जानिए शनि की साढ़ेसाती क्या है, इसके उदय, शिखर और अस्त चरण, भावों पर प्रभाव, इंदिरा गांधी की कुंडली का उदाहरण और राहत के आसान उपाय।
शनि की साढ़ेसाती क्या है? उदय, शिखर और अस्त चरण का पूरा फल
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनिश्चरः।
सार्धानि सप्त वर्षाणि तथा दुःखैर्युतो भवेत् ।।
शनि की साढ़ेसाती का वर्णन हमारे शास्त्रों में भी किया गया है। उपरोक्त श्लोक के अनुसार जब शनि जन्म पत्रिका में स्थित चंद्रमा से बारहवें भाव में, चंद्रमा की राशि में अथवा चंद्रमा से द्वितीय भाव में गोचर करे तो ये समय जातक को दुख प्रदान करने वाले माने जाते हैं। चूँकि चंद्रमा सबसे तेज चलने वाला ग्रह है। हमारा मन भी बहुत चंचल होता है इसलिए ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक कहा जाता है तथा मन की स्थिति को चंद्रमा के द्वारा ही देखा जाता है। चंद्रमा हमारी भावनाओं को दर्शाता है, इसलिए यदि जातक की पत्रिका में चंद्रमा की स्थिति अच्छी हो तो यह कहा जाता है कि जातक जीवन का आनंद भोगने में सफल होगा। शनिदेव सबसे धीरे चलने वाले ग्रह हैं तथा यह विरक्ति तथा दुख का भी कारक है। इसलिए यदि चंद्रमा जैसे ग्रह के करीब शनिदेव का गोचर हो तो यह स्थिति अच्छी नहीं मानी जाती क्योंकि दोनों ग्रहों के कार्यकत्व बिल्कुल विपरीत हैं, इसलिए चंद्रमा पर शनि का प्रभाव दुख तथा विरक्ति देने वाला कहा जाता है।
शनि देव को ज्योतिष शास्त्र में कर्म फल दाता के नाम से जाना जाता है। यही कारण है कि शनि देव का गोचर प्रत्येक जातक के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि जातकों के द्वारा किए गए कर्मों के परिणाम से ही जीवन की सफलताएँ तथा असफलताएँ तय होती हैं। जन्म पत्रिका में स्थित चंद्रमा के सापेक्ष शनि के गोचर को जानकर ही शनि की साढ़े साती का विचार किया जाता है। मोटे तौर पर यह कहा जाता है कि जिस राशि में लग्न पत्रिका में चंद्रमा स्थित हो उससे एक राशि पूर्व जब शनि गोचर करता हुआ आता है तब जातक की साढ़े साती प्रारंभ होती है। इसके पश्चात् गोचर का शनि लग्न पत्रिका के चंद्र राशि में आता है, तब भी शनि की साढ़े साती बरकरार रहती है। तत्पश्चात् शनि गोचर करते हुए उस राशि में जाता है, जो लग्न पत्रिका में चंद्रमा से द्वितीय हो, तब भी यह साढ़े साती बरकरार रहती है। अर्थात् जब गोचर का शनि लग्न पत्रिका की चंद्रराशि से द्वादश भाव में हो तब जातक की शनि की साढ़े साती प्रारम्भ होती है। यह साढ़े साती तब तक चलती रहती है जब तक गोचर का शनि लग्न पत्रिका की चंद्र राशि से द्वितीय राशि की यात्रा पूर्ण नहीं कर लेता। चूँकि शनिदेव एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं अतः तीन राशियों में वे लगभग साढ़े सात साल तक रहते हैं, इसलिए लग्न पत्रिका के सापेक्ष शनिदेव का यह गोचर शनि की साढ़े साती कहलाता है। अधिक बारीकी से व्याख्या करने के लिए लग्न पत्रिका में चंद्रमा की डिग्री को देखा जाता है। जब गोचर के शनि कि डिग्री चंद्रमा की डिग्री से 45° पूर्व हो तब शनि की साढ़ेसाती प्रारम्भ होती है और यह तब तक चलती है, जब तक गोचर के शनि की डिग्री लग्न के चंद्रमा की डिग्री से 45° आगे न हो जाए। जब गोचर के शनिदेव जन्म के चंद्रमा से एक भाव पहले स्थित होते हैं तो यह शनि की साढ़ेसाती का उदय चरण कहलाता है। जब गोचर के शनिदेव जन्म के चंद्रमा की राशि पर ही स्थित हो तो यह शनि की साढ़ेसाती का शिखर चरण कहलाता है तथा जब गोचर के शनिदेव जन्म के चंद्रमा से एक भाव आगे स्थित हो तो यह शनि की साढ़ेसाती का अस्त चरण कहलाता है।
