निराला के काव्य में प्रकृति चित्रण

SHARE:

राला के काव्य में प्रकृति चित्रण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के छायावादी युग के उन स्तंभ कवियों में से हैं

निराला के काव्य में प्रकृति चित्रण

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य के छायावादी युग के उन स्तंभ कवियों में से हैं, जिन्होंने प्रकृति को केवल सौंदर्य-चित्रण की वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि जीवन, संघर्ष और चेतना के प्रतीक के रूप में अपनी कविताओं में उकेरा है। जहाँ छायावाद के अन्य कवियों ने प्रकृति के रूप-सौंदर्य को कोमल भावनाओं और रहस्यवादी अनुभूतियों के माध्यम से चित्रित किया, वहीं निराला की प्रकृति-दृष्टि में एक विशिष्ट ओज, गतिशीलता और यथार्थपरकता दिखाई देती है। उनकी कविताओं में प्रकृति कभी शांत, स्निग्ध और मनोरम रूप में सामने आती है तो कभी वह प्रचंड, विद्रोही और क्रांतिकारी शक्ति के रूप में प्रकट होती है, जो मानव-जीवन के संघर्षों से गहरा साम्य रखती है।

किसी कवि, कलाकार व रचनाशील मनुष्य से ही नहीं अपितु सामान्य मनुष्य से भी प्रकृति का अनादि काल से ही बड़ा निकट का सम्बन्ध रहता आया है वस्तुतः मनुष्य का जन्म विकास और उसका अवसान भी प्रकृति की गोद में ही होता है । प्रकृति ही उसके जीवन की सम्पोषिका है और उसके समस्त भाव जगत को उद्बुद्ध करने वाली सबसे बड़ी प्रेरक स्रोत-स्थली भी है।अस्तु प्रकृति और मानव के अटूट सम्बन्ध व्याख्यापित हैं मनुष्य के जीवन की सहजता प्रकृति से उसके तादात्म्य में ही अभिव्यंजित होती है।
 
छायावाद के शलाका पुरुष कविवर निराला जी के काव्य में प्रकृति अपने विविध रूपों में प्रकट हुई है। वस्तुतः छायावाद का जन्म ही प्रकृति की कोख से हुआ है अतः यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि वह अपने विविध रूप रंगों से छायावादी कवियों के काव्यों को विभूषित करे। निराला जी के काव्य में प्रकृति के विभिन्न रूप देखने को । मिलते हैं कहीं वह उसका सहज चित्रण करते हैं तो कहीं पर अलंकारिक चित्रण कहीं उसे उपदेशात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं तो कहीं उसे पृष्ठभूमि में रखते हैं कहीं उसके चेतन स्वरूप को अभिव्यंजित करते हैं तो कहीं कोमल, रौद्र तथा रहस्यमय रूप को । प्रकृति उनके लिए जहाँ मन-शांति का साधन है वहीं उनके क्रोध और खीज को अभिव्यजित करने में एक उपादान बनी है। निराला जी ने सभी ऋतुओं के प्रकृति चित्र उकेरे हैं किन्तु वर्षा और बसंत यह दो उनकी सर्वाधिक प्रिय ऋतुएँ हैं। बसंत का एक सहज और अत्यंत मोहक भाव पूर्ण चित्र देखिए -

सखि, बसन्त आया । 
भरा हर्ष वन के मन, 
नवोत्कर्ष छाया । 
किसलय-वसना नव-वय लतिका, 
मिली मधुर, प्रिय-उर तरु पति का, 
मधुप-वृंद बन्दी- 
पिक-स्वर नभ सरसाया 
लता-मुकुल-हार-गंध-भार- 
भर बही पवन मंद मंद मंदतर, 
जागी नयनों में वन- 
यौवन की माया । 
आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे, 
केसर के केश कमल के छुरे, 
स्वर्ण-शस्य-अंचल 
पृथ्वी का लहराया। 

