निराला की कहानी कला की प्रमुख विशेषताएं

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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' मूलतः छायावादी एवं प्रगतिवादी कवि के रूप में विख्यात हैं, किंतु हिंदी गद्य और कथा-साहित्य में उनका योगदान असाधारण है।

निराला की कहानी कला की प्रमुख विशेषताएं


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' मूलतः छायावादी एवं प्रगतिवादी कवि के रूप में विख्यात हैं, किंतु हिंदी गद्य और कथा-साहित्य में उनका योगदान असाधारण है। उनकी कहानियाँ तत्कालीन सामाजिक विषमताओं, रूढ़ियों और शोषित वर्ग के जीवन का सजीव दस्तावेज़ हैं।

साहित्य की अन्य विधाओं में निराला जी जी के व्यक्तित्व का जिस प्रकार लब्ध प्रतिष्ठ और ख्यात रूप प्रकट हुआ है वैसे ही कहानी के क्षेत्र में भी उनकी एक विशिष्ट पहचान बनी है । निराला जी जी प्रेमचन्द युगीन कहानीकार थे । प्रत्येक साहित्यकार अपने युग से प्रेरित और संप्रभावित होता है। प्रेमचन्द जी ने अपने साहित्य के द्वारा इन साहित्यिक यथार्थ को अधिक सशक्त ढंग से हिन्दी जगत में प्रस्तुत किया था । निराला जी प्रेमचन्द के प्रभाव वृत्त के लेखक होने के नाते उनसे अनेक रूपों में प्रेरित थे।साहित्य के प्रति प्रेमचन्द की दृष्टि को उन्होंने सराहा था और उसकी सार्थकता. को स्वयं अपने लेखन द्वारा भी विस्तार दिया था।

उन्होंने अपनी कहानियों में युग-यथार्थ की पृष्ठभूमि में युग-जीवन को तथा युग-जीवन के सन्दर्भ में व्यक्ति के जीवन को विभिन्न कोणों, प्रसंगों तथा स्थितियों में देखा है एवं भिन्न-भिन्न आयामों का चित्र प्रस्तुत किया है, जिससे व्यक्ति अपने व्यक्ति रूप में तथा सामाजिक प्राणी के रूप में भी दोनों ही रूपों में भीतर-बाहर से स्पष्ट हो उठता है। उनकी कहानियों में व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का धनी भी है और समाज- व्यवस्था का अंग भी न तो वह समाज-व्यवस्था के बन्धनों से बँधकर अपने व्यक्तित्व को खो बैठता है और न समाज की धारा से अलग हटकर अपने व्यक्तित्व की रक्षा अथवा स्थापन में नितान्त काल्पनिक, शावुक आदर्शों में डूबा रहने वाला या त्रिशंकु अथवा द्रोही बन जाता है। उसके व्यक्तित्व में नयेपन की ऐसी प्रखरता है जो समाज और उसके प्राणी के रूप में व्यक्ति के जीवन के संक्रमण की आन्तरिक और बाह्य प्रक्रिया को उजागर करती है । उनमें युग तथा व्यक्ति के जीवन की महानता और क्षुद्रता, उसकी सामान्यता तथा असाधारणता, उसके जीवन का विस्तार और गहराई, उसके जीवन का द्वन्द्व और संक्रमणशीलता, पुराने विश्वासों की टूटन और नयी चेतना के उभार की कुलबुलाहट सभी कुछ सजीव हो उठा है । निराला जी ने अपनी कहानियों के माध्यम से मनुष्य-मनुष्य के बीच जाति, धर्म तथा वर्ग के कटघरे के निस्सार बताकर शुद्ध मानव के रूप में आपसी सम्बन्धों का नया मानवीय धरातल प्रस्तुत किया है। उन सम्बन्धों में नयी मानवीय संवेदना के सूत्र जोड़े हैं। उन सम्बन्धों को जोड़ने के लिए आकर्षण चरित्र तथा व्यक्तित्व की महानता, व्यक्ति के सौन्दर्य-बोध तथा जीवन मूल्य के नए परिवेश तथा नए आयाम प्रदान किए हैं।"
 
