सेवासदन उपन्यास का उद्देश्य | मुंशी प्रेमचंद मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'सेवासदन' (1918) हिंदी उपन्यास जगत की एक युगांतकारी रचना है।
सेवासदन उपन्यास का उद्देश्य | मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित 'सेवासदन' (1918) हिंदी उपन्यास जगत की एक युगांतकारी रचना है। यह प्रेमचंद का पहला प्रौढ़ हिंदी उपन्यास है, जिसने हिंदी कथा-साहित्य को तिलिस्मी और एयारी दुनिया से निकालकर सीधे सामाजिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा किया।इस उपन्यास का मूल उद्देश्य भारतीय समाज के विभिन्न दोषों, विशेषकर मध्यमवर्गीय समाज की विसंगतियों और नारी जीवन की त्रासदियों को उजागर करना तथा उनके समाधान का मार्ग खोजना है।
तत्कालीन समाज का चित्र प्रस्तुत करने वाली कृति 'सेवासदन' प्रेमचन्द का एक शुद्ध सामाजिक उपन्यास है। इसमें नायिका की कथा के माध्यम से नारी समाज की समस्याओं पर अधिक बल दिया गया है। अतः उक्त उपन्यास का नामकरण भी कथावस्तु के निम्न मूल उद्देश्यों के आधार पर ही किया गया है -
कथानक का उद्देश्य मात्र नायिका की जीवन गाथा का वर्णन करना नहीं
'सेवासदन' की नायिका सुमन की कथा का एक माध्यम समाज पर व्यंग्योक्तिपूर्ण आक्षेप करना है। सुमन की जीवन-कथा से प्रकट होने वाली सामाजिक विषय-वस्तु, समस्याओं एवं स्थितिजनक घटनाओं का क्रम से सहज ही में अनुमान लगाया जा सकता है।
लेखक द्वारा प्रारम्भ में दहेज प्रथा के नग्न रूप का प्रदर्शन है। उसने इस कुप्रथा की भयावह स्थिति का मर्मभेदी साकार चित्रांकन किया है जो समाज की दो सुन्दर कन्याओं के पतन और जीवन-संघर्ष के रूप में सामने आया है। सुमन का वेश्यागृह पहुँच जाना और शान्ता की बारात का लौट जाना-इन दोनों बातों के मूल में दहेज प्रथा है । सुमन का विवाह एक विधुर से हुआ जो आकांक्षाओं और कामनाओं को मार देता है, तथा शान्ता एक अनाथ कन्या की-सी स्थिति में आ जाती है। इस समस्या के वृक्ष में लगने वाले वेश्यारूपी फल को लेखक ने जिस तरह प्रकट करके वेश्या-समस्या से जोड़ा है तथा उस समस्या के सुधार-मार्ग का दर्शन कराकर उसने बाद में शान्ता को भी जोड़ा है, वह लेखकीय कला का सक्षम उदाहरण है ।
अन्त में कथावस्तु का उद्देश्य स्थापित करने के लिए उपन्यासकार ने अपनी पात्रा सुमन को सभी तरफ से प्रताड़ित-अपमानित दिखाते हुए 'सेवासदन' का संचालन करते हुए दर्शाया है। यहाँ नायिका सुमन द्वारा निःस्वार्थ सेवा द्वारा मुक्ति का मार्ग अपनाया जाना भारतीय दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। इसी प्रकार अनेकानेक पात्रों के उच्च और निम्न-कोटि के विचारों का संकलन कथा के प्रवाह को अवरुद्ध होने से बचता है।
सेवासदन का उद्देश्य प्रवृत्तिपरक या निवृत्तिपरक
उपन्यासकार द्वारा रसयुक्त एवं रोचक कथावस्तु का निर्माण किये जाने पर भी उपन्यास प्रवृत्ति से निवृत्ति की तरफ झुकता प्रतीत होता है। शनैः-शनैः सांसारिक सुखों को भोगने की प्रवृत्ति मोक्ष मार्ग की तरफ अग्रसित होते हुए दिखाई देती है ।
अन्त में सुमन और स्वामी का प्रस्तुत कथन इसकी पुष्टि कर देता है-
“स्वामी-क्या चाहती हो, धन ?
सुमन- नहीं, महाराज, धन की कमी नहीं।
स्वामी—सम्मान ?
सुमन-नहीं महाराज, सम्मान की भी इच्छा नहीं ।
स्वामी- भोग-विलस ?
सुमन- महाराज, इसका नाम न लीजिये, मुझे ज्ञान दीजिए ।
स्वामी- अच्छा तो सुनो, सतयुग में मनुष्य की मुक्ति ज्ञान से होती थी, त्रेता में सत्य से, द्वापर में भक्ति से, पर इस कलियुग में इसका केवल एक ही मार्ग है, और वह है—सेवा । इसी मार्ग पर चलो, इसी से तुम्हारा उद्धार होगा। जो लोग तुमसे भी दीन, दुःखी, दलित हैं, उनकी शरण में जाओ और उनका आशीर्वाद तुम्हारा उद्धार करेगा। कलियुग में परमात्मा इसी दुःख- सागर में वास करते हैं।”
इस प्रकार की निवृत्ति-सम्बन्धी विचारधारा पद्मसिंह के भूली हुई आत्माओं को सचेत करने एवं अज्ञानावस्था से मुक्त करने में विट्ठलदासजी द्वारा निस्वार्थ कर्म की प्रतिज्ञा में तत्पर रहने में दिखाई देती है।
सुमन के चरित्र में गुम्फित 'सेवासदन' का उद्देश्य उपन्यासकार ने सुमन को वेश्यालय से सम्बद्ध करके एक ही तीर से 'दहेज' तथा 'वेश्या प्रथा' नामक दो सामाजिक राक्षसियों पर निशाना साधा है। सुमन तत्कालीन समाज की स्त्री जाति का सूचक चिह्न है । उसकी संवेदना सम्पूर्ण नारी जाति की संवेदना है। सामाजिक प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप होने वाला सुमन के चरित्र का उत्कर्ष - अपकर्ष समाज से प्रताड़ित सम्पूर्ण नारी जाति के उत्थान और पतन का द्योतक है। इसलिए उपन्यासकार द्वारा अधिकांश प्रसङ्गों को सम्पूर्ण नारी जाति को सम्बोधित करते हुए दर्शाया गया है। इसी निरादर एवं अपमान का सूचक गजानन्द का कथन प्रस्तुत है-
“ईश्वर वह दिन कब लावेगा कि हमारी जाति में स्त्रियों का आदर होगा ? स्त्री मैले-कुचैले, फटे-पुराने वस्त्र पहनकर, आभूषण-विहीन होकर, आधे पेट सूखी रोटी खाकर, झोंपड़े में रहकर, मेहनत-मजदूरी कर, सब कष्टों को सहते हुए भी आनन्द से जीवन व्यतीत कर सकता है। केवल घर में उसका आदर होना चाहिए। आदर या प्रेम-विहीन महिला महलों में भी सुख से नहीं रह सकती।”
यहाँ 'आदर' शब्द का व्यापक अर्थों में प्रयोग किया गया है। करुणा से विह्वल वेश्याओं का जीवन अनुभव करने के पश्चात् पद्मसिंह मात्र सुमन के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण वेश्या समाज के लिए अपना मन्तव्य इस प्रकार प्रकट करते हैं- “ये स्त्रियाँ विचारशून्य नहीं, भावशून्य नहीं, बुद्धिहीन नहीं, लेकिन माया के हाथों में पड़कर उनकी सारी सद्वृत्तियाँ उल्टे मार्ग पर जा रही हैं, तृष्णा ने उनकी आत्माओं को निर्बल- निश्चेष्ट बना दिया है। पद्मसिंह इस माया जाल को तोड़ना चाहते हैं, वह उन भूली हुई आत्माओं को सचेत करना चाहते थे, वह उनको इस अज्ञानावस्था से मुक्त किया चाहते थे।”
गजाधर की पुस्तक में सुन्दरता हमारे पूर्वजन्म के अच्छे कर्मों का फल है, यह पढ़कर विट्ठलदास और पद्मसिंह के सन्मार्ग पर लाये गये प्रयासों से प्रभावित होकर महबूबजान, सुन्दरबाई, जोहरा, रामभोली, रामप्यारी आदि सभी वेश्याएँ चाँदी में बिकने के बदले नेक रास्ते पर चलने को तैयार हो जाती हैं-
“हमने उसे अपने दाम में नहीं फँसाया, बल्कि उसके खुद दाम में फँस गयीं। उसने सोने और चाँदी से हमको खरीद लिया। हम अपनी अस्मत् (पवित्रता) जैसी वेवहा (अमूल्य) जिंस खो बैठी। आइंदा से हमारा वह वतीरा (ढङ्ग) होना चाहिए कि अगर अपने में किसी को बुराई करते देखें तो उसे उसी वक्त बिरादरी से खारिज कर दें।'
यहाँ उपन्यासकार समाज में नारी अभ्युत्थान वाले अपने लक्ष्य को स्पष्टतः परिलक्षित करने में पूर्णरूपेण सफल हुए हैं। वेश्याओं के छोटे विचारों का पवित्र भावों में बदलना मानसिक रूप से भी स्त्रियों को सदृढ़ और संयत बनाता है।
बहुमुखी उद्देश्य-स्थान-स्थान पर आये हुए पात्रों के अन्य वार्तालापों से स्पष्ट एवं अस्पष्ट परिलक्षित होने वाला बहुमुखी उद्देश्य इस प्रकार है- जीवन के स्तर को उदात्त एवं आदर्श बनाने में सदैव संलग्न रहना चाहिए।
दोनों विरोधी गुणों (भोगलिप्सा एवं त्याग) वाले कथोपकथन मात्र विचारों का आदान- प्रदान नहीं हैं, अपितु 'सेवासदन' नामक शीर्षक को सार्थक करते हुए कथानक और उद्देश्य को स्वतः व्यञ्जित करने वाले हैं। यही कारण है कि उपन्यास अपने चरम एवं उत्कृष्ट रूप में दृष्टिगोचर होता है ।
अन्त में निष्कर्ष रूप में 'सेवासदन' के उद्देश्य को इस प्रकार समझा जा सकता है—यहाँ नायिका के चरित्र का उत्कर्ष - अपकर्ष दिखाने से तात्पर्य समाज को नैतिक शिक्षा देने से है। विवेच्य उपन्यास के माध्यम से उपन्यासकार भी यही कहना चाहता है कि मनुष्य को अपनी परिस्थिति से सन्तुष्ट रहना चाहिए तथा दूसरों की उन्नति एवं वैभव को देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। संक्षेप में इन उद्देश्यों का सार लोक-कल्याण की भावना में निहित है।कहें तो 'सेवासदन' का उद्देश्य केवल एक मनोरंजक कहानी सुनाना नहीं था, बल्कि सोए हुए समाज की चेतना को जगाना था। प्रेमचंद ने वासना और रूढ़ियों से जकड़े समाज को सुधारवादी दृष्टिकोण और मानवीय सहानुभूति का मार्ग दिखाया है, जहाँ नारी को भोग की वस्तु न मानकर समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिया जा सके।


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