अनामदास का पोथा उपन्यास की नायिका जाबाला का चरित्र चित्रण

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अनामदास का पोथा उपन्यास की नायिका जाबाला का चरित्र चित्रण उपन्यास के प्रथम अध्याय में ही नायक रैक्व का जाबाला से मिलन होता है

अनामदास का पोथा उपन्यास की नायिका जाबाला का चरित्र चित्रण


चार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा विरचित आध्यात्मिक उपन्यास 'अनामदास का पोथा' के नायक तापस कुमार रैक्व हैं । नायक की पत्नी ही रचना की नायिका अथवा प्रमुख स्त्री पात्र कही जाती है । उपन्यास के प्रथम अध्याय में ही नायक रैक्व का जाबाला से मिलन होता है। इसके बाद दोनों एक-दूसरे को देखने के लिए व्याकुल रहते हैं । अन्त में तापस कुमार रैक्व और जाबाला का विवाह हो जाता है। विवाह तो पति-पत्नी बनने की सामाजिक स्वीकृति है। रैक्व और जाबाला एक दूसरे के प्रति उपन्यास के आरम्भ से अन्त तक आकर्षण अनुभव करते रहे हैं। रैक्व ने शुभा अर्थात् जाबाला के अतिरिक्त प्रेयसी भाव से किसी युवति का चिन्तन नहीं किया और जाबाला भी तापस कुमार रैक्व के अतिरिक्त किसी युवक के प्रिय के भाव से चिन्तन और आकर्षण का अनुभव नहीं कर सकी । इस दृष्टि से और इस आधार पर जाबाला को इस उपन्यास की नायिका स्वीकार करना सभी प्रकार उचित है। जाबाला के चरित्र की विशेषताओं का संकेत इस प्रकार किया जा सकता है -
 

रजोगुण और सतोगुण की सम्मिलित मूर्ति

जाबाला राजा जानश्रुति की एक मात्र सन्तान थी । उसकी वेशभूषा रजोगुण प्रधान होनी स्वाभाविक है । वह रंग-बिरंगे, आकर्षक और बहुमूल्य वस्त्र धारण करती थी। रैक्व ने जब मूर्च्छिता और वर्षा के कारण भीगे वस्त्रों वाली जाबाला को पहली बार देखा था, उस समय उस राजकुमारी की स्थिति इस प्रकार थी" दूसरे प्राणी की नाक पर हाथ रखकर देखा तो साँस चल रही थी। ऋषि कुमार ने सोचा कि अगर उसकी कुछ सहायता कर दी जाये तो शायद बच जाये । कठिनाई यह भी कि वह दूसरा प्राणी इतने कपड़ों से और मणि-मोतियों से जड़ा हुआ था कि उनकी समझ में नहीं आया ये सब कपड़े क्या हैं ? ये मोती-माणिक जैसी चीजें इस प्राणी ने पहले से ही धारण की थी या बाद में उसके शरीर पर डाली गयी हैं।"

अनामदास का पोथा उपन्यास की नायिका जाबाला का चरित्र चित्रण
राजकुमारी का मोती माणिक धारण करना स्वाभाविक है। यह रजोगुणी प्रवृत्ति है । है सम्भव है, उस समय राज परिवार के सदस्यों को मोती माणिक धारण करने के लिए विवश होना पड़ता होगा। जाबाला अकेली एक गाड़ीवान के साथ अपनी मौसी के घर जा रही थी । आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उस गाड़ी को रथ कहा है-" उन्होंने सावधानी से चारों ओर देख, एक पगडण्डी-सी दिखाई पड़ी। गाड़ियों के चलने से चिह्न बन गये थे । एक गाड़ी तो लगता है-तूफान में फँस गयी थी, क्योंकि उसके पहिये दूर-दूर तक धँसे हुए दिखायी देते थे । उन निशानों पर आगे बढ़ते हुए एक जगह आकर रैक्व एकदम रुक गये। यह क्या ? सामने एक बैलगाड़ी, जिसे उन दिनों रथ कहा करते थे, बुरी तरह कीचड़ में धँसी पड़ी थी।"

