आधे अधूरे नाटक में सावित्री की छोटी पुत्री किन्नी का चरित्र चित्रण मोहन राकेश वह इस टूटते-विखरते निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे मासूम
आधे अधूरे नाटक में सावित्री की छोटी पुत्री किन्नी का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक 'आधे-अधूरे' में किन्नी (किन्नू) परिवार की सबसे छोटी सदस्य है, जिसकी उम्र लगभग 12-13 वर्ष दिखाई गई है।वह इस टूटते-विखरते निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे मासूम, लेकिन परिस्थितियों से बुरी तरह प्रभावित और उपेक्षित पात्र है।
आधे-अधूरे' नाटक में किन्नी सबसे छोटा 12-13 वर्ष का सहायक पात्र है। अर्थ-काम की दृष्टि से असाधारण बने परिवारों का, आपस में निरन्तर झगड़ते रहने वाले, चख-चख एवं चिल्लपों में पूर्णतः निरत रहने वाले परिवारों का छोटा सदस्य सम्भवतः सबसे अधिक ऐसे वातावरण से प्रभावित होता है और ऐसी दशा में तो और गम्भीर प्रभाव उस पर पड़ता है, जबकि वह एक महत्वाकांक्षी और भौतिक अपेक्षाओं से तृषित माँ का सबसे प्यारा हो। वह जिद्दी, मुँहफट, अनैतिक एवं आवारा हो जाया करता है, इसी मनोवैज्ञानिक तथ्य को नाटककार ने छोटी लड़की अर्थात् किन्नी के चरित्र के माध्यम से उजागर किया है। यहाँ भी नाटककार इस चरित्र को एक 'व्यक्ति' का चरित्र होते भी समूह या सामाजिकता के परिचायक एक प्रतीक एवं प्रतिनिधि चरित्र की तरह चित्रित करता है। सुकुमारावस्था या किशोरावस्था में ही उसके मन-मस्तिष्क में अनेक प्रकार की ग्रन्थियाँ उपजती जा रही हैं, तो भविष्य का क्या होगा, किन्नी के चरित्र के माध्यम से इस बात का अनुमान सहज ही किया जा सकता है। पात्र-परिचय के अन्तर्गत नाटककार मोहन राकेश द्वारा प्रस्तुत उसके चरित्र की रूप-रेखा इस प्रकार है-
"छोटी लड़की, उम्र बारह और तेरह के बीच । भाव, स्वर, चाल- हर चीज में विद्रोह । फ्रॉक चुस्त, पर एक मोजे में सुराख ।"
किन्नी उभरती आयु के साथ जवानी की तरफ द्रुत गति से अग्रसर हो रही है, अतः उसके प्रति घर-परिवार के सदस्यों का व्यवहार बड़ा ही सयत, सन्तुलित एवं सावधानीपूर्ण होना चाहिए, क्योंकि बच्चों के बनने या बिगड़ने के यही दिन हुआ करते हैं, पर उसे घर में वैसा व्यवहार स्यात किसी से भी नहीं मिल पाता, अतः उसमें बिगड़ाव के सभी लक्षण स्वतः ही उभरते आ रहे हैं। इसके बाद नाटककार ने उसके परिचय में लिखा है- "भाव स्वर, चाल- हर चीज में विद्रोह।" यह सब उपर्युक्त सावधानियों के अभाव का अवश्यम्भावी परिणाम है। नाटक में वह प्रत्येक स्तर पर भाव, स्वर और चाल के रूप में विद्रोहात्मक व्यवहार करती हुई दिखाई गई है। उसका पहनावा है, उसकी परिवेशगत विपन्नता और आयु का परिचायक है, परन्तु वह जो अपने घर में देख रही है, उसने उसके मन-मस्तिष्क को आयु के सन्तुलन से हटा दिया है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उसे बारह-तेरह वर्ष की आयु में ही असाधारण एवं अस्वाभाविक बना दिया है। नाटक के आरम्भ में ही सावित्री का वक्तव्य किन्नी के समूचे व्यक्तित्व एवं कृतित्व की एक झाँकी-सी हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है। वह बाहर से थकी-हारी आती है, अन्दर के दरवाजे की तरफ देखकर आवाज लगाती है-
