बीस साल पुरानी दोस्ती, एक हादसा और छिपा हुआ राज़ — पढ़िए 'कैद', अपराध-बोध और पश्चाताप की एक मार्मिक व संवेदनशील हिंदी कहानी।
कैद
रोज की तरह उस दिन भी शाम को मैं कॉलेज से लौटकर, चाय की प्याली थामकर, बाहर बालकनी में रखी हुई आरामकुर्सी पर पसर गई। सूरज दादा अपनी किरणों को समेटकर लौटने की तैयारी में थे, लेकिन शरारती किरणें जाते-जाते भी ऊँचे पर्वत शिखरों पर केसर का तिलक लगा रही थी। उस पर्वतीय इलाके में दूर-दूर तक फैली घाटियाँ धीरे-धीरे धुंध की दुशाला ओढ़ने लगी थी। मैं देर तक प्रकृति की उस पावन सुंदरता को निहारती रही। अचानक मोबाइल की रिंग से मेरी तंद्रा टूटी, "प्रिया" नाम देखकर चौंक ही गई...आज अचानक इतने सालों बाद..."कैसी है यार?" उधर से वही खनकती हुई मीठी सी आवाज़ आई, "सुन, अगले संडे आ रही हूँ, दो दिन के लिए, बहुत सारी बातें करनी है यार।" प्रिया ने कहा था। फोन आने के बाद मेरा मन उद्वेलित हो उठा। मन में जाने क्यों एक अजीब सी उथल-पुथल सी होने लगी। पुरानी सारी बातें एक-एक करके इस तरह आँखों के सामने तैरने लगी, मानो वो सब कल की ही बात हो।
प्रिया और मैं स्कूल-कॉलेज में एक ही बैच में थे। हमारी जान पहचान बचपन से ही थी, बहुत गहरी दोस्ती न सही लेकिन हाय-हैलो तो थी ही। कॉलेज में प्रिया के और मेरे विषय अलग-अलग थे। यह एक संयोग ही था कि हम दोनों की पहली नियुक्ति पहाड़ी क्षेत्र के उस सुंदर से शहर के कॉलेज में हो गई। नया जोश और नई उमंग के साथ हम दोनों ने सहर्ष अपना कार्यभार संभाला था और उन नई जिम्मेदारियों में स्वयं को ढालने में लग गई थी। हमारे विभाग आमने सामने ही थे। हम दोनों में अब गहरी दोस्ती हो चली थी। फ्री होते ही प्रिया और मैं अक्सर कम्प्यूटर लैब में बैठ जाते थे। उस कम्प्यूटर लैब की वायरिंग में जाने क्या खराबी थी कि उसमें आए दिन स्पार्किंग होकर लाईट चली जाती थी, जिसके लिए बार-बार इलेक्ट्रिशियन को बुलाना पड़ता था। हम दोनों वहाँ बैठकर, टिफिन खाते, गपशप-हँसी-मज़ाक करते। प्यारी और सलोनी प्रिया का शांत-शिष्ट व्यवहार, सहज-सरल मुस्कान, मासूम अंदाज और काम के प्रति ईमानदारी सबको भाने लगी थी। उन दिनों डॉ. कुलकर्णी हमारे विभाग के विभागाध्यक्ष थे। लगभग अड़तालीस वर्ष के प्रौढ़, औसत चेहरा-मोहरा, औसत कद, विवाहित, दो बड़े बच्चों के पिता।
इधर कुछ दिनों से डॉ. कुलकर्णी में कुछ खास बदलाव देखे जाने लगे। वे अपनी वेशभूषा तथा अपने रखरखाव पर कुछ अधिक ही ध्यान देने लगे थे। अब वे कुछ गहरे रंग के कपड़े पहनते, अपने बालों को रंगते, परफ्यूम लगाते। उनके इस बदलाव को मेरे और प्रिया के अलावा भी कई लोगों ने नोटिस किया था। मैं और अन्य युवा साथीगण कम्प्यूटर लैब में बैठकर गपशप करते, लेकिन जैसे ही प्रिया वहाँ आती, तो अक्सर डॉ. कुलकर्णी भी वहाँ आ जाते। इतने सीनियर प्रोफेसर के वहाँ आते ही हम सब बेहद औपचारिक हो जाते। शांत स्वभाव वाली प्रिया की तो मानो बोलती ही बंद हो जाती। लेकिन वे प्रिया से ही बात करने की कोशिश करते, उसके पास वाली चेयर पर बैठते। प्रिया को बहुत अजीब लगता और बेहद नागवार गुजरता। लेकिन बेचारी उनसे कुछ कह नहीं पाती थी। हम दोनों अकेले में उनका खूब मजाक बनाते, "उम्र पचपन की और दिल बचपन का" "अभी से सठिया गए हैं" "घर में बीवी पूछती नहीं होगी" और भी जाने क्या-क्या कहते और खूब हँसते थे हम लोग। हालाँकि डॉ. कुलकर्णी ने कभी अभद्रता नहीं कि लेकिन प्रिया के प्रति उनके लगाव को स्वतः ही जाना जा सकता था, जिसके कारण प्रिया असहज महसूस करती थी। उनकी हरकतों