लोक कला की शिखर विभूति तीजनबाई (24 अप्रैल, 1956 - 5 जुलाई, 2026) पंचतत्व में विलीन हो गईं !
श्रद्धांजलि : तीजनबाई के (न) होने का अर्थ !
लोक कला की शिखर विभूति तीजनबाई (24 अप्रैल, 1956 - 5 जुलाई, 2026) पंचतत्व में विलीन हो गईं! लाल मिट्टी वाले छत्तीसगढ़ के आसमान में गूँजती एक आदिम और ओजस्वी हुंकार अचानक शांत हो गई है!! उनके हाथों से तंबूरे का छूटना केवल एक कलाकार का जाना नहीं; एक पूरे युग, एक सशक्त परंपरा और मिट्टी की उस सोंधी गंध का तिरोहित हो जाना है, जिसने दशकों तक भारत ही नहीं, समूची दुनिया को सम्मोहित किए रखा था!!!
तीजनबाई का जीवन कभी भी मखमली रास्तों का सफर नहीं रहा। एक साधारण पारधी परिवार में जन्मीं तीजन का बचपन जिन दुश्वारियों और संघर्षों की भट्टी में तपा, उसने ही उनके भीतर के फौलाद को गढ़ा था। जिस दौर में महिलाओं के लिए 'कापालिक शैली’ (खड़े होकर और सघन अभिनय के साथ गायन) में महाभारत की कथा बाँचना एक बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता था, उस दौर में उन्होंने तंबूरा उठाया। समाज के ताने सहे। बाल-विवाह का दंश झेला। बिरादरी से बहिष्कृत तक होना पड़ा। पर तीजनबाई ने कभी अपनी आवाज़ को दबने नहीं दिया। उनका संघर्ष महज़ एक लोक कलाकार का संघर्ष नहीं था। वह एक स्त्री का उन पितृसत्तात्मक मान्यताओं के खिलाफ खुला विद्रोह था, जिसकी ढाल उनका तंबूरा बना; और सबसे मारक हथियार उनकी बेखौफ आवाज़ बनी।
तीजनबाई का स्वभाव उनके गायन की ही भाँति अकृत्रिम, खरा और ऊर्जा से लबालब था। माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी। होंठों पर पान की लाली। हाथों में मोरपंख लगा तंबूरा। जब वे मंच पर उतरतीं, तो केवल एक गायिका नहीं रह जाती थीं। कथा के प्रवाह में पल भर में उनका तंबूरा गदा बनकर दु:शासन की जंघा तोड़ते भीम का अहसास कराता, तो अगले ही पल वे क्रोध में जलती द्रौपदी बन जातीं।
तीजनबाई का फक्कड़पन और सादगी ऐसी थी कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति, पद्मश्री-पद्मभूषण से लेकर पद्मविभूषण तक के सर्वोच्च अलंकरण भी उनके भीतर की उस 'ठेठ छत्तीसगढ़िया' महिला को बदल नहीं पाए। वे जितनी सहजता से पेरिस और लंदन के सुसज्जित मंचों पर गाती थीं, उतनी ही आत्मीयता से भिलाई के किसी छोटे से आयोजन में धूल भरे फर्श पर बैठकर भी रम जाती थीं।
कला के प्रति तीजन का समर्पण किसी तपस्या से कम नहीं था। बिना किसी औपचारिक या किताबी शिक्षा के, केवल अपने नाना के मुख से सुनी महाभारत की कथाओं को उन्होंने अपनी आत्मा में ऐसे बसा लिया था कि वे वृत्तांत और संवाद उनकी साँसों में धड़कते थे। उन्होंने पांडवानी को छत्तीसगढ़ के गाँवों की चौपालों से निकालकर वैश्विक मंचों का सरताज बना दिया। यह उनका अपनी मिट्टी और अपनी कला के प्रति निश्छल समर्पण ही था, जिसने एक क्षेत्रीय लोक विधा को सार्वभौमिक पहचान दिला दी।
आज तीजनबाई के “न होने” का अर्थ है लोक मंच से उस आदिम ऊर्जा, उस अप्रतिम साहस और उस बेलौसपन का छिन जाना। लेकिन, उनके “होने” का अर्थ बहुत बड़ा है। उनका जीवन भावी पीढ़ियों को यह ज्वलंत संदेश देता रहेगा कि यदि आप अपनी जड़ों, अपनी बोली, अपने देहातीपन और अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं, तो पूरी दुनिया आपके सामने नतमस्तक होगी! आज भूमंडलीकरण के दौर में जब युवा अपनी स्थानीय पहचान से कट रहे हैं, तीजनबाई उन्हें सिखाती हैं कि असली वैश्विक होना अपनी जड़ों को गहराई से सींचना है। कला केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति और समाज से संवाद का माध्यम है।
तीजनबाई आज भले ही देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब भी कहीं कोई लोक कलाकार अपने तंबूरे की तार छेड़ेगा और 'अरे मोर दाऊ रे...' की हुंकार भरेगा, तीजनबाई वहीं, उसी स्वर में जीवित हो उठेंगी! चिर-विदा तीजन दीदी!! छत्तीसगढ़ की मिट्टी और यह देश आपकी गगनभेदी आवाज़ और निश्छल मुस्कान का सदैव ऋणी रहेगा!!!
- ऋषभदेव शर्मा


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