"किन्नी! होगी ही नहीं, जवाब कहाँ से दे ? (तिपाई पर पड़े बैग को देखकर) यह हाल है इसका! (बैग की एक किताब उठाकर). फिर फाड़ लायी एक और किताब ! जरा शरम नहीं कि रोज-रोज कहाँ से पैसे आ सकते हैं नयी किताबों के लिये।"
मैं और फिर वह जब दृश्य में आती है, तो एक नया ही हड़कम्प लिये। वह घर में अपनी माँ, बाप, बड़ी बहन को एक साथ उपस्थित देखकर, अपने भीतर कुछ छिपाते हुए ठिठक कर कह उठती है-"कुछ पता नहीं चलता यहाँ तो। बताओ, चलता है कुछ पता? स्कूल से आयी, तो घर पर कोई भी नहीं था। और अब आयी हूँ, तो तुम भी हो, डैडी भी हैं, बिन्नी दीदी भी हैं-पर सब लोग ऐसे चुप हैं जैसे " स्पष्ट है कि वह घर की प्रत्येक स्थिति से परिचित होकर उसे तीखी निगाहों से भाँपने और समझने लगी है। इसी कारण उसका भाव, स्वर, चाल-सभी एकदम तीखे होते जा रहे हैं। तभी तो माँ के पूछने पर कि वह आते ही कहाँ चली गई थी, तुनककर उत्तर देती है-"कहीं भी चली गई थी। घर पर था कोई जिसके पास बैठती यहाँ?" किन्नी की यह प्रतिक्रिया घर के सदस्यों या माँ के प्रति नहीं, उस घर के वातावरण के प्रति है, जिसे वह समझ चुकी है।
सम्भवतः यदि उसके स्कूल से आने पर घर में सब सदस्य होते भी तो शायद वह दूसरे शब्दों में वहाँ के वातावरण की आख्या करती वह छोटी होने के कारण ही शायद माँ की सिर चढ़ी और लाडली बेटी है। उसके इस प्रकार के व्यवहार का कारण माँ के लाड़-प्यार को समझा भी जा सकता है, पर क्या इसमें यह भी निहित नहीं है कि माँ, उससे कुछ ऐसा बनने की अपेक्षा करती है, जो उसकी आकांक्षाओं के केन्द्र से जुड़ा हुआ हो, जैसा कि प्रायः ऐसी माताओं की प्रकृति में देखा जाता है। वह एकदम वाचाल और मुँहफट है। छोटे-बड़े किसी का भी लिहाज या शर्म-हया करना वह जानती ही नहीं-ऐसा न कहकर यह कहना चाहिए कि वह ऐसा कर पाने की स्थिति में परिवेशगत दुर्बलताओं के कारण नहीं रह गई है। घर-परिवार के बड़े सदस्यों के स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण, स्वेच्छाचारिता और यौन-सम्बन्धों में एक प्रकार की उन्मुक्तता का ही यह परिणाम है कि केवल बारह-तेरह वर्ष के बीच की आयु वाली किन्नी कैसोनोवा की यौन-स्वेच्छाचारों की रूपायक कहानियाँ बड़े चाव से पढ़ती है। इसके लिए वह अपने बड़े भाई के बिस्तर और तकिये को टटोलती है, ताकि उसे इस प्रकार की पुस्तकें प्राप्त हो सकें। इतना ही नहीं, वह अपनी समवयस्काओं के साथ स्त्री-पुरुषों के यौनाचारों की दिलचस्पी के साथ चर्चा भी करती है। इसके लिए उसे न तो इस बात की चिन्ता है, कि माँ से पिटना पड़ता है और न इस बात की ही कि बड़ा भाई भी पिटाई करता है।
