सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख काव्य रचनाएं

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख काव्य रचनाएं सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हिंदी साहित्य में छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख काव्य रचनाएं


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' आधुनिक हिंदी काव्य के उन विरल कवियों में से हैं जिन्होंने न केवल भाषा और भाव के स्तर पर, बल्कि काव्य की संरचना और शिल्प के स्तर पर भी हिंदी कविता को एक नई दिशा दी। छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों—जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और निराला—में वे सबसे अधिक विद्रोही, प्रयोगधर्मी और बहुआयामी रचनाकार माने जाते हैं। उनका जन्म सन् 1896 में हुआ था और उनका संपूर्ण जीवन आर्थिक संघर्ष, पारिवारिक विषाद तथा सामाजिक विषमताओं से जूझते हुए बीता, किंतु इन्हीं विपरीत परिस्थितियों ने उनकी रचनाशीलता को असाधारण गहराई और तीव्रता प्रदान की।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की प्रमुख काव्य रचनाएं
निराला की काव्य-यात्रा केवल छायावादी रहस्यवाद और सौंदर्य-चेतना तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने प्रगतिवादी विचारधारा, सामाजिक यथार्थ, व्यक्तिगत शोक और आध्यात्मिक चिंतन जैसे विविध आयामों को भी अपनी रचनाओं में समाहित किया। यही कारण है कि उनकी कविताओं में एक ओर प्रकृति का सूक्ष्म और संवेदनशील चित्रण मिलता है, तो दूसरी ओर सामाजिक शोषण, वर्ग-विषमता और मानवीय पीड़ा के विरुद्ध तीखा आक्रोश भी दिखाई देता है। उन्होंने हिंदी काव्य को छंदों की परंपरागत जकड़न से मुक्त कर मुक्त छंद की नींव रखी, जिसने बाद के अनेक कवियों को नई काव्य-भाषा गढ़ने की प्रेरणा दी।

निराला की रचनाओं की विशेषता यह है कि उनमें भावुकता के साथ-साथ बौद्धिक गहराई और दार्शनिक चिंतन का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है। चाहे वह पिता के हृदय की मार्मिक वेदना हो, आत्मविश्वास और शक्ति-साधना का उद्घोष हो, अथवा सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य हो, निराला हर विधा और हर भाव को अपनी विशिष्ट शैली में ढालने में सिद्धहस्त थे।

छायावाद के कीर्ति स्तंभ महाप्राण निराला उन स्वनाम धन्य कवियों में हैं जो स्वयं से ही राजित हैं । उन्होंने अपनी अप्रतिम कर्यित्री प्रतिभा से अनेक काव्य-कृतियों का सृजन किया जिनका कालक्रमानुसार परिचय इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है- निराला जी के काव्य ग्रन्थों का प्रकाशनानुसार क्रम इस प्रकार है— अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1939), अनामिका (दि. 1938), तुलसीदास (1938), अणिमा (1943), नये पत्ते (1946), अपरा (1946), बेला (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953), गीत गुँज (1954), कविश्री (1955), सांध्य काकली (1969), राग-विराग (1947) । प्रथम अनामिका उपलब्ध नहीं है । इसमें कुल 9 कविताएँ थीं जिनमें से 7 कविताएँ बाद में परिमल में समाविष्ट पर कर ली गयीं 'अपरा' और 'कविश्री' काव्य-संग्रह हैं। इनमें पूर्व प्रकाशित काव्य-ग्रन्थों से रचनाएँ, संकलित की गयी हैं। 'राग-विराग' में डॉ. रामविलास शर्मा ने कवि की श्रेष्ठ रचनाओं को कालक्रमानुसार सम्पादित किया है -

अनामिका

सन् 1923 ई. में 'अनामिका' नामक निराला जी का प्रथम काव्य-संग्रह कलकत्ता से श्री नवजादिक लाल द्वारा प्रकाशित हुआ जो अब लगभग अप्राप्य सा है। यह संग्रह हिन्दी साहित्य की प्रथम विशुद्ध स्वच्छंदतावादी कृति समझी जा सकती है इसकी रचनाएँ, 'नारायण', 'मतवाला' और 'समन्वय' नामक पत्रों में प्रथम बार प्रकाशित हुई थीं । प्रारम्भिक रचना होने के कारण इस संग्रह की सभी रचनाओं में प्रौढ़ता की आशा नहीं की जा सकती वस्तुतः उनका मूल्य काव्य की दृष्टि से उतना नहीं है जितना ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से है तथापि इस संग्रह की तीन रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। 'पंचवटी प्रसंग', 'जूही की कली' तथा 'तुम और मैं' में इन तीन कविताओं का निराला साहित्य में ही नहीं अपितु पूरे हिन्दी साहित्य में भी महत्वपूर्ण स्थान है। इस संग्रह की अधिकांश रचनाओं के दो ही विषय हैं- अध्यात्म और प्रेम।पंचवटी प्रसंग में अद्वैतवादी दर्शन का उत्कृष्ट निदर्शन हुआ । प्रेम-मूलक रचनाओं में प्रेम के विविध आयामों का रूपातयन हुआ है 

परिमल

सन् 1930 ई. में निराला का दूसरा काव्य-संग्रह 'परिमल' प्रकाशित हुआ, जिसमें सन् 1924 ई. से 1927 ई. तक 'मतवाला' काल में निराला जी ने जिन कविताओं का प्रणयन किया, उनका संग्रह है । 'परिमल' निराला जी की गीत सृष्टि का प्रथम सोपान कहा जा सकता है। इसमें लगभग बीस गीत हैं। स्वयं निराला जी के मतानुसार इसमें उनकी प्राथमिक अधिकांश सुनी हुई रचनाएँ हैं। इस संग्रह के तीन खण्ड निराला जी ने किये हैं । प्रथम खण्ड में सममात्रिक सान्त्यानुप्रास कविताएँ, दूसरे खण्ड में विषम मात्रिक सान्त्यानुप्रास कविताएँ एवं तीसरे खण्ड में स्वच्छंद छंद में लिखित कविताएँ हैं । 'परिमल' में कुल 48 कविताएँ हैं । शिल्प और छंदगत नाविन्य का आग्रह 'परिमल' में झलकता है। 'बादल राग', 'धारा', 'रास्ते के फूल से', 'कवि', 'जुही की कली', आदि कविताएँ इसका साथ देती हैं। 'बादल राग', 'महाराजा शिवाजी का पत्र', 'जागो फिर एक बार', आदि कविताओं में ओज और प्रखरता है । गीतों में ऋतु-सौन्दर्य सम्बन्धी गीत अधिक हैं। पूरे काव्य-संग्रह में एक सहजता है।

गीतिका

परिमल की भाव-भूमि का ही विकास 'गीतिका' में हुआ है, जो सन् 1936 ई. में प्रकाशित हुई । 'गीतिका' में लगभग 101 गीत हैं, जो विविध भावों में रचे गये हैं । इन विविध भावों में रचित गीतों पर दर्शन, श्रृंगार और सौन्दर्य की छाप है । इन गीतों में प्रस्फुरित प्रणय और श्रृंगार का निराला जी के वैयक्तिक जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं है । भाषा इस संग्रह की बड़ी गरल प्रवाहमयी और समलंकृत है । निराला जी ने अनेक छंदों का प्रयोग कर 'गीतिका' के गीत सँवारे हैं। शृंगार और सौन्दर्य से लबालब इसके अधिकांश गीतों में स्त्री-सौन्दर्य का सुन्दर वर्णन है । इन मृदु और मधुर स्वरों में संघर्षात्मक अनुभूतियों का एक तीव्र स्वर भी मिलता है, जो आगे चलकर प्रबल रूप में उपस्थित हुआ है । 'जला दे जीर्ण शीर्ण प्राचीन', 'जागो', 'जीवन- धनिके', 'छोड़ दो', 'जीवन यों न भलों', आदि गीतों में सामाजिक जीवन की भी चर्चा प्राप्त है । 'गीतिका' का उद्देश्य उसके नामकरण पर से ही गीत प्रस्तुत करना सिद्ध होता है । निराला जी ने इन गीतों को शास्त्रीय संगीत के आधार पर लिखा है । इन गीतों की स्वरलिपि स्वयं निराला जी तैयार करने वाले थे परन्तु परिस्थितिवश वे ऐसा न कर सके। अगर करते तो शायद बंगला के रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गीतों के समान 'गीतिका' के गीत भी घर-घर गाये जाते । इतने विविध भाव से भरे वस्तु-मूलक गीत हिन्दी में न के बराबर लिखे गये हैं।
 

अनामिका (द्वितीय)

यह प्रथम अनामिका से सर्वथा भिन्न है । निराला जी ने यह नामकरण स्वर्गीय बाबू महोदव प्रसाद सेठ की स्मृति में कृतज्ञतावश किया है । यदि सेठ जी न होते तो निराला भी न आए होते क्योंकि निराला को वेदान्तिक साहित्य से खींचकर हिन्दी में परिचित और प्रगतिशील करने का श्रेय सेठ जी को ही है। श्री धनंजय वर्मा के अनुसार, "परिमल के बाद अनामिका ही निराला जी का पूर्ण प्रतिनिधित्व करती है और स्वयं अनामिका स्वच्छंदतावाद का करती है।" दिव्य प्रेम और उत्युक्त सौन्दर्य के साथ यहाँ जीवन के यथार्थ का कटु अनुभव कराने वाली प्रगतिशील रचनाएँ हैं जिनमें भाव परिवर्तन के साथ शैली भी परिवर्तित होती गयी है । अनामिका के एक छोर पर 'प्रेयसी' जैसी रचना हैं और दूसरे पर 'राम की शक्ति पूजा' जैसी रचना हैं । इनके बीच एक रूप 'तोड़ती पत्थर' और 'बनबेला' का है दूसरा 'सरोज स्मृति' का । एक ओर 'दान' जैसी व्यंग्य प्रधान रचनाएँ हैं तो दूसरी ओर 'नर्सिंग' जैसी महाकाव्यात्मक कल्पना प्रधान रचनाएँ हैं। एक ओर पराजय और निराशा है, दूसरी ओर उद्दाम आत्मविश्वास का जागरण गीत और उद्बोधन है। निराला जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनका विरोधाभास है । एक ही ग्रन्थ में विरोधाभास का यह रूप उनकी व्यापकता और विविधता, विराटता और विस्तार का ही परिणाम है। हमारे मत में सब दृष्टियों से अनामिका निराला जी का ही नहीं पूरे स्वच्छन्तावादी युग का प्रतिनिधि काव्य-संग्रह है । इसमें प्रथम अनामिका का कोई अंश नहीं है डॉ. भगीरथ मिश्र के मतानुसार, “निराला जी काव्य की प्रायः सभी प्रवृत्तियों की झलक इस दूसरी 'अनामिका' में मिलती है । 'रेखा', 'सरोज स्मृति' में कवि का पारिवारिक जीवन मुखर है । 'दान', 'बनवेला', 'मित्र के प्रति', 'ठूंठ', 'उक्ति', 'सच है', आदि कविताओं में व्यंग्य का स्वर प्रधान है, तो 'नाचे उस पार श्यामा', 'कहाँ देश है ?', 'तोड़ती पत्थर', 'दिल्ली', 'वे किसान की नई बहू की आँखें', इत्यादि कविताओं में सामाजिक एवं राजनैतिक वैषम्य पर करारी चोटें हैं। कुछ श्रृंगारिक, भक्तिपरक एवं प्रकृति वर्णनात्मक कविताएँ भी इस संग्रह में हैं। सन् 1936 ई. से 1939 ई. का काल निराला काव्य में उथल-पथल, परिवर्तन और संक्रान्ति का काल है। स्वच्छंद रोमानी वातावरण में डूबा हुआ उनका मन वास्तविक परिस्थिति के कठोर धरातल पर उतरकर जीवन के भव्य, भीषण, रुद्र तथा करुण दृश्यों को देखने, परखने एवं अंकित करने में अधिक व्यस्त था। 'अनामिका' में विद्रोह का यह स्वर जैसा प्रबल है, वैसा ही पूर्वकाल का आस्थामय एवं उदारता भाव का स्वर भी मुखर है।
 