वर्षा ऋतु से सम्बन्धित निराला जी ने अनेक गीतों की रचना की है, जिसमें उनका बादल राग सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है । बेला और नये पत्ते में वर्षा पर जो रचनाएँ हैं उनमें प्रकृति का यथातथ्य चित्रण है । वहाँ बात एकदम सीधे-साधे कह दी गई है। फूलों में बेला, जूही, कमल, वृक्षों में आम, पीपल तथा पशु-पक्षियों में गाय, भैंस, हिरन और मोर का उल्लेख है । कवि की दृष्टि विशेष रूप से गाँवों की ओर गयी हैं । वहाँ के वातावरण का चित्रण उसने कई प्रकार से किया है । बाहर दृष्टि पड़ती है तो ज्वार, अरहर, मूँग, उड़द, सन और धान के खेत दिखाई पड़ते हैं। कहीं युवक अखाड़ों में कुश्तियाँ लड़ रहे हैं, कहीं गाँव की लड़कियाँ बारह भाषा गा रही है, कहीं लोग देश-प्रेम की चर्चा में लीन हैं, इन सबके ऊपर आँखों को सुखद लगने वाली हरियाली, शरीर को रोमांचित करने वाली पुरवाई और नदी, नालों, सरोवरों को भी कवि विस्मरण नहीं कर पाया है— 

नाचते मोर, झूमते हुए पीपल देखे । (1) 
कानों में बातें बेला और जूही करती थीं, (2) 
घने-घने बादल हैं 
एक ओर गड़गड़ाते, 
पुरवाई चलती है, 
तालों में करंबुए, कोकनद खिले हुए, 
ढोर चरते हुए, 
आम पकते हुए -बेला

कहीं हिरनों का झुण्ड, 
नाले बहते हुए 
युवक अखाड़ों में जोर करते हुए -नये पत्ते

'गीत गुंज' की रचनाओं में कुछ तो अन्य रचनाओं की अनुगुंज है—वही हरियाली, वही पुरवाई, वे ही पुरुष । लेकिन दृष्टिकोण कुछ बदला हुआ है। अभिव्यक्ति कुछ अधिक काव्यात्मक हो गयी है। रचनाओं में संगीत तत्त्व का प्राधान्य है। प्रकृति के सौन्दर्य की ओर अब कवि की दृष्टि अधिक है । वर्षा को वह एक सुन्दर रमणी के रूप में देखने लगा है ।मेघ एवं विद्युत अब उसे केश और कटाक्ष के रूप में दिखाई देने लगे हैं । वातावरण अधिक संश्लिष्ट और सजीव है। घने अंधकार में बिजली चमकने, बादलों के गरजने, फुहारों के पड़ने और नीम के हिंडौलों में कजली-मलार के गाए जाने की चर्चा बार-बार हुई है।
 
निराला के काव्य में प्रकृति चित्रण
'चौमासा' एक ऐसी ही परम्परा विहित रचना है । इन गीतों में लोक-मण्डल की भावना पूरी-पूरी पायी जाती है । कवि केवल ऐसी कामना ही नहीं करता कि वर्षा मंगलदायी हो, वरन् उसने लोक को उत्सव मनाते भी देखा है। इस प्रकार वर्षा का प्रभाव उसके मानस में रक्षित हैं- 

मालती खिली, कृष्ण मेघ की । 
उग आये अंकुर जीवन, 
धान, ज्वार, अरहर औ' सन 
वही पुनः गंध से पवन 
पके आम की ।

यह गाढ़ तन, आषाढ़ आया, 
दाह दमक लगी, 
जगी-री- रैन चैन नहीं कि बैरिन नयन नीर-नदी बही री।
 
फिर लगा सावन, सुमन भावन, झूलने घर-घर पड़ें, सखि चीर सारी की सँवारी झूलती झोंके बड़े । फिर भरा भादों धारा भीगी, नदी उपनाई हुई; री, पड़ी जी की ; प्राण पी की सुधि न जो आई हुई, वर क्वार कंत विदेश छाये, कनक ही के वश हुए, गीत गुंज आराधना कह कौन-सी परतीत जो की शपथ; कर मरे हुए ? निराला जी के संघर्षमय जीवन की रचनात्मक और कोमल-कठोर प्रतिच्छाया उनके वर्षा गीतों में प्राप्त होती है । कहीं उद्दीपनात्मक चित्र प्रस्तुत कर वे संसार के हर्ष-विषाद को अपनाते हुए दिखायी देते हैं, तो कहीं अपने मन के अनुकूल उसे विविध रूप देते हुए निर्माण की ओर अग्रसर करते हैं। बादल के उग्र रूपों में कई लोगों को उनके ध्वंसात्मक रूप की झाँकी मिल सकती है, किन्तु इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि 'शाप तुम्हारा गरज उठे सौ-सौ बादल' रचना के अतिरिक्त बादल सर्वत्र है एक रचनात्मक क्रान्तिकारी के रूप में ही दिखलाया गया है। यह निराला जी के तेजस्वी और विशाल मन की बहुत बड़ी विषय है । उक्त रचना का मूल भाव भी विनाशक नहीं, जब कवि कहता है -