आचार्य द्विवेदी ने इसे केवल बैलगाड़ी कहकर ही सन्तोष नहीं किया है, अपितु इसके बैलों के रस्सी तुड़ाकर भाग जाने की बात भी कही है। बैलगाड़ी और रथ एक नहीं होते । रथ को बैलगाड़ी और बैलगाड़ी को रथ कभी नहीं कहा गया। बैलगाड़ी या गाड़ी या शकट में बैल जोड़े जाते थे और रथ को घोड़े खींचते थे । रथ का चालक सारथि कहलाता था । वह साधारण किसान या मजदूर नहीं होता था । उस गाड़ी को जो हाँक रहा था, उनकी पत्नी ऋजुका ने अपने पति को जानश्रुति का मजदूर बताया है। वह राजा का हल जोतता था और दूसरे काम भी करता था । रथ के सारथि रथ हाँकने और घोड़ों की मालिश करने के अतिरिक्त दूसरा काम नहीं करते थे । भारत में रथों के होने के प्रमाण त्रेता युग से प्राप्त होते हैं। राजा दशरथ के मन्त्री सुमन्त राम, लक्ष्मण और सीता को रथ में बैठाकर अयोध्या नगरी से बाहर ले गये थे । द्वापर में महाभारत का जो युद्ध हुआ, उसमें काम आने वाले रथों को चार घोड़े खींचते थे । 

एक ओर राजकुमारी जाबाला मोती माणिक से लदी थी और दूसरी ओर वह गाड़ी या बैलगाड़ी में बैठकर अपनी मौसी के घर जा रही थी, जिसे एक साधारण मजदूर हाँक रहा था। इसे राजकुमारी की सादगी या सात्विकता ही कहा जायेगा।
 

लोक व्यवहार की अज्ञानता पर मुग्ध

राजकुमारी जाबाला इस बात के लिए ऋषि कुमार रैक्व की कृतज्ञ थी कि उन्होंने जाबाला के प्राण बचाये थे । वह इस बात से आश्चर्यचकित भी थी कि रैक्व उसे स्वर्गलोक का प्राणी या देवता समझ रहे थे। रैक्व ने उसके चिकने गालों और कोमल बालों को छूकर देखा । जाबाला ने उन्हें झिड़क दिया । यदि कोई युवक किसी युवति के गालों का स्पर्श करे तो उसे क्रोध करना चाहिए था, पर जाबाला रैक्व को केवल झिड़क कर रह गयी। इससे स्पष्ट है कि जाबाला ऋषिकुमार रैक्व के भोलेपन पर मुग्ध थी। उसे ज्ञात हो गया कि इससे पहले इस युवक तपस्वी ने किसी स्त्री को नहीं देखा है । जाबाला ने अपने स्त्री होने की बात ऋषिकुमार रैक्व को इस प्रकार समझायी-

"देखो ऋषिकुमार ! मैं महाराज जानश्रुति की कन्या हूँ। तुम्हें इतनी तो जानकारी होनी ही चाहिए कि इस तरह से स्त्रियों का स्पर्श करना अनुचित है, पाप है, परन्तु मैं तुम्हारी सरलता पर मुग्ध हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि तुमने जीवन में मेरी जैसी कोई लड़की देखी ही नहीं । तभी तुम्हें आश्चर्य हो रहा है। मैं राजा की कन्या हूँ। कुछ समझ रहे हो ?" 
ऋषिकुमार भौचक्के खड़े थे । असमंजस में पड़े हुए बोले-“कन्या शब्द से मैं परिचित हूँ, लेकिन यह होता क्या है, यह मैं नहीं जानता।" अब राजकुमारी को कुतूहल हुआ- "अच्छा ऋषिकुमार ! तुमने व्याकरण पढ़ा है।" इस ऋषिकुमार ने गर्व से कहा-" अवश्य पढ़ा है ।" 
"तो फिर जानते हो, व्याकरण में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग होता है ।" 
" जानता हूँ ।" 
"तुम पुल्लिंग हो, मैं स्त्रीलिंग हूँ। आगे मुझे सम्बोधित क्या करोगे, बोलो तो ।” 
जब राजकुमारी जाबाला ने ऋषिकुमार रैक्व से कहा कि तुम मुझे मेरे पिता के घर पहुँचा दो तो रैक्व सहर्ष उसे अपनी पीठ पर बैठाकर वहाँ तक ले जाने को प्रस्तुत हुए। जाबाला ने उन्हें बताया कि इससे लोक निन्दा होगी। कोई भी युवक किसी कुमारी को पीठ पर ले जाने की बात नहीं करता, सोचता भी नहीं । जब रैक्व ने आर्त की सेवा को धर्म बताते हुए अपने प्रस्ताव को धर्मसम्मत कहा तो जाबाला उनकी सरलता पर मुग्ध हो गयी- "राजकुमारी मुग्ध दृष्टि से ऋषिकुमार की ओर देखती रही। क्या सरल भाव है ? कैसा सहज कमनीय मुख !" हँसकर बोली-"हाँ कुमार ! तुम जानते ही नहीं, कि कितनी अनुचित बात कह गयी हो।" 

