राम की शक्ति पूजा की काव्यगत विशेषताएँ | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

SHARE:

राम की शक्ति पूजा की काव्यगत विशेषताएँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' निराला ने पौराणिक राम को अलौकिकता के धरातल से हटाकर सामान्य मानव रूप में प्रस्तुत

राम की शक्ति पूजा की काव्यगत विशेषताएँ | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


छायावादोत्तर हिंदी काव्य-परंपरा में सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का स्थान अद्वितीय है, और उनकी कालजयी रचनाओं में 'राम की शक्ति पूजा' को शिखर स्थान प्राप्त है। यह प्रबंध-काव्य सन् 1936 में रचा गया था और इसका आधार कृत्तिवास रामायण की उस कथा से लिया गया है, जिसमें रावण के विरुद्ध युद्ध में लगातार असफल होते राम अंततः शक्ति यानी दुर्गा की पूजा करके विजय प्राप्त करते हैं। किंतु निराला ने इस पौराणिक आख्यान को केवल धार्मिक कथा के रूप में प्रस्तुत न करके उसमें गहरा दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और युगीन अर्थ भर दिया है। यह कविता राम के पौरुष, उनकी पराजय की पीड़ा, आत्मसंघर्ष और अंततः शक्ति के जागरण की गाथा है, जो अपने समय के परतंत्र भारत की मनोदशा का भी प्रतिबिंब बन जाती है। इस रचना में निराला ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के दैवी आवरण से हटाकर एक संघर्षशील मानव के रूप में चित्रित किया है, जो पराजय के क्षणों में स्वयं अपनी शक्ति और आस्था पर प्रश्न उठाता है। यही मानवीकरण इस कविता को शेष रामकाव्य परंपरा से भिन्न और विशिष्ट बनाता है। भाव, भाषा, शिल्प और वैचारिक गहराई की दृष्टि से यह रचना हिंदी की श्रेष्ठतम काव्य-कृतियों में गिनी जाती है, और इसकी काव्यगत विशेषताओं का विवेचन हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय रहा है।

राम की शक्ति पूजा की काव्यगत विशेषताएँ | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
राम की शक्ति पूजा के राम परब्रह्म राम न होकर मानव राम हैं, जो निरन्तर संघर्षों से लड़ते रहते हैं । उनका जीवन सुख-दुःख, आशा-निराशा, घात-प्रतिघांत का जीवन है। परिस्थितियों की विषमता उन्हें विचलित कर देती है, परन्तु कर्त्तव्य-बुद्धि द्वारा संयत रहकर वे आत्म-विश्वास को पुनः जाग्रत करते और अन्ततः समस्त बाधाओं पर रावण रूपी बाधाओं पर विजय प्राप्त करते हैं। अपने कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहकर सफलता प्राप्त करने के लिए वे अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को उद्यत रहते हैं। अपनी आँख निकालकर शक्ति को समर्पित करने का संकल्प इसी सर्वस्व समर्पण-भाव का द्योतन करता है।
 
प्रस्तुत कविता में राम की विजय की अपेक्षा उनकी साधना ही अधिक महत्त्वपूर्ण दिखाई देती है।डॉ० रामविलास शर्मा के शब्दों में--" राम के संघर्ष का चित्र जितना प्रभावशाली है, उतना उनकी विजय का नहीं । कवि के जीवन में संघर्ष ही सत्य रूप में आया है ।"
 
जिस प्रकार वाल्मीकि तथा तुलसी ने अपनी कृतियों में व्यक्ति के विविध सम्बन्धों के निर्वाह और प्रतिष्ठा की भावना को व्यक्त किया है, उसी प्रकार निराला ने राम तथा उनके परिवेश में आने वाले अनेक पात्रों के माध्यम से समाज के सम्बन्धों को नर्चा की है। निराला ने राम को ईश्वरीय पद या ब्रह्मत्व प्रदान न करके उन्हें सर्वथा मानव ही माना है। राम और विभीषण के मध्य निराला ने भगवान् और भक्त का सम्बन्ध नहीं माना है । उसमें राजवंशोचित कूटनीति को प्रश्रय दिया गया है-- 

"हे सखा, विभीषण बोले, आज प्रसन्न वदन, 
वह नहीं देखकर जिसे, समग्र वीर वानर ।" 

