यही उनका नमो भारत है

SHARE:

उदासी से भरा एक बहुस्वरीय समाज गायों के खुरों के नीचे, भय से जड़ हो चुकी मृत्यु में सिसकता रहता है। यही उनका "नमो भारत" है।

नव भारत!


बुद्धि!
सदा खुली आँखों के सामने
चिथड़ों से ढका
एक चरखा पड़ा है।

उसका शरीर धूल और थकान से मलिन।
स्पर्शों में श्रम की झुर्रियाँ,
समय स्वयं पसीना बहाता है।
वह केवल
कालातीत नहीं,
काल-पराजित वस्त्रों को ही
बार-बार सी सकता है।

नशा!
धुँधली रोशनी में,
आधी मुंदी भोगी आँखों की नोक पर
सदा खुला मुँह किए
एक बंदूक खड़ी है।

नव भारत!
केवल तीन गोलियों से ही
उसने नश्वर मनुष्य को
देवत्व के सिंहासन पर बैठा दिया।
वह सहज हाथों में ढल जाती है,
और सदियाँ बीत जाने पर भी
कभी पुरानी नहीं पड़ती।

अधम भारत की नागरिकता
चरखे की पूजा करती है।
टूटती हड्डियों को ढोती,
समय से हारे वस्त्र पहनती,
खुरदरा कपड़ा फैलाकर
याचना से भरी प्रार्थनाएँ करती,
इस प्रकार
एक कठिन, क्लांत जीवन जीती है।

उत्तम भारत की नागरिकता
गर्व से बंदूक को
सीने से लगा लेती है।
कभी न पुरानी होने वाली गोलियाँ
सम्मान के साथ
आकाश की ओर दागती है।

गायों के थनों के नीचे
एक बहुवर्णी समाज
अपना चेहरा खोता हुआ,
धीरे-धीरे,
धीरे-धीरे
मौन में बदलता जाता है।

मध्यम भारत की नागरिकता
भोर में उठकर
अधम भारत के चरखे की पूजा करती है;
फिर दिन भर
उत्तम भारत की बंदूक
दीर्घायु रहे,
इसके लिए कठिन परिश्रम करती है।

और जब
साँझ उतर आती है,
पश्चाताप से घायल मन लिए
फिर उसी चरखे के आगे
हाथ जोड़कर
मोक्ष की याचना करती है।

उदासी से भरा
एक बहुस्वरीय समाज
गायों के खुरों के नीचे,
भय से जड़ हो चुकी मृत्यु में
सिसकता रहता है।

यही उनका "नमो भारत" है।

स्नेहाकांक्षा की राख

काँपती हुई इच्छाओं के
कोमल दीमक
जब हृदय की लकड़ी पर
मौन होकर अपने दाँत गड़ा देते हैं,
तब जीवन धीरे धीरे
निःशब्द मृत्यु की
मुलायम राख बन जाता है।

प्रेम के धुएँ से भरी पगडंडियों पर
कामना और मोक्ष,
दो प्यासी परछाइयों की तरह,
एक ही स्वप्न की
गुप्त भूख लिए
साथ साथ चलते हैं।

हे सृजन चेतना,
क्या तुम्हारा यह अमूल्य जीवन
काल की शांत हवा में
राख के महीन कणों सा
धीरे धीरे
अदृश्यता में बिखर रहा है?

आवेग...
क्या वह हृदय की गहराइयों में
क्षणभर को चमक उठने वाला
केवल श्रृंगार है,
या स्वतंत्रता की मधुर वेदना का
धीमे स्वर में सुलगता निःश्वास?

या फिर प्रेम ही
अग्नि का हिम आवरण है?
जिसके अग्नि स्वप्नों के भीतर
भटकती हुई आत्मा
अपने ही अनर्थ की खोज में निकली
एक अनंत संगीत यात्रा है?

अंततः
समय का मौन ही पूछता है,

क्या प्रेम
राख में बदलती एक चिंगारी है,
या फिर
जीवन को जलाकर
अर्थ में खिल उठने वाली
एक अदृश्य ज्वाला?

प्रशंसा का गड्ढा

कहते हैं,
छिपे हुए गड्ढों में
आसानी से हाथी गिर जाते हैं।

पर सच तो यह है,
सबसे सहज
प्रशंसा के गड्ढे में
मनुष्य ही गिरता है।


- Binoy.M.B,
Thrissur district, pincode:680581,
Kerala state, email:binoymb2008@gmail.com,
phone:9847245605(office)

COMMENTS

Leave a Reply

इन्हे भी अवश्य पढ़ें -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका