रोहित अब धीरे-धीरे बड़ा हो चुका था। घर में उसकी खिल खिलाहट, पढ़ाई, खेल और शरारतों से रौनक तो बनी रहती थी, लेकिन रेवती के मन का एक कोना फिर भी खाली-सा
डैडीज गर्ल
रोहित अब धीरे-धीरे बड़ा हो चुका था। घर में उसकी खिल खिलाहट, पढ़ाई, खेल और शरारतों से रौनक तो बनी रहती थी, लेकिन रेवती के मन का एक कोना फिर भी खाली-सा रहने लगा था। उसे महसूस होता कि बेटा जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है, वैसे-वैसे वह अपने पिता का प्रतिबिंब बनता जा रहा है। स्कूल से लौटते ही सबसे पहले वह पापा को दिनभर की हर छोटी-बड़ी बात बताता। रात में पापा के साथ ही सोना, छुट्टी के दिन पापा के साथ घूमना, बाज़ार जाना, क्रिकेट खेलना—यही उसकी दुनिया थी। रेवती मुस्कुराती अवश्य थी, पर भीतर कहीं एक हल्की-सी कसक भी उठती थी। एक दिन उसने अपने पति से कहा, "जानते हो, बेटा कितना भी अच्छा हो, लेकिन माँ की एक बेटी तो होनी ही चाहिए।" पति मुस्कुराए, "ऐसा क्यों?" रेवती ने हँसते हुए कहा, "क्योंकि बेटी ही तो माँ की पहली सहेली होती है। वही चोटी बनवाती है, नई साड़ी पर राय देती है, मेहँदी लगाती है, रसोई में चटपटी चीज़ें बनाना सीखती है, छोटी-छोटी बातें माँ से साझा करती है। बेटा चाहे कितना भी प्यारा हो, वह यह सब कहाँ करेगा?" पति ने मज़ाक में कहा, "और अगर बेटी भी मेरी तरह निकल गई तो?" रेवती खिलखिला उठी, "ऐसा मत कहिए, इस बार तो वह मेरी ही होगी।" समय के साथ यह इच्छा उसके मन में इतनी गहरी हो गई कि उसने दोबारा माँ बनने का निर्णय लिया। उसे पता था कि गर्भावस्था आसान नहीं होगी।
नौ महीने का शारीरिक परिवर्तन, उल्टियाँ, कमजोरी, प्रसव का असहनीय दर्द—सब फिर से सहना पड़ेगा। लेकिन इस बार उसके मन में दर्द से बड़ा एक सपना था—एक नन्ही बेटी का। गर्भधारण के कुछ ही दिनों बाद उसके भीतर एक अनोखा विश्वास जन्म लेने लगा। वह बार-बार अपने पेट पर हाथ रखकर कहती, "मेरी बिटिया आ रही है।" परिवार वाले हँस देते। कोई कहता, "अभी तो डॉक्टर ने कुछ नहीं बताया।" रेवती मुस्कुराकर कहती, "माँ का मन डॉक्टर से पहले जान जाता है।" वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो गर्भ के शुरुआती दिनों में केवल माँ की भावना के आधार पर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि गर्भ में पुत्र है या पुत्री। भ्रूण का लिंग निषेचन के क्षण में ही गुणसूत्रों (XX या XY) से निर्धारित हो जाता है, लेकिन माँ को उसका वास्तविक ज्ञान नहीं होता। फिर भी मनोविज्ञान बताता है कि गर्भावस्था के दौरान माँ और शिशु के बीच एक अत्यंत गहरा भावनात्मक संबंध बनता है। कई बार माँ की अंतःप्रेरणा सही भी निकल आती है, तो कई बार नहीं।
विज्ञान इसे संयोग या अवचेतन मन की अनुभूति मानता है। भारतीय परंपरा में इसे “मातृ-अंतर्ज्ञान” कहा गया है। मान्यता है कि ईश्वर माँ के हृदय को ऐसी सूक्ष्म संवेदनाएँ देता है जिन्हें शब्दों में समझाना कठिन है। गर्भावस्था के दिन आगे बढ़ते गए। रेवती को सबसे बड़ा आश्चर्य रोहित को देखकर होता। जिस बेटे को वह केवल "पापा बॉय" समझती थी, वही अब उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया था। सुबह स्कूल जाने से पहले वह पूछता, "मम्मी, दूध पी लिया?" शाम को लौटकर कहता, "ज़्यादा मत चलिए, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है।" वह पानी की बोतल भर देता, दवाइयाँ समय पर देता, तकिया ठीक करता और कई बार तो रात में उठकर भी पूछ लेता, "मम्मी, कुछ चाहिए?" एक दिन रेवती की आँखें भर आईं। उसने पति से कहा, "मुझे लगता था बेटा केवल आपका है।" पति मुस्कुराए। "बेटा मेरा है, इसलिए तुम्हारा भी है।" फिर धीरे से बोले, "मैं हमेशा कहता हूँ न—जिस पुरुष में स्त्री के करुणा, संवेदनशीलता और सेवा जैसे गुण आ जाएँ, वह वास्तव में महान बन जाता है।" रेवती ने पहली बार उस बात को गहराई से महसूस किया। उसे लगा कि रोहित केवल पिता की आदतें नहीं सीख रहा, बल्कि दादी का धैर्य, माँ की ममता और पिता की जिम्मेदारी—तीनों अपने भीतर समेट रहा है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार करुणा, सहानुभूति, सेवा-भाव, धैर्य और भावनात्मक अभिव्यक्ति किसी एक लिंग की विशेषता नहीं हैं। ये मानवीय गुण हैं, जो परिवार, संस्कार, वातावरण और अनुभव से विकसित होते हैं।
