सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कहानी 'भक्त और भगवान' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और सामाजिक विद्रूपताओं पर तीखा प्रहार करने वाली एक यथार्थवादी
भक्त और भगवान कहानी की समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कहानी 'भक्त और भगवान' धार्मिक पाखंड, रूढ़िवादिता और सामाजिक विद्रूपताओं पर तीखा प्रहार करने वाली एक यथार्थवादी एवं व्यंग्यात्मक रचना है। निराला ने इस कहानी के माध्यम से धर्म के बाह्याडंबरों और ठेकेदारों के असली चेहरे को उजागर करते हुए सच्ची मानवीय आस्था को रेखांकित किया है।
आचार्यों ने कहानी में निम्नलिखित तत्त्वों का होना आवश्यक माना है। इन तत्त्वों में से किसी तत्त्व का विस्तार अधिक हो सकता है, किसी का कम और किसी का संकेत मात्र हो सकता है तथा किसी का अभाव । यह कहानीकार पर कहानी विषय के आधार पर निर्भर करता है । कला की दृष्टि से कहानी में निम्नलिखित तत्त्व पाये जाते हैं :
- कथानक या कथावस्तु
- पात्र और चरित्र-चित्रण,
- कथोपकथन,
- देशकाल या वातावरण,
- भाषा-शैली,
- उद्देश्य,
- शीर्षक ।
इन्हीं तत्त्वों के आधार पर यहाँ 'भक्त और भगवान' कहानी की समीक्षा प्रस्तुत है
कथानक या कथावस्तु
निरंजन हनुमान जी का भक्त था । उसने अनेक बार हनुमान जी का शृंगार किया था । जहाँ भी कीर्तन या तुलसीदास की रामायण का पाठ होता था, वहाँ निरंजन को बहुत अच्छा लगता था । विवाह के दो वर्ष बाद निरंजन की पत्नी सरस्वती की मृत्यु हुई। इसके बाद निरंजन का पूरा परिवार नष्ट हो गया । इसके बाद निरंजन ने एक राजा के यहाँ नौकरी कर ली। राजा पुत्र का शोषण करता था, इसलिए निरंजन का मन नौकरी में नहीं लगता था, उसने नौकरी छोड़ दी । स्वप्न में हनुमान जी ने दर्शन देकर कहा कि मुझे बुद्धि नहीं, भक्ति प्रिय है । निरंजन हनुमान जी की भक्ति में लग गया ।
पात्र एवं चरित्र चित्रण
भक्त और भगवान कहानी के पात्रों को दो वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-
(क) प्रमुख पात्र
(ख) गौण पात्र
(क) प्रमुख पात्र-भक्त-प्रस्तुत कहानी 'भक्त और भगवान' का प्रमुख पात्र है—भक्त । समस्त कहानी उसी के द्वारा कही जाती है, इसलिए यह कहानी आत्म- कथात्मक शैली में कही गयी है । कहानी पढ़ने पर प्रतीत होता है कि कहानीकार पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने ही स्वयं भक्त पात्र के रूप में कहानी के कलेवर में अपने संस्मरण लिखे हैं । निराला जी ने महिषादल राज्य, पश्चिमी बंगाल के राजा के यहाँ नौकरी की थी। फिर किसी विवाद के कारण वे नौकरी छोड़ आये थे । प्रस्तुत कहानी में भी भक्त कहता है कि उसे नौकरी अच्छी नहीं लगती है । उसका मन पूजा के सौन्दर्य की ओर लगा रहता है। तहसील-वसूल, जमा-खर्च, खत-किताबत, अदालत-मुकद्दमा आदि राज्य के कार्य उसे साँप के डसने के समान तीक्ष्ण ज्वालामय लगते हैं।