छायावादी कवियों की भाँति निराला ने नारी को अनन्त प्रेरणा का स्रोत माना है। राम का मन नैर' य में डूबा हुआ था। सीता की मधुर छवि का स्मरण करते ही उनका मन सिहर उठा और उनकेशन में विश्व-विजय करने की इच्छा बलवती हो उठी तथा उनके हाथ अब शिव का धनुष भंग करने को सन्नद्ध हो जाते हैं-- 

"सिहरा तन, क्षण भर भूला मन- लहरा समस्त, 
हर धनुर्भंग को पुनर्गर ज्यों उठा हस्त । 
फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर, 
फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर ।" 

राम की शक्ति पूजा की विशिष्टताएँ इस प्रकार हैं -

राम की साधना योग शास्त्र के अनुरूप

'राम की शक्ति-पूजा' में राम की साधना योग-शास्त्र के अनुरूप हुई है। हठयोग के अनुसार सुषुम्ना के मार्ग में अनेक चक्र होते हैं । प्रथम चक्र मूलाधार है जो सुषुम्ना के मध्य में स्थित है। यह चतुर्दल कमल के आकार का है। दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र है जो लिंगमूल में स्थित है। यह षद्दल कमल के आकार का है। तीसरा चक्र मणिपुर है जो नाभिमल में स्थित है, यह दशदल कमल के आकार का है । चौथा चक्र हृदय- चक्र या अनाहत चक्र है जो हृदय में स्थित है। यह द्वादशदल कमल के आकार का है। पांचवाँ विशुद्ध चक्र कंठ स्थान में स्थित है जो षोडश कमलदल के आकार का है। छठा चक्र आज्ञा- चक्र या आकाश-चक्र है जो द्विदल कमल के आकार का है। यह भूमध्य में स्थित है । इन षट्- चक्रों के अतिरिक्त ब्रह्मरन्ध्र में सहस्त्रार चक्र है जो सहस्रदल कमल के आकार का है।
 
प्रत्येक चक्र में एक-एक देवता की स्थिति स्वीकार की गई है। मूलाधार में ब्रह्मा, स्वाधिष्ठान में विष्णु, मणिपुर में महारुद्र, हृदय में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव, आज्ञा में शिव और सहस्रार में परमशिव का निवास माना जाता है। योगी का मन जब इड़ा, पिंगला को छोड़ 'सुषुम्ना मार्ग' को पार करता हुआ सहस्रार तक पहुँचता है, तब सिद्धि की प्राप्ति होती है। 'राम की शक्ति-पूजा' में राम का मन, एक के पश्चात् एक क्रमशः सब चक्रों को पार करता हुआ ऊर्ध्वगामी हो जाता है-- "चक्र से चक्र मन चढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस ।"

छठे दिन राम का मन आज्ञा-चक्र में समाहित होता है, त्रिकुटी पर ध्यान पहुँचकर द्विदल (देवी के द्विदल पद) पर केन्द्रित होता है--

"चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित मन, 
प्रति जप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण, 
संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर ।" 

अन्त में ध्यानयुक्त मन ऊर्ध्वगामी होता हुआ ब्रह्मा--हरि--शंकर के स्तर (षट् चक्रों) का अतिक्रमण करता हुआ सहस्रार दुर्ग को पार करने को उद्यत हो जाता है । यही साधना की चरमावस्था है ।
 
डॉ० रामविलास शर्मा के शब्दों में--"योगदर्शन में काव्य के लिए जो सुलभ उपकरण मिले, उन्हें कवि ने मूर्त रूप दिया है। आज्ञा, /सहस्रार आदि चक्रों पर रामचन्द्र के मन के चढ़ने की क्रिया के अतिरिक्त हनुमान का समुद्र को विलोड़ित करते हुए महाकाश में चढ़ना ओजपूर्ण वर्णन में अनूठा है। प्रकाश और अन्धकार का ऐसा चित्रमय सम्मिश्रण उन्होंने पहले कभी नहीं किया था। इसकी प्रतीक-व्यंजना अद्भुत है। रावण समस्त तमोगुणी विघ्न-बाधाओं का प्रतिनिधि मात्र दिखाई पड़ता है । उसके साथ शिव, आकाश और शक्ति सभी क्रियाशील जान पड़ते हैं । इस अनन्त तमोगुण में राम के दिव्य-शर श्रीहत होकर कहीं खो जाते हैं। मनुष्य का मन पराजित होकर भी पराजय स्वीकार नहीं करता । युद्ध के लिए, विजय के लिए वह पुन: चेष्टा करता है। 'राम की शक्ति-पूजा' का यही महान् आशावादी संदेश है ।"
 