"आओ, अनिमेष नयन, करो निरामय वर्षण, 
संचय हे संघर्षण ! कलित साधना के शुभ फल ।"
 
'अलि' घिर आए घन पावस के' में बादल सम्बन्धित पावस के वातावरण का आकर्षक वर्णन कर कवि ने अपने विरह-विधुर मन की पीड़ा को व्यक्त किया है । 'घन गर्जन से भर दो वन' पावस में भी वसन्त के दृश्य हैं और अन्त में बादल से वज्र-स्वर से गर्जना कर भूधर-भूधर को मरने तथा 'पल्लव-पल्लव' पर जीवन की वर्षा करने की कामना की गयी है। यहाँ बादल का क्रान्तिकारी रूप है, किन्तु कितना रचनात्मक । रही आज मन में । 'वह शोभा जो देखी थी वन में' में सारा वन वर्षा के सुखद आगमन से लबालब प्रफुल्लता से भर आया है, जिसे कवि-मन भूलना नहीं चाहता है । 'उद्बोधन' में बादल के प्रचण्ड और क्रान्तिकारी रूप का चित्रण और अंत में उसकी सुखद धारासार वर्षा से पृथ्वी आकाश को एक कर देने की कामना का सुन्दर चित्र।
 
“भर उद्दाम वेग से बाबा हर तू कर्कश प्राण दूर कर दे दुर्बल विश्वास 
किरणों की गति से, आ, तू, गौरव-गान, 
एक कर दे पृथ्वी आकाश ।"
 
निराला जी के प्रकृति-चित्रण में उसके प्रायः सभी रूपों का दर्शन होता है इसकी चर्चा हमने पहले की है। यहाँ हम उन्हीं रूपों की वर्गीकृत ढंग से कतिपय उद्धरणों के माध्यम से उनके प्रकृति चित्रों को निरूपित करने का प्रयत्न कर रहे हैं -
  • आलम्बन रूप में, 
  • उद्दीपन रूप में, 
  • मानवीकरण रूप में, 
  • अलंकृत रूप में, 
  • पृष्ठभूमि रूप में, 
  • रहस्यात्मक रूप में, 
  • उपदेशात्मक रूप में,
  • दूती रूप में और 
  • प्रतीक रूप में ।

आलम्बन रूप में

"देखता मैं प्रकृति चित्र अपनी मृदु भावना की छायाएँ चिर-पोषित ।"प्रकृति को मुख्य विषय बनाकर प्रायः तटस्थ भाव से चित्रण करना ही आलम्बन प्रणाली है, किन्तु निराला जी के प्रकृति गीतों में आलम्बन प्रणाली बहुत क्षीण है। यदि कहीं है, तो उसके साथ और कई भाव और रूप भी संश्लिष्ट हैं। उनके प्रकृति गीतों का झुकाव और अवसान इतिवृत्त की ओर नहीं जाता, अपितु प्रकृति के विभिन्न बिम्बों में कवि का अवसाद-विषाद; हर्ष-उल्लास संयोजित होकर एक संश्लिष्ट चित्र की सृष्टि करता है। चाहे सुख-समृद्धि, उल्लास या उत्तेजना के विस्फोटक क्षण हों या अवसाद, खिन्नता, उदासी, अवसान या तिरोहित होने के छीजते हुए शान्त क्षण, निराला जी उन्हें पारम्परिकता और गतानुगतिकता से अलग सर्वथा, निजी रूप में ऋतुओं के माध्यम से जीते हैं ।" इसीलिए उनके ऋतु वर्णन को आलम्बन या उद्दीपन जैसे काव्य-शास्त्रीय में बाँधना नामुमकिन है।
 

उद्दीपन रूप में 

'वासन्ती' के भी कई बन्दों में प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण हुआ है। 
"बहती जातीं साथ तुम्हारे स्मृतियाँ कितनी दग्ध चिता के कितने हाहाकार 
नश्वरता की थीं सजीव जो कृतियाँ कितनी. अबलाओं की कितनी करुण पुकार।"
 
नदी में उठती हुई लहरों को देखकर नदी से प्रसक्त चिता-ज्वलन का स्मरण होते ही कवि की शोकानुभूति तीव्र वेग से बढ़ गयी है।
 
'बसन्त समीर', 'अलि घिर जाये घन पावस के', 'निशा के उर की खुली कली', 'संध्या सुन्दरी', 'शरद पूर्णिमा की विदाई', 'जुही की कली', 'जागो फिर एक बार', 'पंचवटी प्रसंग (1)', और 'वे गये असह दुःख भर' कविताओं के अनेक अंशों में उद्दीपन प्रणाली का सहारा लिया गया है। 'प्रेयसी याद है उषाः काल दूर-दूर तक दिखा' का पूरा प्रसंग उद्दीपनात्मक है । 

"है अमा निशा, उगलता गगन घन अंधकार खो रहा दिशा का ज्ञान स्तब्ध है पवन चार अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल -भूधर ज्यों ध्यान मग्न, केवल जलती मशाल ।"
 

मानवीकरण रूप में

निराला जी ने प्रकृति का उपयोग मानवीकरण करके भी किया है और यहाँ यह न भूलना चाहिए कि मानवीकृत छायावादी कविता की एक उल्लेखनीय विशेषता है तथा छायावादी कवियों ने प्रकृति में मानव रूप, मानव गुण, मानव क्रियाकलापों व मानव-भावनाओं का आरोप कर प्रकृति को सचेतन रूप में देखा है और किसी भी प्राकृतिक वस्तु के रूप, भाव व वातावरण को लेकर सुन्दर मानव-रूप की सृष्टि की है।
 
'यमुना के प्रति' की समग्र रचना में यमुना को सम्बोधित करने के जितने भी प्रसंग हैं वे सब प्रकृति के मानवीकरण से सम्बद्ध है। यमुना को देखकर द्वापरकालीन परिस्थितियों का स्मरण आना स्वाभाविक है । कृष्ण-लीला को और किसी ने भले ही न देखा हो, किन्तु यमुना ने उसे देखा है। जड़ नदी के रूप में वह कुछ नहीं बता सकती, अतएव उसे सजीव नारी के रूप में कल्पित कर कवि उससे एक जिज्ञासु की भाँति विविध प्रसंगों का हाल पूछा है।

'बदला' में पुष्प और भ्रमर का मानवीकरण कर एक-दूसरे के दान- प्रतिदान का भावमय वर्णन किया गया है । 'तरंगों' के प्रति मानवीकरण पद्धति की बड़ी ही सशक्त रचना है; जिसमें तरंगों को नारी रूप में प्रतिष्ठित कर अनेक मानवीय प्रसंगों से उन्हें जोड़ दिया गया है । 'जलद के प्रति' में बादल को सजीव और मूर्त रूप में अंकित कर पवन को उसके शत्रु के रूप में तथा पृथ्वी को माता के रूप में देखा गया है। 'वसन्त-समीर' एक ऋतु गीत है, जिससे वसन्त समीर, ज्योत्स्ना, निशा, मंजरी इत्यादि प्राकृतिक उपादानों को सजीव रूप में देखा गया है।
 
'आग्रह' में विघामाया को माँ के रूप में चित्रित करती तीखी तथा अदृश्य शक्ति को नारी के रूप में देखा है। 'बादल राग' की छहों कविताओं में बादल को विप्लवी एवं रचनात्मक पुरुष के रूप में अंकित किया गया है। 'जागो फिर एक बार (1)' में तारों, सूर्य, यामिनी गंधा, अलि, चकोर, कलियों और पपाहों को सजीव प्रतिमा के रूप में चित्रित कर कवि ने 'आयी भारती-रति-कण्ठ' में कहकर अपने सामाजिक दायित्व के पालनार्थ स्वानुभूति का सुन्दर समन्वय किया है। 'जूही की कली' कथा शेफालिका में मूल भाव प्रेम है, किन्तु इनमें मानवीकरण पद्धति का सहारा लिया गया है -
  
