सेवासदन की सुमन का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद

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सेवासदन की सुमन का चरित्र चित्रण मुंशी प्रेमचंद सुमन का चरित्र बेहद जीवंत, यथार्थवादी और संवेदनशील है।समाज में नारी की स्थिति, वैवाहिक विसंगतियों

सेवासदन की सुमन का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद


मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यास 'सेवासदन' की मुख्य पात्र सुमन का चरित्र बेहद जीवंत, यथार्थवादी और संवेदनशील है। प्रेमचंद ने उसके माध्यम से तत्कालीन समाज में नारी की स्थिति, वैवाहिक विसंगतियों और सामाजिक पाखंड को उजागर किया है।

सुमन 'सेवासदन' की नायिका है। यह इस उपन्यास की सर्वाधिक शक्तिशाली पात्रा है। उसके चरित्र को लेखक ने सौन्दर्य और सेवा-भाव दोनों से ही समन्वित किया है। वह एक चंचल नायिका तो है ही, परन्तु चलायमान चित्त की निर्बलता को दूर करने में भी सक्षम है। उसमें एक ओर मांसल सौन्दर्य है तो दूसरी ओर अत्यधिक अन्तर्दृष्टि भी । हम उसके चरित्र में निम्न तत्वों को प्राप्त करते हैं -

मांसल सौन्दर्यस्वरूपा

उपन्यास में सुमन का प्राकट्य एक सुन्दर चंचल और अभिमानिनी के रूप में होता है। वहीं सुमन उस कथा के अन्त में केशहीना, आभूषणविहीना, रूप-लावण्य के स्थान पर, पवित्रता की ज्योति के रूप में दिखाई देती है। उसके सौन्दर्य पर प्रकाश डालने वाले कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- 

वेश्या बनी सुमन के प्रति विट्ठलदास का कथन- “स्त्रियों को अगर ईश्वर सुन्दरता दे तो धन से वंचित न रखे। धनहीन सुन्दर स्त्री पर दुर्व्यसन का मन्त्र शीघ्र ही चल जाता है।"

गजाधर का कथन - "मैं उसकी सुन्दरता का मान न कर सका। इसलिए सुमन का भी मुझसे प्रेम नहीं हो सका।” 
सुमन को देखकर पूर्ण मनोरथ वाली भोलीबाई की उक्ति- “सेठ बलभद्रदासजी अब तक मुझसे कन्नी काटते फिरते थे, इस लावण्यमयी सुन्दरी पर भ्रमर की भाँति मँडरायेंगे ।”
 
सुमन की पूर्व-सुन्दरता का वर्णन करते हुए शान्ता कहती है- 
“यही मेरी प्यारी बहन है, जिसके साथ मैं तीन-चार साल पहले खेलती थी। वह लम्बे-लम्बे केश कहाँ हैं? वह कुन्दन-सा दमकता हुआ मुखचन्द्र कहाँ है? वह चंचल, सजीव, मुस्कराती हुई आँखें कहाँ गयीं? वह कोमल चपल गात, वह ईंगुर-सा भरा हुआ शरीर, वह अरुण वर्ण कपोल कहाँ लुप्त हो गये ? यह सुमन है या उसका शव, अथवा उसकी निर्जीव मूर्ति ? उस वर्णहीन मुख पर विरक्ति, संयम तथा आत्म-त्याग की निर्मल शान्तिदायिनी ज्योति झलक रही थी।” 

सुमन का कथन — “हाय ! इसी सुन्दरता ने मेरी मिट्टी खराब की, मेरे सौन्दर्य के अभिमान ने मुझे यह दिन दिखाया।"

इस प्रकार हम देखते हैं कि उसका सौन्दर्य उपन्यास में आकर्षण का एक केन्द्र-बिन्दु है जिससे सभी पात्र एवं घटनाएँ प्रभावित हैं।

भौतिक भोग के प्रति आकर्षित बाद में आत्मचिन्तित

सेवासदन की सुमन का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद
नायिका सुमन में भोग-विलास के प्रति अद्भुत ललक दिखाई देती है। इसको भोगने के लिए वह सम्मानित जीवन को भी तुच्छ समझने लगती है। अपनी निर्धनता से त्रस्त वह भोलीबाई के ऐश्वर्य से प्रभावित होकर गजाधर को सुनाते हुए कहती है- “वह चाहे तो हम जैसों को नौकर रख ले।” उसके सम्बन्ध में उपन्यासकार द्वारा रचित "उसने गृहिणी बनने की नहीं, इन्द्रियों के आनन्द-भोग की शिक्षा पायी थी।” अक्षरशः कुशल गृहणी न होने का परिचायक है। इसलिए तो कृपण गजाधर के अल्प वेतन को वह खोमचे वालों की वस्तुओं को अकेले ही खाकर समय से पहले समाप्त कर देती है। यद्यपि सुमन का जीवन सुख से कटा था और अच्छा खाने और पहनने की आदत थी, तथापि अपनी इस प्रवृत्ति पर अंकुश न रख जिन्दा रस भोगने के लिए पति से कपट करती है। जब गजाधर द्वारा निकाल दी जाती है, तो ऐसी विपत्ति के समय उसकी मनोवृत्तियाँ और भी प्रबल हो जाती हैं, यहाँ तक कि वेश्या बनने तक को वह अपना सौभाग्य समझती है। इसी सम्मान के विषय में कहा गया सुमनबाई का आत्मकथन — “मेरा तो यह अनुभव है कि जितना आदर मेरा आज हो रहा है उसका शतांश भी नहीं होता था। एक बार मैं सेठ चिम्मन लाल के ठाकुरद्वारे में झूला देखने गयी थी, सारी रात बाहर खड़ी भीगती रही, किसी ने भीतर न जाने दिया, लेकिन कल उसी ठाकुरद्वारे में मेरा गाना हुआ तो ऐसा जान पड़ता था, मानो मेरे चरणों से मन्दिर पवित्र हो गया।
 
उपन्यास के मध्य में विट्ठलदास के द्वारा दिए गए ज्ञान से प्रभावित होकर वह इस मार्ग को निकृष्ट समझने लगती है—“आप सोचते होंगे कि भोग-विलास की लालसा से कुमार्ग में आयी हूँ, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। मैं ऐसी अन्धी नहीं कि भले-बुरे की पहचान न कर सकूँ। मैं जानती हूँ कि मैंने अत्यन्त निकृष्ट कर्म किया है। लेकिन मैं विवश थी, इसके सिवा मेरे लिए और कोई रास्ता न था।"
 
सुमन का यह आत्मकथन नारी की दयनीय दशा का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर रहा है। प्रायः तत्कालीन समाज में अपनी रक्षा का अन्य मार्ग न देखकर इन विचारों के अन्तर्द्वन्द्व में स्त्रियाँ वेश्या बन जाने के लिए बाध्य हो जाया करती थीं। गजाधर के इस कथन से - " मेरी असज्जनता और निर्दयता, सुमन की चंचलता और विलास-लालसा ने मिलकर हम दोनों का सर्वनाश कर दिया । " - सुमन की विलास प्रवृत्ति को टूटते हुए परिवारों के लिए काफी समय तक उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

कथानक की चरम परिणति में अपनी दुर्दशा का श्रेय इस विलास प्रवृत्ति को देते हुए सुमन कहती है- 
“नहीं, मैं किसी को दोष नहीं दे सकती, बुरे कर्म तो मैंने किए हैं, उनका फल कौन भोगेगा ? विलास-लालसा ने मेरी यह दुर्गति की। मैं कैसी अन्धी हो गयी थी, केवल इन्द्रियों के सुखभोग के लिए अपनी आत्मा का नाश कर बैठी ।”
 
रूपगर्वित चांचल्य से भरपूर - सुमन का चंचल स्वभाव उसे अस्थिर ही नहीं करता, उसके पत्नी-स्वरूप को विकृत कर देता है। वह अपने इसी स्वभाव को समस्त आपत्तियों का कारण मानती है। इसके लिए आर्तनाद करने वाला सुमन का कथन सजीव एवं स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत है – “हा प्रभो ! तुम सुन्दरता देकर मन को चंचल क्यों बना देते हो ? मैंने सुन्दर स्त्रियों को प्रायः चंचल ही पाया। कदाचित् ईश्वर इस युक्ति से हमारी आत्मा की परीक्षा करते हैं, अथवा जीवन-मार्ग में सुन्दरता-रूपी बाधा डालकर हमारी आत्मा को बलवान्, पुष्ट बनाना चाहते हैं । सुन्दरता-रूपी आग में डालकर उसे चमकाना चाहते हैं, पर हाँ! अज्ञानवश हमें कुछ नहीं सूझता, यह आग हमें जला डालती है, वह बाधा हमें विचलित कर देती है।”
 