निराला जी की पत्नी का निधन सन् 1923 में हुआ था। जब वे मात्र 24 वर्ष के थे । प्रस्तुत कहानी में भक्त की पत्नी भी विवाह के 2-3 वर्ष बाद मर जाती है। भक्त स्वप्न में अपनी पत्नी को माथे पर सिन्दूर लगाये देखता है । निराला जी जब बंगाल के महिषादल राज्य में राजा के यहाँ नौकरी करते थे, तब वे हनुमान जी को तुलसीकृत रामायण का पाठ सुनाते थे । इस कहानी का पात्र भक्त भी महावीर जी की मूर्ति के सामने रामायण पढ़कर सुनाया करता था ।
हनुमान- महावीर जी का भक्त-भक्त वास्तव में हनुमान जी का भक्त है । वह राजा के तालाब से कमल के पुष्प तोड़कर महावीर जी की मूर्ति को सजाता है। एक दिन वह कमल की काँटेदार नाल तोड़कर कमलों की गडूरी बनाता है और दबाकर मूर्ति के सिर पर रख देता है, ताकि वह सिर से नीचे न गिर जाये। स्वप्न में भक्त को हाथ जोड़े हुए हनुमान जी की मूर्ति के दर्शन होते हैं । वे भक्त से कहते हैं- "मैं इसी तत्त्व को हाथ जोड़े हुए हूँ-वही मेरे राम हैं, तुम इसी तरह रहो । किसी काम को छोटा न समझो, न किसी की निन्दा करो।" भक्त का नाम निरंजन है, परन्तु सम्पत्ति के सम्बन्ध में वह निरंजना है अर्थात् धन-सम्पत्ति के माया-मोह से दूर है।
भक्त का स्वप्न देखना-स्वप्न में भक्त देखता है कि कमल जल पर निकलता है और हाथ जोड़े हुए कहता है—“मैं तो राजा का था, तुमने मुझे क्यों तोड़ा ।" तभी स्वप्न में भक्त को गुलाब हिल-हिलकर कहता है-"मुझे छूने का तुम्हें क्या अधिकार था ?" भक्त ने राजा के दूसरे तालाब के सहारे बने बगीचे से गुलाब के फूल तोड़- तोड़कर महावीर जी की मूर्ति सजायी थी। तभी भक्त को स्वप्न में पुनः महावीर जी दिखाई देते हैं । वे भक्त से कहते हैं-"वत्स ! यहाँ कौन-सी चीज राजा की नहीं है, यह मूर्ति किसकी खरीदी है ? कौन पुजवाता है ।" तात्पर्य यह है कि महावीर जी की मूर्ति भी राजा की है, क्योंकि उसी के द्वारा खरीदी गयी है औ वही इसकी पूजा करवाता। स्वप्न में भक्त, व्याकुल दुःखी होकर हनुमान जी से कहता है कि गरीब मरे जा रहे हैं, इनके लिए क्या होगा ? महावीर जी कहते हैं कि ये मर नहीं सकते, इनके लिए वही है, जो राजा के लिए है । इन्हें वही उभारेगा जो वहाँ के राजा को उभारता है, तुम अपने में रहो । दूर मत जाओ । तात्पर्य यह है कि स्वप्न में महावीर जी हनुमान भक्त को यह समझाते हैं कि उसे अपनी सीमा में रहना चाहिए। गरीबों तथा राजाओं सबके ऊपर एक अज्ञात शक्ति है । सब उसके अधीन रहकर यहाँ अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं ।
