सच्ची बहादुरी केवल तलवार चलाने में नहीं होती, बल्कि दूसरों को सुरक्षित, निश्चिंत और खुश रखने में होती है।
सोने वाली राजकुमारी
बहुत समय पहले की बात है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों के बीच एक सुंदर राज्य था। वहाँ के राजा न्यायप्रिय, दयालु और अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करने वाले थे। लेकिन उनकी एक ही इच्छा थी—काश, उनके घर भी एक नन्ही-सी संतान होती।
समय बीतता गया। राजा बूढ़े हो चले, तभी एक दिन पूरे राज्य में खुशियों की लहर दौड़ गई। महल में एक नन्ही राजकुमारी ने जन्म लिया।
जैसे ही लोगों ने उसे देखा, सबकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं। उसका चेहरा संगमरमर से भी अधिक उजला था, मानो चाँद धरती पर उतर आया हो। उसकी आँखें गहरे नीले आकाश जैसी चमकती थीं और उसके लंबे सुनहरे बाल सुबह की पहली किरणों की तरह दमकते थे।
लेकिन उस नन्ही राजकुमारी की एक बहुत ही अनोखी आदत थी।
उसे नींद केवल अपने पिताजी, महाराज, की गोद में ही आती थी।
महल के सबसे मुलायम मखमली बिस्तर भी उसे नहीं सुला पाते थे। सुगंधित फूलों की खुशबू, मधुर संगीत, झरनों की कल-कल या लोरी गाती दासियाँ—कुछ भी उसे सुला नहीं पाता था।
पर जैसे ही महाराज उसे अपनी गोद में उठा लेते, वह उनकी दाढ़ी से अपना गाल सटा लेती, उनके हाथ को तकिया बना लेती और पल भर में मीठी नींद सो जाती।
महाराज भी मुस्कुराते हुए उसे गोद में लेकर दरबार लगाया करते।
दरबार में मंत्री अपनी बातें रखते, सैनिक समाचार सुनाते, न्याय की घंटी बजती, याचक अपनी समस्याएँ बताते, कभी-कभी बाहर युद्ध के नगाड़े भी गूँजते रहते। लेकिन राजकुमारी तो अपने पिता की गोद में निश्चिंत होकर सोती रहती।
पूरा राज्य उसे प्यार से "सोने की राजकुमारी" कहने लगा। कुछ लोग कहते थे कि यह नाम उसके हर समय सोते रहने के कारण पड़ा, तो कुछ कहते थे कि उसके सुनहरे बालों की वजह से।
लेकिन किसी को नहीं पता था कि इस शांत और मासूम बच्ची के भीतर एक अद्भुत रहस्य छिपा था।
समय बीतते-बीतते राजकुमारी दस वर्ष की हो गई।
एक रात पूरे राज्य पर गहरी शांति छाई हुई थी।
महल के पहरेदार उनींदे थे। सैनिक दिनभर की ड्यूटी के बाद आराम कर रहे थे। महाराज भी थककर गहरी नींद में सो गए।
राजकुमारी जानती थी कि उसके पिताजी को वीणा की मधुर धुन बहुत पसंद है। इसलिए वह धीरे-धीरे वीणा बजा रही थी, ताकि उनकी नींद और भी मीठी हो जाए।
उसी समय अँधेरे का फायदा उठाकर पड़ोसी राज्य के कुछ सैनिक चुपके-चुपके महल की दीवारों पर चढ़ने लगे। उनका इरादा राज्य पर कब्ज़ा करने का था।
राजकुमारी ने खिड़की से उनकी परछाइयाँ देख लीं।
वह तनिक भी नहीं घबराई।
उसने तुरंत महल की चेतावनी वाली घंटी नहीं बजाई, क्योंकि वह जानती थी कि पहले सैनिकों को महल के भीतर आने से रोकना ज़रूरी है।
उसने सबसे पहले दीवारों पर चढ़ रही रस्सियों को अपनी छोटी-सी तलवार से काट दिया।
धड़ाम... धड़ाम...!
