मोहन राकेश द्वारा विरचित एकांकी 'प्यालियाँ टूटती हैं' एक सम्पन्न परिवार के द्वारा अतिथि को चाय पार्टी पर बुलाने से सम्बन्ध रखता है।
प्यालियाँ टूटती है एकांकी का सारांश | मोहन राकेश
मोहन राकेश द्वारा विरचित एकांकी 'प्यालियाँ टूटती हैं' एक सम्पन्न परिवार के द्वारा अतिथि को चाय पार्टी पर बुलाने से सम्बन्ध रखता है। माधुरी एक सम्पन्न व्यक्ति की पत्नी थी। उसने मिस्टर और मिसेज मेहता को अपने घर चाय पर बुलाया था। माधुरी प्यालियों को मेज पर ठीक से रखने की चेष्टा कर रही थी। तभी एक प्याली नीचे गिरकर टूट गयी। माधुरी के मुँह से निकला लो एक और प्याली टूट गयी। माधुरी की छोटी बहन मीरा वहाँ बैठी पत्रिका के पन्ने उलट रही थी। उसने प्याली टूटने को महत्व न देते हुए प्याली टूटने को सामान्य बात बताया।
प्यालियाँ टूटना अपशकुन -माधुरी ने प्यालियाँ टूटने को अपशकुन बताया। उसने मीरा को कोई-न-कोई अनिष्ट होने की आशंका व्यक्त की। मीरा के अनुसार प्याली टूटना ही अनिष्ट था, शेष माधुरी के मन का बहम था। माधुरी ने भी स्वीकार किया कि प्याली टूटने से साठ रुपये का सैट बरबाद हो गया, पर उसे अनिष्ट की आशंका बनी रही।
माधुरी का मन उखड़ा-उखड़ा-उस दिन माधुरी का मन उखड़ा - उखड़ा था। उसने मिस्टर और मिसेज मेहता को चाय पर बुलाया था। वह मिसेज मेहता के स्वभाव के कारण चिन्तित थी। वे घर के मालिक के सामने तो पार्टी में हर चीज की प्रशंसा करती रहती थीं, पर बाद में पार्टी देने वाले के सामान, स्वभाव और सम्पत्ति में दूसरों के सामने दोष निकालकर निन्दा करती रहती थीं। माधुरी चाहती थी कि मिसेज मेहता को आज की पार्टी में ऐसा दोष प्रतीत न हो, जिसके आधार पर वे बाहर मेरी निन्दा कर सकें । माधुरी के हाथ से बार-बार प्यालियों को टूटना संकेत कर रहा था कि आज कोई न कोई अनिष्ट अवश्य होगा ।
मीरा का आश्वासन-माधुरी की छोटी बहन मीरा ने माधुरी को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम्हारा रहन-सहन किसी से कम नहीं है। तुम्हारे जैसा लॉन किसी का नहीं होगा। विलायती पापी के फूल की भी मीरा ने बहुत प्रशंसा की। मीरा के अनुसार, माधुरी जैसा घर किसी का नहीं है। माधुरी के घर जैसे पर्दे भी किसी के घर नहीं होंगे। मीरा की दृष्टि में यह माधुरी की हीनभावना थी जो वह मिसेज मेहता को लेकर चिन्तित थी।
दीवानचन्द के आने की सूचना-इसी बीच माधुरी की पुत्री पम्मी ने आकर बताया कि वे आ गये हैं। माधुरी ने समझा कि मिस्टर और मिसेज मेहता आ गये हैं। पम्मी ने स्पष्ट किया कि स्यालकोट वाले मौसाजी दीवानचन्द आये हैं। दीवानचन्द माधुरी और मीरा की बड़ी बहन के पति थे। स्यालकोट में उनका अच्छा मकान और व्यापार था, पर भारत-विभाजन के बाद उनकी हालत खराब हो गयी थी। अब उनके पास कुछ भी नहीं बचा था। पम्मी ने बताया कि दीवानचन्द मैला-चीकट तहमंद, उसके ऊपर वैसी ही कमीज पहने हैं और उनके गले में लाल अंगोछा लिपटा हैं। उन्होंने अपने माथे पर गेरू का तिलक लगाया हुआ है। वे चिंतपुरनी देवी के दर्शन करके आये हैं।