यदि गोचर के शनिदेव चंद्रमा से बारहवें स्थान पर हो तो जातक की साढ़ेसाती प्रारंभ होती है। इस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि शनिदेव चंद्र कुंडली के बारहवें भाव में स्थित हैं तथा इस भाव में स्थित होकर वे दूसरे, छठवें तथा नवम भाव में दृष्टि डालेंगे। अतः इसप्रकार साढ़ेसाती के उदय चरण में शनिदेव चंद्र कुंडली के बारहवें, दूसरे, छठवें तथा नवम भाव को प्रभावित करते हैं। यदि जातक की कुंडली में शनि की स्थिति अच्छी नहीं हो तो शनि की साढ़ेसाती के उदय चरण में जातक को धन से संबंधित परेशानियाँ हो सकती हैं तथा उसके खर्चों में वृद्धि की संभावना हो सकती है। इसके अलावा संभव है कि इस चरण में जातक का भाग्य उसका साथ न दे। छठवाँ भाव संघर्षों का भाव है और शनि एक क्रूर ग्रह है इसलिए शनि की दृष्टि के प्रभाव से छठवें भाव के परिणामों में कमी हो सकती है। अतः जातक के जीवन में संघर्षों की कमी हो जाएगी। उपचय भावों में शनि की दृष्टि अच्छी मानी जाती है।
यदि गोचर के शनिदेव चंद्रमा की राशि में ही स्थित हो तो इस स्थिति में शनिदेव चंद्र कुंडली के लग्न में स्थित होकर तीसरे, सातवें तथा दसवें भाव पर दृष्टि डालेंगे। अतः यदि जातक की कुंडली में शनि की स्थिति अच्छी न हो तो शनि की साढ़ेसाती के शिखर चरण में इन भावों से संबंधित परेशानियां देखने को मिल सकती है। इस स्थिति में जातक को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि वैवाहिक जीवन को नीरस बना सकता है। लेकिन कई जातकों के विवाह शनि की साढ़ेसाती में होते हुए भी देखे गए हैं। दसवें भाव में शनि की दृष्टि होने पर जातक के करियर में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। तीसरे भाव में शनि की दृष्टि अच्छी मानी जाती है क्योंकि यह जातक के साहस या पराक्रम को बढ़ाती है।
यदि गोचर के शनिदेव चंद्रमा की राशि के दूसरे भाव में स्थित हो तो, इस स्थिति में शनिदेव चंद्र कुंडली के धन भाव में स्थित होकर चौथे, आठवें तथा एकादश भाव पर दृष्टि डालते हैं। अतः जातक को धन तथा आय से संबंधित परेशानियाँ हो सकती हैं। जातक के मानसिक शांति तथा सुख में कमी हो सकती है। हाँलाकि शनि की साढ़ेसाती के अस्त चरण में कई जातकों के मकान भी बनते हुए देखे गए हैं।
अतः शनि की साढ़ेसाती के उदय चरण में 2, 6, 9, 12 भाव, शिखर चरण में 1, 3, 7, 10 भाव तथा अस्त चरण में 2, 4, 8, 11 भाव प्रभावित होते हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शनि की साढ़ेसाती के साढ़े सात सालों में जातक की पत्रिका के पंचम भाव को छोड़कर प्रत्येक भाव प्रभावित होता है। इसके अतिरिक्त ज्योतिष शास्त्रों में अष्टम शनि तथा अर्धाष्टम शनि की व्याख्या भी की गई है, जिसमें यह कहा गया कि जब गोचर का शनि जन्म पत्रिका के चंद्रमा से चतुर्थ भाव में अथवा अष्टम भाव में हो, तब भी शनि के गोचर के दुष्प्रभाव जातक के जीवन में देखे जा सकते हैं। इसप्रकार शनि का गोचर (साढ़ेसाती, अष्टम तथा अर्धाष्टम शनि) जातक के जीवन के 40% भाग को प्रभावित करता है। सामान्यतः जातक के जीवन काल में तीन बार शनि की साढ़ेसाती आती है, लेकिन ऐसे जातक, जिनका जन्म ही शनि की साढ़ेसाती में होता है, उनके जीवन में चार बार भी शनि की साढ़ेसाती आ सकती है।