आख्यान प्रगीत

यह पौराणिक कथानक पर आधारित एक आख्यानिक प्रगीत है। राम द्वारा देवी की उपासना का प्रसंग देवी भागवत, कालिका पुराण तथा कृत्तिवास रामायण में मिलता है। शिव महिम्न स्तोत्र में भी विष्णु द्वारा शिव की पूजा का उल्लेख हुआ है । 'राम की शक्ति-पूजा' का मूल आधार वस्तुतः कृत्तिवास रामायण ही है। पौराणिक कथानक को अपनी कल्पना एवं कला-कुशलता द्वारा पल्लवित न करके निरालाजी ने उसे एक नवीन रूप प्रदान किया है।
 

व्यक्तिगत भावों की अपेक्षा जातिगत भावों का बाहुल्य

'राम की शक्ति-पूजा' केवल 'राम की शक्ति-पूजा' का ही काव्य नहीं है, अपितु उच्च मानव मूल्यों के समर्थन में प्रत्येक भद्र व्यक्ति के मन में होने वाले संघर्ष का दर्पण है । डॉ० उपाध्याय के शब्दों में--" इस काव्य का मर्मभेदी प्रभाव सर्वाधिक रूप से इसलिए पड़ता है कि इस काव्य में सारी मानसिक स्थितियाँ व्यक्त हैं, जिनका वास्तविक रूप में हमें तब अनुभव होता है, जब हम किसी जनद्रोही प्रबल पक्ष के विरुद्ध संघर्षरत होते हैं, मन संशयग्रस्त हो जाता है, क्योंकि अपने-अपने स्वार्थ के कारण अन्यायी पक्ष के व्यक्ति अधिक संख्या में अधिक प्रभाव और अधिक बल के निधान होते हैं।"
 

नारी के प्रति सम्मान

'राम की शक्ति-पूजा' की महाशक्ति वस्तुत: नारी-स्वरूपा आदिशक्ति है । इसको अदिति भी कहा गया है। यही महाशक्ति निराला के 'तुलसीदास' में 'रत्ना' के रूप में दिखाई देती है । तुलसी को रत्ना उद्बोधन देकर सत्य मार्ग पर चलने को प्रेरित करती है। 'राम की शक्ति-पूजा' में भी सीता की स्मृति भग्न-हृदय राम को विजय के लिए पुनः सन्नद्ध करती है। नारी ही दोनों स्थानों पर नर की प्रेरक शक्ति के रूप में दिखाई देती हैं। ठीक ही है, नारीरूपिणी शक्ति के अभाव में मानव शिव के बजाय केवल 'शव' रह जाता है।
 

राम की शक्ति पूजा का चिन्तन

'राम की शक्ति-पूजा' में शक्ति-पूजा की कल्पना रामकृष्ण परमहंस के अनुकूल है। स्वामी रामकृष्ण शक्ति के इसी रूप के उपासक थे। बंगाल में यह देवी प्रचंडता, करालता और असुर-विनाशिनी शक्ति के रूप में कल्पित है । स्वामी विवेकानन्द के ' अम्बा स्तोत्र' में--" आघूर्णित भवजलं प्रबलोर्भिभंगे, छाया मृतेस्तव दयात्व मृते च मात: औरं जगद्विधात्रीम् " के रूप में इस देवी का स्तवन हुआ है। कालीमाता की उनकी एक अंग्रेजी कविता में भी इस विकराल और जगत्-व्यापी रूप की कल्पना हुई है। उसका नाम आतंक है और मृत्यु उसके श्वास में है । वह सर्वनाशिनी है।
 
"सामने स्थित जो यह भूधर, 
शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर ।"

इस प्रकार राम ने अपने मन में शक्ति का स्वरूप जाग्रत किया था और अन्त में शक्ति के राम के शरीर में विलोम होने (समा जाने) का तात्पर्य भी यही है। यह स्वयं ही शक्ति का प्रतीकार्थ है । यह वेदान्त दर्शन के भी अनुकूल है । अद्वैतवादी, वेदान्ती समस्त शक्ति का संचयन आत्मा में ही मानता है । आत्मा की इस शक्ति से प्राकृतिक शक्तियों पर भी विजय पाई जा सकती है । स्वामी विवेकानन्द आत्मा में ही समस्त शक्तियों का आवास मानते थे । अद्वैतवाद की यही शिक्षा 'है कि वह हमें तेजस्वी सर्व-शक्तिमान और सर्वज्ञ सोचने को कहता है । 'राम की शक्ति-पूजा' के चिन्तन का दूसरा पक्ष राम के अन्तर्द्वन्द्व से सम्बद्ध है। युद्ध की पराजय से राम के मन में मनोवैज्ञानिक अन्तर्द्वन्द्व होता है । पुनः आत्मविश्वास की जागृति का उपक्रम होता है । जीवन की सामयिक हार, निराशा से मन पूर्व-स्मृतियों में उलझता है, पूर्व कृत्यों की स्मृति उसे हो आती है । राम पुष्पवाटिका में सीता-मिलन की याद करते हैं और धनुर्भंग का स्मरण आते ही उनमें ओजस्व और वीरत्व जाग्रत हो जाता है । यह स्मृति द्वारा रस की उद्रेकावस्था का-सा रूप है । साधना की चरम अवस्था पर विफलता की आशंका एकाएक निराशा और आत्मवंचना जाग्रत करती है। मन की निबिड़तम निराशा और दैन्य की स्थिति में यह आत्मवंचना स्वाभाविक है । लेकिन इसी स्थिति में बुद्धि की गति से, प्राचीन स्मृति के आश्रय से राम को एक युक्ति सूझती है और माता द्वारा 'राजीवनयन' कहे जाने के आधार पर कमल को नयन से स्थानापन्न करते हैं। यह दैवी- विरोध और संघर्ष पर व्यक्तित्व की विजय का आलेख कहा जा सकता है।आत्म-वंचना की पंक्तियों में निराला के व्यक्तित्व का प्रकाशन भी माना गया है, लेकिन जैसे राम उस अन्तर्द्वन्द्व और क्षणिक निराशा पर विजय प्राप्त करते हैं-- अपनी मौलिक सूझ के द्वारा उसी प्रकार निराला का व्यक्तित्व भी सर्वजित रहा है। कदाचित् इसीलिए राम के चित्रण में निराला के व्यक्तित्व का प्रक्षेप माना गया है। यह भी हो सकता है कि कवि कथानक में चरित्रों का निर्माण अपने स्वभाव और व्यक्तित्व के अनुकूल करता है । 'हाइपीरियन' का अपोलो कीट्स का ही प्रतिरूप हैं।
 

मौलिक उद्भावनाएँ

निराला ने 'राम की शक्ति-पूजा' की परम्परागत व्यवस्था में नयी उद्भावना भी की है। उन्होंने प्राचीन सामग्री का उपयोग किया है और प्राचीन परिपाटी पर ही वर्णन किया है, किन्तु उस पर अपनी छाप लगा दी है और विशिष्ट नियोजन के साथ उसे सम्पन्न किया है । 'राम की शक्ति-पूजा' में निराला की ये नवीन उद्भावनाएँ हैं-- 
  1. निराला, युद्ध के समाप्त होने के एक दिन पूर्व शक्ति-पूजा न कराकर राम से नवरात्र का व्रत कराते हैं और उसकी पूर्णाहुति की व्यवस्था करते हैं । 
  2. यहाँ एक सहस्र कमलों के स्थान पर हनुमान द्वारा लाये गये एक सौ आठ इन्दीवरों का उल्लेख है । 
  3. निराला शक्ति की आराधना की प्रेरणा, नारद के स्थान पर जाम्बवान से दिलवाते हैं। 
  4. निराला, राम की स्मृतियों से उनके अतीत के चित्र जोड़ देते हैं, इस प्रकार यह प्रसंग सर्वथा काव्य के अनुरूप हो गया है । 

राम की शक्ति पूजा युग जीवन की कथा

राम की शक्ति-पूजा' का युग वह था, जब देश पर अंग्रेजों का शासन था, भारत का स्वाधीनता आन्दोलन क्षीण होता जा रहा था और देश निराशा के अन्धसागर में डूबता जा रहा था । निराला ने अत्याचार, क्रूरता और अन्याय के प्रतीक अंग्रेजी शासन को रावण और सत्य, न्याय, देशभक्ति तथा राष्ट्रीयता को राम के रूप में प्रस्तुत किया है । राम की निराशा वास्तव में देश की ही निराशा है-- 
"मित्रवर, विजय होगी न समर । 
अन्याय जिधर, है उधर शक्ति ।"
 