भारतीय दर्शन में भी “अर्धनारीश्वर” का स्वरूप यही संदेश देता है कि प्रत्येक मनुष्य में पुरुष और स्त्री—दोनों प्रकार की ऊर्जाओं का संतुलन होना चाहिए। शक्ति और संवेदना साथ हों, तभी व्यक्तित्व पूर्ण बनता है। कुछ महीनों बाद वह दिन भी आ गया जिसका रेवती वर्षों से सपना देख रही थी। घर में एक नन्ही-सी परी ने जन्म लिया। रेवती ने उसे पहली बार सीने से लगाया तो लगा जैसे जीवन की सारी अधूरी इच्छाएँ एक साथ पूरी हो गई हों। उसकी छोटी-छोटी उँगलियाँ, बंद आँखें, गुलाबी होंठ—सब कुछ किसी स्वर्गीय उपहार जैसा था। दूध पीते समय वह अपनी माँ की ओर निहारती रहती। रेवती को लगता जैसे पूरी दुनिया उसी क्षण में सिमट गई हो। धीरे-धीरे बच्ची पलटने लगी। अब वह अपने आसपास की चीज़ों को पहचानने लगी थी। रेवती को पूरा विश्वास था कि अब वह सबसे पहले उसकी ओर आएगी। लेकिन एक दिन कुछ अनोखा हुआ। बच्ची ने पेट के बल पलटकर सबसे पहले जिस दिशा में रेंगना शुरू किया, वहाँ उसके पिता बैठे थे। रेवती ने मुस्कुराकर उसे अपनी ओर बुलाया। "इधर आओ बेटा… मम्मा के पास।" लेकिन नन्ही परी लगातार पापा की ओर ही बढ़ती रही। कुछ ही दिनों बाद उसने अपना पहला स्पष्ट शब्द बोला— "पा…पा…" पूरा घर तालियों से गूँज उठा। पिता की आँखें भर आईं। वे बच्ची को गोद में उठाकर घूमने लगे। रेवती कुछ क्षण उन्हें देखती रही। उसे लगा, शायद इस बार भी वही कहानी दोहराई गई।
लेकिन आश्चर्य! इस बार उसके मन में ज़रा भी ईर्ष्या नहीं हुई। वह मुस्कुराते हुए उठी और अपने पति को गले लगा लिया। धीरे से बोली, "लगता है, यह भी आपकी ही टीम की खिलाड़ी निकली।" पति हँस पड़े। "और तुम्हारी भी।" भाषा विज्ञान के अनुसार "पा", "बा", "मा" जैसी ध्वनियाँ शिशु सबसे पहले आसानी से उच्चारित कर पाते हैं। इसलिए कई बच्चे "पापा" पहले बोलते हैं, तो कई "मम्मा"। इसका यह अर्थ नहीं कि वह किसी एक से अधिक प्रेम करते हैं। यह केवल ध्वनि-विकास की प्राकृतिक प्रक्रिया है। धार्मिक दृष्टि से कहा जाता है कि प्रत्येक आत्मा अपने साथ पूर्वजन्म के संस्कार और विशेष आकर्षण लेकर आती है। इसलिए कुछ बच्चों का झुकाव प्रारम्भ से ही माँ की ओर होता है, कुछ का पिता की ओर। दोनों ही ईश्वर की सुंदर योजना का भाग माने जाते हैं। समय के साथ रेवती ने एक गहरी बात समझ ली। माँ बनने का अर्थ यह नहीं कि बच्चा केवल उसी का हो।
बच्चे किसी एक माता-पिता की संपत्ति नहीं होते। वे प्रेम की उस नदी की तरह होते हैं जो जहाँ अधिक स्नेह, सुरक्षा और अपनापन पाती है, कुछ देर वहीं बहती है, फिर लौटकर सबको समान रूप से सींच देती है। उसने देखा कि उसकी बेटी भले ही "डैडीज़ गर्ल" बन गई थी, लेकिन रात में डर लगने पर माँ की गोद ही खोजती थी। बीमार पड़ती तो माँ का स्पर्श उसे सबसे पहले सुकून देता था। नई फ्रॉक पहनती तो माँ के सामने घूम-घूमकर पूछती—"मैं कैसी लग रही हूँ?" रेवती मुस्कुरा देती। उसे अब समझ आ गया था कि प्रेम बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है। और शायद ईश्वर ने उसे बेटी इसलिए नहीं दी थी कि वह केवल उसकी सहेली बने, बल्कि इसलिए दी थी कि पूरा परिवार प्रेम के एक और रंग से भर जाए।
उस रात दोनों बच्चों को अपने पिता के कंधों पर सोते देखकर रेवती ने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया। वह बोली— "हे प्रभु! मुझे बेटी दी, इसके लिए धन्यवाद। पर उससे भी बड़ा उपहार यह दिया कि मैंने अपने बेटे और बेटी—दोनों में एक संवेदनशील, स्नेही और जिम्मेदार पिता का प्रतिबिंब देखा। अब मुझे किसी बात की कमी नहीं लगती।" और सच ही तो था— जिस घर में पिता बच्चों का पहला मित्र बन जाए, माँ उनका पहला आश्रय बन जाए, और दोनों मिलकर प्रेम का संतुलन रचें, वही घर वास्तव में स्वर्ग बन जाता है।
- डॉ अतुल गोयल
सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय,झाँसी (उप्र)


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