विजन वन वल्लरी पर
सोती थी सुहाग भरी-स्नेह स्वप्न मग्न- अमल, कोमल, 
तनु तरुणी-जुही की कली दृग बन्द किए, शिथिल, पत्रांक में, वासन्ती निशा थी, 
विरह विधुर प्रिया संग छोड़ 
किसी दूर देश में था पवन 
जिसे कहते हैं मलयानिल । 
आई याद बिछुड़न से मिलन की मधुर रात, 
आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात 
आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात।

जुही की कली 'संध्या सुन्दरी' का यह प्रथम छंद ही देखिए, जिसमें संध्या एक अलौकिक सौन्दर्य सम्पन्न परी के रूप में चित्रित है । तारा उसका प्रिय है और वह तारे के रूप में हृदय राज्य की रानी है । नीरवता उनकी प्यारी सखी है । वह मंथर गति से पृथ्वी पर अवतरण कर रही है । यहाँ वह दुल्हन के रूप में अंकित है ।
 
“दिवसावसान का समय मेघमय 
आसमान से उतर रही है वह संध्या सुंदरी परी-सी 
धीरे-धीरे-धीरे । 

कवि का बढ़ जाता अनुराग विरहाकुल कमनीय कण्ठ से 
आप निकल पड़ता तब तक विहाग ।”
 
'सखि वसन्त आया', 'सोचती अचानक आप खड़ी', 'सखी री, यह डाल', 'सरि, धीरे बह री', 'अपने सुख स्वप्न से खिली', 'भारति, जय, विजय करे', 'देकर अन्तिम कर रवि' और 'खलती मेरी शेफाली' में अनेक भावों के संश्लेषण के साथ प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।

अलंकृत रूप में

छायावादी काव्य में प्रकृति का अलंकारों के रूप प्रचुरता से प्रयोग हुआ है । निराला जी की अनेक कविताओं में प्रकृति को उपमा, रूपक, मानवीकरण तथा संदेह आदि अलंकारों के रूप में सहज ही देखा जा सकता है। निराला जी के यह अलंकारिक चित्र सहज रूप में अंकित हुए हैं इनके लिए कवि ने कोई प्रयास नहीं किया है।
 
'जीवन प्रात समीकरण सा लघु' में जीवन की सरलता और समृद्धि का वर्णन है। 'वोहित के हित सरल अनिल से' में ऋतु गति की प्रतिष्ठा है । 'शशि सा मुख', 'ज्योत्स्ना सा गात' में नवीनता के साथ उपमा का प्रयोग है । 'मत्त भृंग सम संग-संग' में भौंरे का उपमान है । कहीं-कहीं कई-कई पंक्तियों में प्रस्तुत होकर उपमाएँ भाव तथा चित्र संवर्द्धन में सहायक हैं।
 
"अति गहन विपिन में जैसे गिरि के तट काट रही है; नव-जल-धाराएँ, वैसे भाषायें सतत् बहीं हैं ।' 
'अस्थिर एक किरण सी झलकी आशा ।' 
'वायु-व्याकुल शतदल-सा हाय ।' 
'वह टूटे तरु की लता-सी दीन ।' 
ओस-कण सा पल्लवों से झर गया जो अश्रु ।"
 
सादृश्यमूलक अलंकारों के रूप में प्रकृति के विपुल प्रयोग हैं, इसके अलावा संदेह और प्रतीप जैसे विषम अलंकारों के रूप में भी ये प्रयोग हैं। 
“शीत की नीरस निठुर तू यामिनी 
या वसंत-विभावरी की रम्यता ।" 
“तू किसी वन की विषय वन वल्लरी 
या कि मन्द समीर गन्ध-विनोद की ।"
 