निराला जी साहित्यकार से पहले महामानव थे, अतः उस महाप्राण साहित्यकार का ध्यान स्वभावतः ही उपेक्षितों, उत्पीड़ितों, शोषितों और विपन्नों की ओर चला जाता था । कविता में इस वर्ग के लिए लिखने का बहुत अवकाश न था, इस कसर को उन्होंने कहानियों में पूरा किया है।
 
उन्होंने अधिकांशतः दमित, दलित और उपेक्षित को अपना स्वर और संवेदन किया है । चाहे वह दमित, दलित व उपेक्षित वर्ग हो अथवा व्यक्ति । चाहे वह समाज- व्यवस्था, सामाजिक और आर्थिक वैषम्य, सामाजिक वर्जनाओं, वर्ग विशेष अथवा व्यक्ति-विशेष किसी से भी दबाया हुआ, पीड़ित और उपेक्षित हो।
 
निराला की कहानी कला की प्रमुख विशेषताएं
निराला जी की कहानियाँ और उनके उपन्यास साहित्य की तुलना में अधिक यथार्थवादी रहे हैं । उन्होंने समाज के सभी वर्गों से कथा-वस्तु का चयन किया है, किन्तु निम्न-मध्यम वर्ग की समस्याओं की अभिव्यक्ति अधिक मनोयोगपूर्वक की है। उनकी सामाजिक कहानियों की कथा-वस्तु पर्याप्त सुसंगठित रही है, किन्तु संस्मरणात्मक कहानियों में लेखक के निजी जीवन-प्रसंगों के समावेश के कारण कहीं-कहीं विषयान्तर आ गया है। इसके विपरीत दार्शनिक कहानियाँ उद्देश्य-प्रधान हैं, फलतः उनमें कथानक का महत्त्व प्रायः गौण है । इनमें संयोगाश्रित घटनाओं की बाहुलता रही है, जिससे कथानक में कुछ अस्वाभाविकता का आ जाना स्वाभाविक था । सामान्यतः निराला जी की कहानियों का अन्त सांकेतिक रहा है, किन्तु संस्मरणात्मक कहानियों में अन्त की ओर इस रूप में ध्यान नहीं दिया गया है। इनमें उद्देश्य-पूर्ति के साथ ही कहानी समाप्त हो गई है ।

निराला जी ने पात्रों के चरित्र-चित्रण में विशेष सजगता का परिचय दिया है। उनकी अधिकांश कहानियाँ नायिका प्रधान हैं। जिनके सौन्दर्य का अलंकारिक चित्रण हुआ है उनके स्त्री-पात्रों में परम्परागत बँधनों को तोड़ने की इच्छा सर्वाधिक प्रबल रही है। वे साहसपूर्ण अपने अधिकारों की रक्षा में संलग्न रही हैं। उनमें नारी सुलभ लज्जा, विनय और क्षमा के अतिरिक्त साहस, धैर्य, वाक्पटुता, तात्कालिक बुद्धि, आत्माभिमान आदि पुरुषोचित गुणों का भी अपूर्ण समन्वय है ।

डॉ. रामगोपाल सिंह चौहान के शब्दों में, “निराला जी की कहानियों का युग ऐसा था, जब चेतना के स्तर पर सामाजिक असन्तोष से विक्षुब्ध मानव वैयक्तिक उत्सर्ग, और बलिदान के भावुक आदर्श से बढ़कर असन्तोष के विरुद्ध संघबद्ध संघर्ष की त्याग सामाजिक चेतना की ओर बढ़ रहा था। सन् 1930 ई. और उसके आस-पास के काल से देश के सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन ने एक नयी करवट लेना प्रारम्भ कर दिया था । देश के औद्योगीकरण से उत्पन्न मजदूर समाज के एक संगठित वर्ग के रूप में उभर चला था। उसको नयी चेतना से सम्पन्न कर रहा था। मार्क्सवादी जीवन-दर्शन रूसी क्रान्ति से प्रेरणा प्राप्त कर देश के शिक्षित मध्यम-वर्ग तथा मजदूर वर्ग में फैल रहा था । अंग्रेजी शासन की दासता से राष्ट्रीय-स्वाधीनता का आन्दोलन जनव्यापी होकर दिन-प्रतिदिन अधिक उग्र हो चला था और सन् 1930 ई. तक पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य राष्ट्रीय लक्ष्य बन चुका था । काँग्रेस में उग्र विचारों का बहुमत हो गया था । औद्योगीकरण तथा पाश्चात्य प्रभाव ने नगर सभ्यता को एक नया उत्कर्ष प्रदान कर दिया था। यह सारी स्थिति रहन-सहन से लेकर विचारों तथा जीवन-मूल्यों तक में एक उत्क्रान्ति उत्पन्न कर रही थी । यह सारी स्थिति निराला जी की कहानियों के युग को एक नया सन्दर्भ प्रदान कर रही थी । जिस सन्दर्भ में उस युग का जीवन हर स्तर तथा क्षेत्र में अपने को नया स्वर देने के लिए कसमसा रहा था । निराला जी ने अपनी कहानियों में उस नए स्वर की कसमसाहट को एक नया अर्थ देने का प्रयास किया है।"
 
डॉ. निर्मल जिन्दल की दृष्टि में निराला जी ने विधवा-विवाह, दहेज-प्रथा, अन्तर्जातीय विवाह, अनमेल विवाह, आदि के रूप में नारी-विषयक समस्याओं की अभिव्यक्ति अधिक मनोयोगपूर्वक की है। उन्होंने सामाजिक व्याघातों से उत्पन्न नारी की कुंठाओं, आत्म-पीड़ा, विद्रोह आदि का भी सफल चित्रण किया है। इसके अतिरिक्त जमींदार वर्ग के अत्याचार, वर्गभेद, जाति-भेद, ग्रामीण जनता के अन्धविश्वास, ईर्ष्या, आदि के रूप में ग्रामीण समस्याओं को भी उनकी कहानियों में स्थान मिला है। इनमें काँग्रेस-आन्दोलन, पिकेटिंग, पुलिस की अंध कार्यप्रणाली, देशी राजाओं के व्यवहार, आदि राजनीतिक परिस्थितियों का आलेखन भी कम मात्रा में नहीं हुआ है । प्रकाशकों की शोषणवृत्ति लेखक-वर्ग की विवशता के अंकन द्वारा तत्कालीन साहित्यिक परिस्थितियों पर भी प्रकाश पड़ा है । यह उल्लेखनीय है कि निराला जी ने केवल समस्याओं का चित्रण ही नहीं किया, अपितु उनकी उत्पत्ति के कारणों की भी खोज की है ।समस्याओं के समाधान प्रायः आदर्शोन्मुख रहे हैं, किन्तु लेखक ने उनका प्रत्यक्ष कथन कहीं नहीं किया है । इसके अतिरिक्त सामाजिक समस्याओं पर वैयक्तिक दृष्टिकोण से विचार करने की पद्धति भी उन्होंने अपनायी है । फलतः ये कहानियाँ जितनी समाज-सापेक्ष हैं उतनी ही व्यक्ति-सापेक्ष भी हैं। वैसे, निराला जी ने वातावरण निर्माण की ओर भी समुचित ध्यान दिया है । कतिपय अन्य कहानियों में स्थान- विशेष की प्रकृति, घटनाओं एवं संस्कृति के अंकन द्वारा स्थानीय रंग को उभारने का सफल प्रयत्न किया गया है।

निराला जी की कहानियों में उन भाव-बोधों और स्थितियों का बड़ा ही सहज और मार्मिक चित्रण हुआ है, जिसको निराला जी ने अपने जीवन में स्वयं अनुभव किया है । इसीलिए संभवत: निराला जी हिन्दी के उन इने-गिने कहानीकारों में हैं जिनकी कहानियों में साहित्य तथा साहित्यकारों की चर्चा इतने विशद रूप में खुलकर हुई है और शायद इसीलिए वे अपने पात्रों को इतनी आत्मीयता से प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं, क्योंकि उनकी स्थितियों को उन्होंने स्वयं जिया है।

