भारतेंदु हरिश्चंद्र : अंधेर नगरी और राजनीतिक व्यंग्य की धार

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हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाम उस युग-प्रवर्तक के रूप में लिया जाता है जिसने आधुनिक हिंदी गद्य, नाटक और पत्रकारिता की नींव रखी

भारतेंदु हरिश्चंद्र : अंधेर नगरी और राजनीतिक व्यंग्य की धार


हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु हरिश्चंद्र का नाम उस युग-प्रवर्तक के रूप में लिया जाता है जिसने आधुनिक हिंदी गद्य, नाटक और पत्रकारिता की नींव रखी। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, जब भारत अंग्रेजी शासन की जकड़न में पूरी तरह जकड़ चुका था और समाज सामंती जड़ता, अंधविश्वास तथा राजनीतिक दमन के बीच झूलता हुआ अपनी पहचान खोज रहा था, ठीक उसी समय भारतेंदु ने साहित्य को केवल मनोरंजन या शास्त्रीय अलंकरण का माध्यम न मानकर उसे समाज-सुधार और राजनीतिक चेतना जगाने का हथियार बना दिया। उनकी रचनाओं में हास्य और व्यंग्य केवल कलात्मक सजावट नहीं थे, बल्कि वे तीखे प्रहार थे जो शासन-व्यवस्था की विसंगतियों, धार्मिक पाखंड और सामाजिक रूढ़ियों पर सीधे किए जाते थे।इसी परंपरा की सबसे प्रतिनिधि और चिरस्थायी कृति है उनका प्रहसन 'अंधेर नगरी', जो सन् 1881 ई. में प्रकाशित हुआ था और जो आज भी हिंदी रंगमंच की सबसे अधिक खेली जाने वाली नाट्य-रचनाओं में गिना जाता है।

'अंधेर नगरी' मूलतः एक छोटा प्रहसन है, किंतु उसकी संक्षिप्तता में जो सामाजिक-राजनीतिक आलोचना समाहित है, वह किसी दीर्घकाय ग्रंथ से कम प्रभावशाली नहीं। नाटक की कथावस्तु सतही तौर पर बड़ी सरल जान पड़ती है। एक ऐसा नगर, जहाँ हर वस्तु चाहे वह अच्छी हो या बुरी, उपयोगी हो या निरर्थक, टके सेर के भाव बिकती है। यह "टका सेर भाजी, टका सेर खाजा" वाली व्यवस्था वास्तव में उस समाज का प्रतीक है जहाँ मूल्यों का कोई ठोस आधार नहीं बचा, जहाँ न्याय, नीति और विवेक सब कुछ समतल होकर एक ही भाव में बिक रहे हैं। यह विडंबना अपने आप में उस समय के औपनिवेशिक शासन की उस मनमानी व्यवस्था पर करारा व्यंग्य है जिसमें कानून और शासन की प्रक्रियाएँ तर्क या न्याय के बजाय सनक और स्वार्थ से संचालित होती थीं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र : अंधेर नगरी और राजनीतिक व्यंग्य की धार
नाटक के केंद्र में जो न्यायिक प्रहसन रचा गया है, वह भारतीय साहित्य में राजनीतिक व्यंग्य के सबसे मारक दृश्यों में से एक माना जाता है। जब नगर की दीवार गिरने से एक व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो न्याय की खोज में जिस बेतुके ढंग से दोषी तय किया जाता है, वह पूरी न्याय-व्यवस्था की पोल खोल देता है। पहले मोटे व्यक्ति को फांसी पर चढ़ाने का निर्णय होता है क्योंकि रस्सी उसके गले के नाप की मिल जाती है, फिर जब वह मोटा व्यक्ति स्वयं को बचाने के लिए दुबले व्यक्ति की तलाश करवाता है, तो अंततः राजा गोबरधन दास स्वयं फांसी के फंदे में झूल जाते हैं, केवल इसलिए कि रस्सी उनके गले पर ठीक बैठती है। यह दृश्य हास्यास्पद प्रतीत होते हुए भी अपने भीतर एक भयावह सच्चाई समेटे है, न्याय अगर तर्क, प्रमाण और नैतिकता के बजाय संयोग, सुविधा और सत्ता के खेल पर टिका हो, तो वह न्याय नहीं, केवल अंधेर है। भारतेंदु ने यहाँ शासन तंत्र की उस चरित्रहीनता को उजागर किया है जहाँ निर्णय लेने वाले स्वयं इतने विवेकहीन और भ्रष्ट हैं कि वे अपने ही बनाए जाल में फंसकर नष्ट हो जाते हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि भारतेंदु ने इस नाटक में सीधे अंग्रेजी शासन का नाम लेकर आलोचना नहीं की, बल्कि रूपक और प्रतीक के माध्यम से अपनी बात कही। यही उस युग के व्यंग्यकारों की चतुराई थी, वे प्रत्यक्ष राजद्रोह के आरोप से बचते हुए भी अपनी आलोचना की धार को कुंद नहीं होने देते थे। 'अंधेर नगरी' का चौपट राजा, जिसकी अदालत में विवेक का कोई स्थान नहीं और जिसकी प्रजा भाँति-भाँति के पाखंडी साधु-संतों और स्वार्थी व्यापारियों के बीच फंसी हुई है, वह किसी विशेष शासक या घटना का सीधा चित्रण नहीं, बल्कि उस पूरी औपनिवेशिक व्यवस्था का प्रतिनिधि है जिसमें शासन प्रजा के हित के बजाय अपने स्वार्थ और सनक के अनुसार चलता था। इसके साथ ही यह नाटक भारतीय समाज की उस आंतरिक कमजोरी पर भी प्रहार करता है जो बाहरी शासन को संभव बनाती है, जनता की उदासीनता, अंधविश्वास और अपने ही भीतर के पाखंड को पहचानने में असमर्थता।