पृष्ठभूमि रूप में

किसी प्रसंग या घटना के पूर्व अथवा साथ-साथ जब प्रकृति का प्रयोग किया जाता है तब वहाँ वह पृष्ठभूमि के रूप में आती है।घटना के पूर्ण प्रकृति को पृष्ठभूमि के रूप में प्रस्तुत करने के दो सशक्त उदाहरण 'अनामिका' की दान और 'वन-वेला' कविताओं में प्राप्त हैं । दान में प्रकृति का प्रात:कालीन रम्य दृश्यांकन है । कवि प्रातः काल पर्यटन के लिए निकला । उसने एक ब्राह्मण को देखा कि उसने झोली से पुए निकालकर बन्दरों को खिला दिये; किन्तु कातर दृष्टि से चिल्लाते हुए भिक्षु की ओर घूमकर ताका भी नहीं। प्रकृति-दर्शन से कवि की धारणा पुष्ट हुई थी कि सब प्राणियों में मानव ही श्रेष्ठ है, किन्तु व्यवहार में मानव की अवमानना देखकर वह अपने ही निष्कर्ष पर करारा व्यंग्य करता है और मानव श्रेष्ठता का यह निष्कर्ष बालू की दीवार की भाँति ढह जाता है । 

मेरे पड़ोस के सज्जन करते प्रतिदिन सरिता-मज्जन झोली से पुए निकाल लिए बढ़ते कपियों के हाथ दिए हुए देखा भी नहीं उधर किधर जिस ओर रहा वह शिशु इतर । चिल्लाया किया दूर दानव, मैं बोला- “धन्य श्रेष्ठ मानव ।"
 

रहस्यात्मक रूप में

छायावादी कवियों ने प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते उसमें उसके रहस्यवादी रूप का भी साक्षात्कार किया है। निराला जी में भी यह भाव अपने समकालीन कवियों की तरह प्रचुर मात्रा में देखने को मिलता है । कतिपय स्थलों की ओर संकेत पर्याप्त होता है।
 
'तुम हो अखिल विश्व में', कवि ने कण के माध्यम से विराट शक्ति के प्रति जिज्ञासा प्रकट की है । 'आराधना' के 'कमल-कमल युग पद तल' में अज्ञात शक्ति के प्रति कवि का विश्वास बढ़ जाता है और वह उसी का दर्शन करता है- 'तुम और मैं' में कवि ने प्रकृति के विभिन्न उपादानों के माध्यम से परमात्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित किया है

उपदेशात्मक रूप में

प्राचीनकाल से चला आ रहा है। अपने मूक कार्य-कलापों से प्रकृति सदुपदेश देती रहती है, जिससे चेतन मानव अपने व्यवहार से निरन्तर उदार बना रहता है । अंग्रेजी के रोमांटिक कवियों ने प्रकृति के इसी गुण के कारण उसके प्रति अपार आस्था प्रकट की है।
 
निराला काव्य में प्रकृति उनकी अनुभूतियों से एकाकर हो गयी है । इसी कारण प्रकृति का अलग से उपदेशिका रूप बहुत ही क्षीण हैं। 'पहचानना' कविता में कवि ने एक फूल के मूक व्यवहार को देखकर उसे एक उत्तम अतिशय के रूप में अंकित किया है, किन्तु माली की निष्ठुरता यह प्रकट करती है कि चंद पैसों के लोभ में पड़कर कैसे लोग एक सज्जन को मिटा डालने तक की हरकतें कर डालते हैं -
"तोड़ लिया लटकायी ज्यों ही डाली, 
पत्थर से भी कठिन कलेजे का है 
चला गया जो वह हत्यारा माली ।"
 
'रास्ते के फूल से' में भी प्रकृति का यही उपदेश रूप अंकित है । ऊँचे चढ़े हुए व्यक्ति को ऊपर न देखकर नीचे देखना चाहिए, क्योंकि समाज तो उसकी सेवाओं की प्रतीक्षा करता रहता है । झरने का पृथ्वी पर आकर उसे प्रफुल्ल करने के इसी उदाहरण से कवि इसी उद्देश्य को सिद्ध करता है- 
"गर्जित जीवित-झरना, उद्देश्य पार पथ करना । 
ऊँचा रे, नीचे आता जीवन-भर दे जाता । 
गाता, वह केवल गाता-बन्धु तारना-तारना ।"
 