यह सब क्रियायें बिन्नी के मानसिक सोच का परिणाम नहीं हैं, बल्कि उसकी उस रुचि का परिणाम हैं, जो उसकी इस उम्र को सोचने के लिए सुलभता से उसमें विकसित हो चुकी है। स्वाभाविक है कि मनुष्य अपनी रुचि का दास हो जाता है और जीवन के प्रति नवोदित रुझान के दिनों में तो और भी अधिक। उसकी कोई दिशा नहीं है। माँ और भाई की मार-पीट उल्टे उसे और भी अधिक ढीठ तथा बेशर्म बनाने में ही सहायक होती है।
किन्नी दिग्भ्रमित मध्यवर्गीय माँ सावित्री की ऊहात्मकता, पूर्णता की (जैसी कि लेखकीय धारणा है) असफल तलाश और कदम-कदम पर मिलने वाली अन्य प्रकार की असफलताओं की ही चरम परिणति कही जा सकती है। वह उस वाचात, कृतघ्न, बिगड़ैल और आत्मकेन्द्रित नयी पीढ़ी का विसंगत रूप व्यक्त करती है, जो आज के युग में बड़ी ही तीव्र गति से उभरकर हमारे सामने आ रही है। किन्नी के चरित्र की समग्रता को अपनी भाषा योजना में व्यक्त करते हुए ओम शिवपुरी लिखते हैं-"छोटी लड़की पिता, माता, बहन, भाई-किसी के प्रति लगाव महसूस नहीं करती। अपनी छोटी-छोटी आवश्यकताओं की आपूर्ति से बेहद कड़वी होकर वह कैंची की तरह जुबान चलाती है और यौन-सम्बन्धों में ऐसी दिलचस्पी लेने लगी है, जो उसकी आयु से कहीं आगे हैं। उसकी बदतमीजी दिन-पर-दिन बढ़ती जाती है, क्योंकि पिता की बेकारी, माँ के पुरुष-मित्रों और बड़ी बहन के घर से भाग जाने के कारण उसे बाहरी लोगों की कुत्सित बातें सुननी पड़ती हैं।" स्पष्ट है कि ओम शिवपुरी ने भी पारिवारिक परिवेशिक दृष्टि से ही किन्नी के चरित्र को अंकित करने, देखने-समझने का प्रयास किया है।
किन्नी के व्यक्तित्व एवं चरित्र-चित्रण के सम्बन्ध में महेश आनन्द ने भी परिवेश को ही महत्व देते हुए लिखा है-"छोटी लड़की किन्नी तुनुकमिजाज और बद-जुवान होने के साथ-साथ छोटी उम्र में ही यौन-सम्बन्धी बातों में दिलचस्पी लेने लगी है। एक प्रकार से बिन्नी और किन्नी सावित्री के व्यक्तित्व के ही अंश हैं, जो अपनी माँ के पदचिह्नों पर चल रही हैं।" किन्नी को आयु के कारण अधूरेपन का अहसास स्पष्टतः नहीं है, न ही स्पष्टतः पूरेपन की तलाश ही उसे हैं, क्योंकि वह अपरिपक्व वय में परिपक्व यौवनोल्लास में किसी भी समझ-सोच से परे है।
किन्नी का चरित्र 'आधे-अधूरे' नाटक में उस आधुनिक बिखरे हुए परिवार की बलि चढ़ती हुई नई पीढ़ी का प्रतीक है। मोहन राकेश ने किन्नी के माध्यम से यह दर्शाया है कि जब एक घर में सौहार्द और बुनियादी प्रेम समाप्त हो जाता है, तो उसका सबसे घातक और दर्दनाक असर बच्चों के कोमल मानसिक विकास पर पड़ता है।


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