अशोक इस नाटक का एक प्रमुख पात्र है। वह सावित्री और महेंद्रनाथ का बड़ा बेटा है। वह समकालीन युवा पीढ़ी की हताशा, दिशाहीनता और विद्रोह का प्रतिनिधित्व कर
आधे अधूरे नाटक में अशोक का चरित्र चित्रण | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक ‘आधे अधूरे’ आधुनिक हिंदी नाटक साहित्य की एक मील का पत्थर रचना है। यह नाटक मध्यवर्गीय परिवार के बिखराव, आर्थिक तंगी, और पारिवारिक संबंधों में आई दरार को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करता है।अशोक इस नाटक का एक प्रमुख पात्र है। वह सावित्री और महेंद्रनाथ का बड़ा बेटा है। वह समकालीन युवा पीढ़ी की हताशा, दिशाहीनता और विद्रोह का प्रतिनिधित्व करता है।
महेन्द्रनाथ और सावित्री के परिवार की नव-सांस्कृतिक टूटन और बिखराव के वातावरण का उत्पाद यह पात्र भी है। नाटक की कथावस्तु की कथा/कड़ियों में अशोक कहाँ पर कैसे और क्यों फिट किया गया है, इसका उत्तर यदि नाटक में खोजा जाए तो यही प्राप्त होता दिखाई देगा कि वह भी बिन्नी की तरह ही यह स्पष्ट करने के लिए सृजा गया चरित्र है कि आधुनिक भौतिक युग की चपेट में टूटे परिवारों की ही आन्तरिक संत्रासित और घटनभरी पीड़ा लेकर दिशाहीन विद्रोह के मार्ग पर अग्रसर होने वाले युवक पैदा हो रहे हैं। निश्चित रूप से लेखक आधुनिक युग की नई पीढ़ी को दिशाहीन हो गयी मानता है और उसका कारण वह सावित्री महेन्द्रनाथ के परिवार जैसे पातावरण की देन मानता है अर्थात् 'आधे-अधूरे' के आधे-अधूरे क्षेत्र के लिए आधी-अधूरी पात्रता' तथा उसके सामाजिक प्रादुर्भाव की धारणा लेकर आगे बढ़ा है। वह नई पीढ़ी की उच्छृंलता में विद्रोह के कीटाणुओं को फैलता देखता है। वह नये युग की युवा पौध को संत्रासित, घुटन, पीड़ित और तनाव से संचालित देखता है और उन परिस्थितियों की खोज करता है, जो उसे ऐसा बना रही हैं, परन्तु उसकी खोज उस सीमित क्षेत्र में है, जिसे आधुनिक युग के प्रभाव में संस्कार खोकर टूट चुके परिवार का नाम दिया गया है।
अशोक को नाटककार ने आज के युवक समाज के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया है और इसके माध्यम से मनोवैज्ञानिक धरातल पर उन पारिवारिक पृष्ठभूमियों को उद्घाटित किया है, जो उसे पलायनवादी, निठल्ला और निकम्मा बना देने के लिए उत्तरदायी हैं। इस सब बातों को ध्यान में रखकर ही अशोक के व्यक्तित्व एवं चरित्र को अच्छी प्रकार से समझा-परखा जा सकता है।
पात्र-परिचय के अन्तर्गत अशोक के बारे में नाटककार लिखता है-"लड़का । उम्र इक्कीस के आस-पास । पतलून के अन्दर दबी भड़कीली बुशशर्ट धुल-धुलकर घिसी हुई। चेहरे से, यहाँ तक कि हँसी से भी, झलकती खास तरह की कड़वाहट ।" अशोक की यह रूपरेखा उसकी बाह्य परिस्थितियों के अनुकूल तो है ही, साथ ही, मनोवैज्ञानिक स्तर पर उसकी अन्तः गहन, बिखरी एवं संत्रस्त परिस्थितियों की भी परिचायक है। 