कई सैनिक नीचे गिरे और भाग खड़े हुए।
कुछ सैनिक आगे बढ़े तो राजकुमारी ने अपनी धनुष से उनके पैरों के पास तीर चलाए। तीर इतने सटीक थे कि सैनिक डरकर पीछे हट गए।
जो सैनिक महल के द्वार तक पहुँच गए थे, उन्हें उसने अपनी फुर्ती और साहस से रोक लिया।
इतने में शोर सुनकर महल के सैनिक भी जाग गए और उन्होंने शेष आक्रमणकारियों को पकड़ लिया।
सुबह जब सूरज निकला, तब सबको पता चला कि पूरी रात महल और राज्य की रक्षा एक दस वर्ष की राजकुमारी ने की थी।
महाराज ने गर्व से अपनी बेटी को गले लगा लिया।
उन्होंने कहा,
"सच्चा वीर वही है जो अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की रक्षा के लिए करे।"
उस दिन के बाद लोगों ने राजकुमारी को केवल सोने वाली बच्ची नहीं समझा।
उन्हें विश्वास हो गया कि वह ईश्वर का विशेष उपहार है।
जब गर्मी में किसान खेतों में मेहनत करके थक जाते, तो राजकुमारी रात में गाँव-गाँव घूमकर खेतों की रखवाली करती। वह पहरेदारों की मदद करती, जंगली जानवरों को खेतों से दूर भगाती और किसानों को निश्चिंत होकर आराम करने देती।
बरसात के मौसम में वह वैद्यों के साथ मिलकर बीमार लोगों तक औषधियाँ पहुँचाती। बच्चों को साफ-सफाई और पेड़ लगाने का महत्व समझाती। धीरे-धीरे पूरा राज्य पहले से अधिक स्वस्थ और खुशहाल हो गया।
महल के सैनिक भी जानते थे कि जब तक राजकुमारी जाग रही है, राज्य सुरक्षित है। इसलिए वे निश्चिंत होकर अपनी ड्यूटी के बाद आराम कर पाते थे।
राज्य में एक बात बहुत प्रसिद्ध थी।
लोग कहते थे कि जब पूरी दुनिया सोती है, तब सोने की राजकुमारी जागती है।
दिन में वह अपने पिता की गोद में मीठी नींद सोती, लेकिन जैसे ही चाँद आकाश में मुस्कुराता और चाँदी जैसी चाँदनी धरती पर बिखरती, उसकी आँखें धीरे-धीरे खुल जातीं।
वह चुपचाप महल की सबसे ऊँची खिड़की से बाहर देखती।
मानो पूरा जंगल उसका इंतज़ार कर रहा हो।
जैसे ही वह महल के बगीचे में पहुँचती, पेड़ों की डालियाँ हवा के साथ झुककर उसका स्वागत करतीं।
रात की रानी के फूल खिल उठते।
जुगनुओं की छोटी-छोटी टिमटिमाती रोशनियाँ उसके चारों ओर नाचने लगतीं।
सबसे पहले एक नन्ही गिलहरी दौड़ती हुई आती।
"राजकुमारी! आज तुम देर से आई हो!" वह अपनी छोटी-सी पूँछ हिलाते हुए कहती।
राजकुमारी हँस पड़ती।
"आज पिताजी बहुत थके हुए थे। मैं उनके लिए देर तक वीणा बजाती रही।"
तभी ऊपर से एक हरा तोता फड़फड़ाता हुआ नीचे उतरता।
"चलो, आज तुम्हें एक नया रास्ता दिखाते हैं।"
इतने में हिरनों का पूरा झुंड भी वहाँ आ पहुँचा।
सबसे आगे था चितकबरा हिरन—चंचल।
उसके पीछे थी सफ़ेद खरगोश—फुदकी।
पेड़ की ऊँची डाल पर बैठा बुद्धिमान उल्लू—आचार्य ऊँऊ, जो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से सबको देख रहा था।
और थोड़ी ही देर में एक विशाल लेकिन अत्यंत शांत हाथी भी आ गया।
उसका नाम था- महाबल।
महाबल राजकुमारी को अपनी सूँड़ पर बैठाकर जंगल की सैर कराता था।
जंगल में कोई किसी से नहीं डरता था।
क्योंकि सब जानते थे—
राजकुमारी किसी की मालिक नहीं, बल्कि सबकी मित्र है।
उस रात सभी मित्रों ने एक नई यात्रा का निश्चय किया।
"आज हम इंद्रधनुषी झरने तक चलेंगे।" तोते ने उत्साह से कहा।
राजकुमारी की आँखें चमक उठीं।
"क्या वही झरना, जिसकी बूँदें चाँदनी में सात रंगों की हो जाती हैं?"