भारत को शक्ति की साधना का उपदेश

ऐसे समय में निराला राम के माध्यम से भारत को शक्ति की साधना और उपासना का संदेश देते हैं, क्योंकि उस समय गाँधीजी की नीतियाँ अंग्रेजी दमनचक्र के सम्मुख विफल होती जा रही थीं। गाँधीजी का न्यायपूर्ण पक्ष अन्याय से हो रहा था । अहिंसा और न्याय के गाँधीजी के अस्त्र उसी प्रकार श्रीहंत और खण्डित हो रहे थे, जैसे राम के बाण - 
"शत शुद्धि-बोध, सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक, 
जिनमें हैं क्षात्र धर्म का घृत पूर्णाभिषेक । 
जो हुए प्रजापतियों के संयम से रक्षित, 
वे शर हो गये आज रण में श्रीहत, खण्डित।"

गाँधीजी की पराजय

राम की पराजय वास्तव में गाँधीजी की ही पराजय है और इसीलिए आवश्यकता है--शक्ति की आराधना की। निराला जानते हैं कि राजनीति में शक्ति ही विजय प्राप्त करती है, चाहे वह न्यायी के पास हो या अन्यायी के -

"आया न समझ में यह दैवी विधान, 
रावण अधर्मरत भी अपना, मैं हुआ अमर- 
यह रहा शक्ति का खेल समर शंकर शंकर ।"
 
हाँ, यह आवश्यक है कि एक तो यह शक्ति बाह्य और भौतिक रूप में न होकर आत्मिक रूप में होनी चाहिए और दूसरे इसे प्राप्त करने के लिए आसुरी भावों का दमन आवश्यक है. "लख महाभाव मंगल पद-तल धँस रहा गर्व, मानव के मन का असुर मंद हो रहा खर्व ।"
 

आशा का संदेश

इसके साथ ही जो अन्य संदेश निराला देना चाहते हैं -- वह है आशावादिता । निराशा के इस काल में यदि कुछ समय के लिए असफलता भी हाथ लगे, कमल चुरा भी लिया जाय, तो चाहे अनुभूति हो तो-- 
" धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध, 
धिक् 'साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध । 
जानकी हाय ! उद्धार प्रिया का हो न सका ।"
 
परन्तु इसे स्थायी भाव न बना लिया जाय । आज दैन्य और विनय को नहीं, मायावरण को भेदने की आवश्यकता हैं-- 
"वह एक और मन रहा राम का जो न थका, 
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय, 
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय ।" 
इस शक्ति-प्राप्ति और स्थिरता के बाद ही तो-- 
"होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन ।"
 

निराला का जीवन राम के जीवन के समान संघर्षमय

निराला का अपना जीवन भी राम के जीवन के समान अबाध संघर्षों की एक लम्बी कहानी रहा था । निराला प्रतिरोधी शक्ति से निरन्तर संघर्ष करते रहे थे। उनके अपने जीवन का यही संघर्ष इस कविता में राम के माध्यम से व्यक्त हुआ है । डॉ० रामविलास शर्मा के शब्दों में--"यहाँ उन्होंने अपने जीवन की अनुभूति, निराशा, पराजय, संघर्ष और विजय-कामना को नाटकीय रूप दिया है। आकाश और समुद्र के सम्मिलित गर्जन में राम का व्यक्तित्व कुछ क्षण को मानों खो जाता है। यह क्रियाशील तमोगुण जीवन की परिस्थितियाँ हैं, जिन्हें परास्त करने के लिए सम सदा साधनों की खोज करते हैं । राम शक्ति की साधना करते हैं । यह साधना और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो उठती है, जब हम उस चित्र का स्मरण करते हैं, जहाँ राम समुद्र के किनारे अकेले बैठे हैं, सिर पर एक मशाल जल रही है और समुद्र के गरजने के साथ रावण का उन्मत्त अट्टहास सुनाई देता है । वे अधीर हो जाते हैं, सीता की स्मृति से मोहित हो जाते हैं, आँखों से आँसू भी गिरने लगते हैं, इसीलिए शक्ति की साधना इतनी महत्त्वपूर्ण है। राम के रूप में कवि ने जीवन की परिस्थितियों को एक बार चुनौती दी है । उसके नायक युद्ध के लिए फिर तैयार होते हैं। लेकिन यह महाशक्ति एक दैवी शक्ति है । शक्ति का आकर राम का हाथ पकड़ना एक मनोमुग्धकारी चमत्कार-सा है । राम के संघर्ष' का चित्र जितना प्रभावशाली है, उतना उनकी विजय का नहीं। कवि के जीवन में संघर्ष ही सत्य रूप में आया है । विजय की कामना अपूर्ण रही है ।"
 