यदि पत्रिका में चंद्रमा कमजोर हो तथा वह शनि से भी प्रभावित हो, ऐसी स्थिति में जातक चाहता है कि वह सबके बीच लोकप्रिय इंसान बने तथा सब उसका उसका साथ दें, लेकिन ऐसा होता नहीं है। ऐसी स्थिति में जब शनि की साढ़ेसाती आती है तो जातक और भी अधिक परेशान हो जाता है। यदि पत्रिका में चंद्रमा बली हो तो ऐसा जातक सर्वदा खुश रहने वाला जातक होता है, इसलिए शनि की साढ़ेसाती आने पर भी वह अधिक तनाव में नहीं आता है। यदि जन्म पत्रिका में चंद्रमा बली हो तथा वह धनु, मीन, मकर अथवा कुंभ राशि में स्थित हो साथ ही उस पर शनि की दृष्टि भी हो तो ऐसी स्थिति में जातक विरक्ति के भाव में ही प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति होता है। अर्थात् वह एकांत में भी प्रसन्नता अनुभव करता है, ऐसी स्थिति में शनि की साढ़ेसाती आने पर भी उस पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन यदि जन्म पत्रिका में बली चंद्रमा ऐसी राशियों में स्थित हो जहां पर जातक का मन भोग में ही प्रसन्नता का अनुभव करता हो जैसे वृषभ, तुला, मिथुन इत्यादि, तब ऐसी स्थिति में शनि की साढ़ेसाती आने पर जातक को परेशानियों का अनुभव होता है। इसका कारण यह है कि शनि की साढ़ेसाती आने पर चंद्रमा पर शनि का प्रभाव के कारण जातक के जीवन में विरक्ति का समावेश होने लगता है तथा भोग में प्रसन्न रहने वाला जातक विरक्ति से परेशान हो जाता है। यदि जन्मपत्रिका में बली मंगल की दृष्टि शनि पर पड़ती हो या बली मंगल ने शनि को पीड़ित किया हो तथा मंगल की ही महादशा चल रही हो, इस स्थिति में यदि शनि की साढ़ेसाती आ जाए तो जातक को अधिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता है। यदि पत्रिका में चंद्रमा कमजोर हो तथा वह शनि से पीड़ित भी हो तथा चंद्रमा की महादशा में ही शनि की साडेसाती आ जाए तो जातक को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इस स्थिति में जातक को अंधेरे कमरों तथा अकेलेपन से दूर रहना चाहिए, क्योंकि अंधेरे में तथा अकेलेपन में शनि की प्रधानता बढ़ जाती है। अतः जातक को मन को प्रफुल्लित रखने की कोशिश करना चाहिए।
चंद्रमा के साथ-साथ पत्रिका का लग्न भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि शनि की साढ़ेसाती के समय लग्न पत्रिका और चंद्र पत्रिका दोनों में एक ही भाव प्रभावित हो रहा हो तो जातक को उस विशेष भाव से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अतः जातक को उस विशेष भाव के प्रति सचेत रहना चाहिए। उदाहरण के लिए माना कि किसी जातक के लिए लग्न मेष है तथा राशि मकर है। माना कि शनि की साढ़ेसाती के समय शनि का गोचर चंद्रमा की राशि से ही हो रहा हो तो इस स्थिति में चंद्र कुंडली में शनि लग्न में स्थित होकर सप्तम भाव पर दृष्टि डालेगा तथा लग्न पत्रिका में भी शनि दशम भाव में स्थित होकर सप्तम भाव पर दशम दृष्टि डालेगा। अतः जातक का सप्तम भाव दोनों कुंडलियों में शनि से प्रभावित हो रहा है, इसलिए जातक को सप्तम भाव से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार एक दूसरे उदाहरण के अंतर्गत माना कि किसी जातक का लग्न वृश्चिक राशि का है तथा उसकी चंद्र राशि कुंभ है। माना कि शनि की साढ़ेसाती के समय शनिदेव चंद्रमा से दूसरे भाव से अर्थात् मीन राशि से गोचर कर रहे हैं। इस स्थिति में चंद्र कुंडली का दूसरा भाव शनि से प्रभावित हो रहा है। लग्न पत्रिका में भी शनिदेव पंचम भाव में स्थित होकर दूसरे भाव पर अपनी दशम दृष्टि डाल रहे हैं। अतः दोनों कुंडलियों में शनिदेव द्वितीय भाव को प्रभावित कर रहे हैं, इसलिए जातक को द्वितीय भाव से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। अतः इस गोचर में जातक को अपने धन को लेकर सचेत रहना होगा। इस समय शनिदेव लग्न पत्रिका के एकादश भाव (कन्या राशि) पर भी सीधी दृष्टि डालेंगे इसलिए धन के प्रति विशेष जागरूक रहने की आवश्यकता होगी। इस प्रकार शनि की साढ़ेसाती में लग्न कुंडली तथा चंद्र कुंडली दोनों का एक साथ विवेचन करना आवश्यक है। यदि दोनों कुंडलियों में किसी विशेष भाव पर शनि की दृष्टि हो तो उस भाव से संबंधित परेशानियाँ आ सकती हैं।