दूती रूप में भारतीय काव्य

साहित्य में प्रकृति के उपादानों को दूत बनाकर संदेश कहने की परम्परा पुरानी है । कालिदास ने मेघदूत में मेघ द्वारा यक्ष का संदेश यक्षिणी को निवेदित कराया है। जायसी ने नागमती के विरह को रत्नसेन तक पहुँचाने के लिए एक पक्षी का ही सहारा लिया है।
 
निराला जी के काव्य में भी कतिपय ऐसे दृश्य देखने को हमें मिल जाते हैं। उनका कोकिल स्वर सप्तक के साथ प्रकट हुआ है। वन में विटपी बसंत स्मरण से काँप उठती है, आगे का सारा चित्र बसंत ऋतु के प्रभाव का ही है-
 
दूत अलि ऋतु पति के आये । 
फूट हरित पात्रों के रूप उर से स्वर सप्तक छाये।
 
प्रेममय वातावरण में यद्यपि प्रकृति के प्रेम पात्र से सम्बद्ध मिलन प्रसंगों को ही अधिक उद्दीप्त कर रही है, तथापि बलाहकों द्वारा कवि की प्रेयसी को कोई अमूल्य संदेश भी प्राप्त होता है -

“सूर्य हीरक धरा प्रकृति नीलाम्बरा, 
संदेश-वाहक बलाहक विदेश के ।"
 

प्रतीक रूप में

निराला काव्य में प्रकृति प्रतीकों की संख्या पर्याप्त है । छायावाद युग की एक प्रमुख विशेषतता यह भी थी कि लाक्षणिक भाषा और प्रतीकों का कवियों ने बहुलता से प्रयोग किया है। निराला जी काव्य की कतिपय पंक्तियों को यहाँ प्रस्तुत करके प्रकृति-चित्रण की इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं- 
कोयल वसन्त दूत के रूप में- 
'दूत अलि, ऋतु पति के आये।" 

प्रसंग भेद से 'तुम और मैं' में प्रकृति की अनेक वस्तुएँ आत्मा परमात्मा के प्रतीक रूप में वर्णित हैं । निराला जीवन को मरु और भाषा की किरण कहा गया है-

“यौवन मरु की पहली ही मंजिल में 
अस्थिर एक किरण-सी झलकी आशा ।"
 
'माया' में प्रकृति के प्रतीकों के रूप में प्रयुक्त हुई है। समाज द्वारा अटकाये गये रोड़े और अटल प्रतिज्ञा के व्यक्तित्व और उपलब्धि के कई प्रतीक 'स्वागत' कविता में देखे जा सकते हैं।बादल राग श्रृंखला में बादल सुपुत्र सहृदय नायक परोपकारी और क्रान्तिकारी के अनेक प्रतीकों के रूप में वर्णित है।

इससे स्पष्ट है कि हिन्दी काव्य-जगत में सामान्य रूप से प्रकृति-चित्रण के जितने रूप प्राप्त हैं । निराला जी ने सभी का प्रयोग अपने काव्य में किया है जो जहाँ एक ओर उनके प्रकृति प्रेम को प्रकट करता है, वहीं उनकी काव्य प्रतिमा के बहुआयामी रूप को -भी अभिव्यंजित करता है।

इस प्रकार निराला के काव्य में प्रकृति-चित्रण बहुआयामी है—वह कहीं कोमल और श्रृंगारिक है तो कहीं उग्र और क्रांतिकारी, कहीं दार्शनिक चिंतन से युक्त है तो कहीं सामाजिक यथार्थ से अनुप्राणित। निराला ने प्रकृति को मानव-मन की विविध अवस्थाओं और सामाजिक चेतना के साथ इस प्रकार एकाकार कर दिया है कि उनका प्रकृति-चित्रण छायावादी काव्य-परंपरा में सर्वथा नवीन और मौलिक प्रयोग के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। यही कारण है कि निराला को प्रकृति के एक विशिष्ट और शक्तिशाली चितेरे के रूप में हिंदी साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है।

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हे भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका