आज़ादी घर में प्रवेश करते ही माँ को आज कुछ असामान्य-सा महसूस हुआ। घर वही था, आँगन भी वही, लेकिन न जाने क्यों हर ओर एक अजीब-सी खामोशी और वीरानी पसरी हु
आज़ादी
घर में प्रवेश करते ही माँ को आज कुछ असामान्य-सा महसूस हुआ। घर वही था, आँगन भी वही, लेकिन न जाने क्यों हर ओर एक अजीब-सी खामोशी और वीरानी पसरी हुई थी। तभी उसे गहराई से महसूस हुआ कि घर की असली रौनक तो बच्चों की हँसी, उछल-कूद और चहचहाहट से ही होती है।
उसकी नज़र कमरे की ओर उठी। उसकी बेटी बिस्तर पर चुपचाप लेटी छत को इस तरह निहार रही थी, जैसे अपने ही विचारों की किसी अनदेखी दुनिया में खो गई हो।
कुछ दिन पहले उसके पैर में फ्रैक्चर हो गया था और डॉक्टर ने उसे पूरी तरह आराम करने की सलाह दी थी। फिलहाल उसकी सारी गतिविधियाँ बिस्तर तक ही सीमित होकर रह गई थीं।
माँ अपनी बेटी की यह हालत देखकर भीतर ही भीतर दुखी होती रहती। वह किसी न किसी तरह उसकी तन्हाई बाँटना चाहती थी।
एक दिन वह उसके लिए एक नन्ही-सी बिल्ली ले आई।
"देखो, तुम्हें बिल्लियाँ कितनी पसंद हैं न? अब यह तुम्हारा मन बहलाया करेगी।"
बेटी के मुरझाए चेहरे पर पहली बार हल्की-सी मुस्कान उभरी। उसने बड़े प्यार से बिल्ली को गोद में लिया, उसे सहलाया और उसके साथ खेलने की कोशिश की। लेकिन बिल्ली भला कब एक जगह ठहरने वाली थी! थोड़ी ही देर में वह उछलती-कूदती कमरे से बाहर निकल जाती और बच्ची उसे तरस भरी नज़रों से देखती रह जाती।
अगर पहले की बात होती, तो वह खुद भी उसके पीछे दौड़ पड़ती, मगर अब बिस्तर से उठना भी उसके लिए आसान नहीं था।
माँ ने यह देखा तो कुछ दिन बाद एक जोड़ा खरगोश ले आई।
"ये दोनों तो हर समय तुम्हारे साथ रहेंगे। अब तुम्हारा मन नहीं उदास होगा।"
बेटी ने उनसे भी उतना ही प्यार किया, लेकिन खरगोश भी अपनी फितरत के मुताबिक कभी इधर फुदकते, कभी उधर। वह उन्हें देखकर मुस्करा तो देती, मगर उसके मन की वीरानी ज्यों की त्यों बनी रहती।
आखिर एक दिन माँ एक सुंदर-सा हरा तोता ले आई।
उसने पिंजरा बेटी की चारपाई के पास लटकाते हुए खुशी से कहा,
"लो, अब यह तुम्हारी तन्हाई का साथी है। यह तुमसे बातें करेगा, तुम्हारे साथ चहकेगा भी। तुम बस इसका ख्याल रखना, इसे समय पर दाना-पानी देना। देखना, तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।"
बेटी सचमुच खुश हो गई। अब वह दिन में कई-कई बार तोते से बातें करती, उसके लिए दाना-पानी रखती और देर तक उसे प्यार से निहारती रहती।
लेकिन कुछ ही दिनों में उसे एक अजीब-सी बात महसूस होने लगी।
इतना प्यार और देखभाल मिलने के बावजूद तोते की आँखों में वह चमक नहीं थी, जो उसने बिल्ली और खरगोश की आँखों में देखी थी।
वह बहुत संवेदनशील और सहृदय स्वभाव की लड़की थी। दूसरों की तकलीफ महसूस कर लेना उसकी फितरत में शामिल था। तोते की आँखों में भी उसे एक ऐसी अनकही उदासी दिखाई देती थी, जिसे वह महसूस तो कर सकती थी, लेकिन अभी उसकी वजह समझ पाने में असमर्थ थी।
कुछ दिन बाद उसकी कुछ सहपाठी सहेलियाँ उससे मिलने, उसकी कुशल-क्षेम पूछने आईं।
कमरा अचानक हँसी, खुशगप्पियों और चहल-पहल से भर गया।
हर किसी के पास सुनाने के लिए कुछ न कुछ था।
"इस बार स्वतंत्रता दिवस की तैयारी बड़ी धूमधाम से हो रही है।"
"स्कूल की पूरी इमारत सजाई जा रही है।"
"परेड की रिहर्सल भी शुरू हो गई है।"
"और इस बार भाषण प्रतियोगिता भी होने वाली है!"