ऋषिकुमार रैक्व की इस सरलता ने राजकुमारी जाबाला का मन मोह लिया था । यह मोह तभी शान्त हुआ, जब जाबाला का विवाह रैक्व से हो गया।
 

लोक लज्जा के कारण कुछ कहने में असमर्थ

राजकुमारी जाबाला किसी को यह ज्ञान नहीं होने देना चाहती थी कि किसी युवक ने उसकी सहायता की है ? यही कारण था कि जब उसने अपने पिता के सेवकों को अपनी ओर आते देखा तो रैक्व से दूर जाकर छिप जाने को कहा। रैक्व शारीरिक रूप से तो जाबाला से दूर चले गये, पर उसके हृदय में समाये रहे । जाबाला को रैक्व ने अपना नाम बताया था, पर वह किसी से रैक्व के मिलने की बात कह नहीं सकती थी। वह रैक्व को देखना चाहती थी, पर किसी से कहने में उसे संकोच होता था। वह यह भी तो नहीं जानती थी कि उसका प्रिय तापस कुमार कहाँ मिलेगा ? इसी सोच और विवशता में जाबाला उदास रहने लगी, उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उसे स्वस्थ करने के अनेक उपाय किये गये, पर सभी व्यर्थ हुए। जाबाला के पिता राजा जानश्रुति और उसके शिक्षक आचार्य औदुम्बरायण उसका रोग नहीं समझ पा रहे थे । जाबाला अपने आपको स्वस्थ बताती थी और कहती थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ है। उसे कुछ हुआ तो अवश्य था, अन्यथा वह सूखती क्यों जा रही है ? अन्त में यह निश्चय कि जाबाला को कोई गन्धर्व लग गया है जो उसका रक्त चूस रहा है । इस गन्धर्व को भगाने अथवा शान्त करने के लिए कोहलियों द्वारा नाटक की व्यवस्था की गयी। इस नाटक को देखकर जाबाला बुरी तरह रोई । नाटक में ऋष्यश्रृंग और सुव्रता अप्सरा का जो प्रसंग था, वह जाबाला को अपनी ही कहानी जान पड़ी । जाबाला के मन की पीड़ा, जाबाला का प्रेम भाव केवल उसकी मौसेरी बहन अरुन्धती समझ पायी । तभी उसने आचार्य औदुम्बरायण के शिष्य आश्वलायन से जाबाला के विवाह का प्रबल विरोध किया था ।
 

उच्च शिक्षिता

जाबाला के पिता राजा जानश्रुति क्षत्रिय नहीं, शूद्र थे। उनकी जाति में युवकों के उच्च-शिक्षित होने की परम्परा और प्रचलन नहीं था । उन्होंने अपने पुरोहित आचार्य औदुम्बरायण को अपनी पुत्री जाबाला का शिक्षक नियुक्त करके उच्च शिक्षा का प्रबन्ध किया था । वे अपनी पुत्री जाबाला का विवाह उसी के समान किसी उच्च शिक्षित युवक से करना चाहते थे, पर इस प्रकार का कोई युवक उनकी जाति का मिल नहीं रहा था । कोई ब्राह्मण युवक इसके लिए सहमत नहीं हो रहा था। गुह्य सूत्रों की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण चारों जातियों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाति की कन्याओं से विवाह कर सकता था पर यह विवाह श्रेष्ठ नहीं माना जाता था । इस विवाह से उत्पन्न सन्तान वर्णसंकर मानी जाती थी।
 

