बाधकेश ज्योतिष का महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो जीवन में बाधाएं दर्शाता है। जानें सभी 12 लग्नों के बाधकेश ग्रह व कुंडली उदाहरण सहित पूरी जानकारी।
बाधकेश क्या है? जन्म पत्रिका में इसका महत्व और प्रभाव
ज्योतिषशास्त्र में राशियों को चर, अचर और द्विस्वभाव के रूप में तीन समूहों में बाँटा गया है। मेष, कर्क, तुला व मकर राशियाँ (1, 4, 7, 10) चर राशियाँ, वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ राशियाँ (2, 5, 8, 11) स्थिर राशियाँ तथा मिथुन, कन्या, धनु व मीन राशियाँ (3, 6, 9, 12) द्विस्वभाव राशियाँ कहलाती हैं। लग्न में स्थित राशि को देखकर पत्रिका के बाधक भाव को जाना जाता है। यदि चर राशि लग्न में हो तो ग्यारहवाँ भाव बाधक भाव कहलाता है। स्थिर राशि लग्न में हो तो नवम भाव तथा यदि द्विस्वभाव राशि लग्न में हो तो सप्तम भाव बाधक भाव कहलाता है। बाधक भाव का भावेश ही उस लग्न की पत्रिका के लिए बाधकेश होता है। द्विस्वभाव राशियों (3, 6, 9, 12) के स्वामी बुध (मिथुन व कन्या) व गुरु (धनु व मीन) होते हैं। बुध की लग्न हो अर्थात् लग्न में मिथुन या कन्या राशि हो तो सप्तम भाव में गुरु की राशि आती है। गुरु की लग्न हो अर्थात् लग्न में धनु या मीन राशि हो तो सप्तम भाव में बुध की राशि आती है। अतः बुध की लग्न हो तो गुरु तथा गुरु की लग्न हो तो बुध बाधकेश होता है। इसप्रकार मेष लग्न के लिए शनि, वृषभ के लिए शनि, मिथुन के लिए गुरु, कर्क के लिए शुक्र, सिंह के लिए मंगल, कन्या के लिए गुरु, तुला के लिए सूर्य, वृश्चिक के लिए चंद्रमा, धनु के लिए बुध, मकर के लिए मंगल, कुंभ के लिए शुक्र तथा मीन के लिए बुध बाधकेश होता है। बाधकेश के प्रभावों के अंतर्गत लोगों से अचानक विरोध, जातक के कार्य में बार-बार बाधाओं का आना, गुप्त शत्रुओं या षडयंत्रों का सामना करना इत्यादि हैं। बाधकेश जातक के द्वारा भौतिक सुखों को प्राप्त करने की दिशा में बाधा उत्पन्न करने वाला ग्रह माना जाता है। यही कारण है कि बाधकेश ग्रह जातक को आध्यात्मिक राह में ले जाने के लिए सहायक ग्रह भी कहा जाता है।
स्थिर लग्न की पत्रिका में नवम भाव का स्वामी ही बाधकेश कहलाता है। लेकिन ज्योतिष के नियमों के अनुसार नवम भाव, जो कि भाग्य भाव है, सर्वाधिक शुभ त्रिकोण भाव है। इस स्थिति में भाग्येश ही बाधकेश कैसे बन सकता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की पत्रिका में नवम भाव में मेष राशि आती है मेष राशि का स्वामी मंगल है, जो कि सिंह लग्न की पत्रिका में योगकारक ग्रह है। इस स्थिति में योगकारक ग्रह बाधकेश कैसे बन सकता है। इसी प्रकार वृषभ लग्न की पत्रिका में शनि नवमेश है, अतः बाधकेश है। इसके साथ ही वृषभ लग्न की पत्रिका में शनि योगकारक भी है। अतः बाधकेश ही योगकारक है। इसीप्रकार कुंभ लग्न की पत्रिका में शुभ ग्रह शुक्र योगकारक है तथा बाधकेश भी है। इसप्रकार के विरोधाभास के संबंध में ज्योतिष शास्त्रियों के अलग-अलग मत हैं। कई ज्योतिषशास्त्रियों का मानना है कि बाधक या बाधकेश का महत्व केवल मुहूर्त में होता है। उदाहरण के लिए यदि माना कि जातक के लग्न में सिंह राशि है। सिंह राशि स्थिर राशि है अतः उसका नवम भाव बाधक भाव कहलाता है। सिंह राशि से नवम स्थान में मेष राशि आती है। मेष राशि का स्वामी मंगल होता है, जो बाधकेश