तुलसीदास

यह निराला जी की एक प्रौढ़ काव्य कृति है जिसकी रचना 100 छंदों और 600 पंक्तियों में हुई है । इसमें महाकाव्यात्मक गरिमा है । इसका कथानक पत्नी के प्रति तुलसीदास की गहनासक्ति तथा पत्नी की फटकार से उनके राम भक्ति की ओर उन्मुख होने की लोक प्रचलित कथा पर आधारित है । इसके कथा विकास को स्थूल रूप से चार सोपानों में विभक्त किया जा सकता है- 

(i) पृष्ठ भूमि के रूप में भारतीय संस्कृति के ह्रास का चित्रण, 
(ii) तुलसीदास को चित्रकूट भ्रमण के समय प्रकृति से देश के जीवनोद्धार का संदेश मिलना, 
(iii) प्रेमासक्त तुलसीदास का ससुराल जाना तथा 
(iv) पत्नी के उपदेश से जीवन का लक्ष्य प्राप्त होना है।
 
इस रचना का उद्देश्य सांस्कृतिक उत्थान के लिए अपेक्षित रचनात्मक संघर्ष को स्वीकृति देना और समूचे राष्ट्र को इसके लिए प्रेरित करना है।

'तुलसीदास' में प्रकृति-वर्णन और रूपकों की सृष्टि प्रचुर मात्रा में है प्रकृति-वर्णन के आधार पर ही निराला जी तुलसीदास का मानसिक और संस्कृतियों का आपसी संघर्ष चित्रित करते जाते हैं। प्रकृति-वर्णन के साथ-साथ सामाजिक और पारिवारिक जीवन की अत्यंत मार्मिक एवं सरस झांकियाँ उन्होंने प्रस्तुत की हैं। संक्षेप में 'तुलसीदास' निराला जी की उदात्त चिंतन प्रधान बुद्धिवादी काव्यकृति है ।
 

अणिमा

इसका प्रकाशन सन् 1943 ई. में हुआ था । 'अणिमा' में 44 रचनाएँ संकलित हैं, जिनमें कुछ गीत हैं और कुछ कविताएँ हैं। यह निराला जी का सातवाँ काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में दो प्रकार की कविताएँ हैं—व्यक्ति विशेष पर जैसे संत कवि रैदास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, कविवर प्रसाद, विजयलक्ष्मी पण्डित, भगवान बुद्ध इत्यादि तथा अन्य विषयों पर जैसे—सहस्रावधि, उद्बोधन आदि। इसके विषय आध्यात्मिक, आत्मसाक्षात्कार और महापुरुष वंदना सम्बन्धी हैं । 'अणिमा' के अनेक गीतों में एकाकी कवि हृदय के करुण उद्गार हैं । अन्य गीतों में रहस्यवादी, राष्ट्रीयतावादी और मानवतावादी स्वर प्रस्फुटित हैं । इन कविताओं में महान् आत्माओं के प्रति कवि का आदर और श्रद्धा भाव झलकता है । इस कविता संग्रह में कवि छायावाद की सीमा पार करके 'प्रगतिवाद' की सीमा पर खड़ा हुआ दिखाई देता है ।
 

नये पत्ते

इसका प्रकाश काल सन् 1946 ई. है । 'नये पत्ते' की कविताओं में भाषा और विषय की वैविध्य नहीं है। सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक रूढियों और परम्पराओं पर तीक्ष्ण व्यंग्य प्रहार करना ही कवि का लक्ष्य दृष्टिगोचर होता है । जीवन का अवगढ़ भदेस यहाँ पर उसके मूल विकृत रूप में उपस्थित हुआ है । निराला जी ने यथार्थ का चित्रण करने में बड़े पैने, व्यंग्य, विनोद, हास्य की योजना की है फिर भी कई जगह पर उसकी भाषा ऊबड़-खाबड़ और भाव अत्यंत अनावृत्त रूप में उपस्थित हुए हैं । 'रानी और कानी', 'खजोहरा', 'भास्कोडायलॉग्स', 'गरम-पकौड़ी', 'महगूँ रहा', 'कुत्ता भौंकने लगा', 'झिंगुर डटकर बोला', आदि कविताएँ निराला जी की हास्य विनोद प्रियता को स्पष्ट करती हुई भी एक प्रयोगशील यथार्थवादी दृष्टि का परिचय देती हैं।
 

अपरा

अपरा काव्य-संग्रह सन् 1946 ई. में साहित्यकार संसद द्वारा प्रकाशित हुआ । इस संकलन में निराला जी की विभिन्न कालों में लिखी हुई प्रकाशित अप्रकाशित कविताओं का संचय है । 'जागो फिर एक बार', 'सरोज स्मृति', 'राम की शक्ति पूजा', 'बादल राग', आदि प्रसिद्ध कविताएँ भी इस संग्रह में हैं । 'अपरा' का प्रारम्भ भारती-वंदना से है। निराला जी काव्य की लगभग सभी प्रवृत्तियाँ इस संग्रह में देखने को मिलती हैं।
 

बेला

इसका प्रकाशन सन् 1943 में हुआ था । इसमें निराला जी काव्य की विभिन्न प्रवृत्तियों का दिग्दर्शन होता है। इसमें 95 गीत संकलित हैं और कुछ गजलें भी हैं । गजलों की सृष्टि उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी के लोगों द्वारा फेंकी गयी चुनौती के फलस्वरूप की थी। इन गजलों में फारसी के छंद शास्त्र का निर्वाह किया गया है पूरे काव्य में कई तरह की रचनाएँ संकलित हैं । यथा-विनय सम्बन्धी, प्रवृत्ति परक, शृंगारिक, दार्शनिक, व्यंग्यात्मक, विनोदपूर्ण, सामाजिक तथा राष्ट्रीय भाव धारा का वहन करने वाली और रहस्यवादी कविताएँ भीं। सभी गीत पूरी तरह से गेय हैं।

अर्चना

अर्चना का प्रकाशन सन् 1950 ई. में हुआ है । 'अर्चना' में आध्यात्मिक, सामाजिक शृंगारिक, प्राकृतिक और आत्म-परक सभी प्रकार के गीत हैं। भक्ति-परक गीतों में 'पूरित दूर करो नाथ', 'जिधर देखिए श्याम विराजे', आदि हैं। सामाजिक जीवन, शृंगार आदि प्रकृति का सुन्दर समन्वित रूप 'प्रिय के हाथ लगाये जागी' में देखा जा सकता है। 'माँ अपने आलोक निखारो' गीत में कवि नर को नरक के त्रास से उबारने के लिए प्रयत्नशील है, तो 'दुखता रहता है अब जीवन' में अपने अतीत की सुखद स्मृतियों से दुखी मन को सम्बल देते हुए दीख पड़ते हैं। 'अर्चना' के गीत की भाषा-शैली उच्चकोटि की है। 

आराधना

'आराधना' का प्रकाशन काल सन् 1953 ई. है । आराधना में 96 गीतों का संकलन है । विषय की दृष्टि से इसके गीतों में विविधता है, किन्तु इनमें भक्ति-परक एवं आध्यात्मिक गीतों की प्रधानता है। जिससे निराला जी का भक्त रूप उजागर हुआ है । 'कृष्ण-कृष्ण-राम-राम', 'काम रूप हरो राम', 'राम के हुए तो बने काम', 'विपदा हरण हार', 'हरि हे करो पार', आदि गीत भक्ति-परक हैं 'जब तू रचना में हँस दी', 'वन उपवन खिल आईं कलियाँ', आदि गीत प्रणय सम्बन्धी हैं। 'ऊँट बैल का साथ हुआ है', 'मानव जहाँ बैल घोड़ा है', 'बाँध टूटता है', आदि गीतों में सामाजिक विकृतियों पर व्यंग्य हैं । 'आराधना' के गीतों का विषय उदात्त और लक्ष्य महान है।
 

सांध्यका कली

'सांध्यका कली' का प्रकाशन सन् 1969 में हुआ है। यह निराला जी की 68 रचनाओं का संकलन है। इसकी रचनाएँ भक्ति, प्रेम, सौन्दर्य, श्रृंगार और प्रकृति से सम्बन्धित हैं । 'जिधर देखो श्याम विराजे', 'कल्मष को साधन से धोओ', आदि गीतों में उनकी भक्ति भावना व्यक्त हुई है। शीत की गहरी विभावरी में प्राकृतिक सौन्दर्य दृष्टिगोचर होता है। 'जय तुम्हारी देख भी ली' तथा 'पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ' है जैसी रचनाएँ आत्म-परक हैं। 'सांध्यका कली' के गीतों में महान् मानवीय मूल्यों की स्थापना के रूप में सांस्कृतिक चेतना का उदय स्पष्ट दिखाई देता है । इसकी भाषा सहज और सरल है।
 

कुकुरमुत्ता

'कुकुरमुत्ता' के प्रथम संस्करण में कुकुरमुत्ता नाम की एक लम्बी कविता के साथ अन्य कविताएँ भी संकलित थीं । किन्तु इसके द्वितीय संस्करण में उन सात कविताओं को 'नये पत्ते' में सम्मिलित कर दिया गया और इसमें कुकुरमुत्ता को ही अकेले छापा गया । इस काव्य में कुकुरमुत्ता सामान्यजन का प्रतीक है, जो आभिजात्य के प्रतीक गुलाब पर तीव्र व्यंग्य प्रहार करता है। इस काव्य में सामाजिक आभिजात्य के. साथ-साथ कविता के आभिजात्यवादी प्रतिमानों से भी मुक्ति का प्रयास उजागर हुआ है।

राम की शक्ति पूजा

'राम की शक्ति पूजा' निराला जी की एक प्रबन्धात्मक रचना है जिसने उनके सम्पूर्ण कृतित्व और व्यक्तित्व को गौरव प्रदान किया है । इसके माध्यम से उनकी काव्य-प्रतिभा का चरमोत्कर्ष व्यंजित हुआ है। छायावाद के अंतिम चरण में रची गई यह कविता जहाँ हिन्दी काव्य जगत में हो रहे परिवर्तन को संकेतित करती है वहीं उसने अपने संघर्ष को भी मुखरित किया है । कवि ने इसके कथानक का संयोजन बड़ी ही सूझ-बूझ और गंभीरता से किया है और उसके विकास में जो अपनी प्रबंध-पटुता दिखायी है वह सभी दृष्टियों से सराहनीय है। 

इस तरह हम देखते हैं कि निराला जी ने अपनी मौलिक करयित्री प्रतिभा से प्रभूत काव्य-सृष्टि की है। वे छायावाद के प्रवर्तकों एवं प्रमुख उन्नायकों में हैं । उनका सम्पूर्ण काव्य संसार उनके आत्माभिव्यंजन से अभिव्यंजित है साथ ही साथ उनकी काव्य की अन्तःचेतना में उनका गहन और गंभीर अध्ययन परिलक्षित होता है । छायावाद के चारों प्रमुख स्तम्भों में सबसे मौलिक प्रतिभा निराला जी में ही देखने को मिलती है, यद्यपि प्रसाद पंत और महादेवी की प्रतिभा भी कम नहीं है तथापि निराला जी की उदात्त चेतना और युग संचरण की अप्रतिम क्षमता अनुपमेय है। उनके काव्य का चिंतन सर्वांशतः उनका अपना है। वे आपाद मस्तष्क मौलिक रचनाकार हैं। उनकी उपमा स्वयं ही उन्हीं से दी जा सकती है अन्य किसी से नहीं की जा सकती है।

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