यहाँ सुमन अपने आत्मकथन द्वारा व्यक्त कर रही है कि स्त्री का गौरव, सौन्दर्य, महत्त्व स्थिरता में है।

सुशिक्षित और चतुर महिला

सुमन एक विदुषी, सुशिक्षिता और चतुर स्त्री है। मन को शान्त करने के लिए वह बीच-बीच में धार्मिक पुस्तकों, रामायण आदि का अध्ययन एवं मनन करती है। उसमें किसी बात को समझाये जाने पर अच्छे और बुरे का अन्तर करने की अद्भुत क्षमता है। वेश्या बन जाने पर भी रात्रि में वह सदैव ज्ञान-चक्षु खोलकर इस तथ्य पर मनन करती है— जो शान्तिमय सुख सुमन को प्राप्त है क्या वह मुझे मिल सकता है ? असम्भव । यह तृष्णा सागर है, वहाँ शान्ति-सुख कहाँ है।" आदर एवं निर्लज्जता के सम्बन्ध में कहे गये कथन भी उसके सांसारिक ज्ञान परिचायक हैं- 

“आप चाहे समझते हों कि आदर और सम्मान की भूख बड़े आदमियों को ही होती है, किन्तु दीन दशा वाले प्राणियों को उसकी भूख और भी अधिक होती है, क्योंकि उनके पास इनको प्राप्त करने का कोई साधन नहीं है। वह इनके लिए नोरी, छल-कपट, सब-कुछ कर बैठते हैं। आदर में वह सन्तोष है जो धन और भोग-विलास में नहीं है।"
 
“यहाँ आकर मुझे मालूम हो गया है कि निर्लज्जता सब कष्टों से दुस्सह है और कष्टों से शरीर को दुःख होता है, इस कष्ट से आत्मा का संहार हो जाता है।”

इसके उत्तरस्वरूप कहा गया विट्ठलदास का यह कथन — “सुमन, तुम वास्तव में विदुषी हो” चरित्र पर प्रकाश डालने के लिए पूर्ण रूप से सफल है।

संघर्ष के मार्ग पर - 'सेवासदन' में सुमन एक ऐसी नारी का प्रतिनिधित्व करती है, जो समस्त आपत्तियों का सामना स्वयं करती है। अपने द्वारा किये गये अच्छे या बुरे कर्मों के फल को भोगने के लिए वह स्वयं तैयार है— 
“मैं सहानुभूति की भूखी थी, वह मुझे मिल गयी। अब मैं अपने जीवन का भार आप लोगों पर नहीं डालूंगी आप केवल मेरे रहने का प्रबन्ध कर दें जहाँ मैं विघ्न-बाधा से बची रह सकूँ ।" 
“मैं परिश्रम करूंगी। अपनी निर्लज्जता का कर आपसे न लूँगी।”
 

एक जीवन्त नायिका 

सुमन के चरित्र में एक निर्लिप्त-सी जीवन्तता है। ऐसा लगता है कि वह सब कुछ क्रीडापूर्वक करती है और बड़े ही विनोदपूर्ण ढंग से परिस्थितियों के साथ स्वयं आनन्दित रहती है। दालमण्डी छोड़ते समय जब वह अपने प्रेमियों को विदा करती है उस समय प्रकृति हास्य से परिपूर्ण दृष्टिगोचर होती है, जैसे- “उसने सिगरेट की एक डिबिया मँगवायी और वारनिश की एक बोतल मँगाकर ताक पर रख दी और एक कुर्सी का एक पाया तोड़कर कुर्सी छज्जे पर दीवार के सहारे रख दी। पाँच बजते-बजते मुंशी अबुलवफा का आगमन हुआ। इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् सुमन बोली- “ आइए आज आपको वह सिगरेट पिलाऊँ कि आप भी याद करें।” “सुमन ने जब सलाई रगड़कर अबुलवफा की दाढ़ी का सर्वनाश कर दिया तो हँसी उसके ओंठों पर आ गयी।” अर्थात् विनोदी क्रीड़ा में जैसे वह सब कुछ भूलकर मजाक (हास्य) का आनन्द लेती है।
 