'भड़कीली बुशशर्ट धुल-धुलकर घिसी हुई', उसकी आर्थिक-वर्गीय असमर्थता का प्रतीक है, जो उसकी आन्तरिक घुटन एवं बिखराव की प्रतीक है। चेहरे और हँसी से झलकती खास तरह की कड़वाहट अशोक ही नहीं, आज के समूचे युवा वर्ग की आन्तरिक कड़वाहट एवं आन्तरिक खीझ का सटीक चित्रण है। जीवन में प्रवेश करने से पहले ही पढ़ा-लिखा यह नवयुवक एक प्रकार से विरक्त बना बैठा है। पलायनवादी हो गया है। उसके संत्रास ने उसे इस सीमा तक उधेड दिया है कि उसके चरित्र की सही स्थितियों का नाटककार के अनुरूप ही विश्लेषण करते हुए ओम् शिवपुरी लिखते हैं-"लड़का पत्रिकाओं से अभिनेत्रियों की रंगीन तस्वीरें काटता हुआ उस मौके के इन्तजार में है, जब वह भी यहाँ से निकल सकेगा। अपने पिता के लिए उसके मन में करुणा है, माँ के लिए आक्रोश । वह बड़ी बहन के प्रेम में विश्वास नहीं करता, उसे घर से निकलने का एक जरिया मानता है," और सत्य तो यह है कि वह स्वयं भी अपने पारिवारिक परिवेश से निकल भागने के किसी जरिये की अनवरत खोज में रहता है।
समाज-सेविका के पीछे उसके 'जूतियाँ चटखाते' रहने का कारण और उद्देश्य उसकी घर से पलायन करने की इच्छा में निहित मान लिया गया है, परन्तु एक युवक की, जिसका स्वाभाविक रूप से विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण होना कोई अप्राकृतिक बात नहीं है, घर से पलायन करने की इच्छा से जुड़ा हुआ ही हो, यह आवश्यक नहीं है। शायद घर से पलायनवादी रुख का विश्लेषण इसलिए प्रस्तुत किया जा सकता है, क्योंकि वह अपनी बहन बिन्नी की वैवाहिक घटना को उसके प्रेम का कारण नहीं बताता, बल्कि वह उसे उसके घर से मुक्त होने की इच्छा का आधार मानता है। यह सत्य है कि इस घर में वह अपने आपको नितांत अकेला एवं एकदम पराया-सा अनुभव करता रहता है। इस अनुभूति का कारण वही है-कोई, खास चीज-जो यहाँ किसी को भी अपनत्व की भावना से अनुप्राणित नहीं होने देती और वह मानवीय सहज सम्बन्धों का महत्व तस्वीर काटने से अधिक नहीं स्वीकारना चाहता है। उसकी मानसिकता को जिस प्रकार चित्रित करने की चेष्टा की गई है कि वह जीवन के यथार्थ से आँख मूँद लेने में ही सुरक्षा समझ लेने वाला कबूतर बनकर रह गया है।
यह घटना सत्य प्रतीत नहीं होती, क्योंकि उसमें पलायनवादी प्रवृत्ति है, साथ ही -साथ वह स्वच्छन्दतावादी और रोमाण्टिक भी है। एक सेण्टर वाली (समाज-सेविका) लड़की से उसका रोमांस भी हैं। वह अपनी छोटी बहन को मिले उपहारों को भी उसी लड़की को दे देता है। मानव-चरित्र को उसकी यह प्रवृत्ति दूसरे ही रूप में प्रस्तुत करती दिखाई देती है। वस्तुतः नाटक में उसका जो चरित्र उपस्थित हुआ है, वह उसके आन्तरिक रूप की परतें, उसी प्रकार खोलता है, जो इस उम्र में कदम रखने वाले एक बिगड़े हुए या संस्कारहीन परिवार के युवा के होने चाहिए, परन्तु ऐसा भी प्रतीत होता है कि उसमें पारिवारिक संस्कारहीनता प्रवेश नहीं कर पाई है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि उसकी माँ पर-पुरुषों से मिले या उन्हें अपने घर