भक्त को स्वप्न में महावीर जी की मूर्ति में सारे भारत का दर्शन होता है । वह भारत नहीं, साक्षात् महावीर दिखाई देते हैं। पंजाब की ओर उनका मुँह, दाहिने हाथ में गदा-मौन शब्द-शास्त्र, बंगाल के ऊपर दायें-बायें हिमालय पर्वत की श्रेणी, बगल के नीचे बंगाल की खाड़ी, एक घटना वीर-वेश सूचक, एक पैर लम्बा, अँगूठा कुमारी अन्तरीप, नीचे राक्षस रूप लड़का रूपी कमल-समुद्र पर खिला हुआ ।
कथावस्तु का केन्द्र है भक्त—प्रस्तुत कहानी का केन्द्र एक ही पात्र है-भक्त । सारा कथावृत्त उसी के चारों ओर घूमता है । अन्य पात्र तो उसके स्वप्न के पात्र हैं। भक्त की पत्नी सरस्वती से जो भी बात होती है तथा महावीर जी से जो वार्तालाप होता है वह सब स्वप्न की ही घटना के रूप में वर्णित है ।
जब परमहंस रामकृष्ण देव के शिष्य स्वामी प्रेमानन्द जी दीवान जी के साथ राजा के यहाँ आते हैं तो भक्त स्वामी जी के लिए मालाएँ बनाता है। परमहंस देव की पूजा होती है । भक्त तुलसीकृत रामायण से सुतीक्ष्ण का प्रसंग स्वामी प्रेमानन्द जी को सुनाता है।
सारांश यह है कि 'भक्त और भगवान' शीर्षक कहानी का केन्द्र-बिन्दु भक्त है और भक्त के रूप में स्वयं निराला जी ने अपने जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य इसमें संस्मरण रूप में प्रस्तुत किये हैं ।
(ख) गौण पात्र - निराला जी की इस कहानी में प्रमुख पात्र 'भक्त' के अतिरिक्त गौण पात्र महावीर जी की मूर्ति, भक्त की पत्नी स्वप्न में, राजा साहब दीवान जी स्वामी प्रेमानन्द हैं । लेखक ने इस सब का चरित्र का परिचय दिया है।
कथोपकथन
कहानी में कथोपकथन स्वाभाविकता एवं नाटकीयता लाने वाले होते हैं, जिनसे कथा रुचिकर एवं ग्राह्य बन जाती है । प्रस्तुत कहानी 'भक्त और भगवान' में भी कहानीकार निराला जी ने कथोपकथन या संवादों की योजना की है । अधिकांश कथोपकथनों की योजना भक्त के स्वप्न-दर्शन में की गयी है।
उदाहरण – स्वप्न में हाथ जोड़े हुए महावीर जी की मूर्ति प्रकट होती है। भक्त के साथ महावीर जी का एक कथोपकथन—वार्तालाप देखें-
महावीर जी (भक्त से) - "वत्स ! यहाँ कौन-सी चीज राजा की नहीं है ? यह मूर्ति किसकी खरीदी है ? कौन पुजवाता है ?"
भक्त- "ये गरीब मरे जा रहे हैं—इनके लिए क्या होगा ?"
महावीर जी " ये मर नहीं सकते, इनके लिए वही है, जो वहाँ राजा के लिए, इन्हें वही उभाड़ेगा, जो वहाँ राजा को उभाड़ता है, तुम अपने में रहो। दूर मत जाओ।"
एक भावपूर्ण कथोपकथन का उदाहरण भक्त और उसकी पत्नी के बीच का प्रस्तुत है—
महावीर जी की मूर्ति की पूजा करने के बाद भक्त घर आता है । पत्नी नई गुलाबी रंग की साड़ी पहने है। भक्त भी महावीर जी की पूजा उनकी मूर्ति को गुलाब के फूलों से सजाकर आया है। भक्त पत्नी से कहता है-"तुम मन की बात समझती हो।"
सहज सरलता से पत्नी कहती है-"तुम जैसा पसन्द करते हो, मैं वैसा ही करती हूँ ।"
