं। अतः आज मानवता को कलंकित करने वाला यह अन्धकार अवश्य समाप्त  फिर आशा का सूर्य उदित होगा। अन्धकार अवश्य समाप्त होगा और फिर आशा का सूर्य उदित होगा। ऐसी परिस्थिति में हमें निराश  की आवश्यकता नहीं है।  
लेखक वर्तमान सामाजिक वातावरण का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है। लेखक देश की वर्तमान िष्टि से बहुत उदासीन है। सुबह उठते ही समाचार पत्रों में ठगी ,चोरी और तस्करी के समाचारों को पढ़कर उसका मन उद्गीन्न हो जाता है।  प्रायः ऐसा देखा जाता है कि लोग एक दूसरे के दोषों को खोजों में ही व्यस्त रहते हैं।  आज ऐसा वातावरण बन गया है कि सच्चे व्यक्ति का कहीं मूल्य ही नहीं है।  जो कुछ भी नहीं करता ,उसमें हज़ारों दोष ढूंढे जाते हैं। लेखक के अनुसार आदमी हूँ गुनाह करता हूँ के आधार पर मनुष्य में गुण और दोष तो होते ही हैं। दुःख का विषय यह है कि गुणों का कम परन्तु दोषों का बढ़ा चढ़ा पेश करते हैं। यही िष्टि चिंता का विषय है।  लेखक भारतीय संस्कृति की गरिमा एवं स्वर्णिम भविष्य की कल्पना को साकार रूप में देखने का विश्वासी है। लेखक का मन यह देखकर दुखी होता है कि आज लोग गाँधी ,तिलक ,विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ के आदर्शों से क्यों विमुख हो रहे हैं।  महात्मा गाँधी की राम राज्य की कल्पना जिसका मूल अभिप्राय था।  दैहिक दैविक भौतिक तापा ,राम राज काहू नहीं व्यापा  से आज के शासक कोसों दूर है।  हमारे मनीषियों की महानता उनके आध्यात्मिक चिंतन की थी जिससे इस देश को विश्वगुरु कहा जाता था।  आज हम लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ रहे हैं। अतीत से ही यह देश विभिन्न जातियों एवं परिवारों का संगम रहा है।  सम्पूर्ण दुनिया में विश्व बंधुत्व का आदर्श स्थापित करने वाला देश आज सम्प्रदारियका एवं वैमनष्य से जूझ रहा है।ईमानदार एवं परीक्ष्मी संघर्षमय जीवन जी रहे हैं जब कि फ़रेबी एवं असामाजिक तत्व सुखमय जी रहे हैं।  परिस्थ्ति कुछ ऐसी हो गयी है कि जीवन के सच्चे आदर्शों के बारे लोगों की आष्टा ही हिलने लगी है।  परन्तु आज भी लेखक का मन निराश नहीं है। उसकी मान्यता है कि हमारे राष्ट्र के अतीत के आदर्श की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अपसंस्कृति का यह झोंका उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।  अतः ऊपर से चाहे कितना भी कोलाहल क्यों न हो ,अंदर से भारत अब भी महान है।  
लेखक के अनुसार आज सवत्र जो उहापोह की ितसिटी है उसके जिम्मेदार हम स्वयं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह काल एवं परिशतितयों के अनुसार  नियम कायदे बनता रहता है।  समय परिवर्तन के साथ वह उसमें संसोधन भी किया करता है।  इस परिवर्तन में यदि वह रंच मात्र भी भूल कर देता है तो हमें सदियों उसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है। आज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जो साधारण नियम कानून सबके लिए बनाये जाते हैं ,सुबिधापूर्ण वर्ग उसे अपने अनुसार मोड़ लेते हैं। सामाजिक कायदे कानून पुराने संस्कारों से टकराते हैं और उनके दोषों का निराकरण होता रहता हैं।  अतः परिष्ट्ती विशेष को देखकर हताश हो जाना ठीक नहीं है।  
लेखक ने अपने जीवन की दो घटनाओं का उल्लेख करता है यह बताता है कि सब कुछ होते हए भी आज भी समाज में अच्छे लोगों और अच्छाई की कमी नहीं है। एक बार लेखक यात्रा के समय दस रुपये किराये की जगह एक सौ रुपये का नोट दे दिया।  वह जाकर गाड़ी में बैठ गया परन्तु कुछ ही देर बाद टिकट बाबू उसे खोजते हुए सेकंड क्लास के डिब्बे में आया और माफ़ी मांगते हुए उन्हें नब्बे रुपये लौटा दिए।  लेखक के अनुसार इस घटना का आज भी बहुत महत्व है। यह ईमानदारी के प्रति हमारे खोये हुए विश्वास को जगाती है।  दूसरी घटना में लेखक एक बार सपरिवार बस से यात्रा कर रहा था। मंजिल के कुछ दूर पहले ही बस ख़राब हो गयी।  रात के दस बजे थे। सभी घबड़ाये हुए हुए था।  एकाएक कंडक्टर एक सायकिल लेकर तेज़ी से भागा। लोग ड्राइवर को घेर कर उस पर शक करने लगे कि वे लोग डाकुओं से मिले हुए हैं तथा उसे मारने पर उतारू हो गए।  लोगों के मन में दशहत बैठ गयी थी क्योंकि एक दिन पहले ही उस स्थान पर एक बस लूट ली गयी थी।  किन्तु थोड़ी देर में ही कंडक्टर ने एक खाली बस, साथ में पानी और कुछ दूध लेकर आया।लोगों के चेहरे खिल उठे और वह कबीर बारह बजे सकुशल मंजीत तक पहुंचे गए।  लोगों ने कंडक्टर को धन्यवाद दिया। ड्राइवर से माफ़ी मांगी। 
लेखक  निष्कर्ष पर पहुँचता कि यद्पि वातावरण विषाक्त है ,मनुष्य द्वारा बनाये नियम -कानून उसके लिए बाधक है।इसका उपाय परिस्थिति से पलायन नहीं है।हमें हमेशा आशान्वित होना चाहिए।सत्य का कभी पराभव नहीं होता।भारत अवश्य अपनी महानता हो प्राप्त करेगा।अतएव अभी निराश होने की जरुरत नहीं है।  