परं बुलाये। स्वयं जिन अश्लील एवं स्वेच्छाचारी यौनाचारों की पुस्तकें पढ़ता है, नहीं चाहता कि उन्हें उसकी छोटी बहन किन्नी भी पढ़े। यहाँ तक कि जिस पिता से वह एक करुण सहानुभूति रखता है, जब वे उन पुस्तकों को देखना चाहते हैं, जिन्हें वह स्वयं तकिये के नीचे रखकर सोता है और किन्नी के देखने पर उसे डाँट-फटकार ही नहीं, बल्कि पीट तक देता है, पिता से कहता है-"नहीं आपके देखने की नहीं ।" यद्यपि अशोक की माँ सावित्री के अनुसार वह जो बड़े लोगों से मिलती या उन्हें घर बुलाती है तो इसलिए कि अशोक के लिए किसी रोजगार की जुगाड़ हो सके, पर नहीं, अशोक इस सबका विरोध करता है। इस विरोध का वह एक मनोवैज्ञानिक कारण भी देता है और वह यह कि इन लोगों के घर पर आने से वह अपनी निगाहों में 'जितना छोटा है, उससे कहीं और छोटा हो जाता है।'
परन्तु, वह अपनी पारिवारिक भूमि का उत्पाद तो है ही, उसके हालात से वह संत्रस्त, पीड़ित और आन्तरिक दृष्टि से विघटित होकर इस सीमा तक विद्रोह, पारस्परिक सम्बन्धों या दुहरे सम्बन्धों के दिखावे से विक्षुब्ध हो चुका होता है कि वह उन्हें तोड़ देने तक की बात साफ कह देता है। वह अपनी बहन बिन्नी से साफ-साफ शब्दों में कहता है, "मैं कहना नहीं चाहता था, लेकिन कहना पड़ रहा है, क्योंकि जब नहीं निभता, इनसे यह सब, तो ये क्यों निभाये जाती हैं, उसे? जो चीज बरसों से एक जगह रुकी है, वह रुकी नहीं रहनी चाहिए।" इतना ही नहीं, वह यह भी कह देता है कि, "मैं खुद अपने को बेगाना महसूस करता हूँ यहाँ।" इस प्रकार अशोक प्रायः सभी जगह स्पष्टवादी- 'उसे उतना स्पष्टवादी न कहकर संत्रासों एवं हीनताओं के कारण मुँहफट कहना चाहिए'- बन गया है। इस सीमा तक कि सिंघानिया के बारे में वह अपनी माँ के सामने स्पष्ट कर देता है-"तुम्हारा बॉस न होता तो उस दिन मैंने कान पकड़कर घर से निकाल दिया होता।" उसकी दृष्टियाँ भी अधिक पैनी और तमीज से परे हो गई है।
उपर्युक्त प्रसंग में ही वह कहता है-"सोफे पर टाँगें पसारे आप सोच कुछ रहे हैं, जाँघ खुजलाते देख किसी तरफ रहे हैं और बात मुझ से कर रहे हैं।" वह माँ से यह भी कह देता है कि वह आदमी को नहीं देखती, बल्कि उसके ओहदे और तनख्वाह को देखती है, नाम और रुतबे को देखती है और यह उसे कतई पसन्द नहीं। पर यह सब उसका आक्रोश ही आक्रोश है। उसमें व्यावहारिकता नाममात्र को भी नहीं रह गई है। तभी तो अपने पिता के समान ही तीखे मरा होकर कुढ़ते रहने, बेकारी का अन्त कर कुछ न करने की अन्तश्चेतना-रहित रहने की स्थिति में उनकी मानसिकता आ गई है, शायद यौवनोन्माद की उसकी यह स्थिति इस दुष्प्रभावी वातावरण से टूटकर रह पाने की निरुद्देश्य ललक ही उसे लड़कियों के पीछे जूतियाँ चटकाते रहने की ओर धकेल देती है। सम्भवतः उसे अपने-आप घृणा- भी होती हो।