का कार्य करता है। अतः जातक को उस मुहूर्त का चयन किसी भी शुभ कार्य के लिए नहीं करना चाहिए, जिसका लग्न मेष का हो, साथ ही उस लग्न को भी किसी शुभ कार्य के लिए त्याग देना चाहिए जिसके लग्न में मंगल स्थित हो। लेकिन कई ज्योतिषशास्त्री जन्म पत्रिका में भी बाधक भाव तथा बाधकेश को महत्व देते हैं। कुछ ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि पत्रिका में बाधकेश जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव के लिए बाधा उत्पन्न करता है। कई ज्योतिषशास्त्रियों के अनुसार बाधकेश यदि शुभ भाव का स्वामी हो तो थोड़े संघर्षों के बाद उन्नति देता है। एक अन्य नियम के अनुसार बाधकेश केवल लग्न में स्थित होने पर ही बाधा देता है, इस नियम को अनेक पत्रिकाओं में सटीक परिणाम देते हुए देखा गया है। मेष लग्न में शनि बाधकेश होकर मेष में ही स्थित हो तो वह नीच का होता है, इस स्थिति में वह सामान्य रूप से ही अच्छे परिणाम देने में समर्थ नहीं होगा। इसीप्रकार तुला राशि के लिए सूर्य बाधकेश है तथा वह तुला में नीच का भी होता है। मीन राशि के लिए बुध बाधकेश है और वह मीन में नीच का होता है इसीप्रकार वृश्चिक राशि के लिए चंद्रमा बाधकेश है और वह वृश्चिक में ही नीच का होता है। अपवाद स्वरूप मकर राशि के लिए मंगल बाधकेश है लेकिन मंगल मकर में उच्च का होता है। मकर राशि शनि की राशि है और शनि, मंगल को शत्रु मानता है। अतः मकर राशि में स्थित मंगल तो बली होता है, लेकिन मकर राशि या वह भाव जिसमें मकर राशि स्थिर है कमजोर हो जाती है। इसलिए यदि लग्न में मकर राशि हो और उसमें मंगल स्थित हो तो यह स्थिति लग्न के लिए अच्छी नहीं मानी जाती।
अनेक पत्रिकाओं के अध्ययन के उपरांत यह देखा गया कि किसी भी पत्रिका में अकेला बाधकेश कोई भी समस्या उत्पन्न करने में लगभग असमर्थ होता है। यदि बाधकेश जन्म पत्रिका के लग्न में ही स्थित हो साथ ही वह तृतीयेश या षष्ठेश के साथ युति कर रहा हो तो वह जातक के जीवन में परेशानियाँ तथा बाधाएँ दे सकता है। बाधकेश की दशा में तृतीयेश, षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश की अंतर्दशा हो, इसके साथ ही यदि बाधकेश संवेदनशील भावों (जैसे लग्न या भाग्य भाव) पर गोचर कर रहा हो, उस समय जातक के जीवन में बाधकेश का अधिक प्रभाव देखा जा सकता है। प्रत्येक राशि के लिए एक ग्रह बाधकेश का कार्य करता है। पत्रिका के किसी भी भाव से संबंधित बाधाओं का विश्लेषण करने के लिए सर्वप्रथम उस भाव की राशि के बाधकेश को जाना जाता है। उदाहरण के लिए माना कि किसी जातक की पत्रिका के किसी भाव में मेष राशि है। चूँकि मेष राशि चर राशि है, अतः मेष से ग्यारहवें भाव का स्वामी अर्थात् शनि, मेष राशि के लिए बाधकेश है, इसलिए यदि शनि, किसी भी लग्न की पत्रिका में मेष में ही स्थित हो (जो कि उसकी नीच की राशि भी है) तो जातक को उस भाव से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी प्रकार वृषभ राशि स्थिर राशि है, अतः उससे नवम भाव में मकर राशि आती है, जिसका स्वामी शनि वृषभ राशि के लिए बाधकेश का कार्य करता है। अतः यदि किसी पत्रिका के किसी भाव में वृषभ राशि में शनि स्थित हो तो जातक को उस भाव से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसप्रकार प्रत्येक राशि के लिए देखा जा सकता है। लेकिन यह बात ध्यान देने योग्य है कि अकेला बाधकेश किसी भी भाव को खराब नहीं करता है। यदि किसी भाव का बाधकेश उसी भाव में स्थित हो तथा वह पत्रिका के बाधकेश के साथ युति में हो तभी वह उस भाव के लिए बाधा उत्पन्न कर सकता है।