मर्यादा का ध्यान रखने वाली और पालन करने वाली

राजकुमारी जाबाला जिस समय में हुई थी, वह समय मर्यादा में रहने का था । जाबाला आज की शिक्षिता कुमारियों के समान अपने पिता और आचार्य से स्पष्ट रूप से नहीं कह सकती थी कि मैं रैक्व से प्रेम करती हूँ और उसी से विवाह करुँगी । जाबाला की मौसरी बहन अरुन्धती ने अपनी बहन की पीड़ा समझी थी और ऋषिकुमार रैक्व के प्रति उसके आकर्षण को जाना था पर वह भी कुछ नहीं कह सकती थी, वह भी मर्यादा में बँधी थी।
 
इस पर माता ऋतम्भरा अपने पुत्र रैक्व के लिए चिन्तित थीं।वे समझ गयी थीं कि उनका भोला-भाला पुत्र किसी शुभा नाम वाली युवती से मिलने को व्याकुल है । रैक्व ने अपनी माता को यह भी बताया कि शुभा राजा जानश्रुति की पुत्री है। माता ऋतम्भरा ने बताया था कि राजा जानश्रुति की कन्या का नाम तो जाबाला है । वे यह समझकर शान्त हो गयीं कि शुभा के पिता जानश्रुति कोई अन्य राजा होंगे । माता ऋतम्भरा को जब जाबाला के अस्वस्थ रहने का समाचार प्राप्त हुआ तो वे उससे मिलीं। उनसे जाबाला ने स्पष्ट तो नहीं कहा कि मैं रैक्व से प्रेम करती हूँ, पर उसने रैक्व की कुशलता आदि के विषय में जिस भाव और जिस भाषा में माता ऋतम्भरा से प्रश्न किये, उससे वे समझ गयीं कि यह मेरे माने हुए पुत्र रैक्व से प्रेम करती है । राजा की पुत्री से अपने पुत्र के विवाह की बात कहना सर्वथा अनुचित था। वैसे भी आर्य जाति में विवाह का प्रस्ताव कन्या पक्ष वर पक्ष के सम्मुख उपस्थित करता है, वर पक्ष कभी विवाह का प्रस्ताव नहीं करता । यह जानकर माता ऋतम्भरा ने अपने द्वारा पुत्र स्वीकार किये गये रैक्व को लौकिक और व्यावहारिक बनाने का प्रयत्न किया। माता ऋतम्भरा के पति औषस्ति ऋषि की आज्ञा से रैक्व ने सभी शास्त्रों का अध्ययन किया और सत्संग किया । वह सभी प्रकार के लोक व्यवहार को जान गया, उसकी प्रसिद्धि तपस्वी रूप में ही नहीं, एक व्यवहार कुशल विद्वान के रूप में भी सभी ओर फैल गयी।
 

रैक्व और जाबाला का पुनर्मिलन

जाबाला समझ गयी थी कि माता ऋतम्भरा उसकी समस्या और व्यथा समझ गयी है। वह उनसे अकेले में मिलना चाहती थी । वह अपने पिता के साथ ऋषि औषस्ति के आश्रम पर गयी । उसके पिता तो ऋषि का आदेश प्राप्त करने के लिए रुक गये और वह माता ऋतम्भरा की कुटिया में आ गयी । माता ऋतम्भरा उसे अपने कुटिया में अकेली छोड़कर उसके पिता का स्वागत करने चली गयीं। उसी बीच रैक्व उस कुटिया में आ गये, जहाँ सभी की जाबाला और रैक्व की शुभा बैठी थी। यह आधुनिक कलियुगी दो प्रेमियों का मिलन नहीं था जो विवाह से पहले एक-दूसरे से लिपट जाते । जाबाला ने यहाँ भी अपने प्रेम की मर्यादा का पालन किया और रैक्व से कुछ समय के लिए बाहर चले जाने को कहा। जाबाला नहीं चाहती थी कि माता ऋतम्भरा उन दोनों को एकान्त में देखें । अन्त में माता ऋतम्भरा की कृपा से ही रैक्व का विवाह जाबाला के साथ हुआ । 

इस प्रकार स्पष्ट है कि राजकुमारी जाबाला का चरित्र और व्यक्तित्व अत्यन्त श्रेष्ठ है।उसके स्वभाव में उच्च कुल की कुमारी की सभी विशेषताएँ हैं।वह अपने सच्चे प्रेम के कारण ही अपने मनपसन्द वर रैक्व की पत्नी बन सकी थी।

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