निराला जी अपनी कहानियों का विकास तीव्र गति से करते हैं तथा क़ौतूहल और उत्सुकता बनाए रखते हैं। नाटकीय-संयोग के सहारे भी कथा-प्रवाह को बरकरार रखा गया है । 'ज्योतिर्मयी' में वीरेन्द्र प्रच्छन्न रहकर संयोगों की सृष्टि करता है जिससे पाठकों की उत्सुकता बढ़ती ही जाती है। अंत में रहस्योद्घाटन द्वारा पाठकों की जिज्ञासा को तृप्त किया गया है। 'कमला' में संयोग के बल पर कथा-प्रवाह को दूसरी ओर मोड़ दिया गया है । कमला का पति उसके चरित्र के प्रति शंकालु होकर विवाह होते ही उसे छोड़ देता है विदा कराकर भी नहीं ले जाता है । कमला की माँ का इस आघात से शरीरांत हो जाता है । वह अपने छोटे भाई के साथ मौसी के घर कानपुर चली जाती है। अब भी उसकी पतिभक्ति पूर्ववत् है । साम्प्रदायिक दंगों में पति की बहिन गुंडों के हाथ पड़ जाती है । कमला का भाई राजकिशोर उसकी रक्षा करता है, किन्तु ऐसी लड़की से ब्याह कौन करेगा ? कमला अपने भाई से उसका ब्याह कराकर अपनी महानता का परिचय देती है।

इस कहानी में आकस्मिक घटनाओं एवं संयोगों का सहारा लिया गया है । किन्तु चरित्रों का विकास मनोवैज्ञानिक आधार पर कराया गया है। कमला का गौरवमय चरित्र कहानी को अस्वाभाविक होने से बचा लेता है। इसके अतिरिक्त 'श्यामा, 'प्रेमिका- परिचय', 'परिवर्तन', 'सखी', 'न्याय', 'सफलता', 'कला की रूपरेखा' और 'क्या देखा' के कथानकों का विकास भी कौतूहल और जिज्ञासा से पूर्ण है। 'श्यामा' में संयोग स्वाभाविक है और कथानक का क्रमिक विकास करने में सहायक है । 'क्या देखा' में जिज्ञासा और चमत्कार की अधिकता हो गई है, जिससे वह जासूसी कहानी जैसी लगती है। विकास स्वभाविक रूप से होने के कारण कथानक में उलझाव आ गया है।
 
निराला जी की कहानियाँ घटना-प्रधान सी लगती हैं, किन्तु हैं वे चरित्र - प्रधान । कहानी में चरित्र का उद्घाटन करनां निराला जी का प्रधान उद्देश्य है । इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वे नाटकीय प्रसंगों एवं संयोगों का सहारा लेते हैं । उदाहरण के लिए. 'ज्योतिर्मयी', 'कमला', 'श्यामा', 'सखी', 'क्या देखा' तथा 'श्रीमती गजानन्द- शास्त्रिणी' में नारी के विद्रोही स्वरूप परं प्रकाश डालने के लिए संयोग काम में लाए गए हैं।

निराला जी की कहानियों में चरम सीमा वहाँ होती है जहाँ कौतूहल और जिज्ञासा का अन्त होता है। 'पदमा और लिली' आजीवन कुँवारी रहने का संकल्प करती हैं यही चरम सीमा है । 'ज्योतिर्मयी' में ट्रेन में बहु का घूँघट उठाकर विजय आश्चर्यचकित हो जाता है, पाठक भी विस्मय विमुग्ध हो जाते हैं यही चरम सीमा है । 'कमला और श्यामा' में चरम सीमा के पूर्व तक कहानियाँ मन्द गति से चलती हैं किन्तु चरम सीमा नजदीक आते ही उनका वेग तीव्र हो जाता है । हम सोचते ही रहते हैं कि कमला पति की बहिन से अपने भाई के विवाह को स्वीकार करेंगी या नहीं यह जिज्ञासा की तीव्रता है। कमला द्वारा प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चरम सीमा है और यहीं कहानी समाप्त हो जाती है । निराला जी की यथार्थवादी कहानियों में चरम सीमा, चमत्कार एवं नाटकीयता युक्त नहीं होती है। इन कहानियों में चरम सीमा वहाँ है जहाँ लेखक का चरित्र की विशेषता और क्षमता से परिचित होकर श्रद्धापूरित हो जाता है। 'चतुरी चमार', 'देवी', 'सुकुल की बीबी', और 'कला की रूपरेखा' इसी प्रकार की कहानियाँ है । 