वह चुपचाप सबकी बातें सुनती रही। होंठों पर हल्की-सी मुस्कान जरूर थी, मगर दिल के किसी कोने में एक टीस उतरती जा रही थी।
वह हाई स्कूल की एक बुद्धिमान, संवेदनशील और बेहद कोमल हृदय वाली छात्रा थी। स्कूल की सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में वह हमेशा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती और अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए शिक्षकों तथा सहपाठियों से खूब प्रशंसा पाती थी। मगर कुछ दिन पहले पैर में फ्रैक्चर हो जाने के कारण इस बार वह इन गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सकती थी।
कुछ देर बाद सहेलियाँ चली गईं।
कमरा फिर उसी खामोशी में डूब गया।
माँ भला अपनी बेटी के मन की हालत से कैसे अनजान रहती। वह हर समय उसकी दिलजोई और सेवा में लगी रहती, ताकि वह पंद्रह अगस्त से पहले स्वस्थ हो सके।
एक शाम वह खिड़की के पास बैठी बाहर देख रही थी।
गली से उसकी कुछ सहपाठी लड़कियाँ हँसती, बातें करती और शरारतें करती हुई गुजर रही थीं। उनके हाथों में रंग-बिरंगे कागज़ और झंडियाँ थीं। वे स्कूल में स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में हिस्सा लेकर लौट रही थीं।
वह देर तक उन्हें देखती रही।
उसका मन हुआ कि वह भी उनके साथ जा मिले, उनके साथ हँसे, बातें करे और हर साल की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में शामिल हो।
लेकिन अगले ही पल उसकी नज़र अपने प्लास्टर चढ़े पैर पर पड़ी।
उसने अनायास एक आह भरी, चुपचाप खिड़की बंद की और पलटकर तोते की ओर देखने लगी।
तोता रोज़ की तरह पिंजरे में चुपचाप बैठा था।
उसकी निगाहें बार-बार सामने वाले पेड़ पर जा टिकतीं, जहाँ आज़ाद पक्षियों का एक झुंड बेफिक्री से शोर मचा रहा था। पक्षी कभी एक डाल से दूसरी डाल पर उड़ते, कभी खुले आकाश में ऊपर उठ जाते और फिर लौटकर उसी पेड़ पर आ बैठते।
पिंजरे में बंद तोता अपनी उदास और वीरान आँखों से बस उन्हें देखे जा रहा था।
वह भी देर तक तोते को देखती रही।
फिर उसकी नज़र बाहर आज़ाद पक्षियों पर गई और दोबारा पिंजरे में बंद तोते पर आकर ठहर गई।
उसे ऐसा लगा, जैसे उसके अपने मन की बेबसी और तोते की आँखों की उदासी के बीच कोई अनदेखा रिश्ता जुड़ गया हो।
"आखिर यह क्या है?"
उसने मन ही मन खुद से पूछा।
उसे कोई जवाब तो नहीं मिला, मगर इतना जरूर महसूस हुआ कि कोई ऐसी बात है जो लगातार उसके मन को कचोट रही है।
आज पंद्रह अगस्त है और माँ का दिल असामान्य रूप से बोझिल है।
हर साल इसी दिन वह बड़े उत्साह से अपनी बेटी की तैयारियों में उसकी मदद करती, उसकी यूनिफॉर्म की सिलवटें ठीक करती, उसकी छाती पर तिरंगा सजाती और दुआओं के साथ उसे स्कूल के लिए विदा करती। शाम को जब वह लौटती तो पूरे दिन की एक-एक बात बड़े उत्साह से सुनाती और माँ मुस्कराते हुए उसकी बातें सुनती रहती।
मगर इस बार सब कुछ अलग था।
हालाँकि उसकी सेहत पहले से कुछ बेहतर हो गई थी और वह थोड़ा-बहुत चलने भी लगी थी, फिर भी वह अभी ऐसी हालत में नहीं थी कि कहीं बाहर जा सके। माँ ने एक नज़र अपनी बेटी की ओर देखा, उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और धीरे से बोली,
"मैं चलती हूँ... अपना ख्याल रखना।"
बेटी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।
माँ घर से निकल गई।
कुछ घंटों बाद जब वह वापस लौटी तो देखा कि बेटी अपने बिस्तर पर लेटी किसी गहरे विचार में डूबी हुई है।
माँ उसके पास आकर बैठ गई और भरे हुए गले से बोली,
"मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि इस बार तुम हमारे साथ स्वतंत्रता दिवस नहीं मना सकीं।"
बेटी ने माँ की ओर देखा और धीरे से बोली,
"हम तिरंगा फहरा लेते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं, भाषण देते हैं... और समझते हैं कि हमने स्वतंत्रता दिवस मना लिया।"
फिर उसने माँ की ओर देखते हुए कहा,
"लेकिन आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना ही तो नहीं होता, माँ?"