इस प्रकार प्रस्तुत कहानी में यद्यपि कथोपकथन कम है, क्योंकि अधिकांश पात्रों का चित्रण भक्त ने स्वप्नावस्था में किया है, परन्तु सभी कथोपकथन सहज, स्वाभाविक एवं पात्रों के चरित्र के व्यंजक हैं ।
वातावरण या देशकाल
कथा का स्थल बंगाल है । वातावरण की सृष्टि दो रूपों में दिखाई देती है-
(i) प्रकृति-चित्रण — गाँव के बाहर एकान्त में, एक रास्ते के किनारे, चढ़ी मालती के बड़े पीपल के नीचे बँधे पक्के चबूतरे पर महावीर जी की सुन्दर मूर्ति स्थापित है, भक्त वहीं जाकर बैठ जाता है, सामने एक पुराने आम के पेड़ पर नई जंगली बेलों की फूली हुई लता हवा में हिल रही है । भक्त की इच्छा होती है कि वह माला गूँथकर महावीर जी को पहनाये । एक केले के पेड़ से पैनी लकड़ी से भक्त एक पत्ता काट लेता है और पेड़ पर चढ़कर, उसी के दोनों में फूल तोड़-तोड़कर रखने लगता है। फिर गुर्ज जैसी एक लता की पतली लड़ी तोड़कर, उसी चबूतरे पर बैठकर माला गूँथने लगता है।
प्रकृति का एक अन्य दृश्य मनोरम वातावरण की सृष्टि करता है-"राजा का सरोवर कमल के फूलों से पूर्ण है । नील जल शशि पर हरे पत्र, उनके बीच उठे वृन्त (डंठल), उन पर डोलते कमल, उन पर काँपती किरणें।"
(ii) स्वप्न का वातावरण-भक्त बाहर घूमकर बड़ी प्रसन्नता से भोजन के बाद सोता है । मस्तिष्क उसका स्नेह से पूर्ण है । बात की बात में उसे नींद आ जाती है । रात के पिछले प्रहर में वह स्वप्न देखता है । वह स्वप्न में महावीर जी की उस मूर्ति को सामने मुस्कराती हुई खड़ी देखता है । मूर्ति कह रही है—“बन्धु, तुमने अपनी पूजा का स्वार्थ देखा, पर मेरे लिए विचार नहीं किया । तुमने कमल-नाल की गुड़री इतनी जोर से गड़ाई कि उसके काँटे मेरे सिर में छिद गये हैं, दर्द हो रहा है। स्वप्न में ही भक्त की पत्नी अँधेरे के प्रकाश में उठती हुई सामने आती है और महावीर जी की मूर्ति अदृश्य हो जाती है। पत्नी के सिर पर सिन्दूर चमक रहा है। भक्त सोचता है—'इसके मस्तक पर क्या है ?' भक्त को आश्चर्य में पड़ा देखकर पत्नी कहती है, "प्रिय ! महावीर को मैं मस्तक पर धारण करती हूँ ।" स्वप्न में भक्त पूछता है—“मैं नहीं समझा, अर्थ क्या है ?" पत्नी की आँखों में रहस्यमयी मुस्कान दिखाई देती है; वह कहती है-"उठो, अर्थ सब मैं हूँ — मुझे समझो ।' तभी भक्त की आँखें खुल जाती हैं। वह सोने से जग पड़ता है।
इस प्रकार भक्त का स्वप्न प्रस्तुत कहानी में एक रहस्यमय मनोवैज्ञानिक वातावरण की सृष्टि करता है।
(iii) धार्मिक वातावरण—महावीर जी की पूजा, उनकी मूर्ति को कमलों और गुलाब के पुष्पों से सजाना—इनके वर्णन में कहानी का वातावरण धर्ममय हो जाता है ।
जब राजा के दीवान साहब परमहंस रामकृष्ण देव के शिष्य प्रेमानन्द जी को अपने यहाँ लेकर आते हैं तो भक्त स्वामी परमहंस की पूजा के लिए माला तथा फूल चुनता है।वहाँ स्वामी जी को मालाओं से लाद दिया जाता है।