क्या निराश हुआ जाए का उद्देश्य kya nirash hua jaye extra question answer - 

क्या निराश हुआ जाए ? हज़ारी प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा लिखित एक प्रेरणात्मक निबंध है। देश की वर्तमान अवस्था  लेखक के मन में निराशा का भाव उठता है।  आज समाज में ठगी ,जालसाजी ,धोखाधड़ी का बोलबाला है। लोग अच्छाई को काम तथा बुराई को अधिक महत्व दे रहे हैं।  हर जगह नैतिकता का अवमूल्यन हो रहा है।  किन्तु इससे निराश होने की जरुरत नहीं है।  आज भी समाज में सत्य ,दया ,अहिंशा ,करुणा आदि भाव हैं चाहे वे दबे हुए ही क्यों न हो। एक न एक दिन सद्गुणों का उत्थान अवश्य ही तेज़ी से होगा और अमानवीय मूल्यों का ध्वंश हो जाएगा। अतः निराश होने की जरुरत नहीं है।  
सुबह सुबह उठकर अखबारों के कॉलम म प्रतदिन ठगी ,डकैती ,चोरी ,तस्करी और भष्ट्राचारी के समाचारों की विविधता को पढ़कर लेखक का चित्त बेचैन हो जाता है और यही उसकी उदासी का मूल कारण है।  आज का वातावरण बड़ा की प्रदूषित है।  हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।  जो व्यक्ति जितने ऊँचे पद पर है वह उतनी ही शंका की दृष्टि से देखा जाता है।  
राष्टपिता महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक ,भारत की आज़ादी के बाद भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे जहाँ सबको सुख ,सुविधा और विकाश का सामान अवसर मिले। वास्तव में उनका महत उद्देश्य राम -राज्य की कल्पना थी। मनुष्य सामाजिक नियम को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियमों एवं कानूनों को बनाता है। जब समाज में नवीन परिशतियाँ जन्म लेती है तो उस स्थितियों का सामना करने के लिए प्राचीन नियमों में परिवर्तन किया जाता है।  आज भी समाज में सेवा ,ईमानदारी तथा सच्चाई को महत्व दिया जाता है। लोग चोरी ,फरेब एवं धोखेबाज़ी की निंदा करते हैं। आज भी महिलाओं को सम्मान दिया जाता है और पर पीड़ा को अधर्म माना जाता है।  आज भी लोग बेबस लोगों की सहायता करने में अपने को धन्य मानते हैं।  जीवन में धोखेबाज़ी और विश्वासघात की घटनाएँ घटती ही रहती है।  इसे याद रखने से जीवन कष्टमय हो जाएगा। आज भी बहुत से ऐसे प्रसंग है जिनसे ढाढ़स और हिम्मत बंधती है।लेखक ने अपने जीवन की दो घटनाओं का उल्लेख करता है यह बताता है कि सब कुछ होते हए भी आज भी समाज में अच्छे लोगों और अच्छाई की कमी नहीं है। एक बार लेखक यात्रा के समय दस रुपये किराये की जगह एक सौ रुपये का नोट दे दिया।  वह जाकर गाड़ी में बैठ गया परन्तु कुछ ही देर बाद टिकट बाबू उसे खोजते हुए सेकंड क्लास के डिब्बे में आया और माफ़ी मांगते हुए उन्हें नब्बे रुपये लौटा दिए।  लेखक के अनुसार इस घटना का आज भी बहुत महत्व है। यह ईमानदारी के प्रति हमारे खोये हुए विश्वास को जगाती है।  दूसरी घटना में लेखक एक बार सपरिवार बस से यात्रा कर रहा था। मंजिल के कुछ दूर पहले ही बस ख़राब हो गयी।  रात के दस बजे थे। सभी घबड़ाये हुए हुए था।  एकाएक कंडक्टर एक सायकिल लेकर तेज़ी से भागा। लोग ड्राइवर को घेर कर उस पर शक करने लगे कि वे लोग डाकुओं से मिले हुए हैं तथा उसे मारने पर उतारू हो गए।  लोगों के मन में दशहत बैठ गयी थी क्योंकि एक दिन पहले ही उस स्थान पर एक बस लूट ली गयी थी।  किन्तु थोड़ी देर में ही कंडक्टर ने एक खाली बस, साथ में पानी और कुछ दूध लेकर आया।लोगों के चेहरे खिल उठे और वह कबीर बारह बजे सकुशल मंजीत तक पहुंचे गए।  लोगों ने कंडक्टर को धन्यवाद दिया। ड्राइवर से माफ़ी मांगी। इन घटनाओं से भी यह प्रमाणित होता है कि मनुष्यता के गुण अब भी बाकी है। अब भी समाज में दया ,माया ,प्रेम भाव बचे हुए हैं।    

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