उदाहरण के लिए निम्नलिखित पत्रिका पर विचार करते हैं:
DOB: 29-07-1979, TOB: 12:30:00, POB: New Delhi
उपरोक्त पत्रिका के लग्न में तुला राशि है। तुला राशि चर राशि है, इसलिए तुला राशि से ग्यारहवाँ भाव बाधक भाव कहलाएगा। जिसका स्वामी सूर्य तुला राशि के लिए बाधकेश का कार्य करेगा। पत्रिका के दसवें भाव में कर्क राशि है। कर्क राशि भी चर राशि है, इसलिए कर्क राशि से ग्यारहवें भाव में स्थित वृषभ राशि, कर्क राशि के लिए बाधक भाव है, जिसका स्वामी शुक्र कर्क राशि के लिए बाधकेश का कार्य करेगा। उपरोक्त पत्रिका में कर्क राशि का बाधकेश में शुक्र, कर्क में ही स्थित है। साथ ही शुक्र सूर्य के साथ युति में भी है। जहाँ सूर्य, लग्न के लिए बाधकेश है। अतः दसवें भाव का बाधकेश लग्न के बाधकेश के साथ युति में है। इसलिए इस पत्रिका में यह कहा जा सकता है कि जातक को दसवें भाव से संबंधित परेशानियाँ या बाधाओं का सामना कर पड़ सकता है, क्योंकि यहाँ दशम भाव का बाधकेश अकेला नहीं है, वह लग्न के बाधकेश के साथ युति में है।
उपरोक्त पत्रिका (DOB: 13-01-1985, TOB: 9:15, POB: New Delhi) में लग्न में कुंभ राशि है जो कि एक स्थिर राशि है। अतः इसके लिए बाधक भाव नवम भाव अर्थात् तुला राशि है, जिसके स्वामी शुक्र इस पत्रिका के लिए बाधकेश है। पत्रिका में शुक्र लग्न में ही स्थित है तथा तृतीय भाव के स्वामी मंगल के साथ युति में है। अतः बाधकेश अकेला नहीं है वह तृतीयेश के साथ युति में है इसलिए उसे बल मिल रहा है। तृतीय भाव साहस का भाव है तथा मंगल ग्रह स्वयं भी साहस का कारक है। शुक्र स्त्रियों का कारक है तथा स्त्रियों के साथ संबंधों को भी दर्शाता है। अतः जातक के लिए लोगों की धारणा अच्छी नहीं होगी अर्थात् लोगों के मन में जातक की छवि अच्छी नहीं होगी। इस कारण जातक को जीवन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
बाधकेश जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव को नुकसान नहीं पहुंचता, अपितु जिस भाव में स्थित होता है, केवल उसी भाव को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन यदि बाधकेश अकेला हो तो कोई बाधा नहीं देता, अर्थात् यदि बाधकेश अकेला हो तो उसके प्रभाव को नकारा जा सकता है। बाधकेश, बाधा तभी देता है जब वह पत्रिका के तृतीयेश या षष्ठेश के साथ युति में हो। यहाँ केवल युति का ही प्रभाव देखा गया है, बाधकेश पर तृतीयेश या षष्ठेश की दृष्टि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता (बाधा के संदर्भ में)। इसीप्रकार यदि किसी राशि का बाधकेश, पत्रिका के लग्न के बाधकेश के साथ युति में हो तो उस भाव के लिए बाधा उत्पन्न करता है, जिस भाव में यह युति हो रही हो। यदि किसी राशि का बाधकेश तृतीयेश/षष्ठेश या लग्न के बाधकेश के साथ युति में हो तो उस ग्रह के नैसर्गिक कार्यकत्वों के कारण उस भाव के लिए बाधा उत्पन्न होती है। जैसे यदि किसी राशि का बाधकेश, मंगल के साथ युति में हो, तो यह गुस्सा/लड़ाई/झगड़ा के माध्यम से उस भाव की उन्नति में बाधा उत्पन्न करता है। यदि शनि के साथ युति में हो तो दीर्घकालीन देरी के माध्यम से बाधा उत्पन्न करता है। यदि बुध के साथ हो तो बुद्धि के कारण या अतिचिंतन के कारण बाधा देता है। सूर्य के साथ युति में हो तो अति आत्मविश्वास या अभिमान के कारण, चंद्रमा के साथ युति हो तो परिवर्तनशीलता या संवेदनशीलता के कारण, गुरु के साथ युति हो तो ज्ञान या ज्ञान के अभिमान के कारण, शुक्र के साथ युति हो तो प्रेम या रिश्तों के कारण बाधा उत्पन्न होती है। यदि किसी राशि का बाधकेश राहु या केतु के साथ युति में हो तब भी बाधकेश को बल मिल जाता है। इस स्थिति में अज्ञात भय या गलतफहमी इत्यादि के कारण उस भाव के कारकों में बाधा उत्पन्न होती है। यदि पत्रिका का बाधकेश, षष्ठेश के साथ युति में हो अथवा किसी राशि का बाधकेश उसी राशि में पत्रिका के षष्ठेश के साथ युति में हो तो उस भाव से संबंधित अभिचार (काला जादू) के कारण बाधा की संभावना हो सकती है अथवा उस भाव से संबंधित गुप्त शत्रुओं के कारण बाधा उत्पन्न हो सकती है या उस भाव से संबंधित रोग या कानूनी समस्याओं के कारण बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसके अतिरिक्त यदि कोई वक्री ग्रह बाधकेश के साथ युति में हो तब भी बाधकेश को बल मिल जाता है।
उपरोक्त पत्रिका (DOB: 07-06-1991, TOB: 17:00, POB: Delhi) में लग्न में तुला राशि है। तुला राशि के लिए सूर्य बाधकेश है, लेकिन इस पत्रिका का बाधकेश, तृतीयेश या षष्ठेश के साथ युति में नहीं है, अतः यह जातक के जीवन में कोई बाधा नहीं डालेगा। पत्रिका के दशम भाव में कर्क राशि है। कर्क राशि के लिए शुक्र बाधकेश होता है जो कि कर्क राशि में ही स्थित है तथा बृहस्पति के साथ युति में है, जहाँ बृहस्पति इस पत्रिका के लिए तृतीयेश और षष्ठेश दोनों है। अतः जातक को दशम भाव के कार्यकत्वों अर्थात् कर्मक्षेत्र से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ेगा। दशम भाव में मंगल भी शुक्र और गुरु के साथ युति में है। मंगल द्वितीयेश और सप्तमेश है। अतः जातक को सप्तम भाव और द्वितीय भाव से संबंधित बाधाओं का भी सामना करना पड़ेगा।
उपरोक्त पत्रिका (DOB: 08-11-1999, TOB: 12:32PM, POB: Delhi) मकर लग्न की है, जिसका बाधकेश मंगल अकेला ही बारहवें भाव में स्थित है, अतः इस पत्रिका में बाधकेश के रूप में मंगल का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। पत्रिका में लग्नेश शनि वक्री है। चतुर्थ भाव में मेष राशि है, जिसके लिए शनि बाधकेश है जो कि चतुर्थ भाव में ही तृतीयेश बृहस्पति के साथ स्थित है। इस कारण जातिका को चतुर्थ भाव से संबंधित बाधाओं का सामना करना पड़ा। उसके जीवन में मानसिक शांति तथा पारिवारिक सुख का अभाव रहा तथा चतुर्थ भाव के कार्यकत्वों में आई बाधाओं के लिए जातिका स्वयं ही जिम्मेदार रही लेकिन चूँकि शनि वक्री भी है इसलिए वह इस बात को स्वीकार भी नही कर पाई।
यह लेख मैंने गुरुदेव श्री नितिन कश्यप जी को नमन करते हुए उनके व्याख्यानों से प्रेरित होकर लिखा है।इस प्रकार लग्न तथा विभिन्न भावों के लिए बाधकेश का विश्लेषण करके जातक के जीवन में आने वाली समस्याओं और बाधाओं के बारे में जाना जा सकता है।
- डॉ. सुकृति घोष
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र
शा. के. आर. जी. कॉलेज
ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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