जहाँ तक कहानियों में प्रयुक्त शैली का प्रश्न है हमारे लिए यह ध्यातव्य है कि मुख्य रूप से कहानी की पाँच शैलियाँ होती है। ऐतिहासिक शैली, नाटकीय शैली. आत्मचरितात्मक शैली, पत्र- शैली और डायरी शैली। निराला जी जी ने डायरी शैली को छोड़कर शेष सभी शैलियों का प्रयोग किया है। उनकी कहानियों में विभिन्न शैलियों का मिश्रण है । 'पदमा और लिली', 'ज्योतिर्मयी', 'कमला', 'श्यामा', 'परिवर्तन', 'हिरनी', 'सखी', 'न्याय' 'सफलता' आदि में नाटकीय शैली प्रधान है, किन्तु कहीं-कहीं पर ऐतिहासिक शैली भी आ गयी है। 'अर्थ', 'राजा साहब को ठेंगा दिखाया', 'भक्त और भगवान' तथा 'श्रीमती गजानन्द शास्त्रिणी' में ऐतिहासिक शैली की प्रधानता है। 'प्रेमिका-परिचय' तथा 'अर्थ' में ऐतिहासिक शैली तो है ही, पत्रों का भी प्रयोग किया गया है। 'क्या देखा' में चार शैलियों का प्रयोग किया गया है प्रारम्भ में आत्मकथा, तदनन्तर, ऐतिहासिक और नाटकीय तथा अंत में पत्रात्मक । 'चतुरी चमार', 'देवी', 'स्वामी सारदानन्द जी महाराज और मैं', 'सुकुल की बीबी' और 'कला की रूपरेखा' आत्मकथात्मक शैली में लिखी गयी हैं । 'चतुरी चमार' और 'सुकुल की बीबी' में अन्य शैलियाँ भी काम में लायी गयी हैं । निराला जी का आग्रह किसी शैली के प्रति नहीं है । अपनी बात पाठकों तक पहुँचाने के लिए जो शैली उपयोगी लगी, उसे या अन्य शैलियों को उन्होंने अपना लिया । उनके लिए शैली साधन है साध्य नहीं । काव्यं के समान कथा में निराला जी ने नये प्रयोग नहीं किए हैं, यह ध्यान में रखने योग्य तथ्य हैं ।

निराला जी की कहानियों का उद्देश्य निराला जी के जीवन की आत्मानुभूतियों के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक दृश्य को प्रस्तुत करना है, जिनके बीच वे सनातन जीवन-मूल्यों और सामायिक सामाजिक आदर्शों को भी अभिव्यंजित करने का प्रयत्न करते कतिपय समीक्षकों का यह विचार है कि उनकी कहानियों में समाज को जितना नहीं देखा जा सकता है उतना स्वयं उनको देखा जा सकता है। अपनी कहानियों के माध्यम से विभिन्न सामाजिक आयामों में प्राप्त हुए अपने वैयक्तिक अनुभवों को भी उन्होंने अभिव्यक्त किया है । यथा 'चतुरी-चमार', संग्रह की कहानियों में 'स्वामी सारदानन्द जी महाराज और मैं' 'सफलता' तथा 'भक्त भगवान' ये तीन कहानियाँ किसी न किसी प्रकार निराला जी के व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्धित हैं।'स्वामी सारदानन्द जी महाराज और मैं' में निराला जी ने अपने संघर्षशील जीवन की कहानी कही है।