से तंग आकर प्रिया ने हमारे विभाग में आना ही कम कर दिया था, लेकिन अब वे अक्सर उसके विभाग में जा धमकते। प्रिया को उनसे बहुत चिढ़ होने लगी थी, वे उसे फूटी आँख न सुहाते। "परेशान कर दिया हैं उन्होंने, बिन बुलाए मेहमान की तरह रोज आ जाते हैं यार, चैन से जीना मुश्किल कर दिया है मेरा, जबरदस्ती बात करते हैं मुझसे" प्रिया अक्सर मुझसे कहती। "मैं क्या करूँ मेरी समझ में नहीं आ रहा" प्रिया बहुत परेशान होती। "थोड़े समय बाद अपने-आप सब ठीक हो जाएगा।" मैं उसे समझाती।
दो दिन की छुट्टी के बाद प्रिया कॉलेज आई तो खुशी से दमकते चेहरे और मोहक मुस्कान के साथ अपनी सगाई की खबर और मिठाई का डब्बा भी साथ लाई थी। खबर सुनते ही डॉ. कुलकर्णी का चेहरा दप्प से बुझ गया। दिनभर अनमने से दिखाई दिए। किसी के पूछने पर मैंने उन्हें कहते हुए सुना "आज मेरा मोबाइल घर पर रह गया है।" उस रोज मेरे घर मे मेहमान आने वाले थे, तो मैं जल्दी ही घर चली गई थी और इतनी व्यस्त हो गई कि फोन देखने का भी समय नहीं मिल पाया। अगले दिन जब मैं कॉलेज पहुँची तो चर्चाओं का माहौल गर्म था। एक बड़ी ही दुखद घटना की जानकारी मिली। पता चला कि कल शाम सबके जाने के बाद डॉ. कुलकर्णी देर तक एसी चलाकर चुपचाप कम्प्यूटर लैब में बैठे रहे थे। कर्मचारी को लगा कि सब लोग चले गए तो वह भी कॉलेज बंद करके चला गया। डॉ. साहब कल मोबाइल भी घर भूल आए थे। शाम से रात हो गई तो घरवालों को चिंता हुई, उन्होंने कॉलेज खुलवाया तो देखा कि कम्प्यूटर लैब में बुरी तरह आग लगी हुई थी, शायद हमेशा की तरह वहाँ स्पार्किंग हुई होगी। लैब का दरवाजा पूरी तरह जल चुका था। डॉ. कुलकर्णी बुरी तरह झुलस गए थे। किसी तरह बेहोशी की हालत में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन एक बात सबकी समझ से बाहर थी कि जब आग लग रही थी तो डॉ. कुलकर्णी उस लैब से बाहर क्यों नहीं निकले।
मैं उन्हें देखने अस्पताल गई थी, जहाँ उनकी हालत मुझसे देखी नहीं जा रही थी। मैंने प्रिया को भी अपने साथ चलने के लिए कहा था, लेकिन वो किसी भी हालत में जाने के लिए तैयार नहीं हुई थी। डॉ. कुलकर्णी को बचाया नहीं जा सका था। इस अप्रत्याशित दुर्घटना ने सबको स्तब्ध कर दिया था। प्रिया भी बेहद सहमी और गुमसुम सी रहने लगी थी, मानो हँसना ही भूल गई हो। उसकी सुंदर आँखों में अजीब सी भीरूता और सूनापन उतर आया था। "मेरा मन नहीं लगता यहाँ, मैं यहाँ से जाना चाहती हूँ।" एक दिन उसने मुझसे बड़े ही भारी मन से कहा था। "क्यों?" मेरे पूछने पर उसकी आँखें भर आईं, उन्हीं डबडबाई आँखों से उसने मुझे देखा था। जाने क्या था उन आँखों में, जैसे मुझे कुछ बताना चाहती हों, समझ ही नहीं पाई थी मैं। कुछ महीनों बाद प्रिया ने अपना ट्रांसफर अपने भावी पति के शहर में करवा लिया था। प्रिया को रिलीविंग लेटर मिल गया था और आज इतने दिनों बाद उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट देखने को मिली, लेकिन मुझसे गले मिलकर रोई भी खूब।
प्रिया के जाने का दुख मुझे कई दिनों तक सालता रहा था। लेकिन प्रकृति ने आँखों के साथ मन का एक गहरा रिश्ता बनाया है, व्यक्ति के आँखों से ओझल होते ही मन भी धीरे-धीरे उसकी छवि को धुंधली करने ही लगता है। समय की रेलगाड़ी किसी अनजाने सुखद गंतव्य की ओर तेज गति से चल पड़ी थी, इतनी तेज कि पीछे छूटने वाले स्टेशन भी अर्थहीन हो चले थे। मैं अपने घर-परिवार, पति-बच्चे और नौकरी में व्यस्त हो चली थी। साल दर साल गुजरते चले गए। इस बीच प्रिया ने मुझे कभी कॉल नहीं किया लेकिन मैंने कई बार उससे फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन वो हर बार सिर्फ एक या दो मिनट ही बात करती और फिर किसी काम का बहाना बना देती। मुझे कोफ्त होने लगी थी, मैं स्वयं को अपमानित महसूस करती, आखिरकार मैंने भी उसे कॉल करना छोड़ दिया था। प्रिया को देखे हुए लगभग बीस साल बीत गए। मेरा विवाह उसी शहर में हुआ था, इसलिए मेरी पूरी नौकरी उसी कॉलेज में रही जहाँ से मैंने शुरुआत की थी।