दीवानचन्द माधुरी को अनिष्ट लगे-माधुरी को चिन्ता हुई कि अगर मिसेज मेहता दीवानचन्द्र को देख लेंगी तो उन्हीं को लेकर हमारी निन्दा करेंगी। माधुरी को विश्वास हो गया कि मिसेज मेहता दीवानचन्द जी को अवश्य देख लेंगी। आज प्यालियाँ टूटने का यही अनिष्ट होगा। मीरा ने परामर्श दिया कि मिसेज मेहता के आने से पहले ही उन्हें विदा कर दो। माधुरी के अनुसार दीवानचन्द को विदा करने में एक घण्टा लगेगा।
दीवानचन्द की समाप्त न होने वाली बातें-पम्मी ने बताया था कि मौसाजी सोफे पर पाल्थी मारे बैठे हैं और उनके कपड़ों से बदबू आ रही है। दीवानचन्द माधुरी को इस कारण मुसीबत लगते थे कि उनकी बातें शुरू हो जाने पर समाप्त ही नहीं होती थीं। दीवानचन्द माधुरी की बड़ी बहन राधा के पति थे, इसलिए उन्हें सहन करना पड़ता था । दीवानचन्द को देखकर माधुरी को एक प्रकार की घिनौनी सिहरन होती थी। दीवानचन्द जी अपने स्यालकोट के दिनों को स्मरण किया करते थे। वैसे दीवानचन्द की पत्नी का देहान्त हो चुका था और उनकी पुत्री शुक्ला को कोई ले गया था। वह पाकिस्तान में ही रह गयी थी। दीवानचन्द कभी दो-चार गुलाबजामुन या खुरचनों का कुल्हड़ ले आते थे। जाते हुए एक मैला पुराना एक रुपये का नोट पम्मी के हाथ में दे जाते थे। अपने जूतों से माधुरी का वह कालीन खराब कर जाते थे जो कमरों के फर्श पर बिछा रहता था । पम्मी ने यह भी बताया कि मौसाजी पापा को चिंतपुरनी देवी की यात्रा का हाल सुना रहे थे और अब इधर ही आ रहे हैं।
दीवानचन्द लॉन में आये-माधुरी और मीरा दोनों ने दीवानचन्द का स्वागत किया और उन्हें आदर से बैठाया। माधुरी ने जब दीवानचन्द से चाय पीने के विषय में पूछा तो माधुरी के पति भोलानाथ ने कहा कि आये हैं तो चाय पियेंगे ही। दीवानचन्द ने बताया कि अब उनकी उम्र के आठ-दस साल रह गये हैं तो भोलानाथ ने कहा कि अभी आप बीस-पच्चीस वर्ष जियेंगे। आप इस समय स्यालकोट से अधिक स्वस्थ दिखाई दे रहे हैं।
स्यालकोट की बातें- जब भोलानाथ ने दीवानचन्द के स्वास्थ्य के विषय में स्यालकोट का नाम लिया तो माधुरी ने उन्हें रोका और कहा कि आप स्यालकोट की बातें क्यों करते हैं? भोलानाथ हँसते हुए बोले कि अगर ये आये हैं तो स्यालकोट की बातें जरूर होंगी। दीवानचन्द ने ठंडी साँसें लेते हुए कहा कि स्यालकोट की बातें स्यालकोट में रह गयीं। वहाँ दीवानचन्द की भरी पूरी हवेली थी और आज ये दिन हैं। मीरा ने दीवानचन्द को परामर्श दिया कि वे सभी काम-धन्धे छोड़कर आराम करें। दीवानचन्द ने काम-धन्धे की विवशता बतायी कि काम-धन्धा नहीं करेंगे तो खायेंगे क्या? दीवानचन्द सोने का था, पर आज मिट्टी का है।
भोलानाथ को देखकर दीवानचन्द प्रसन्न -दीवानचन्द ने बताया कि मैं यहीं देखकर प्रसन्न हूँ कि भोलानाथ ने सब कुछ नये सिरे से बना लिया है। माधुरी ने इस घर को दीवानचन्द के आशीर्वाद का फल बताया। दीवानचन्द ने बताया कि जो रुपया-पैसा मैं ला सका, वह मैंने लाहौर में हवाई जहाज वालों को देकर कहा कि इनसे हम सबको दिल्ली पहुँचा दो। मैं अपने साथ चार जानें लेकर आया था, यही मेरी दौलत थी।