शनि को कर्मफल दाता कहा जाता है, इसलिए शनि की साढ़ेसाती में जातक को उसके पुराने बुरे कर्मों के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ता है तथा उन परेशानियों के कारण कुछ न कुछ सीख भी ग्रहण करता है। इसप्रकार शनि की साढ़ेसाती में उसके बुरे कर्म कटते हैं। शनि की साढ़ेसाती में जातक को संयम, नियम और अनुशासन का पालन करना चाहिए। यदि लग्न पत्रिका में शनि महाराज शुभ भाव के स्वामी हो तो शनि की साढ़ेसाती में जातक को बहुत कम परेशानियों का सामना करना पड़ता है तथा कई बार अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए यदि लग्न पत्रिका में शनि भाग्येश हो तो जातक को शनि की साढ़ेसाती में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अलावा शनि की साढ़ेसाती का विश्लेषण करने के लिए हमें कुंडली के सारे ग्रहों की स्थिति और दृष्टि पर विचार करना चाहिए। अष्टकवर्ग के सिद्धांत के अनुसार शनि जिस भाव से गोचर कर रहा हो, उस भाव में यदि लग्न, लग्नेश और भाग्येश के द्वारा बिंदु प्राप्त होते हैं तथा लग्नेश बलवान हो तो जातक को शनि की साढ़ेसाती में परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता, अपितु जातक को अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त यदि लग्न पत्रिका में शनि कोई राजयोग का निर्माण कर रहा हो तब भी जातक को शनि की साढ़ेसाती के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। ऐसी स्थिति में जातक को शनि की साढ़ेसाती आने पर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। यदि शनि की साढ़ेसाती के दौरान लग्न पत्रिका में दूसरे ग्रहों के ऊपर से शनि का गोचर होता है, तो हमें उन ग्रहों के स्वामित्व वाले भावों को देखना चाहिए। इस स्थिति में उन सब भावों के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके अलावा सूर्य के ऊपर से शनि के गोचर को शुभ माना जाता है क्योंकि इस स्थिति में जातक को कार्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। शनि सेवा का कारक है इसलिए यदि शनि की साढ़ेसाती के दौरान जातक अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर निःस्वार्थ भाव से वृद्ध, बीमार या विकलांग व्यक्तियों की सेवा करता है तो उसकी परेशानियाँ कम हो सकती हैं। इसके अलावा शनि गायत्री मंत्र का जाप या महादेव या हनुमानजी या श्रीकृष्ण भगवान की उपासना भी लाभप्रद सिद्ध हो सकती है।
यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि शनि की साढ़ेसाती, शनि के गोचर के प्रभाव को ही दर्शाती है और ज्योतिष के नियमों के अनुसार गोचर का प्रभाव दशा व योग के बाद आता है। शनि की साढ़ेसाती की विवेचना करने के लिए गोचर के ही नियमों का विश्लेषण करना चाहिए। मोटे तौर पर यदि पत्रिका में चंद्रमा सिंह राशि में हो तो जातक को शनि की साढ़ेसाती का ज्यादा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इस स्थिति में चंद्र कुंडली में शनि षष्ठेश तथा सप्तमेश होता है तथा षष्ठम भाव त्रिक भाव और त्रिषडाय दोनों में आता है। यदि पत्रिका में चंद्रमा कर्क राशि में हो ऐसी स्थिति में शनि सप्तमेश तथा अष्टमेश होता है, चूँकि अष्टम भाव सम कहलाता है इसलिए इस स्थिति में जातक को शनि की साढ़ेसाती का उतना बुरा प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि चंद्रमा के सिंह राशि में होने पर पड़ता है। लेकिन शनि की साढ़ेसाती में किस भाव के बुरे अथवा किस भाव के अच्छे प्रभाव परिणाम प्राप्त होंगे, यह पूरी कुंडली का अच्छी तरह से विश्लेषण करने के पश्चात् ही कहा जा सकता है। शनि की साढ़ेसाती में किस भाव के बुरे परिणाम प्राप्त होंगे अथवा किस भाव के अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे यह जानने के लिए ज्योतिष शास्त्र में एक बहुत अच्छा नियम बताया गया है। इस नियम के एक भाग के अनुसार शनि की साढ़ेसाती के दौरान सर्वप्रथम लग्न पत्रिका के किसी भाव से अष्टम भाव को देखा जाता है। फिर उस अष्टम भाव के स्वामी ग्रह को जाना जाता है। तत्पश्चात् उस ग्रह की नवांश में स्थिति जानी जाती है। उस राशि को नोट किया जाता है, इसके साथ ही उस राशि से त्रिकोण में स्थित राशियों को भी नोट किया जाता है।जब गोचर का शनि उस राशि को अथवा उसके त्रिकोण में स्थित राशियों को प्रभावित करता है तब लग्न पत्रिका के उस भाव से संबंधित बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसी नियम के दूसरे भाग के अनुसार शनि की साढ़ेसाती के दौरान सर्वप्रथम लग्न पत्रिका के किसी भाव के स्वामी ग्रह को देखा जाता है। तत्पश्चात् उस ग्रह की नवांश में स्थिति जानी जाती है। उस राशि को नोट किया जाता है, इसके साथ ही उस राशि से त्रिकोण में स्थित राशियों को भी नोट किया जाता है।जब गोचर का शनि उस राशि को अथवा उसके त्रिकोण में स्थित राशियों को प्रभावित करता है तब लग्न पत्रिका के उस भाव से संबंधित शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।
उदाहरण के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी जी की पत्रिका पर विचार करते हैं (DOB: 19 November 1917, TOB: 23:11:20, POB: Allahabad)
लग्न पत्रिका:

नवांश पत्रिका:

श्रीमती इंदिरा गांधी जी के पिता श्री जवाहर लाल नेहरू जी की मृत्यु 27 मई 1964 में हुई थी। उस समय शनि का गोचर कुंभ राशि से हो रहा था। चूँकि लग्न पत्रिका में चंद्रमा मकर राशि में स्थित है, अतः उस समय जातिका की शनि की साढ़ेसाती चल रही थी। लग्न पत्रिका के नवम भाव में मीन राशि है। उससे आठवें भाव में तुला राशि स्थित है। तुला राशि का स्वामी शुक्र नवांश पत्रिका में स्वराशि तुला में ही स्थित है और उससे त्रिकोण भाव कुंभ तथा मिथुन है। चूँकि शनि का गोचर कुंभ राशि से ही हो रहा था इसलिए जातिका को लग्न पत्रिका के नवम भाव से संबंधित अशुभ परिणामों की प्राप्ति हुई, जिसके फलस्वरूप उनके पिता की मृत्यु हो गई।
श्रीमती इंदिरा गांधी जी 22 जनवरी 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनी। उस समय भी उनकी शनि की साढ़ेसाती चल रही थी। लग्न पत्रिका के दशम भाव में मेष राशि स्थित है। मेष राशि का स्वामी मंगल नवांश पत्रिका में सिंह राशि में स्थित है। जिसके त्रिकोण भाव में धनु राशि तथा मेष राशि आती है। गोचर का शनि उस समय कुंभ राशि में स्थित होकर सिंह राशि पर सीधी दृष्टि डालकर उसे प्रभावित कर रहा था। इसलिए जातिका को दशम भाव से संबंधित शुभ परिणामों की प्राप्ति हुई। जिसके फल स्वरुप वे देश की प्रधानमंत्री बन गई। इस प्रकार शनि की साढ़ेसाती में जातिका को नवम भाव से संबंधित अशुभ परंतु दशम भाव से संबंधित शुभ परिणाम की प्राप्ति हुई।
अतः यह कहा जा सकता है कि शनि की साढ़ेसाती में जातक को किसी भाव से संबंधित शुभ तो किसी भाव से संबंधित अशुभ परिणामों की प्राप्ति संभव है। अतः शनि की साढ़ेसाती से डरकर जातक को व्यर्थ ही चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। कुंडली का भली प्रकार विश्लेषण करके ही यह जाना जा सकता है कि शनि के इस गोचर में जातक को किस प्रकार के परिणामों की प्राप्ति होगी। यह लेख मैंने गुरुदेव श्री नितिन कश्यप जी तथा गुरुदेव श्री वी. पी. गोयल जी के चरणों में सादर नमन करते हुए उनके व्याख्यानों से प्रेरित होकर लिखा है।
- डॉ. सुकृति घोष
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र
शा. के. आर. जी. कॉलेज
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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