इतने सालों बाद अचानक प्रिया का आना किसी अचरज से कम नहीं था। वो किसी रिश्तेदार की शादी में आई थी, लेकिन आते ही मुझसे मिलने के लिए दौड़ी चली आई। "इतने सालों बाद देख रही हूँ तुझे !" कहकर उसने मुझे कसकर गले से लगा लिया। मुझे रोना आ गया,"फोन पर मुझसे बात क्यों नहीं करती थी, प्रिया?" मैंने पूछा था। मेरी बात सुनकर उसका चेहरा उतर सा गया, "तुझे बहुत सारी बातें बतानी है यार, शायद तुझे बताकर मुझे थोड़ा चैन मिले" उसने कहा और सोफे पर बैठ गई। "तुझे याद है, वो डॉ. कुलकर्णी ?" प्रिया ने पूछा। "हाँ यार, याद क्यों नहीं होंगे?" जवाब में मैंने कहा। "उस दिन तू जल्दी घर चली गई थी। लगभग पौने पाँच बजे मैं स्टाफ रूम में अकेली ही बैठी-बैठी पढ़ रही थी कि अचानक डॉ. कुलकर्णी आ गए। उनका इस तरह आना और मुझे एकटक देखना, मुझे बहुत गंदा लगा, मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। एक पल को मुझे लगा कि मैं उनकी आँखें नोच लूँ। मेरे सिर पर भूत सवार हो गया कि आज तो इन्हें सबक सिखाना ही पड़ेगा। मैंने किसी तरह खुद को संयत करते हुए उनसे कहा कि सर चलिए, कम्प्यूटर लैब में बैठते हैं। मेरी बात सुनकर उनकी तो बाँछें खिल गई। कम्प्यूटर लैब में जाकर वे कुर्सी पर बैठ गए। मैं भी उनके साथ उस लैब में गई लेकिन तुरंत ही बाहर निकल आई और लैब का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। इसके बाद तमतमाती हुई मैं जल्दी से कॉलेज से निकल गई। मुझे लगा कि वो किसी को फोन करके दरवाजा खुलवा लेंगे, मुझे नहीं पता था कि उस दिन वो मोबाइल घर पर भूल आए थे।" प्रिया कहती जा रही थी और मैं हतप्रभ होकर सुनती रही। "मैं सिर्फ उन्हें सबक सिखाना चाहती थी यार, मुझे पता नहीं था कि इतनी बड़ी दुर्घटना घट जाएगी।" कहते कहते प्रिया ज़ार ज़ार रोने लगी। "मैंने सोचा था उन्हें उस लैब में कैद करके सबक सिखाऊँगी, लेकिन उस दिन के बाद मेरी चेतना ही मानो उस लैब में कैद होकर रह गई। तब से लेकर अब तक एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब मैंने खुद को उस घटना के लिए न कोसा हो। अपने अपराध बोध के कारण ही मैं तुझसे बात करने में कतराती थी यार। लाख पश्चाताप करूँ, लेकिन मैं अपने अपराध बोध से जीवन भर मुक्त नहीं हो पाऊँगी" प्रिया रो रोकर बताती रही और मैं अवाक् होकर सुनती रही। "जाने दे यार, उस परिस्थिति में तुझे जो ठीक लगा तूने किया, खुद को दोष मत दे। लेट इट गो। अपने आप को माफ कर दे और सुन किसी से कभी भी बताना मत। बस, तेरा और मेरा सीक्रेट है। समझी।" मैं खुद को संभालकर उसे समझाती रही। कर्म के बंधन में यहाँ हर कोई कैदी ही है, कैदखाने सबके अलग-अलग हैं। कोई प्रेम में कैद तो कोई नफरत में, कोई यादों में कैद तो कोई पश्चाताप में, कोई अधूरी आकांक्षाओं में कैद तो कोई अतृप्त वासनाओं में। मुक्त तो यहाँ कोई भी नहीं....मैं प्रिया को सांत्वना देती हुई सोचती रही थी।
- डॉ. सुकृति घोष
प्राध्यापक, भौतिक शास्त्र
शा. के. आर. जी. कॉलेज
ग्वालियर, मध्यप्रदेश


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