मलयालम सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र और सत्ता की अश्लीलता सिनेमा की बात करते समय हमारी दृष्टि प्रायः पर्दे पर ठहर जाती है।
मलयालम सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र और सत्ता की अश्लीलता
सिनेमा की बात करते समय हमारी दृष्टि प्रायः पर्दे पर ठहर जाती है। पात्र प्रेम करते हैं, संघर्ष करते हैं, टूटते हैं, मरते हैं और कभी-कभी पुनर्जन्म भी लेते हैं। नायक विजयी होता है, नायिका प्रेम करती है, खलनायक पराजित होता है और कहानी समाप्त हो जाती है। रोशनी बुझती है। दर्शक अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
लेकिन क्या सिनेमा सचमुच वहीं समाप्त हो जाता है?
नहीं।
पर्दे के पीछे एक दूसरा सिनेमा लगातार चलता रहता है। वहाँ कैमरे के पीछे के सत्ता-संबंध हैं। धन की शक्ति है। प्रसिद्धि की राजनीति है। अवसरों का नियंत्रण है। शरीरों का बाजारीकरण है। मौन की कीमत है। बोलने की कीमत है। और कभी-कभी चुप रहने की भी कीमत है।
किसी को बोलने पर अपना करियर खोने का भय होता है और किसी को चुप रहने पर अपना आत्मसम्मान।
इसलिए मलयालम सिनेमा का इतिहास केवल फिल्मों, अभिनेताओं, निर्देशकों और पुरस्कारों का इतिहास नहीं है। वह सत्ता, देह, श्रम, प्रसिद्धि और रचनात्मक स्वतंत्रता के बीच बने जटिल संबंधों का इतिहास भी है।
यहीं से सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र एक राजनीतिक प्रश्न में बदल जाता है।
मंजु वारियर और निर्देशक सनल कुमार शशिधरन के बीच हुआ विवाद इसी व्यापक संदर्भ में एक ऐसे प्रसंग के रूप में देखा जा सकता है, जो व्यक्तिगत विवाद से आगे जाकर सार्वजनिक संस्कृति, कानून, मीडिया और सत्ता के संबंधों पर प्रश्न उठाता है।
2022 में मंजु वारियर की शिकायत के आधार पर सनल कुमार शशिधरन को पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उस समय प्रकाशित समाचार रिपोर्टों में सोशल मीडिया के माध्यम से मानहानि और धमकी देने से संबंधित आरोपों का उल्लेख किया गया था। बाद में शशिधरन ने अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का खंडन किया और मंजु वारियर के संबंध में अपने आरोप सार्वजनिक किए। इन आरोपों को आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी आरोप का सार्वजनिक रूप से दोहराया जाना उसे स्वतः सिद्ध तथ्य में परिवर्तित नहीं करता।
यहीं से हमारे सार्वजनिक विवेक की परीक्षा शुरू होती है।
मौन को अपराध-स्वीकारोक्ति क्यों माना जाए?
हमारे समाज में एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है। कानून और प्रमाण की जगह हम अनुमान को बैठा देते हैं।
किसी ने आरोप लगाया।
दूसरे ने उत्तर नहीं दिया।
तीसरे ने उस पर अपनी कहानी जोड़ दी।
चौथे ने उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित कर दिया।
और पाँचवें ने घोषणा कर दी कि यही सत्य है।
इस प्रकार एक आरोप धीरे-धीरे सत्य का मुखौटा पहन लेता है।
लेकिन मौन अपराध-स्वीकारोक्ति नहीं है।
केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति अपने ऊपर लगाए गए आरोप के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा नहीं करता, यह निष्कर्ष निकालना तार्किक नहीं है कि आरोप सत्य है।
कानूनी कार्रवाई न करने के अनेक कारण हो सकते हैं। यह व्यक्तिगत निर्णय हो सकता है, कानूनी सलाह का परिणाम हो सकता है, विवाद को और अधिक सार्वजनिक न करने की इच्छा हो सकती है या कोई अन्य परिस्थिति हो सकती है।
इसी तरह, किसी व्यक्ति द्वारा किसी आरोप को बार-बार दोहराया जाना भी उसे सत्य नहीं बना देता।
सत्य शोर से स्थापित नहीं होता। सत्य प्रमाण से स्थापित होता है।
यही वह बुनियादी नागरिक विवेक है जिसे हमें बार-बार याद करना होगा।
मीडिया-ट्रायल में उत्तेजना होती है; न्यायिक प्रक्रिया में प्रमाण, प्रतिपरीक्षण और प्रक्रिया होती है।
सोशल मीडिया की भीड़ किसी न्यायालय का विकल्प नहीं हो सकती।
स्त्री और मलयालम सिनेमा
व्यक्तिगत विवादों से जुड़े कानूनी प्रश्न अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उनके पीछे एक बड़ा सांस्कृतिक इतिहास भी मौजूद है।
मलयालम सिनेमा में स्त्री को कब एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में देखा गया?
उसकी इच्छा, कामना, क्रोध, बुद्धि, आर्थिक स्वतंत्रता, अकेलापन, असफलता और स्वप्न को कब उसकी अपनी जीवनानुभूति माना गया?
व्यावसायिक सिनेमा के अनेक चरणों में नायिका कथा का स्वतंत्र केंद्र नहीं थी।
वह नायक की कहानी का विस्तार थी।
नायक के प्रेम को प्रमाणित करने के लिए।
नायक की पुरुषत्व-छवि को उभारने के लिए।
नायक के दुःख को सांत्वना देने के लिए।
नायक की विजय को भावनात्मक चमक देने के लिए।
लेकिन प्रश्न यह है:
उसकी अपनी कहानी कहाँ थी?
यही प्रश्न मलयालम के लोकप्रिय सिनेमा के दीर्घकालीन सौंदर्यशास्त्र को समझने के लिए आवश्यक है।
स्त्री को पर्दे पर उपस्थित करना और स्त्री को उसकी स्वतंत्र सत्ता के साथ प्रस्तुत करना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।
शरीर: चरित्र या बाजार की वस्तु?
सिनेमा शरीर के बिना नहीं बनता।
लेकिन शरीर को देखना और शरीर को बेचने योग्य वस्तु में बदल देना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं।
नग्नता अपने आप में अश्लील नहीं है।
कामुकता अपने आप में अश्लील नहीं है।
प्रेम भी अश्लील नहीं है।
अश्लीलता का प्रश्न वहाँ उत्पन्न होता है जहाँ मनुष्य का शरीर उसकी मनुष्यता से काटकर उपभोग की वस्तु बना दिया जाता है।
इसलिए कैमरा स्त्री के शरीर को किस प्रकार देखता है, यह केवल सौंदर्यशास्त्र का प्रश्न नहीं है।
यह सत्ता का प्रश्न भी है।
कौन देख रहा है?
किसे देखा जा रहा है?
देखने का अधिकार किसके पास है?
और देखने के इस संबंध में सत्ता किसके हाथ में है?
सिनेमा के इतिहास में ये प्रश्न नए नहीं हैं। लेकिन हर पीढ़ी को इन्हें अपने समय में फिर से पूछना पड़ता है।
शोभा और विजयश्री: स्मृति से आगे इतिहास की ओर
शोभा और विजयश्री की मृत्यु मलयालम सिनेमा की सामूहिक स्मृति में आज भी गहरी पीड़ा से जुड़ी घटनाएँ हैं।
ऐसी त्रासदियों को याद करते समय सबसे आसान रास्ता है व्यक्तियों के निजी जीवन के बारे में अनुमान लगाना और अतीत के लिए वर्तमान की भाषा में निर्णय सुना देना।
लेकिन इतिहास का अधिक गंभीर रास्ता कुछ और है।
उस समय फिल्म उद्योग में महिलाओं की रोजगार-सुरक्षा कैसी थी?
उनके निजी जीवन में मीडिया का हस्तक्षेप किस स्तर तक था?
एक अभिनेत्री पर सामाजिक और पेशेवर दबाव किस प्रकार काम करता था?
क्या वह सत्ता-केंद्रों के सामने स्वतंत्र रूप से अपनी असहमति व्यक्त कर सकती थी?
कार्यस्थल पर उसकी गरिमा और सुरक्षा के लिए कौन-सी संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद थीं?
ऐसे प्रश्न इतिहास को गपशप से अलग करते हैं।
किसी त्रासदी को व्यक्तिगत आरोप का प्रमाण बना देना सरल है।
उस त्रासदी से सामाजिक संरचना को समझना कठिन है।
इतिहास की गंभीरता इसी कठिन रास्ते में है।
अडूर और सिनेमा की दूसरी भाषा
मलयालम सिनेमा के इतिहास में अडूर गोपालकृष्णन का आगमन एक महत्वपूर्ण सौंदर्यबोधात्मक परिवर्तन का संकेत था।
यह केवल एक नए निर्देशक का आगमन नहीं था।
यह सिनेमा को मनोरंजन की वस्तु से आगे ले जाकर मनुष्य के अंतर्मन, सामाजिक संरचनाओं और अस्तित्वगत संकटों की खोज करने वाली कला के रूप में देखने की नई संभावना थी।
अडूर के पात्र पारंपरिक अर्थों में केवल नायक या खलनायक नहीं हैं।
वे अकेले मनुष्य हैं।
वे टूटे हुए मनुष्य हैं।
वे सामाजिक संरचनाओं से घिरे हुए मनुष्य हैं।
वे अपने अस्तित्व के अर्थ की तलाश में भटकते हुए मनुष्य हैं।
इस नई सिनेमा-भाषा ने मलयालम फिल्म संस्कृति को एक अलग सौंदर्यबोध दिया।
लेकिन यहाँ एक आवश्यक प्रश्न भी है।
क्या कला-सिनेमा के आगमन के साथ सत्ता समाप्त हो गई?
नहीं।
सिनेमा का रूप बदल जाने से सत्ता का चरित्र अपने आप नहीं बदलता।
कला-सिनेमा के भीतर का अँधेरा
“आर्ट सिनेमा” शब्द हमारे भीतर एक सांस्कृतिक श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न करता है।
लेकिन कला भी मनुष्य ही बनाता है।
और जहाँ मनुष्य है, वहाँ अहंकार, सत्ता, आकर्षण, वर्चस्व और आत्ममुग्धता की संभावनाएँ भी हैं।
कला-सिनेमा सत्ता से मुक्त कोई पवित्र क्षेत्र नहीं है।
वहाँ भी पुरुष-दृष्टि हो सकती है।
वहाँ भी व्यक्तिपूजा हो सकती है।
वहाँ भी बाजार का दबाव हो सकता है।
वहाँ भी निर्देशक-केंद्रित सत्ता हो सकती है।
कभी-कभी व्यावसायिक सिनेमा जिस शरीर को सीधे बाजार की वस्तु बनाता है, कला-सिनेमा उसी शरीर को अधिक परिष्कृत बौद्धिक भाषा में प्रस्तुत कर सकता है।
वह शरीर “कला” बन जाता है।
“यथार्थ” बन जाता है।
“प्रतिरोध” बन जाता है।
“सौंदर्यशास्त्र” बन जाता है।
लेकिन तब भी एक प्रश्न बचा रहता है:
क्या उस शरीर की अपनी आवाज़ है?
यही वह प्रश्न है जहाँ कला को स्वयं अपने सामने खड़ा होना पड़ता है।
अश्लीलता शरीर में नहीं, दृष्टि में भी होती है
जो समाज अश्लीलता को केवल नग्न शरीर में खोजता है, वह अश्लीलता के अधिक गहरे अर्थ से बच निकलता है।
स्त्री का शरीर दिखाना अपने आप में अश्लीलता नहीं है।
लेकिन स्त्री के शरीर को उसकी मानवीय गरिमा से अलग करके उपभोग की वस्तु बना देना एक अलग प्रकार की दृष्टि है।
वह दृष्टि कपड़ों के भीतर भी मौजूद हो सकती है।
इसलिए अश्लीलता का संबंध केवल शरीर से नहीं, दृष्टि और सत्ता के संबंध से भी है।
जब किसी मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने के बजाय उपयोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है, तब अश्लीलता का वास्तविक प्रश्न सामने आता है।
सिनेमा की नैतिकता कपड़ों की लंबाई से नहीं मापी जा सकती।
उसे चरित्र की स्वतंत्रता, सहमति, गरिमा और प्रस्तुति के संदर्भ में समझना होगा।
महिला-सुरक्षा: भाषण से संस्था तक
फिल्म उद्योग में महिला-सुरक्षा के पक्ष में अनेक बातें कही गई हैं।
लेकिन भाषण पर्याप्त नहीं है।
कार्यस्थल पर स्पष्ट और प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था होनी चाहिए।
शिकायतकर्ता और आरोपित, दोनों के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित होनी चाहिए।
सत्ता के पदों पर बैठे लोगों के लिए जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए।
अनुबंध पारदर्शी होने चाहिए।
व्यक्तिगत दबाव और पेशेवर निर्णय के बीच की सीमा स्पष्ट रहनी चाहिए।
मीडिया को आरोपों को सनसनी में बदलने से बचना चाहिए।
और सोशल मीडिया की सार्वजनिक भीड़ को न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए।
सुरक्षित फिल्म-संस्कृति केवल घोषणाओं से नहीं बनती।
वह संस्थाओं से बनती है।
प्रसिद्धि: सामाजिक पूँजी का दूसरा चेहरा
सिनेमा में प्रसिद्धि आर्थिक पूँजी के साथ-साथ सामाजिक पूँजी भी है।
एक प्रसिद्ध अभिनेता, अभिनेत्री या निर्देशक की बात को एक सामान्य व्यक्ति की बात की तुलना में कहीं अधिक सार्वजनिक प्रसार मिल सकता है।
इसलिए प्रसिद्धि के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
प्रसिद्धि किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखती।
लेकिन किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के विरुद्ध लगाया गया आरोप भी उसे स्वतः दोषी नहीं बनाता।
स्टारडम प्रमाण नहीं है।
स्टार-विरोध भी प्रमाण नहीं है।
हमें जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह है प्रमाण की संस्कृति।
मलयालम सिनेमा को एक और नवजागरण चाहिए
मलयालम सिनेमा को एक नए नवजागरण की आवश्यकता है।
यह 4K कैमरे का नवजागरण नहीं है।
यह डिजिटल साउंड डिजाइन का नवजागरण नहीं है।
यह मनुष्य को देखने वाली दृष्टि का नवजागरण है।
स्त्री को केवल शरीर के रूप में न देखना।
पुरुष को केवल सत्ता के रूप में न देखना।
श्रमिक को केवल नामहीन हाथ न समझना।
अभिनेता को देवता न बनाना।
निर्देशक को निरंकुश सत्ता न बनने देना।
आलोचक को शत्रु न मानना।
और दर्शक को केवल उपभोक्ता न समझना।
यही सिनेमा के लोकतंत्रीकरण का अधिक गहरा अर्थ है।
आखिर यह सिनेमा किसका है?
मलयालम सिनेमा का इतिहास हमसे एक असुविधाजनक प्रश्न पूछता है।
हम कहते हैं कि हमने सिनेमा को बदल दिया।
लेकिन सिनेमा ने हमें कितना बदला?
कैमरे की भाषा बदल गई।
कहानी की भाषा बदल गई।
नायक के कपड़े बदल गए।
नायिका के चरित्र बदल गए।
तकनीक बदल गई।
लेकिन सत्ता के बारे में हमारी समझ कितनी बदली?
यही वह प्रश्न है जिसे आज मलयालम सिनेमा को अपने सामने रखना चाहिए।
व्यावसायिक सिनेमा की पुरानी अश्लीलता या वल्गरिटी की आलोचना करना आसान है।
लेकिन यह पूछना कठिन है कि कहीं वही दृष्टि अधिक परिष्कृत, अधिक बौद्धिक और अधिक सांस्कृतिक भाषा में कला-सिनेमा के भीतर तो नहीं लौट आई है।
यहीं से वास्तविक आलोचना शुरू होती है।
मंजु वारियर और सनल कुमार शशिधरन के बीच का विवाद अपने कानूनी तथ्यों के स्तर पर संबंधित न्यायिक प्रक्रियाओं और प्रमाणों के आधार पर ही समझा जाना चाहिए।
लेकिन इस विवाद से आगे एक बड़ा सांस्कृतिक प्रश्न हमारे सामने आता है:
मलयालम सिनेमा में सत्ता किसकी है?
स्त्री के शरीर पर अधिकार रखने वालों की?
धन को नियंत्रित करने वालों की?
स्टारडम रखने वालों की?
कैमरा नियंत्रित करने वालों की?
या अंततः उस मनुष्य की, जिसे अपने जीवन की कहानी अपनी ही आवाज़ में कहने का अधिकार है?
शायद सिनेमा के वास्तविक नवजागरण की शुरुआत इसी प्रश्न से होगी।
पर्दे की रोशनी जितनी भी उजली क्यों न हो, वह अपने पीछे के अँधेरे को अपने आप समाप्त नहीं कर सकती।
उस अँधेरे को देखने का साहस चाहिए।
उसकी संरचना को समझने की बौद्धिक ईमानदारी चाहिए।
और उसे बदलने के लिए संस्थागत प्रयास चाहिए।
जब सिनेमा अपने पर्दे के पीछे के अँधेरे को देखने लगेगा, तभी वह मनुष्य को केवल दृश्य, शरीर, पात्र या उपभोक्ता के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र आवाज़ वाले मनुष्य के रूप में देख पाएगा।
और शायद वहीं से सिनेमा की वास्तविक मानवीयता शुरू होगी।
- बिनॉय एम. बी.,
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