दीवानचन्द का पश्चाताप-दीवानचन्द ने बताया कि वे पहले सूम थे।सब लोग मुझे सूम अर्थात् पैसा खर्च न करने वाला कहते थे, पर बँटवारे ने मुझे सीख दे दी। जब घर-परिवार उजड़ गया तो मैंने अपने आप से कहा- “दीवानचन्द पहले तूने बुराई बोई थी, इसलिए तुझे बुराई ही मिली। अब कुछ नेकी कर । तेरे लिए जैसी शुक्ला थी, वैसी ही पम्मी है। पम्मी और शुक्ला बिल्कुल एक-सी लगती हैं। इसे देखकर मेरी शुक्ला सामने आ जाती है। माधुरी ने कहा कि हम तो अक्सर शुक्ला की बातें करते रहते हैं। मीरा ने दुःख के साथ कहा कि उसे न जाने कौन उठाकर ले गया।
मिस्टर और मिसेज मेहता की चाय पार्टी की चिन्ता-माधुरी और मीरा दोनों को मिस्टर और मिसेस मेहता की पार्टी की चिन्ता थी। वे दोनों चाहती थीं कि उनके आने से पहले दीवानचन्द चले जायें। इस विषय में अंग्रेजी में बातें हो रही थीं, क्योंकि यह बात दीवानचन्द से छिपाई जा रही थी और दीवानचन्द अंग्रेजी नहीं जानते थे। मीरा ने माधुरी को संकेत भी किया था कि दीवानचन्द जी के जाने में देरी हो रही है तो माधुरी ने अपनी विवशता बताते हुए कहा कि मैं इस विषय में क्या कर सकती हूँ। भोलानाथ ने हिन्दी में कहा कि मैं उधर जाकर देखता हूँ। माधुरी ने कहा कि आ जायें तो उन्हें ड्राइंग रूप में बिठाइए। दीवानचन्द बिल्कुल नहीं समझे कि यह बातें उन्हीं को लेकर हो रही हैं।
दीवानचन्द बहुत बाद में समझे-मिस्टर और मिसेज मेहता को साढ़े पाँच बजे आना था। माधुरी ने अंग्रेजी में मीरा को पाँच बजकर अठारह मिनट होने की याद दिलायी तो माधुरी ने नौकर महिपत से चाय का पानी खूब गर्म होने की बात पूछी। अन्य सामान के विषय में पूछने के बाद महिपत से नई वाली टी क्रोजी निकालने को कहा। जब मीरा ने महिपत से एक प्याला चाय जल्दी से बनाकर लाने को कहा, जिसमें चीनी अधिक हो । माधुरी ने कुर्सी से उठते हुए मीरा से कहा कि तुम जीजाजी को चाय पिलाओ, मैं इतनी देर अन्दर जाकर देख लूँ। यह सुनकर दीवानचन्द को लगा कि माधुरी परेशान है। उन्हें पूछना ही पड़ा कि माधुरी आज कुछ उतावली सी क्यों दिखाई दे रही है। माधुरी को स्पष्ट शब्दों में बताना पड़ा कि मेरे पति के एक मित्र को चाय पर बुलाया गया है। इसीलिए हम लोग जरा जल्दी में हैं। इसे सुनकर दीवानचन्द ने कहा कि तुम लोग उनकी चाय का इन्तजाम करो और मेरे लिए चाय की प्याली रहने दो। मैं चाय बाद में पी लूँगा। मेरा तो अपना घर है। माधुरी ने आग्रह किया कि आप एक प्याली चाय पी लीजिए। पता नहीं उनकी पार्टी में कितनी देर लगे, आप क्या तब तक बैठे रहेंगे।
दीवानचन्द की लड़की सम्बन्धी भूमिका-माधुरी के पूछने पर भोलानाथ ने बताया कि मिस्टर और मिसेज मेहता अभी नहीं आये हैं। भोलानाथ ने दीवाचन्द की चाय के विषय में पूछा तो माधुरी ने कहा कि आ रही है। तभी दीवानचन्द ने अपने आने का प्रयोजन स्पष्ट करना चाहा। उन्होंने कहा कि मैं आज एक खास काम के लिए आया हूँ। जब तुम लोग इस पार्टी से निबट जाओ तभी कहूँगा। भोलानाथ के माथे पर बल पड़ गये। उन्होंने कहा कि आज जो कहना चाहते हैं, अभी कह दीजिए। पता नहीं बाद में वक्त मिला या नहीं मिला। दीवानचन्द ने बताया कि देवी ने इस बार मुझ पर बड़ी कृपा, की है। देवी ने मेरी खोई हुई बेटी मुझसे मिला दी है। भोलानाथ ने आश्चर्य व्यक्त किया कि आपकी शुक्ला तो पाकिस्तान में रह गयी थी। माधुरी ने पूछा कि वह चिंतपुरनी में कैसे पहुँच गयी और मीरा ने पूछा कि दस साल बाद आपने उसे कैसे पहचाना?
विवश होकर दीवानचन्द ने स्पष्ट किया कि मेरा मतलब उससे नहीं, एक अन्य लड़की से है। मेरी शुक्ला पम्मी जैसी लगती थी, वह भी पम्मी जैसी ही लगती है। मुझे वह गैर नहीं लगती। सूरत-शक्ल में; चाल-ढाल में मुझे वह बिल्कुल अपनी शुक्ला जान पड़ती है। वहाँ देवी के मन्दिर के बाहर मैंने इस लड़की को देखा। वह यात्रियों से पैसे माँग रही थी। उसके कपड़े फटकर तार-तार हो रहे थे। उसका शरीर कपड़ों में छिप नहीं रहा था । वहाँ पर कुछ लोग इस लड़की की तरफ भूखी आँखों से देख रहे थे। विवश होकर भोलानाथ को कहना पड़ा कि आप उस लड़की की बात छोड़िये और मुझे यह बताइए कि आप मुझसे क्या कहना चाहते हैं।
दीवानचन्द का स्पष्ट कथन और भोलानाथ आदि का विरोध - दीवानचन्द ने बताया कि मैं उस लड़की को वहाँ से अपने साथ ले आया हूँ। इसे सुनकर माधुरी ने विरोध किया कि आपको हम लोगों की इज्जत का कुछ ख्याल करना चाहिए। आप एक भिखारिन को हमारे घर ले आये। भोलानाथ ने मीरा को समझाया कि इन्हें किसी के साथ की जरूरत थी। अब इनका मन लगा रहेगा। मीरा ने जब कहा कि पाँच बजकर बाईस मिनट हो गये तो माधुरी अपनी कुर्सी से उठ बैठी। उसने महिपत से दीवानचन्द की चाय न लाने की शिकायत की तो महिपत बोला कि अभी ले आता हूँ.।
दीवानचन्द का स्पष्टीकरण - भोलानाथ और माधुरी ने उस लड़की को भिखारिन कहा था, जिसे दीवानचन्द ले आये थे। दीवानचन्दं को इसका स्पष्टीकरण देना आवश्यक हो गया। दीवानचन्द ने कहा कि मैं उसे अपने साथ घर ले आया हूँ। वह हमारे जैसे अच्छे खानदान की लड़की है। उसके माँ-बाप पाकिस्तान में मारे गये थे। मैंने उसे देखते ही निश्चय कर लिया कि इसे अपने पास रखकर अपने मन की कामना पूरी करूँगा। इसे पढ़ाऊँगा, इसका ब्याह करूँगा । इस तरह मुझे अपनी जिन्दगी बेकार नहीं लगेगी। मैं इस लड़की को देखकर सोचता हूँ कि मेरी शुक्ला के साथ जाने क्या-क्या बीती होगी? अगर आज शुक्ला मिल जाती तो क्या मैं उसे ठुकरा देता ? अगर इस लड़की को इसका बाप मिल जाता तो क्या वह इसे ठुकरा देता ?
मीरा ने विवश होकर पूछा- आप इस लड़की को पढ़ायेंगे और इसका ब्याह करेंगे। इसके लिए आप धन कहाँ से लायेंगे ?
