सेवासदन उपन्यास में गजाधर का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद

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मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'सेवासदन' में गजाधर प्रसाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण और यथार्थवादी पुरुष पात्र हैं सेवासदन उपन्यास में गजाधर का चरित्र चित्रण

सेवासदन उपन्यास में गजाधर का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद


मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यास 'सेवासदन' में गजाधर प्रसाद एक बेहद महत्वपूर्ण और जटिल पुरुष पात्र हैं। वह उपन्यास की मुख्य नायिका सुमन के पति हैं। प्रेमचंद ने गजाधर के चरित्र को किसी आदर्शवादी साँचे में ढालने के बजाय उसे परिस्थितियों के थपेड़े खाते हुए एक आम, कमज़ोर और ईर्ष्यालु इंसान के रूप में चित्रित किया है।

किसी उपन्यास के नायक में जो गुण होने चाहिए, उनके आधार पर यदि विचार किया जाय तो सेवासदन का नायक निश्चित करना कठिन ही होगा, परन्तु उपन्यासकार की विचारधारा को अभिव्यक्ति देने वाला पात्र गजाधर के होने के कारण उसी को इस उपन्यास का नायक मान लेना पड़ेगा । जीवनपर्यन्त दुःखों को भोगते हुए कथानक की चरमाभिव्यक्ति के समय सुखद और त्यागमय जीवन की ओर भी वही अग्रसर है। नायिका भी आजीवन अलग मार्ग पर चलकर अन्त में नायक के उपदेशों से प्रभावित होकर उसी का अनुसरण करती है। इसके अतिरिक्त कथानक में स्थान-स्थान पर महत्त्वपूर्ण भूमिका भी गजाधर ही निभाता दीखता । अतः उसी को नायक होने का गौरव प्राप्त हो जाता है। उसके चरित्र में पायी जाने वाली कतिपय विशेषताओं का मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है- 

प्रकृति या स्वभाव

सेवासदन उपन्यास में गजाधर का चरित्र चित्रण | मुंशी प्रेमचंद
गजाधर की क्रोधी प्रकृति को उपन्यासकार ने भली-भाँति दर्शाया है। उसका यह क्रोध कहीं पर सुमन के गृह-प्रबन्ध में कुशल न होने के कारण और कहीं अत्यन्त शंकालु स्वभाव के कारण प्रकट होता है। आवश्यक व अनावश्यक खर्च का ध्यान न रखने वाली सुमन से यह पूछना - “रुपये तो तुमने खर्च कर दिये, अब बताओ कहाँ से आये ?” अथवा यह कहना - “तो मैं डाका तो नहीं मार सकता" आदि छोटी-छोटी बातों पर साधारणतः वह क्रोधी स्वभाव का मालूम होता है, परन्तु यह बातें घर-गृहस्थी में आर्थिक संकट से ग्रस्त रहकर भी मनुष्य के दिमाग को बिगाड़ देती हैं। इसके बाद हम गजाधर का उत्तेजित रूप तब देखते हैं जब सुमन भोलीबाई के घर गई और वहाँ से देर में लौटी। उस समय के उसके संवाद स्वाभाविक क्रोध के नहीं, बल्कि सकारण क्रोध के हैं। देखिये वह सुमन कहता है- 

गजाधर — “तुम इतनी रात तक वहाँ बैठी क्या कर रही थीं? क्या लाज शर्म बिल्कुल घोलकर पी ली है? 
सुमन ने दीन भाव से उत्तर दिया- “उसने कई बार बुलाया तो चली गयी। कपड़े उतारो, अभी खाना तैयार हुआ जाता है।” 
गजाधर- खाना पीछे बनाना, में ऐसा भूखा नहीं हूँ। पहले यह बताओ कि तुम वहाँ मुझसे पूछे बिना गयीं क्यों ? क्या तुमने मुझे बिल्कुल मिट्टी का लोंदा ही समझ लिया है ? 
सुमन-सारे दिन अकेले इस कुटी में बैठे भी तो नहीं रहा जाता। 
गजाधर - तो इसलिए अब वेश्याओं से मेल-जोल करोगी? तुम्हें अपनी इज्जत-आबरू का भी कुछ विचार है? 
सुमन—क्यों, भोली के घर जाने में कोई हानि है ? उसके घर तो बड़े-बड़े लोग आते हैं, मेरी क्या गिनती है। 
गजाधर - बड़े-बड़े भले ही आवें, लेकिन वहाँ जाना बड़ी लज्जा की बात है। मैं अपनी स्त्री को वेश्या से मेल-जोल करते नहीं देख सकता। धर्म का महत्त्व धन से कहीं बढ़कर है।
 