वह लोगों के (सिंघानिया के) तो कार्टून बनाता है, चाहे भले ही वह स्वयं विक्षुब्ध एवं निठल्ली युवा पीढ़ी का प्रतीक कार्टून बनता जा रहा हो। बात-बात पर छोटो बहन किन्नी से कुढ़कर उसे पीट लेना भी उसकी अपनी स्थिति के प्रति खौफ की ही परिचायक है। उसकी यह कुढ़न, खीझ और घुटन, उसका आन्तरिक बिखराव चेहरे पर उभरती एक विद्रूप एवं कड़वी हँसी बनकर रह गया है। घोर वितृष्णा ही उसके अन्तः- बाह्य व्यक्तित्व एवं चरित्र की अन्तिम परिचायक बन चुकी है। शायद वह अपनी पीड़ितावस्था की पीडा को इस सीमा तक अनुभव करता है कि अपने पिता की दशा का भी कारण वही सब प्रतीत होता है, उसको वह उससे अधिक अपने पिता के प्रति सहानुभूतिपूर्ण है।
अशोक के चरित्र में यौवन का उत्साह और तरंग होना उसके जीवन्त होने के लक्षण तो प्रकट करते हैं, जो घर की सीमा में आकर कुछ संस्कार भी ले लेते हैं। नाटककार उसे इसी रूप में चित्रित भी करना चाहता है, लेकिन अधिक खुले रूप में नहीं, क्योंकि ऐसा करने से उसके नाटक का उद्देश्य और धारण किया हुआ बित्र बिगड़ता है। अतः उसने उसे एक सीमा तक, अपनी सभी प्रकार की हीनताओं एवं असमर्थताओं में भी आधुनिक युवा वर्ग की तरह फैशन की दौड़ में आगे बताया है। उसकी रंगीन, पर घिसी-पिटी बुशशर्ट तो इस तथ्य की परिचायक है ही, वह फैशन-सम्बन्धी, पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ता रहता है। दाढ़ी कटवाना उसन छोड़ दिया है। फ्रेंच-कट, दाढ़ी-मूँछें रखने की फिराक में रहता है। अपनी बहन बिन्नी से कहता है - "मैं फ्रेंच-कट दाढी रखने की सोच रहा हूँ।
कैसी लगेगी मेरे चेहरे पर?" जैसे पारिवारिक संस्कारों में वह पला-बढ़ा है, वे निर्देशात्मक दायित्वहीनता के परिचायक हैं, इसका प्रभाव अशोक के चरित्र पर भी दिखाई देता है। वह अपनी पारिवारिक संस्कृति, पर खीझता है, उससे वह हेयता भी अनुभव करता है, परन्तु बी.एस-सी. होते हुए भी उससे निकलने के प्रयास करने के दायित्व का अनुभव नहीं करता। शायद उपेक्षा दिखाना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अपने महत्व को प्रतिष्ठित कराने या थोपने का ही एक प्रयास है और अशोक भी इसी भावना का शिकार दिखाई देता है। इसी भावना का शिकार होकर ही वह उन समस्त प्रवृत्तियों और परिस्थितियों को नकार देना चाहता है, जो किसी भी तरह उसके प्रतिकूल पड़ती हैं।
अशोक ढहती परम्पराओं और उभरती नव-मान्यताओं के मध्य में दिग्भ्रमित-सा खड़ा है। उसे पता नहीं है कि किधर जाना है और न ही वह उचित और संयत ढंग से इस दिशा में सोचता है। अशोक के चरित्र को प्रस्तुत करते हुए नाटककार ने परिवेश और आयाम को ही अधिक महत्व दिया है। इसे यदि हम लेखकी निर्बलता कहें तो भी अनुचित नहीं होगा।
संक्षेप में, अशोक आधुनिक समाज के उस 'त्रिशंकु' युवा का प्रतीक है जो पुरानी परंपराओं को छोड़ चुका है, लेकिन नई दिशा पाने में असमर्थ है। मोहन राकेश ने अशोक के माध्यम से उस दौर के बेरोजगार युवाओं की मानसिक वेदना, दिशाहीनता और मध्यवर्गीय पारिवारिक विघटन को अत्यंत जीवंत रूप में उभारा है।


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