बेटी की बात सुनकर माँ ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
बेटी ने माँ की ओर देखा और झटके से उठकर बैठ गई। उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि वह किसी नतीजे पर पहुँच चुकी है।
उसने चुपचाप हाथ बढ़ाया और पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया।
दरवाज़ा खुलते ही तोता तुरंत बाहर नहीं निकला। वह कुछ क्षण पिंजरे की चौखट पर बैठा रहा, जैसे उसे यकीन ही न हो रहा हो कि कैद का दरवाज़ा सचमुच खुल चुका है।
फिर वह धीरे-धीरे फुदकता हुआ बाहर आ गया।
"यह... यह क्या कर दिया तुमने?"
माँ ने हैरानी से पूछा। अब उसे बेटी की बातों का मतलब कुछ-कुछ समझ आने लगा था।
बेटी ने बड़े संतोष से जवाब दिया,
"स्वतंत्रता दिवस मना रही हूँ, माँ।"
"लेकिन तुम्हें तो इन नन्हे जीवों से कितना प्यार है।"
माँ ने अफसोस से पिंजरे से दूर जाते तोते की ओर देखा।
"हम जिनसे प्यार करते हैं, उन्हें कैद में तो नहीं रखा जाता न? उन्हें तो अपनी दिशा खुद तय करने की आज़ादी दी जाती है।"
उसने फुदकते हुए तोते को अपने हाथों से सहारा दिया और उसे उड़ने में मदद की।
माँ के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।
बेटी ने अपनी बात जारी रखी।
"आज़ादी तो सभी जीवों को उतनी ही प्यारी होती है, जितनी हमें। फिर जब हम आज़ादी के बारे में सोचते हैं, तो इतने स्वार्थी क्यों हो जाते हैं? आज़ादी का मतलब इतना संकीर्ण तो नहीं होता... यह तो एक बहुत व्यापक एहसास का नाम है, है न माँ?"
माँ चुपचाप खड़ी थी।
उसे पता ही नहीं चला कि उसकी बेटी कब इतनी बड़ी हो गई।
तोते ने अपने पंख फैलाए, एक पल हवा में डगमगाया और फिर पूरी ताकत से उड़कर सामने वाले पेड़ की एक डाल पर जा बैठा।
कुछ ही पलों में दूसरे पक्षी भी उसके आसपास आ जुटे।
वह पहली बार उनके साथ खुले आकाश में चहक रहा था।
माँ और बेटी दोनों ने तोते की ओर देखा, फिर मुस्कराते हुए एक-दूसरे की ओर देखा।
कितने दिनों बाद आज उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान लौट आई थी। उसकी आँखों में वही चमक थी, जिसे वापस लाने के लिए माँ न जाने कितनी कोशिशें कर चुकी थी।
माँ ने प्यार और गर्व से आगे बढ़कर अपनी बेटी का माथा चूम लिया।
उसी क्षण बगल के मदरसे से बच्चों के तराने की आवाज़ हवा में गूँज उठी—
"यह मेरा चमन है, है मेरा चमन... मैं अपने चमन का बुलबुल हूँ।"
माँ और बेटी ने एक साथ पेड़ की ओर देखा।
डाल पर बैठा तोता भी जैसे आज़ाद हवा के साथ अपना तराना गा रहा था—अपने हिस्से का स्वतंत्रता दिवस मना रहा था।
दबिस्ताँ नाज़ बिहार के सीतामढ़ी ज़िले (रायपुर) की एक प्रबुद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद् हैं, जिनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और जीवन के यथार्थवादी अनुभवों की जीवंत अभिव्यक्ति मिलती है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण उनकी दृष्टि अत्यंत संवेदनशील और विचारशील है, जिसका गहरा प्रभाव उनकी लेखन शैली पर स्पष्ट दिखाई देता है। वे समाज के विभिन्न पहलुओं और आम जनमानस के अंतर्द्वंद्वों को अत्यंत सहज और मार्मिक भाषा में उकेरने में पारंगत हैं। उनकी मौलिक कहानी “आज़ादी” इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वे केवल एक कथाकार ही नहीं, बल्कि एक सजग सामाजिक चेतना की संवाहक भी हैं, जो अपनी लेखनी के माध्यम से साहित्य-जगत में अपनी एक विशिष्ट और प्रभावकारी पहचान बना रही हैं।

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