ऐसी बात किसी भी भले घर के गृहपति द्वारा अपनी उस पत्नी से उतेजित भाव से कहना, जो वेश्या से मेल-जोल बढ़ाती हुई दिखाई देती हो, सकारण काफी है।
 
गजाधर के क्रोध का एक रूप और देखिये- 
“वह द्वार पर बैठकर सुमन की राह देखने लगा। जब दस बज गये तो उसने खाना परसा, लेकिन क्रोध में कुछ खाया न गया। उसने सारी रसोई उठाकर बाहर फेंक दी और भीतर से किवाड़ बन्द करके सो रहा। मन में यह निश्चय कर लिया कि सुमन आज कितना ही सिर पटके किवाड़ न खोलूँगा, देखें कहाँ जाती है ? किन्तु उसे बहुत देर तक नींद न आयी। जरा-सी आहट होती तो डंडा लिए किवाड़ के पास आ जाता।”

कृपणता

कृपणता भी गजाधर के स्वभाव में है। उसके चरित्र में इस गुण को दर्शाने के लिए उपन्यासकार ने अनेक उपमानों का सहारा लिया है, जैसे- 
“वह (गजाधर) स्वभाव से कृपण था। जलपान की जलेबियाँ उसे विष के समा: लगती थीं। दाल में घी देखकर उसके हृदय में शूल होने लगता था। वह भोजन करता तो बटुली की ओर देखता कि कहीं अधिक तो नहीं बना है। दरवाजे पर दाल-चावल फिंका देखकर शरीर में ज्वाला-सी लग जाती थी।'
 
खाने-पीने में भी अधिक व्यय हो जाने पर गजाधर को कष्ट का अनुभव होता था । उपन्यासकार के शब्दों में इसकी अभिव्यक्ति इन शब्दों में की गई है- “उसका संचयशील हृदय इस खा-पीकर बराबर की गर्व दशा से बहुत दुःखी रहता था।”

आर्थिक रूप से निर्बल

उपन्यासकार गजाधर का परिचय एक गरीब युवक के रूप में कराता है। उसकी आर्थिक कमजोरी सुमन के लिए शाप बन जाती है जिसके फलस्वरूप वह प्रत्येक परिस्थिति में घटित होने वाली घटना को इसका मूल कारण मानती है। इस दशा पर सुमन की उक्तियाँ- “इतने रुपयों में बरकत थोड़े ही हो जायेगी।” “वह चाहे तो हम जैसों को नौकर रख ले।” निर्धन चरित्र का सफल और यथार्थ चित्रण कर देती हैं। स्वयं गजानन्द का कथन भी उसकी निर्धनता को द्योतित करता है-“निर्धन था, इसलिए आवश्यक था कि मैं धन के अभाव को अपने प्रेम और भक्ति से पूरा करता। मैंने इसके विपरीत उससे निर्दयता का व्यवहार किया। उसे वस्त्र और भोजन का कष्ट दिया।" इतना सब होने पर भी वह अपनी निर्धनता एवं दुरावस्था से दुःखी नहीं थी।
 

अस्थिर चित्त

गजाधर अस्थिर-बुद्धि का व्यक्ति भी है। वह परिणाम को सोचे-समझे बिना ही कार्य करता है। उसकी यही बुद्धि-"अपने गहने-कपड़े लेती जा, यहाँ कोई काम नहीं है।" अपनी पत्नी को घर से निकालने में दिखाई देती है।गजाधर में अद्भुत वर्णन-क्षमता है, जिसे उसका स्वाभाविक विशिष्ट गुण कहा जा सकता है। वह इसी गुण के कारण अपना प्रभाव छोड़ता है। वेश्या-नाच की माँग किए जाने पर वह जन समूह को किस प्रकार सम्बोधित करता है, देखिये- “चलो मैं नाच दिखाऊँ । देवताओं का नाच देखना चाहते हो ? देखो, सामने वृक्ष की पत्तियों पर निर्मल चन्द्र की किरणें कैसी नाच रही हैं। देखो, तालाब में कमल के फूल पर पानी की बूँदें कैसी नाच रही हैं। जंगल में जाकर देखो, मोर पर फैलाये कैसा नाच रहा है। क्यों यह देवताओं का नाच पसन्द नहीं है ? अच्छा चलो, पिशाचों का नाच दिखाऊँ तुम्हारा पड़ोसी दरिद्र किसान जमींदार के जूते खाकर कैसा नाच रहा है। तुम्हारे भाइयों के अनाथ बालक क्षुधा से बावले होकर कैसे नाच रहे हैं अपने घर में देखो, विधवा भावज की आँखों में शोक और वेदना के आँसू कैसे नाच रहे हैं क्या यह नाच देखना पसन्द नहीं ? तो अपने मन को देखो कपट और छल कैसा नाघ रहा है। सारा संसार नृत्यशाला है। उसमें लोग अपना-अपना नाच नाच रहे हैं। क्या यह देखने के लिए तुम्हारी आँखें नहीं हैं ? आओ, मैं तुम्हें शंकर का तांडव नृत्य दिखाऊँ । किन्तु तुम वह नृत्य देखने योग्य नहीं हो। तुम्हारी काम-तृष्णा को इस नाच का क्या आनन्द मिलेगा। हाँ! अज्ञान की मूर्तियो ! विषयभोग के सेवको ! तुम्हें नाच का नाम लेते हुए लज्जा नहीं आती! अपना कल्याण चाहते हो तो इस रीति को मिटाओ। कुवासना को तजो, वेश्या-प्रेम का त्याग करो।
 
गजाधर के इस उपदेश में जो शक्ति है, वास्तव में वही उसे इस उपन्यास के नायक पद पर प्रतिष्ठित करने वाली है। उसका लोगों को वेश्या का नृत्य देखने से वर्जित करने का ढंग कितना सुन्दर है। दूसरी भाषा में उसके द्वारा लोगों को कुप्रवृत्ति से अलग करना उसके श्रेष्ठ चरित्र का परिचायक है।
 

आत्मोद्धार के मार्ग का अनुसरण करना

सुमन को निकालने के पश्चात् अकस्मात् उसके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आता है और वह पहले की अपेक्षा कुछ अधिक उदार प्रकृति वाला हो जाता है। गत जीवन का स्मरण कर वह सेवा-धर्म स्वीकार कर लेता है। निर्वाण मार्ग पर चलने के लिये सेवा-धर्म ही श्रेष्ठ है। यह सिद्ध करने वाला गजानन्द का कथन – “ अज्ञान अविधा के अन्धकार में पड़े हुए मेरे पास अपना उद्धार करने का साधन न रहा, न ज्ञान था, न विद्या थी, न भक्ति की सामर्थ्य थी। मैंने अपने बन्धुओं की सेवा करने का निश्चय किया । यही मार्ग मेरे लिए सबसे सरल था। तब से मैं यथाशक्ति इसी मार्ग पर चल रहा हूँ और अब मुझे अनुभव हो रहा है आत्मोद्धार के मार्गों में केवल नाम का अन्तर है। मुझे इस मार्ग पर चलकर शान्ति मिली है और मैं तुम्हारे लिये भी यह मार्ग सबसे उत्तम समझता हूँ।” अक्षरशः सत्य प्रतीत होता है। निःस्वार्थ भावना का महत्त्व समझाते हुए नायिका को भी इस मार्ग के लिए प्रेरित करना उसके नायकत्व की पुष्टि करता है।
 
उपन्यासकार ने 'उन्होंने निर्धनों की कन्याओं का उद्धार करने के निमित्त अपना जीवन अर्पण कर दिया, यह अन्तिम परिच्छेद में यह लिखकर उसके त्यागमय व्यक्तित्व पर पूर्ण रूप से प्रकाश डाल दिया है। 

संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि गजाधर के चरित्र में मानवीय कमजोरियाँ भी उसकी चारित्रिक श्रेष्ठता को प्रभावित नहीं करतीं। एक साधारण सामाजिक दरिद्र मनुष्य के रूप में उसके स्वभाव का जो रूप होना चाहिए, वह प्रेमचन्द ने बड़े ही शान्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। यह उपन्यासकार की अद्भुत वर्णनात्मक क्षमता तो है ही, गजाधर के चरित्र को ऊँचा भी उठाती है। प्रेमचंद ने गजाधर के चरित्र के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार मध्यवर्गीय समाज की आर्थिक तंगी, झूठी सामाजिक प्रतिष्ठा और पुरुष का अहंकारी स्वभाव एक हँसते-खेलते परिवार को उजाड़ सकता है। गजाधर कोई जन्मजात बुरा व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह परिस्थितियों और अपनी संकीर्ण सोच का शिकार है, जो अंत में पश्चाताप की अग्नि में तपकर एक साधु और समाज सेवक बनता है।

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