परमहंस देव का पूजन होता है । भक्त स्वामी प्रेमानन्द जी की आज्ञा लेकर तुलसीकृत रामायण का सुतीक्ष्ण का प्रसंग पढ़कर सुनाता है । सुनकर लोग तन्मय हो जाते हैं। रामायण-पाठ के बाद तरह-तरह के धार्मिक उपदेश होते हैं। स्वामी जी दीवान साहब से हर एकादशी को महावीर-पूजन एवं राम-संकीर्तन करने के लिए कहते हैं । इस धार्मिक समारोह से कहानी में लेखक ने धार्मिक वातावरण की मनोरम सृष्टि की है।
भाषा शैली
प्रस्तुत कहानी की अधिकांश भाषा संस्कृत तत्सम शब्दावली से युक्त है। विषय भी 'भक्त और भगवान' का है, अतः संस्कृत तत्सम भाषा के प्रयोग प्रभावोत्पादक हैं; उदाहरण- "यह एक संस्कार था— एक मूर्ख संस्कार, जिसे ब्रह्म-भाव के लोग आज कुसंस्कार कहते हैं, वृहत्तर के निर्माण के लिए प्रयत्न भर है।
(ii) साधारण बोलचाल की सरल भाषा-विषयानुरूप कहीं-कहीं लेखक ने सामान्य बोलचाल की सरल भाषा का भी प्रयोग किया है; उदाहरणार्थ- "भक्त की इच्छा हुई, रात की बात कहे; पर किसी ने रोक दिया । सिर झुकाने लगा-न झुकाया। पत्नी सिर झुकाए मुस्करा रही थी। मस्तक का सिन्दूर चमक रहा था, देखकर भक्त चुप हो गया ।"
(iii) प्रस्तुत कहानी में प्रायः अरबी-फारसी के शब्दों का अभाव है। कुछ उर्दू के प्रचलित शब्द ही दिखाई देते हैं; यथा—उम्र, होश, जोर, ज्यादा, मामूली, तरह-तरह के, पसन्द, राजी, गरीब।
शैली-प्रस्तुत कहानी में निम्नलिखित शैलियों का प्रयोग किया गया है :
:
(i) वर्णनात्मक शैली- पात्र या घटना के वर्णन में कहानीकार वर्णनात्मक शैली का प्रयोग करता है। भाषा इस शैली की सरल होती है। एक उदाहरण दृष्टव्य है- “पिता राजा के यहाँ नौकर थे ।......इस समय एक घटना हुई। गाँव के किनारे, कुएँ पर एक युवती पानी भर रही थी । पकारिए के पेड़ के नीचे एक बाबा तन्मय गा रहे थे— 'कौन पुरुष की नारि झमाझम पानी भरे ?' युवती घड़ा खींचती दाहिनी ओर के दाँतों से घूँघट का छोर पकड़े, बायें झुकी हुई मुस्करा रही थी ।
(ii) चित्रात्मक शैली-शब्दों के द्वारा जहाँ पाठकों के समक्ष एक चित्र - सा' खींच दिया जाता है, वहाँ चित्रात्मक शैली होती है । लेखक या कवि की कल्पना में चित्र जितना स्पष्ट होगा, उतना ही अधिक स्पष्ट शब्द-चित्र वह अपनी लेखनी से खींच देगा । प्रस्तुत कहानी में 'कुएँ से घड़ा खींचती युवती का चित्र, महावीर जी का चित्र, स्वप्न में पत्नी का चित्र सभी बड़े प्रभावकारी शब्द चित्र हैं। एक उदाहरण दृष्टव्य है— " भक्त ने देखा, राजा का सरोवर सरोरुहों अर्थात् कमलों से पूर्ण है । नील जलराशि, उनके बीच वृन्त उठे, उन पर डोलते हुए कमल, उन पर काँपती किरणें ।"