इस संग्रह की शेष कहानियाँ भी समाज की अनेक समस्याओं को सामने लाती हैं । 'चतुरी चमार' में जमींदारों का अत्याचार, अस्पृश्यता, राष्ट्रीय आन्दोलन, निरक्षरता आदि अनेकानेक समस्याओं पर प्रकाश डाला है। 'सखी' में प्रेम और विवाह की समस्या तो है ही, इस ओर भी संकेत है कि नारियाँ इतनी अवला होती हैं कि पुष्पों की कुदृष्टि से बचने के लिए भी उन्हें किसी पुरुष की ही अपेक्षा होती है । 'न्याय' में यह दिखाया गया है कि भारतीय पुलिस रक्षक के बदले भक्षक हो रही है । 'राजा साहब को ठेंगा दिखाया' में जमींदारों के अत्याचारों का वर्णन है । जो निरीह है, जो अन्याय का प्रतिकार करने को कौन कहे, उसके विरुद्ध अपना मुँह भी नहीं खोलते हैं, समाज ऐसे व्यक्ति पर दया न कर उसका सब तरह से शोषण करता है। 'देवी' की 'पगली' शोषित, उपेक्षित और उत्पीड़िता की सबसे बड़ी प्रतिनिधि है। 'सुकुल की बीबी', संग्रह कीचारों कहानियाँ सामाजिक यथार्थ का उद्घोष करती हैं । 'सुकुल की बीबी' का प्रतिपाद्य समाज संकीर्णता के कारण विवाह में बाधा है। समाज नारी का रूप, गुण नहीं, गोत्र देखता है । पर यह गोत्रत्व कितना मिथ्या है इसका अनुभव निराला जी को अपने जीवन में खूब हुआ है। जिसे उन्होंने अपनी इस कहानी के माध्यम से व्यक्त किया है।

'कला की रूपरेखा' में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस पर व्यंग्य है। इसके अधिवेशन में स्वयंसेवक का कार्य करने वाले व्यक्ति को जाड़े से बचने के लिए चादर और पैर की रक्षा के लिए चप्पल की भिक्षा माँगनी पड़ती है तथा लखनऊ से अपने घर मद्रास लौटने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं। जब निराला जी उससे पूछते हैं कि क्या काँग्रेस के लोग आपकी इतनी सी मदद नहीं कर सकते, तब वह बड़े भोलेपन से कहता है कि- 'नहीं, काँग्रेस का यह नियम नहीं है। मैं मिला था। मुझे यह उत्तर मिला है।' उसका यह तीन शब्दों में काँग्रेस का सारा खोखलापन अनावृत्त हो गया है । 'क्या देखा' में रहस्यपूर्ण ढंग से समस्या को उपस्थित किया गया है। 'जानकी' एक मनोवैज्ञानिक समस्या को उपस्थित करती है। इसमें यह दिखाया गया है कि अपरिचित रहने पर जो अत्यन्त मोहक लगता है उसकी चारित्रिक विशेषताएँ ज्ञात होने पर उसकी मोहकता नष्ट हो जाती है । व्यक्ति का पहला प्रभाव रूप का पड़ता है, पर वह अस्थायी होता है । दो दाने में निराला जी पुनः व्यक्ति से समाज पर आ गए हैं और बंगाल के अकाल के समय जीने के लिए शरीर बेचने वाली नारी की कहानी कही गयी है।