दीवानचन्द द्वारा धन माँगना - दीवानचन्द ने कहा कि मैं इसीलिए अर्थात् लड़की की पढ़ाई और शादी के लिए धन लेने आपके पास आया हूँ। मुझे विश्वास है कि आप मेरी कुछ मदद जरूर करेंगे। तभी चाय आ गयी। मीरा ने चाय की प्याली महिपत से लेकर दीवानचन्द की ओर बढ़ा दी और पूछा कि क्या कुछ खाने को लेंगे? दीवानचन्द ने खाने को मना करते हुए कहा कि मेरे दाँत ऐसे हो गये हैं कि मुझसे कुछ खाया ही नहीं जाता। गरम चाय पीने से दीवानचन्द के होठ जल गये तो वे चाय फूंक कर पीने लगे। माधुरी ने कहा कि वे लोग चार-छ: मिनट में आने वाले हैं। मीरा ने स्पष्ट किया कि आप जल्दी चाय पी लीजिए। जो मेहमान आ रहे हैं, वे दूसरी तरह के हैं। आपको भी उन लोगों में बैठकर बुरा लगेगा। इसे सुनकर दीवानचन्द सासर में डालकर चाय पीने लगे। दीवानचन्द चाय पी चुके तो भोलानाथ ने उनसे विदा माँगी। मेहमान अब आने वाले ही हैं ।
दीवानचन्द की जरा-सी बात-जब भोलानाथ विदा माँगने लगे तो दीवानचन्द ने कहा कि मेरी जरा-सी बात है। मैं ज्यादा नहीं कहता। तुम आज मुझे हजार पाँच सौ रुपये कर्ज दे दो। मैं कोई छोटी-मोटी दुकान खोल लूँगा। इसे सुनकर माधुरी ने कहा कि आप इस उम्र में दुकान कैसे करेंगे ? मीरा ने कहा कि आप ठीक से चल नहीं सकते, फिर दुकान कैसे करेंगे ? भोलानाथ ने रुपया देने से स्पष्ट मना करते हुए कहा- आपके लिए हजार-आठ सौ रुपया में कहाँ से दे सकता हूँ। आजकल हर आदमी अपना गुजारा मुश्किल से करता है। भोलानाथ इतना कहकर भीतर जाने लगे तो दीवानचन्द ने उनकी और ऐसे देखा जैसे कोई ठुकराया हुआ देखता है। दीवानचन्द ने माधुरी से कहा कि मैं तुम्हारा पैसा रखूँगा नहीं, यह बात तुम जानती हो । हजार-आठ सौ नहीं हो तो चार-पाँच सौ रुपये ही दिला दो। मैं उन्हीं पैसों से कोई काम कर लूँगा। माधुरी ने अपने पति भोलानाथ का बचाव करते हुए कहा कि अगर मेरे पति के पास रुपये होते तो ये मना नहीं करते। इनकार करते हुए इन्हें अच्छा थोड़े ही लगता है। दीवानचन्द ने माधुरी से अधिक आग्रह किया तो उसे कहना पड़ा कि वे लोग आने वाले हैं, ये बातें आप फिर करें।
दीवानचन्द जाने लगे-दीवानचन्द जाने लगे तो उन्होंने अपनी जेब से एक रुपये का मैला नोट माधुरी के हाथ में रखा और साथ ही एक मिठाई के दोने को चिंतपुरनी देवी का प्रसाद बताया। माधुरी ने मना किया तो दीवानचन्द ने सुना ही नहीं। दीवानचन्द को माधुरी ने एक अलग द्वार से जाने की सलाह दी, तभी माधुरी के पैर की ठोकर लगने से वह प्याली गिरकर टूट गयी, जिसमें दीवानचन्द ने चाय पी थी। सहसा भागकर आयी पम्मी ने बताया कि मिस्टर और मिसेज मेहता आ गये हैं। दीवानचन्द की दी हुई मिठाई और रुपया महिपत को दे दिया। पम्मी ने यह भी बताया कि मिसेज मेहता ने मौसा जी को यहाँ से जाते हुए देख लिया था। वे पूछ रही थीं कि यह कौन आदमी है जो रोता हुआ तुम्हारी कोठी से बाहर जा रहा था ।
माधुरी ने माधुरी का अंधविश्वास सत्य-पम्मी की बात सुनकर माधुरी ने मीरा से कहा- "मैं कहती न थी कि आज कुछ न कुछ जरूर होगा। मिसेज मेहता अब जगह-जगह इस बात की चर्चा करेंगी और इसके कई-कई तरह के मतलब निकालेंगी।" अन्त में मीरा अपने आप से दीवानचन्द के विषय में कहती है कि इनकी छाया कितनी मनहूस है।


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