रसखान और रहीम की कृष्ण भक्ति, प्रसिद्ध सवैये-दोहे और गंगा-जमुनी तहज़ीब में सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश जानें इस विस्तृत हिंदी निबंध में।
रसखान और रहीम: सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल और कृष्ण भक्ति की विरासत
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समन्वयशील प्रकृति है। यहाँ अनेक धाराएँ आकर मिलीं और एक-दूसरे को समृद्ध करती गईं। गंगा की धवल धारा और यमुना की श्याम धारा प्रयाग में मिलकर एक हो जाती हैं, फिर भी दोनों का अस्तित्व अलग दिखता है। "गंगा-जमुनी तहज़ीब" इसी सांस्कृतिक संगम का प्रतीक है, जिसमें हिंदू और मुस्लिम परंपराओं ने मिलकर भाषा, संगीत, साहित्य, स्थापत्य और भक्ति को नया रूप दिया। इस तहज़ीब के उज्ज्वल उदाहरणों में दो नाम विशेष रूप से चमकते हैं: रसखान और अब्दुर्रहीम खानखाना, जिन्हें हम रहीम के नाम से जानते हैं। दोनों जन्म से मुसलमान थे, पर उनकी काव्य-वाणी में कृष्ण, ब्रज, गोपियाँ, यमुना और गोकुल की छवियाँ जीवंत हो उठती हैं। दोनों का जीवन और साहित्य इस बात का प्रमाण है कि सच्ची भक्ति और सच्ची मानवता धर्म की दीवारों में बँधती नहीं।
मध्यकालीन पृष्ठभूमि
रसखान और रहीम का काल सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी का है। तब तक उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन और सूफ़ी परंपरा दोनों गहरी जड़ें जमा चुके थे। भक्ति आंदोलन ने जाति-पाँति और कर्मकांड के बंधनों को चुनौती देकर ईश्वर तक पहुँचने का सरल मार्ग प्रेम को बताया। सूफ़ी संतों ने भी ईश्वर को माशूक और भक्त को आशिक़ मानकर प्रेम को ही साधना का सार कहा। कबीर, नानक, जायसी, सूरदास और मीराबाई जैसे कवियों ने इसी प्रेम-तत्त्व को स्वर दिया। राजनीतिक स्तर पर अकबर की "सुलह-ए-कुल" यानी सबके साथ शांति की नीति ने इस वातावरण को और बल दिया। दरबार में हिंदी, संस्कृत और फ़ारसी के विद्वान साथ बैठते थे और अनुवाद तथा संवाद की परंपरा फल-फूल रही थी। रहीम इसी वातावरण की उपज थे, और रसखान इसी भक्ति-प्रवाह के एक विलक्षण पुष्प।
रसखान: कृष्ण-प्रेम में रँगा एक पठान कवि
रसखान का वास्तविक नाम सैयद इब्राहीम था। परंपरा के अनुसार उनका जन्म सोलहवीं शताब्दी में एक संपन्न पठान परिवार में हुआ, यद्यपि जन्मस्थान और तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है और पिहानी तथा दिल्ली दोनों का उल्लेख मिलता है। जनश्रुति है कि उन्होंने किसी प्रसंग में श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य की झलक पाई और उसके बाद उनका जीवन बदल गया। वे ब्रज में जा बसे और गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर पुष्टिमार्ग के अनुयायी बने। उनकी समाधि मथुरा के निकट महावन (गोकुल) में मानी जाती है, जहाँ आज भी लोग श्रद्धा से जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाएँ "सुजान रसखान" और "प्रेमवाटिका" हैं। उन्होंने मुख्यतः सवैया और कवित्त छंदों में ब्रजभाषा की मधुरता के साथ कृष्ण-लीला का गान किया। उनकी भाषा में न बनावटीपन है, न क्लिष्टता; वह सीधी, सरस और हृदय को छू लेने वाली है।
रसखान का सबसे प्रसिद्ध सवैया ब्रज के प्रति उनकी अनन्य आसक्ति का घोषणापत्र है:
मानुष हौं तो वही रसखान, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि कौ, जो कियो हरि छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल-कदंब की डारन॥
कवि कहता है कि अगला जन्म चाहे मनुष्य का मिले, पशु का, पत्थर का या पक्षी का, हर रूप में वह ब्रज से जुड़ा रहना चाहता है। यह भाव किसी बाहरी दिखावे से नहीं, आत्मा की गहराई से उपजा है।
एक अन्य प्रसिद्ध सवैये में रसखान उस परमतत्त्व की बात करते हैं जिसे शेष, गणेश, महेश, दिनेश और सुरेश निरंतर गाते हैं, जिसे वेद अनादि और अनंत कहते हैं, और जिसका पार नारद, शुक और व्यास जैसे ज्ञानी भी नहीं पाते। वही परमतत्त्व अहीर की छोकरियों के हाथ से एक कटोरी छाछ के बदले नाचने को तैयार हो जाता है। यहाँ ईश्वर की ऐश्वर्य-भावना पर माधुर्य-भावना की विजय है, जो भक्ति का चरम रूप है। रसखान की कविता में कृष्ण का बाल-रूप, गोपियों का उलाहना, यमुना-तट की रास-लीला, बाँसुरी की तान और राधा-कृष्ण का प्रेम बार-बार लौटता है। ऐसा रचना-संसार वही कवि रच सकता है जिसने इस भाव को केवल शब्दों से नहीं, पूरे जीवन से जिया हो। रसखान ने प्रेम को साधना का शिखर माना। उनके लिए भगवान का नाम, रूप या पंथ गौण था, प्रधान था प्रेम की निष्कपटता।
रहीम: दरबार का कवि, लोकजीवन का नीतिकार
अब्दुर्रहीम खानखाना (1556-1627) मुग़ल सेनापति बैरम खाँ के पुत्र थे। पिता की मृत्यु के बाद अकबर ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया और वे आगे चलकर दरबार के प्रमुख रत्नों में गिने गए। वे सेनापति, प्रशासक, दानी और विद्वान, सब कुछ थे। उन्हें अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत और हिंदी पर अधिकार प्राप्त था। उन्होंने बाबरनामा का फ़ारसी में अनुवाद किया और संस्कृत श्लोक भी रचे।
रहीम की प्रसिद्धि मुख्यतः उनके दोहों के कारण है, जो "रहीम दोहावली" में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक, नगर शोभा और खेट कौतुकम् जैसी कृतियाँ भी उनके नाम से जानी जाती हैं। उनकी भाषा में ब्रज, अवधी और संस्कृत की छटा दिखती है। उनके दोहों में जीवन का सार सहजता से कह दिया गया है। प्रेम के संबंध में वे कहते हैं:
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
छोटे-बड़े के भेद पर उनकी सीख है:
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥
और परोपकार पर वे कहते हैं:
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥
ये दोहे किसी धर्म-विशेष की शिक्षा नहीं, समूची मानवता की साझा नैतिक पूँजी हैं। इसी से वे आज भी पाठ्यपुस्तकों से लेकर आम बातचीत तक जीवित हैं।
रहीम की रचनाओं में कृष्ण-भक्ति के स्वर भी स्पष्ट सुनाई देते हैं। उनके बरवै छंदों और मदनाष्टक में कृष्ण, गोपियों और राधा के प्रसंग मिलते हैं। कृष्ण और सुदामा की मित्रता को आधार बनाकर उन्होंने कहा:
जे गरीब सों हित करैं, ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग॥
यहाँ रहीम कृष्ण को इसलिए नहीं सराहते कि वे किसी एक धर्म के आराध्य हैं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मित्रता में ऊँच-नीच नहीं देखी। लोक में यह मान्यता भी चली आती है कि रहीम और तुलसीदास के बीच आत्मीय संवाद था, जो राम और कृष्ण की परंपराओं के प्रति उनके सहज आदर को दर्शाता है, हालाँकि यह अधिकतर जनश्रुति पर आधारित है।
दोनों कवियों की समानता और भिन्नता
दोनों कवियों की पृष्ठभूमि और साधना-मार्ग अलग थे। रसखान एक विरक्त भक्त थे जिन्होंने ब्रज में रहकर पुष्टिमार्ग अपनाया और सवैया-कवित्त में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम गाया। रहीम उच्च राजकीय पद पर रहे मुग़ल दरबारी थे, जिन्होंने दरबारी जीवन के बीच रहकर दोहों में नीति और लोक-व्यवहार की बात कही और साथ ही भक्ति-भाव भी प्रकट किया। रसखान की भाषा शुद्ध मधुर ब्रजभाषा है, जबकि रहीम की भाषा में ब्रज, अवधी और संस्कृत का मेल है।
फिर भी दोनों में एक बड़ी समानता है। दोनों ने अपनी धार्मिक पहचान को छोड़े बिना दूसरी परंपरा के आराध्य के प्रति आदर और प्रेम प्रकट किया। रसखान ने अपनी पहचान के साथ कृष्ण को अपनाया, और रहीम ने उसी पहचान के साथ हिंदू परंपरा के प्रसंगों को अपनी कविता में स्थान दिया।यहीं गंगा-जमुनी तहज़ीब का असली अर्थ प्रकट होता है, जिसमें धर्म परिवर्तन नहीं, परस्पर सम्मान और साझेदारी है। रसखान और रहीम किसी अपवाद की तरह नहीं, एक लंबी परंपरा की कड़ी थे। अमीर ख़ुसरो ने हिंदवी में कृष्ण और अपने पीर के प्रेम में रचनाएँ कीं। ताज बीबी ने कृष्ण को अपना आराध्य माना, और उनके बारे में भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध पंक्ति है कि ऐसे मुसलमान हरिभक्तों पर करोड़ों हिंदू न्योछावर किए जा सकते हैं। नज़ीर अकबराबादी ने कृष्ण-जन्म और बाल-लीला पर दिल खोलकर लिखा। जायसी ने पद्मावत में हिंदू कथानक को सूफ़ी प्रेम-दर्शन से जोड़ा, और कबीर ने दोनों धर्मों की रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए एक साझा मानवीय धर्म की बात की।
आज के समय में प्रासंगिकता
आज जब समाज कई बार पहचान की संकीर्ण दीवारों में बँटता दिखता है, रसखान और रहीम की विरासत हमें कुछ ज़रूरी बातें याद दिलाती है। आस्था निजी होती है, पर प्रेम सार्वजनिक; अपने धर्म को निभाते हुए भी हम दूसरे की आस्था का सम्मान कर सकते हैं और उसमें सौंदर्य देख सकते हैं। भाषा, संगीत, काव्य और त्योहार जिस मिली-जुली परंपरा में विकसित हुए, उसे नकारना अपनी ही जड़ों को काटना है। जहाँ राजनीति कभी दूरियाँ बढ़ाती है, वहाँ साहित्य पुल बनाता है और कविता दिलों को जोड़ती है। रहीम का "धागा" और रसखान का "ब्रज", दोनों उसी प्रेम के प्रतीक हैं जो सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है।
उपसंहार
रसखान ने कृष्ण के चरणों में बैठकर और रहीम ने राजदरबार में रहकर एक ही बात सिखाई कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता प्रेम है और मनुष्य होने की सबसे बड़ी कसौटी दूसरे को अपना समझ पाना। गोकुल की रज में रसखान की समाधि और हिंदी के हर पाठक की ज़ुबान पर रहीम के दोहे इस बात के जीवित साक्ष्य हैं कि संस्कृतियाँ टकराकर नहीं, घुल-मिलकर बड़ी होती हैं। जब तक यमुना बहती रहेगी और कृष्ण की बाँसुरी की स्मृति जीवित रहेगी, तब तक रसखान और रहीम गंगा-जमुनी तहज़ीब के सजीव प्रतीक बने रहेंगे।


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