निष्कर्षतः, निराला जी की कहानियों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है— सामाजिक, वैयक्तिक और मनोवैज्ञानिक। निराला जी की विशिष्टता मध्यम वर्ग की कहानियों में है । निराला जी की कहानी कला पर विचार करने के अनुक्रम में हमें यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि निराला जी प्रेमचन्द युगीन कहानीकार हैं किन्तु, इसी के साथ यह भी ध्यातव्य है कि वे हिन्दी छायावादी काव्य के एक प्रकाश स्तम्भ भी हैं और वह उनका मुख्य रूप है। उनके कवि रूप की छाया उनकी कहानी कला पर भी पड़ी है जिसे प्रायः हिन्दी के सभी समीक्षकों ने अनुभव किया है । डॉ. प्रेम प्रकाश भट्ट का कहना है कि उनकी कहानियों में भी उनका छायावादी कवि अग्रिम रहा है प्रसाद, पन्त और निराला जी तीनों छायावाद के श्रेष्ठ कवि रहे हैं। उनकी कहानियों में काव्य कला का प्रभाव अवश्य है पर साथ ही उनकी कहानियाँ सामयिक यथार्थ की चेतना है, वर्तमान स्थिति के प्रति असन्तोष है । यह असन्तोष का भाव तीनों कवि-कहानीकारों में देखने को मिलता है । डॉ. रामविलास शर्मा इन छायावादी कहानीकारों पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं-"सर्व श्री प्रसाद, पन्त, निराला जी तीनों को वर्तमान समाज से असन्तोष है। किसी को कम किसी को अधिक । किसी ने उस पर तीव्र व्यंग्य किया है, किसी का रोष प्रकट हुआ है । उनके काव्य की विशेषताओं का न्यूनाधिक प्रतिरूप हमें उनकी कहानियों में मिलता है । परन्तु यह असन्तोष वह केन्द्र भूमि है जहाँ वे समान रूप से आकर एकमत होते हैं।" प्रसाद और पन्त की निराला जी में यथार्थ चेतना अधिक सशक्त है । यहाँ तक कि प्रेमचन्द सरीखे महान् तुलना में यथार्थवादी कहानीकार से भी निराला जी अपने व्यंग्य के कारण कुछ अलग ही प्रतीत होते हैं । 

हिन्दी कहानी को निराला जी का अवदान व्यंग्य शैली के रूप में है। साथ ही कहानी को रेखाचित्र के निकट लाने का प्रयत्न भी उनका निजी है । निश्चय ही निराला जी ने कहानी के क्षेत्र में कम लिखा है और उनकी कई कहानियों का कलापक्ष भी कमजोर है, तब भी 'श्रीमती गजानन्द शास्त्रिणी, 'सुकुल की बीबी', 'भक्त और भगवान', 'हिरनी', आदि उनकी कुछ श्रेष्ठ कहानियाँ हैं। इनमें लेखक का अभिनव प्रयोग देखने को मिलता है । निराला जी के समय में कहानी के क्षेत्र में शिल्प की दृष्टि से काफी प्रगति हो चुकी थी । 

प्रेमचन्द व प्रसाद की कहानी-कला के आदर्श पर बड़ी संख्या में कहानीकार लिख रहे थे । साथ ही जैनेन्द्र, पहाड़ी, इलाचन्द्र जोशी, भगवती चरण वर्मा, भगवती प्रसाद बाजपेयी, आदि लेखक नवीन प्रयोगों को लेकर मनोवैज्ञानिक व मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से प्रेरित होकर कहानियाँ लिख रहे थे। कुल मिलाकर हिन्दी का कहानी साहित्य बहुत तेजी से प्रगति कर रहा था, जिसमें महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी थीं और असफल प्रयोग भी। इतने बड़े परिप्रेक्ष्य में कहानीकार निराला जी की उपलब्धि, गुण, परिमाण की दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं और इसका एहसास निराला जी को था, क्योंकि 'लिली' की भूमिका में उन्होंने लिखा है—मुझसे पहले वाले हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानी लेखक इस कला को किस उत्कर्ष तक पहुँचा चुके हैं, पूरे मनोयोग से समझने का प्रयत्न करके भी में इसे नहीं समझ सका हूँ। समझता तो शायद उससे पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर लेता और पतन के भय से इतना न घबराता ।" अपनी कहानी कला के प्रति निराला जी की यह आत्मस्वीकृति का भाव एक ओर जहाँ लेखक की सहज कला-चेतना का परिचय देता है तथा अपनी शुरू की कहानियों के कमजोर पक्ष की ओर इशारा करता है, वहीं वह निराला जी की सभी कहानियों के लिए अपर्याप्त कथन सा भी है, क्योंकि उनकी महत्वपूर्ण कहानियाँ, 'लिली' के बाद प्रकाशित होने वाले संग्रहों- 'चतुरी चमार' और 'सुकुल की बीबी' में हैं। अपनी इन यथार्थवादी कहानियों के कारण निराला जी हिन्दी के श्रेष्ठ कहानीकारों में परिगणित किये जा सकते हैं। कहानी के क्षेत्र में व्यंग्य-लेखन की दृष्टि से निराला जी का महत्त्वपूर्ण स्थान सुरक्षित है।

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