(iii) भावात्मक शैली—यह भाव-प्रधान शैली है। यह शैली पाठकों के हृदय में वर्णित भाव उत्पन्न करने में समर्थ होती है। एक उदाहरण दृष्टव्य है— "तरुण युवक खड़ा हो गया। अच्छा लगा। एक पेड़ की जड़ पर बैठकर एक चित्र सुनता रहा। कितने भाव प्राणों में जगकर उथल-पुथल मचाने लगे यह परदेशी की बात कौन कहता है ? क्या कहता है ? तरु-लता-द्रुम-खंजन आदि वही सब अब भी हैं, पर श्याम बिछुड़ गये हैं, इसलिए तो वह सूना हो रहा है ? वहाँ कोई नहीं आता-जाता । यह परदेशी की कैसी बात है।"
(iv) उद्धरण शैली-जब लेखक अन्यत्र से उद्धरण देता है अपनी बात को समझने-समझाने के लिए तब उद्धरण शैली का प्रयोग होता है । प्रस्तुत कहानी में तीन-चार उद्धरणों का प्रयोग हुआ है-
(क) 'कहत कोड परदेशी की बात
(ख) “खसी माल मूरति मुसकानी' वह नहीं समझा, पर खसी माल वाली बिना माला की मूर्ति मुस्करायी ।"
(ग) 'खे संभवं शकरम्', खे संभवं शंकरम्', मौन वीण बज रही थी ।
(घ) “श्याम तामरस-दाम-शरीरम्; जटा मुकुट परिधन मुनि चीरम्"
(v) अलंकृत शैली-जहाँ लेखक रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का प्रयोग करके किसी भाव, विचार या दृश्य का चित्रण करता है, वहाँ शैली अलंकृत हो जाती है। निराला जी ने उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक अलंकारों का प्रयोग अधिक किया है। एक उदाहरण दृष्टव्य है— "मन उतरने लगा । देखा आकाश की नीली लता में सूर्य, चन्द्र और ताराओं के फूल हाथ जोड़े खिले हुए एक अज्ञात शक्ति की समीर से हिल रहे हैं, पृथ्वी की लता पर पर्वतों के फूल हाथ जोड़े आकाश को नमस्कार कर रहे हैं ।"
उपर्युक्त उदाहरण में आकाश को नीली लता तथा सूर्य, चन्द्र एवं ताराओं को फूल का रूपक दिया गया है। यहाँ रूपक अलंकार की छटा दर्शनीय है । इसी प्रकार पृथ्वी को लता तथा पर्वतों को फूलों का रूप कहा गया है। दोनों ही रूपक सर्वथा नवीन एवं मौलिक हैं ।
उद्देश्य
'भक्त और भगवान' कहानी में 'निराला जी' का उद्देश्य भक्त की भगवान के प्रति आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास के स्वरूप को विविध रूपों में व्यक्त एवं चित्रित करना है । इस कहानी में भक्त स्वयं लेखक निराला जी हैं। उन्होंने लिखा है- भक्त साधारण पिता का पुत्र था । पिता राजा के यहाँ साधारण नौकर थे। यह सत्य है। निराला जी के पिता भी बंगाल में महिषादल राज्य के राजा के यहाँ एक साधारण नौकर थे । पिता की मृत्यु के बाद राजा ने 'निराला जी' को अपने यहाँ नौकरी पर बुला लिया था । इस कहानी में जो घटनाक्रम वर्णित है, वह भी उसी समय का है, जब वे महिषादल राज्य के राजा के यहाँ नौकर थे, परन्तु उनका मन नौकरी में नहीं लगता था । भक्त के सम्बन्ध में वे लिखते हैं- "भक्त को नौकरी नहीं अच्छी लगती थी। मन सौन्दर्य निरीक्षण की ओर रहता था । तहसील-वसूल, जमा-खर्च, खत-किताबत, अदालत-मुकदमा आदि राज्य के कार्य सर्पदंशवत् तीक्ष्ण ज्वालामय हो रहे थे, मन में घृणा भी हो गयी ।"