सगर्वा और स्वाभिमान प्रखर

सुमन के चरित्र का एक अपूर्व गुण है उसका स्वाभिमानिनी होना । वह सगर्वा भी है अतः वह किसी के सामने स्वयं को हीन मानकर नहीं आती। पड़ोसियों ने उसके सौन्दर्य, रीति, व्यवहार एवं गुणों पर मुग्ध होकर उसका नेतृत्व स्वीकार कर लिया था-" उसकी सगर्वा प्रकृति को इसमें अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता था। ” अपने इस गुण के कारण ही वह प्रत्येक क्षेत्र में अपना वर्चस्व चाहती है। पड़ोस में रहने पर पड़ोसियों के मध्य, वेश्या बन जाने पर दालमण्डी में अपना आधिपत्य इसी प्रवृत्ति के कारण स्थापित कर पाती है। आश्रम से सेवा-धर्म पालन करके सर्वमान्य पति के घर सब कष्ट झेलकर भी रानी बनकर सम्मान से रहने वाली महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति का प्रदर्शन करती है। इस प्रकार उपन्यास में वह मानिनी सगर्वा स्त्री के रूप में विकसित चरित्र वाली है।
 

बुद्धिमान

हालाँकि सुमन चंचल प्रकृति की नायिका है, जिसके कारण उसकी बुद्धि आच्छन्न हो गई थी और वह भोली के आश्रम तक आ पहुँची थी, परन्तु उसके बौद्धिक रूप का जागरण भी उपन्यास के घटनाक्रम में जिस प्रकार हुआ है, वह उसकी बुद्धिमता की ओर इंगित करता है। उच्छृंखल सोच से युक्त करने वाला उसका बौद्धिक सोच ही है कि वह विट्ठलदास की धार्मिक बातों से अपने विचारों को बदल डालती है। सुमन का आत्मकथन उसके इस लक्षण को प्रस्तुत उदाहरण द्वारा भली-भाँति प्रकट कर देता है - “यदि मैं उस जलसे में न आती तो आज मैं अपने झोंपड़े में सन्तुष्ट होती। आपको मैं सच्चरित्र पुरुष समझती थी, इसीलिए आपकी रसिकता का मुझ पर और भी प्रभाव पड़ा।” 
अन्त में प्रत्युपकार करने की भावना का उदय और उसके अनुसार जीवन में विराग पक्ष को अपना लेना भी उसके बौद्धिक सोच को स्मरणीय बना देता है।
 

धार्मिक पथ पर

एक बार वेश्या बन जाने के कारण वह समाज में तिरस्कृत एवं निम्न स्थान को ग्रहण कर चुकी थी, परन्तु काल-क्रम और घटना प्रवाह ने उसे अपनी चंचलता, कामनाओं से उत्पन्न तृष्णा के भयावह रूप के दर्शन भी कराये और वह मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग पर चल पड़ी। उसने धन की अपेक्षा सेवा को महत्त्व देकर अपना जीवन ही बदल डाला। उपन्यास में उसका त्यागमय जीवन उसे अत्यन्त ऊँचे आसन पर बैठा देता है । अन्त में उसको देखकर गजानन्द कहता है- “मैंने तुम्हें आश्रम में देखा, सदन के घर में देखा, तुम सेवाव्रत में मग्न थीं, तुम्हारे लिए ईश्वर से यही प्रार्थना करता था। तुम्हारे हृदय में दया है, प्रेम है, सहानुभूति है और सेवा-धर्म के यही साधन हैं। तुम्हारे लिए उसका द्वार खुला है।”

सुमन अपनी इसी भावना द्वारा 'सेवासदन' को विधवाश्रम से भी उन्नत अवस्था में पहुँचा देती है। इतना अधिक नीचे गिरकर पात्रों में 'विदुषी' पद से विभूषित होना उसकी निःस्वार्थ त्याग-वृत्ति का ही परिचय है।

संक्षेप में, सुमन का चरित्र कोई आदर्शवादी या काल्पनिक चरित्र नहीं है, बल्कि वह परिस्थितियों की मार खाकर भटकने वाली और फिर अपने आत्मबल से खुद को सुधारने वाली एक यथार्थवादी नारी है। प्रेमचंद ने सुमन के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि नारी स्वभाव से पतित नहीं होती, बल्कि सामाजिक परिस्थितियां और पुरुषों का संकीर्ण दृष्टिकोण उसे गलत रास्ते पर धकेलता है। अंत में उसका सेवा मार्ग चुनना उसके चरित्र की महानता को स्थापित करता है।

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