"हाँ!" सबने एक साथ कहा।
महाबल आगे-आगे चला।
हिरन रास्ता दिखाते रहे।
जुगनू आसमान के तारों की तरह चमकते हुए उनके चारों ओर उड़ते रहे।
कुछ दूर जाने पर एक गहरी नदी मिली।
उस पर कोई पुल नहीं था।
राजकुमारी ने देखा कि नदी के बीच एक छोटा-सा हिरन का बच्चा काँप रहा था।
तेज़ बहाव के कारण वह किनारे नहीं आ पा रहा था।
महाबल तुरंत पानी में उतरा।
तभी राजकुमारी ने पास की लताओं को देखा।
उसने जल्दी से लताओं को जोड़कर एक लंबी रस्सी बनाई।
बंदरों ने उसे ऊँचे पेड़ से बाँध दिया।
ऊदबिलाव पानी में उतर गए।
महाबल ने अपनी सूँड़ आगे बढ़ाई।
कुछ ही क्षणों में हिरन का बच्चा सुरक्षित किनारे आ गया।
उसकी माँ खुशी से उसे चूमने लगी।
सारे जंगल में तालियों जैसी आवाज़ गूँज उठी।
पेड़ों की पत्तियाँ हवा में झूमने लगीं।
पक्षियों ने मधुर गीत गाने शुरू कर दिए।
राजकुमारी मुस्कुराकर बोली—
"मिलकर काम करने से सबसे कठिन रास्ता भी आसान हो जाता है।"
थोड़ी दूर चलने पर वे इंद्रधनुषी झरने के पास पहुँचे।
जैसे ही चाँद की किरणें पानी पर पड़ीं, झरना सात रंगों में चमकने लगा।
लाल...
नारंगी...
पीला...
हरा...
नीला...
जामुनी...
बैंगनी...
ऐसा लग रहा था मानो आसमान का इंद्रधनुष धरती पर उतर आया हो।
राजकुमारी मंत्रमुग्ध होकर उसे देखती रही।
उसी समय झरने के पीछे से एक अत्यंत प्राचीन कछुआ धीरे-धीरे बाहर आया।
उसका कवच चाँदी की तरह चमक रहा था।
उसने मुस्कुराकर कहा—
"स्वागत है, राजकुमारी।"
सभी जानवर आदर से झुक गए।
फुदकी ने धीरे से फुसफुसाया—
"ये हैं महागुरु कच्छप। जंगल के सबसे पुराने और सबसे बुद्धिमान मित्र।"
महागुरु कच्छप ने राजकुमारी की ओर देखकर कहा—
"तुम केवल इस राज्य की राजकुमारी नहीं हो। प्रकृति ने तुम्हें एक विशेष उत्तरदायित्व दिया है। पेड़, नदियाँ, पक्षी और सभी जीव तुम्हें अपना रक्षक मानते हैं।"
राजकुमारी ने विनम्रता से पूछा—
"मैं उनकी रक्षा कैसे करूँ?"
कच्छप मुस्कुराए।
"शक्ति से नहीं... प्रेम से।"
फिर उन्होंने झरने की ओर इशारा किया।
"जब भी तुम्हें किसी कठिनाई का सामना करना पड़े, प्रकृति तुम्हारी सहायता करेगी। लेकिन याद रखना—जो प्रकृति की रक्षा करता है, वही उसका सच्चा मित्र बनता है।"
राजकुमारी ने दोनों हाथ जोड़कर प्रण किया—
"मैं कभी किसी पेड़ को बिना कारण नहीं कटने दूँगी, किसी नदी को गंदा नहीं होने दूँगी और किसी भी जीव को बिना वजह कष्ट नहीं पहुँचने दूँगी।"
जैसे ही उसने यह वचन लिया, झरने की रंग-बिरंगी बूँदें हवा में चमकने लगीं।
ऐसा लगा मानो पूरा जंगल उसकी प्रतिज्ञा से प्रसन्न हो उठा हो।
सालों बाद जब वह बड़ी हुई, तब वह केवल एक वीर योद्धा ही नहीं, बल्कि दयालु, बुद्धिमान और प्रजा का दुख समझने वाली रानी भी बनी।
और लोग अपने बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए कहते—
“सच्ची बहादुरी केवल तलवार चलाने में नहीं होती, बल्कि दूसरों को सुरक्षित, निश्चिंत और खुश रखने में होती है।”
साहस, प्रेम और जिम्मेदारी उम्र नहीं देखते। जो दूसरों की रक्षा करता है, वही सबसे बड़ा नायक होता है।
- डॉ अतुल गोयल
सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय,झाँसी (उप्र)

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