 निराला के व्यक्तिगत जीवन की कथा

'राम की शक्ति-पूजा' निराला के व्यक्तिगत जीवन की भी कथा है। राम के समान निराला भी जीवन-भर संघर्षों का सामना करते हैं--'धिक् जीवन को जो पाता ही आया है विरोध ।' लेकिन राम के ही समान वे भी विरोधी शक्तियों के सामने झुके कभी नहीं। परिस्थितियों को विपरीत देखकर भी एक और मन रहा 'निराला का जो न झुका ।' और वस्तुतः यही इस कविता का संदेश भी है कि चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ हों, अपने लक्ष्य तक पहुँचने में व्यक्ति के आशा रूपी कमल चोरी हो जायें, परन्तु उसे आशावादी बने रहना चाहिए, पराजय नहीं स्वीकार करनी चाहिए। डॉ० रामविलास शर्मा ने लिखा है--" धिक् जीवन जो पाता ही आया है विरोध", यह पंक्ति पूरी कविता का सूत्र है। कहना न होगा कि यह पंक्ति स्वयं कवि के जीवन पर खूब घटित होती है। राक्षस, वानर, लंका, समुद्र-तट यह सब एक विशाल सैटिंग मात्र हैं, वास्तविक संघर्ष राम के हृदय में है । वे शक्ति की साधना कर रहे हैं और प्रश्न है कि वे विजयी होंगे या नहीं। 'तुलसीदास' में कवि एक हद तक तटस्थ है, 'राम की शक्ति-पूजा' पर कवि के अपने व्यक्तित्व की छाप है ।
 

कवि के व्यक्तित्व का विरोधाभास प्रस्तुत कविता में

'राम की शक्ति-पूजा' का काव्य-सौष्ठव अपूर्व है । निराला के व्यक्तित्व का विरोधाभास इस कविता में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है । इसमें एक ओर मिल्टन के काव्य के समान विराट् चित्र उपलब्ध होते हैं-- 
"शत घूर्णावर्त तरंग भंग, उठते पहाड़, 
जल-राशि, राशि-जल पर चढ़ता है खाता पछाड़ । 
तोड़ता बन्ध-प्रति सन्ध धरा हो स्पीत वक्ष, 
दिग्विजय अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष । 
शत वायु-वेगबल, डुबा अतल में देश-भाव, 
जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव । 
वज्रांग तेजधन बना पवन को, महाकाश, पहुँचा, 
एकादश रुद्र क्षुब्ध कर अट्टहास ।"
 
तो दूसरी ओर ऐसे कोमल चित्र भी उपलब्ध होते हैं जिन्हें पढ़कर पाठक निराला की शब्द चयन क्षमता, छन्द-योजना और वर्ण-प्रयोग पर आश्चर्यचकित हो जाता है -
'नयनों का नयनों से गोपन प्रिय-सम्भाषण, 
पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान पतन, 
काँपते हुए किसलय, झरते पराग-समुदय।" 
निराला स्थिर चित्रों के अंकन में तो दक्ष हैं ही, 

गतिशील चित्रों का भी राम की शक्ति पूजा में सफल प्रयोग किया है-- 

प्रतिपल परिवर्तित व्यूह भेद कौशल समूह, 
राक्षस विरुद्ध प्रत्यूह युद्ध कवि विषम हूह ।"

'राम की शक्ति-पूजा' निराला के उस अपराजेय व्यक्तित्व का अन्यतम उदाहरण है। गिरिजा कुमार माथुर ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि--"वे छायावाद से सम्बद्ध होते हुए भी उसकी भाँति समूचे मसृण और एक सीमा तक स्रोत नहीं हैं, पर ललित वृत्ति अपनी पराकाष्ठा पर थी, तब उन्होंने सामासिक शैली में पुरातन कथानक लेकर अपनी कालजयी रचना 'राम की शक्ति- पूजा' लिखी।"
 

