सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा 1938 ई. में रचित 'तुलसीदास' हिंदी साहित्य का एक उत्कृष्ट, प्रौढ़ और सफल खण्डकाव्य है।
निराला की रचना तुलसीदास एक सफल और पूर्ण खण्डकाव्य है
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा 1938 ई. में रचित 'तुलसीदास' हिंदी साहित्य का एक उत्कृष्ट, प्रौढ़ और सफल खण्डकाव्य है। यह महाकाव्य की तरह संपूर्ण जीवन का विस्तार न समेटकर, महाकवि तुलसीदास के जीवन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़—उनकी वैचारिक एवं आत्मिक क्रांति—को केंद्र में रखकर रचा गया है।
निरालाजी की रचना 'तुलसीदास' के विषय में इस बात पर मतैक्य नहीं है कि इसे काव्य की कौन-सी विधा माना जाये। प्रसिद्ध आलोचक रामचन्द्र शुक्ल ने 'तुलसीदास' को प्रबन्धात्मक स्वीकार करते हुए भी लम्बी कविता माना है-
'तुलसीदास' निरालाजी की एक बड़ी रचना है जो अधिकांश अन्तर्मुख-प्रबंध के रूप में है। इस ग्रंथ में कवि ने जिसे परिस्थिति में गोस्वामीजी उत्पन्न हुए उसका बहुत चटकीला और रंगीन वर्णन करके चित्रकूट की प्राकृतिक छटा के बीच किस प्रकार उन्हें आनन्दमयी सत्ता का बोध हुआ, और नवजीवन प्रदान करने वाली ज्ञान की दिव्यं प्रेरणा हुई, उसका अन्तर्वृत्ति के आन्दोलन-रूप में वर्णन किया है।"
राजनाथ शर्मा ने अपने 'हिन्दी-साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास में 'तुलसीदास' को खण्डकाव्यं स्वीकार करते हुए लिखा है-" 'अनामिका' के उपरान्त उनके (निराला के) काव्य- संग्रह इस क्रम से प्रकाशित हुए थे - परिमल, गीतिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, नए पत्ते, बेला, अर्चना, आराधना, गीतकुंज। इनमें से 'तुलसीदास' खण्डकाव्य है।" राजनाथ शर्मा ने अन्यत्र लिखा है -" निराला की उदात्त प्रौढ़ रचनाओं में 'तुलखीदास' नामक खण्डकाव्य तथा 'राम की शक्ति-पूजा', 'सरोज-स्मृति' जैसी लम्बी कविताओं की गणना की जा सकती है।"
डॉ० नगेन्द्र द्वारा सम्पादित 'हिन्दी-साहित्य का इतिहास' में डॉ० रामदरश मिश्र ने निरालाजी की रचना 'तुलसीदास' को खण्डकाव्य स्वीकार करते हुए लिखा है- "तुलसीदास में कवि (निरालाजी) ने गोस्वामी तुलसीदास के माध्यम से भारतीय परम्परा के गौरवशाली मूल्यों की प्रतिष्ठा का प्रयास किया है। इस खण्डकाव्य में उन्होंने लोक में प्रचलित इस कथा को आधार बनाया है, जिसके अनुसार यह माना जाता है कि जब तुलसीदास बिना बुलाये अपनी पत्नी रत्नावली से मिलने के लिए उसके नैहर पहुँचे, तब उसने उन्हें फटकारा, जिसका प्रभाव यह हुआ कि तुलसीदास गृहस्थ जीवन को त्यागकर रामोपासना में लीन हो गये। काव्य के आरम्भ में कवि ने मध्यकालीन भारत की पतित अवस्था का चित्रण किया है, जिसका कारण है- भारत पर विदेशी शासन की स्थापना। इस सन्दर्भ में