भारतेंदु के व्यंग्य की विशेषता यह है कि वह कभी भी शुद्ध रूप से नकारात्मक या निराशावादी नहीं होता। उनके हास्य में एक गहरी करुणा और सुधारवादी दृष्टि निहित रहती है। वे समाज को हँसाते हुए भी उसे आईना दिखाते हैं, ताकि वह अपनी विकृतियों को पहचान सके और उनसे मुक्त होने का प्रयास करे। यही कारण है कि 'अंधेर नगरी' मात्र एक हास्य-प्रहसन बनकर नहीं रह जाता, बल्कि वह एक राजनीतिक चेतावनी की तरह काम करता है, यह संकेत देते हुए कि जब किसी समाज में मूल्यों का पतन हो जाता है, जब न्याय बिकाऊ हो जाता है और सत्ता विवेकहीन हो जाती है, तो उस व्यवस्था का विनाश निश्चित है। नाटक के अंत में राजा की स्वयं फांसी पर चढ़ जाने की घटना केवल एक हास्यास्पद संयोग नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक न्याय है, जो व्यवस्था स्वयं तर्कहीनता पर टिकी हो, वह अंततः स्वयं को ही निगल जाती है।

भाषा के स्तर पर भी 'अंधेर नगरी' अपने समय के लिए क्रांतिकारी प्रयोग था। भारतेंदु ने संस्कृतनिष्ठ, अलंकृत भाषा के बजाय आम बोलचाल की खड़ी बोली, लोकोक्तियों और मुहावरों से भरपूर भाषा का प्रयोग किया, जिससे यह नाटक आम जनता तक सहज ही पहुँच सका। यह भाषिक चयन भी अपने आप में एक राजनीतिक निर्णय था, साहित्य को दरबारी या पंडिती वर्ग की बपौती से निकालकर आम आदमी की भाषा में ढालना, ताकि व्यंग्य की धार सीधे जन-मानस तक पहुँच सके। इस अर्थ में भारतेंदु केवल एक नाटककार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांतिकारी थे जिन्होंने भाषा, रंगमंच और राजनीतिक चेतना को एक साथ जोड़कर हिंदी साहित्य को नई दिशा दी।

आज जब हम 'अंधेर नगरी' को पढ़ते या रंगमंच पर देखते हैं, तो यह केवल उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक भारत की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि वह हर उस काल और समाज पर लागू होती प्रतीत होती है जहाँ सत्ता अपने विवेक और उत्तरदायित्व को भूलकर मनमानी करने लगती है, जहाँ भ्रष्टाचार और अन्याय को सामान्य मान लिया जाता है, और जहाँ जनता अपनी आलोचनात्मक दृष्टि खोकर एक अंधेर व्यवस्था की सहभागी बन जाती है। यही 'अंधेर नगरी' की कालजयिता का रहस्य है, वह एक विशिष्ट राजनीतिक परिस्थिति की उपज होते हुए भी सार्वभौमिक सत्य को उद्घाटित करती है। 

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस लघु प्रहसन के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया कि व्यंग्य, जब वह गहरी सामाजिक चिंता और नैतिक दृष्टि से संचालित हो, तो वह किसी भी गंभीर राजनीतिक आलोचना से अधिक प्रभावशाली और चिरस्थायी हो सकता है। यही कारण है कि आज डेढ़ सौ वर्ष बाद भी 'अंधेर नगरी चौपट राजा' का मुहावरा हमारी राजनीतिक भाषा और सामूहिक स्मृति का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है, और भारतेंदु का यह प्रहसन हिंदी के राजनीतिक व्यंग्य-साहित्य की एक अद्वितीय और अपरिहार्य कृति के रूप में सम्मानित होता है।

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