- राजाओं की भर्त्सना—'निराला जी' का उद्देश्य तत्कालीन राजाओं की निर्दयता एवं शोषण की प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है । भक्त कहता है कि राजा कितना निर्दय, कठोर. होता है। प्रजा का रक्त-शोषण करना उसका धर्म है ।
- राजा की अवधारणा साधु-महात्मा सम्बन्धी-लेखक बताना चाहता है कि राजा लोग मानसिक दृष्टि से कितने घटिया किस्म के होते हैं ? जब परमहंस देव के शिष्य स्वामी प्रेमानन्द जी को राजा के दीवान अपने यहाँ ले जाते हैं, तब देखते हैं कि राजा की परमहंस देव के शिष्यों पर विशेष श्रद्धा नहीं है। राजा समझते हैं कि साधु-महात्मा वह है ही नहीं, जिसकी तीन हाथ की जटा और चिमटा न हो, चिलम भी होनी चाहिए और धूनी भी, तभी राजा भक्तिपूर्वक गाँजा पिलाने को राजी होते । तात्पर्य यह है कि लेखक का एक उद्देश्य राजाओं की शोषण की प्रवृत्ति और उनकी घटिया मानसिकता की पोल खोलना है।
- भगवान के प्रति सच्ची भक्ति-भावना-निराला जी ने इस कहानी में सच्ची भक्ति-भावना एवं भगवान तथा पूजा का स्वरूप चित्रित किया है । परम्परागत अनुष्ठानपूर्वक विधि-विधानपूर्वक पूजा करना ही पूजा नहीं है। सच्ची पूजा तो हृदय की सच्ची भावना से आस्थापूर्वक पुष्पों मात्र से मूर्ति का सजाना भी पूजा है। जब भक्त कमल एवं गुलाब के फूलों से महावीर जी की मूर्ति को सजा देता है। "सिन्दूर पर गुलाब की शोभा चढ़ी । सुन्दर सब समय सुन्दर है । भक्त मूर्ति को सजाकर देर तक देखता रहा । यही पूजा थी।" लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि पूजा का ढोंग और दिखावा पूजा नहीं है, पूजा है इष्ट देव के प्रति सच्ची भक्ति-भावना, श्रद्धा एवं आस्था ।
- राष्ट्रीय भावना-इस कहानी का उद्देश्य राष्ट्रीय भावना का विकास करना भी है। भक्त को महावीर हनुमान जी की मूर्ति स्वप्न में दिखाई दी । भक्त का मन इतनी दूर आकाश में था कि नीचे समस्त भारत दिखा; पर यह भारत न था—साक्षात् महावीर थे, पंजाब की ओर मुँह, दाहिने हाथ में गदा मौन शब्दशास्त्र, बंगाल के ऊपर दायें-बायें पर हिमालय पर्वत की श्रेणी, बगल के नीचे बंगोपसागर (बंगाल की खाड़ी), एक घुटना वीर-वेश-सूचक, टूटकर गुजरात की ओर बढ़ा हुआ, एक पैर प्रलम्ब (लम्बा) – अँगूठा कुमारी— अन्तरीप, नीचे राक्षसरूप लंका-कमल-समुद्र पर खिला हुआ ।
महावीर जी की इस मूर्ति में भक्त सम्पूर्ण भारत के दर्शन करता है। इसका राष्ट्रीय संस्कार की दृष्टि से बड़ा महत्त्व है। चित्त के प्रबल संस्कारों के अनुरूप ही स्वप्न दिखाई देता है। निराला जी ने भक्त पात्र के माध्यम से महावीर जी की वीर मूर्ति में समग्र भारत के दर्शन किये हैं।
हम कह सकते हैं कि 'भक्त और भगवान' कहानी का उद्देश्य अत्यन्त उदात्त है—
(i) प्रकृति का अनुपम सौन्दर्य चित्रण ।
(ii) भक्त एवं भक्त की पत्नी के रूप में दाम्पत्य जीवन का आदर्श चित्रण ।
(iii) भक्त और भगवान के बीच पूजा-आराधना का आडम्बरहीन स्वरूप । मुख्य है—भक्ति-भावना, अन्तर्मन में पूजा का भाव, कोरे विधि-विधान का कोई महत्त्व नहीं ।
(iv) महावीर जी की मूर्ति में समग्र भारत का दर्शन ।
(v) धार्मिकता, रामायण-पाठ एवं संकीर्तन का महत्त्व ।
(vi) राजाओं की निर्दयता, कठोरता एवं शोषण की प्रवृत्ति का दिग्दर्शन ।
विशेषता यह है कि प्रस्तुत कहानी का उद्देश्य उपदेशात्मक नहीं है। पात्रों के चरित्र-चित्रण एवं घटनाक्रम के वर्णन में ही कहानीकार निराला जी ने कहानी का उद्देश्य सांकेतिक शैली में व्यक्त किया है।
शीर्षक
प्रस्तुत कहानी का शीर्षक है—' भक्त और भगवान' जो सर्वथा उपयुक्त है । भक्त महावीर जी की पूजा करता है, वह उनकी मूर्ति को कमल और गुलाब के पुष्पों से सजाकर देखता रहता है और मन में सोचता है—यही पूजा है ।
स्वप्न में वह महावीर जी की वीर मूर्ति देखता है। महावीर जी की ध्वनि उसे स्वप्न में सुनाई देती है—“मैं इसी तत्त्व को हाथ जोड़े हुए हूँ—यही मेरे राम हैं, तुम इसी तरह रहो । किसी कार्य को छोटा न समझो, न किसी की निन्दा करो।”
कहानी के अन्त में भक्त को भगवान सर्वव्यापी अज्ञात शक्ति रूप में सर्वत्र दिखाई देते हैं । आकाश में मानो एक नीली लता है, जिसमें सूर्य, चन्द्र और ताराओं के फूल खिले हुए हैं, वे एक अज्ञात शक्ति की समीर (वायु) से हिल रहे हैं। पृथ्वी रूपी लता में पर्वतों रूपी फूल हाथ जोड़े हुए आकाश को नमस्कार कर रहे हैं। आशीर्वाद की हिमधारा उन पर बह रही है; समुद्र की फैली हुई लता में लहरों और भँवरों रूपी फूल खिले हुए हैं और किसी अज्ञात शक्ति पर चढ़ रहे हैं। वृक्षों की डाल-डाल मानो जैसी उनकी बातें हैं जो किसी अज्ञात शक्ति की ओर पुष्प बढ़ाये हुए हैं। तृण-तृण (तिनका-तिनका) पूजा के रूप में रूपक है । इस प्रकार भक्त को सर्वत्र भगवान जी की अज्ञात शक्ति की अनुभूति होती है। कहानी के शीर्षक 'भक्त और भगवान' की सार्थकता यहीं सिद्ध हो जाती है।
संक्षेप में यह कहानी परंपरागत अर्थ में 'कथा' कम, एक आध्यात्मिक-काव्यात्मक अनुभूति अधिक है। इसमें घटनाक्रम गौण है, भावतरंगें प्रमुख हैं। निराला यहाँ भक्त-हृदय के भीतर झाँकते हैं — कैसे एक सामान्य मनुष्य की श्रद्धा धीरे-धीरे व्यक्तिगत प्रेम, सामाजिक चेतना और ब्रह्मांडीय दृष्टि तक फैलती चली जाती है। जो पाठक कथा में तीव्र घटनाक्रम या द्वंद्व खोजते हैं, उन्हें यह धीमी लग सकती है; पर जो निराला की काव्य-भाषा और उनके छायावादी चिंतन से परिचित हैं, उनके लिए यह उनकी गद्य-रचनाओं में एक विशिष्ट कृति है, जहाँ भक्ति, दांपत्य और राष्ट्र-चेतना एक ही भावसूत्र में बँध जाते हैं।


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