निराला ने जीवन के सभी पक्षों के विघटन और ह्रास का शक्तिशाली चित्रण किया है। इस भूमिका के द्वारा उन्होंने व्यापकं सामाजिक परिवेश को अंकित किया है, किन्तु अभी तक तुलसीदास इस विषमता के प्रति सजग नहीं हैं। फिर वे अपने मित्रों के साथ घूमने के लिए चित्रकूट जाते हैं। वहाँ प्रकृति की निर्मल और सात्विक शोभा से उनका हृदय आन्दोलित हो उठता है। उधर रत्नावली के रूप का सम्मोहन तुलसीदास की चेतना को ग्रस लेता है। जब वे बिना बुलाये पत्नी से मिलने उसके नैहर पहुँच जाते हैं तो रत्नावली की कटूक्तियों से उनकी चेतना मुक्त हो जाती है और ऊध्व की और संचरणं करने लगती है। इस प्रकार कवि ने व्यक्तिगत सुख एवं जीवन के महान् एवं व्यापक मूल्यों के बीच संघर्ष दिखाकर अन्त में उदांत मूल्यों की विजय दिखायी है।"
डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त ने भी अपने हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास के द्वितीय भाग में निरालाजी के 'तुलसीदास' को प्रबन्ध-काव्य स्वीकार करते हुए लिखा है- "निराला की प्रौढ़तर कृतियों में 'तुलसीदास', 'सरोज-स्मृति', 'राम की शक्ति-पूजा' आदि रचनाएँ आती हैं। तुलसीदास' प्रबन्ध-काव्य है।" प्रबन्ध-काव्य के दो भेद होते हैं-महाकाव्य और खण्डकाव्य । 100 छन्दों की यह छोटी-सी पुस्तक महाकाव्य तो नहीं हो सकती, इसे प्रबन्ध-काव्य कहने से गुप्तजी का तात्पर्य खण्डकाव्य से ही है।
यह निश्चित हो जाने पर कि निरालाजी की रचना 'तुलसीदास' खण्डकाव्य है, इसकी परीक्षा खण्डकाव्य के निकष पर करनी उचित है। खण्डकाव्य के मनीषियों ने जो तत्व माने हैं, उनके आधार पर इस रचना 'तुलसीदास' की समीक्षा प्रस्तुत है-
कथावस्तु
किसी भी प्रबन्ध-रचना के लिए कथावस्तु आवश्यक है। खण्डकाव्य की कथावस्तु संक्षिप्त होती है। उसमें महाकाव्य के समान उपकथाएँ तथा अनेक घटनाएँ न होकर केवल एक घटना होती है जो प्रमुख पात्र के चरित्र पर प्रकाश डालती है। 'तुलसीदास' में भी एक ही प्रमुख घटना है, जिसमे तुलसीदास के पूर्ववर्ती चरित्र और उनके परिवर्तित चरित्र पर प्रकाश डाला है। वह घटना है - रत्नावली द्वारा उनको फटकार लगाना। प्रचलित कथानक में निरालाजी ने इतना परिवर्तन किया है कि तुलसीदास मुर्दे पर बैठकर नदी पार करते तथा लटकते हुए साँप को पकड़कर पत्नी की अट्टालिका पर पहुँचते नहीं दिखाये गये हैं। इस प्रकार का वर्णन अशोभन होता। तुलसी का ससुराल में जाना निरालाजी ने अधिक अशोभन नहीं दिखाया है। कुछ लोग केवल व्यंग्य करके रह गये हैं।
सीमित पात्र
खण्डकाव्य में पात्रों की संख्या सीमित रखी जाती हैं। 'तुलसीदास' में भी केवल चार पात्र हैं -तुलसीदास, रत्नावली, रत्नावली के भाई तथा रत्नावली की भावज । प्रमुख पात्र तो तुलसीदास और रत्नावली ही हैं। शेष दो पात्र कथा को पूर्ण करने के लिए आये हैं। रत्नावली की भाभी की तो एक झलके ही दिखायी देती है।
छन्द एवं सर्ग
महाकाव्य में अनेक सर्ग होते हैं और प्रत्येक सर्ग में एक छन्द का प्रयोग किया जाता है। सर्ग विहीन एवं एक छन्द में रचित खण्डकाव्य संस्कृत और हिन्दी दोलों भाषाओं में मिलते हैं। कालिदास के 'मेघदूत' और मैथिलीशरण गुप्त के 'पंचवटी' खण्डकाव्य में सर्ग-विभाजन नहीं है और पूरी रचना एक छन्द में है। इस प्रकार 'तुलसीदास' में सर्गों का अभाव और एक छन्द का प्रयोग उसे खण्डकाव्य मानने में बाधा नहीं बन रहा है।
सोद्दश्यता
प्रबन्ध-काव्य की रचना सदा से सोद्देश्य रही है। निरालाजी तो छायावादी युग के कवि हैं। प्रयोगवादियों एवं साठोत्तरी कविता के कवियों ने भी जो प्रबन्ध-काव्य रचे हैं, वे सोद्देश्य हैं। डॉ० जगदीश गुप्त का सन् 1997 में प्रकाशित खण्डकाव्य' शम्बूक' एवं डॉ० देवराज का सन् 1978 में प्रकाशित खण्डकाव्य 'आहत आत्माएँ' सोद्देश्य रचनाएँ हैं। 'तुलसीदास' की भूमिका में कृष्णदासजी ने इसके उद्देश्य की ओर संकेत करते हुए लिखा है - "कवि का क्षेत्र नवीन है! रहस्यवाद का कथा-रूप में उसने एक नया चित्र खींचा है। मनोवैज्ञानिक तथ्यों का निरूपण उसका ध्येय है। अतः उसे अपनी भाषा बहुत कुछ स्वयं गढ़नी पड़ी है। किस सफलता से उसने छोटी-छोटी बातों से लेकर बड़े-बड़े मानसिक घात-प्रतिघातों को अपनी वाणी द्वारा सजीव कर दिया है। यह सहृदय पाठक स्वयं समझेंगे।"
निरालाजी का उद्देश्य यह रहा है कि जिस स्थिति में रत्नावली ने फटकार लगायी, स्वाभाविक थी। रत्नावली के पीहर में तुलसी का तुरन्त पहुँच जाना एक प्रकार से उसका शीलहरण करना था। तुलसी कामुक नहीं थे, अपनी पत्नी रत्नावली के रूप-जाल में बँधे थे। अपनी पत्नी के प्रति आकर्षण, बन्धन एवं रुचि कामुकता नहीं कहलाती। कामुकता कहलाती है - अनेक स्त्रियों से सम्भोग करके भी तृप्त न होना। एक नारी से बँधा हुआ पुरुष तो ब्रह्मचारी कहलाता है। पूरे भारत में यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है- 'एक नारी, सदा ब्रह्मचारी ।'
तुलसी का आकर्षण और रत्नावली का आक्रोश- दोनों स्वाभाविक थे। रत्नावली ने जो कहा, उसकी तुलसी पर जो प्रतिक्रिया हुई, वह भी स्वाभाविक थी। भावुक प्रकृति के लोग अतिवादी होते हैं, वे मध्यम मार्ग पर नहीं चलते। तुलसी कहाँ तो राम को भूलकर काम के उपासक थे और कहाँ काम को सर्वथा त्यागकर राममय हो गये।
भाषा
प्रत्येक साहित्यिक रचना का भाषा अनिवार्य अंग होती है। प्रबन्ध-काव्य की भाषा तथा साहित्य की अन्य विधाओं की भाषा में थोड़ा अन्तर रहता है। प्रबन्ध-काव्य, चाहे वह महाकाव्य हो, अथवा खण्डकाव्य, उसकी भाषा तत्सम प्रधान, गंभीर और शालीन रहती है। 'तुलसीदास' खण्डकाव्य में निरालाजी ने बड़ी मोहक, सुन्दर और भावपूर्ण भाषा का प्रयोग किया है। यह बात अलग है कि कहीं-कहीं निरालाजी को छन्द और तुक का निर्वाह करने के लिए शब्दों को व्याकरण-विरुद्ध एवं अप्रचलित रूप भी देना पड़ा है।'तुलसीदास' की भाषा के विषय में इसके भूमिका-लेखक कृष्णदासजी का यह कथन सर्वथा उचित है-" मनोवैज्ञानिक तथ्यों का निरूपण उसका ध्येय है, अतः उसे अपनी भाषा बहुत कुछ स्वयं गढ़नी पड़ी है।"
छन्द योजना
निरालाजी ने 'तुलसीदास' में जिस छन्द का प्रयोग किया है, वह कोई परम्परित छन्द नहीं है। यह छः पंक्तियों अथवा परचों का छन्द है। इसमें पहली दूसरी तथा चौथी पंक्तियों की मात्राएँ समान हैं तथा तुक मिलती है। तीसरा और छठा चरण इनसे बड़ा है। इनमें समान मात्राएँ तथा इनकी तुक मिलती है। इनकी मात्राएँ पहली दूसरी तथा चौथी- पाँचवीं पंक्ति से अधिक हैं।
अलंकार योजना
रीतिकाल की कविता अलंकारों से लदी पड़ी थी। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी अलंकारों का मोह नहीं त्याग पाये। महावीर द्विवेदी ने अवश्य इतिवृत्तात्मक कविता का प्रचार किया, जिसमें अलंकार बहुत न्यून थे। छायावादी कविता ने पाश्चात्य अलंकारों का भी समावेश भारतीय अलंकारों के साथ किया। निरालाजी का 'तुलसीदास' छायावादी एवं रहस्यवादी काव्य के अन्तर्गत आता है। 'तुलसीदास' में अनुप्रास, रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा के साथ-साथ ध्वनिसाम्य और विशेषण-विपर्यय का भी प्रयोग हुआ है।
अनुप्रास- 'पड़ते हैं जो दिल्ली पथ पर।'
उपमा- 'ज्यों ग्रस्त आभा रवि की।'
पुनरुक्तिप्रकाश - 'धीरे-धीरे वह हुआ पार।' रूपक- 'प्रेयसी के अलक नील व्योम, दृगपल कलंक मुख मंजु सोम।'
ध्वनिसाम्य-' अब स्मर के शर-केशर से झर।'
विशेषण विपर्यय 'वे शेष श्वास पशु मूक माष ।'
प्रकृति वर्णन
प्रबन्ध-काव्य का प्रमुख आधार या अंग प्रकृति वर्णन रहा है। छायावादी कविता का तो प्रमुख आधार प्रकृति ही थी। छायावादियों ने प्रकृति का उद्दीपन विभाव के रूप में नहीं, आलम्बन के रूप में प्रयोग किया है। निरालाजी के 'तुलसीदास' में प्रकृति वर्णन, पर्याप्त मात्रा में हैं। प्रकृति वर्णन का एक उदाहरण पर्याप्त हैं-
अब धौत धरा, खिल गया उर
उर को मधुर ताप गगन,प्रशमन ।
बहती समीर, चिर आलिंगन ज्यों उन्मन।
झरते हैं पृथ्वी के के शशधर से क्षण-क्षण,
अधरों पर निःस्वन। संजीवन।
ज्योतिर्मय प्राणों के चुम्बन
इस प्रकार स्पष्ट है कि निरालाजी की प्रबन्धात्मक रचना' तुलसीदास' में खण्डकाव्य के समस्त लक्षण पाये जाते हैं और इसे एक सफल खण्डकाव्य कहा जा सकता है।सीमित फलक में गहन सांस्कृतिक चिंतन, तीव्र भावात्मक प्रवाह और एक विशिष्ट जीवन-प्रसंग के माध्यम से युग-सत्य को उजागर करने के कारण 'तुलसीदास' शिल्प और संवेदना दोनों दृष्टियों से एक सफल और पूर्ण खण्डकाव्य सिद्ध होता है।


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