'राम की शक्ति-पूजा' में अनेक शैलियों का प्रयोग

निराला ने अनेक शैलियों का प्रयोग इस कविता में किया है। कहीं वे पूर्वदीप्ति के माध्यम से राम को जनकपुरी पहुँचा देते हैं और कहीं सांकेतिक शैली में राम के व्यक्तित्व को और गौरव प्रदान कर, नैशान्धकार द्वारा उन पर घिरती निराशा को चित्रित कर देते हैं। 

'राम की शक्ति-पूजा' छायावादी काव्य की विशिष्ट कृति

यह कविता मूलत: छायावादी अन्तर्मुखी शैली में लिखी गई है इसलिए इसे ' अन्तर्मुख निबन्ध-काव्य' की संज्ञा प्रदान की जा सकती है। ऐसे काव्यों में कथा का सूत्र अत्यन्त सूक्ष्म तथा बाह्य वर्णनों की अपेक्षा अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण अधिक रहता है। कवि वर्णन-विस्तार में न जाकर संकेतों से ही अधिक काम लेता है । अन्तर्द्वन्द्व का मनोवैज्ञानिक चित्रण, वातावरण की काव्यमय सृष्टि और प्रौढ़ पंद-विन्यास ऐसे काव्यों की प्रधान विशेषताएँ होती हैं। 'राम की शक्ति-पूजा' में हमें यह सारी विशेषताएँ मिलती हैं।
 

राम की शक्ति-पूजा भाषा की अपरिमित शक्ति का प्रतीक

राम की शक्ति- पूजा भाषा-शैली की दृष्टि से वर्णित प्रसंगों की प्रभावकता को अभिव्यंजित करने में पूर्ण सशक्त और समर्थ है। इसमें निराला जहाँ कथा कहते हैं या जहाँ पात्रों का परस्पर वार्तालाप होता है, वहाँ भाषा का रूप सरल रहा है परन्तु जहाँ उन्होंने वातावरण का चित्रण किया है, भावों के अन्तर्द्वन्द्व का अंकन किया है, वहाँ भाषा क्लिष्ट, दुरूह, संस्कृतगर्भित और समास-बोझिल हो उठी है। इसमें हमें ऐसी भाषा भीं मिलती है--'बोली माता-तुमने रवि को जब लिया निगल' और ऐसी भाषा भी मिलती है--'शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग, उठतें पहाड़'।

उपसंहार

'राम की शक्ति-पूजा' एक प्रेरणाप्रद श्रेष्ठ कृति है। इसमें मानव-जीवन के शाश्वत मूल्यों का काव्योचित निरूपण है। इसको पढ़कर पाठक नीलाकाश की ऊँचाइयों के अध्ययन के लिए प्रोत्साहित हो उठता है ।समग्र रूप से देखा जाए तो 'राम की शक्ति पूजा' हिंदी काव्य की उन विरल रचनाओं में से एक है, जिसमें पौराणिक कथावस्तु, गहन दार्शनिक चिंतन, मनोवैज्ञानिक यथार्थ और युगीन राष्ट्रीय चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। निराला ने राम के चरित्र को देवत्व के आवरण से मुक्त कर मानवीय संघर्ष, वेदना और अंततः आत्मबल के जागरण की जीवंत गाथा के रूप में प्रस्तुत किया है, जो पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करती है। भाषा की ओजस्विता, बिंबों की सजीवता, छंद-विधान की मौलिकता और रस-भावों का सुंदर सामंजस्य इस कविता को शिल्पगत दृष्टि से भी असाधारण बनाते हैं। यही कारण है कि प्रकाशन के दशकों बाद भी यह रचना हिंदी साहित्य में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और आत्मसंकट के क्षणों में आत्मबल की खोज करने वाले प्रत्येक व्यक्ति तथा पराधीनता से मुक्ति की आकांक्षा रखने वाले प्रत्येक समाज के लिए एक शाश्वत प्रेरणास्रोत बनी हुई है। निस्संदेह, 'राम की शक्ति पूजा' निराला की काव्य-प्रतिभा का चरमोत्कर्ष है और आधुनिक हिंदी काव्य के इतिहास में एक अमूल्य धरोहर के रूप में सदा स्मरणीय रहेगी।

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हे भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका