लहरों के राजहंस नाटक का नामकरण की सार्थकता

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लहरों के राजहंस नाटक का नामकरण की सार्थकता 'लहरों के राजहंस' मूलतः ऐतिहासिक नाटक है। नाटककार ने इसके नामकरण के आधार को अन्य नाटककारों की परम्परा के

लहरों के राजहंस नाटक का नामकरण की सार्थकता

मोहन राकेश द्वारा रचित 'लहरों के राजहंस' एक उत्कृष्ट ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक नाटक है। इस नाटक का नामकरण बेहद कलात्मक, प्रतीकात्मक और सार्थक है। नाटक का शीर्षक केवल एक नाम नहीं है, बल्कि यह पूरे नाटक के केंद्रीय द्वंद्व और दर्शन को अपने भीतर समेटे हुए है।

साहित्यिक रचना कोई भी हो, उसके नामकरण के पीछे कोई न कोई आधार अवश्य रहता है। यह आधार रचना के विशिष्ट पात्र, घटना या स्थान का भी हो सकता है और उसका उद्देश्य भी । जहाँ तक ऐतिहासिक नाटकों की बात है हिन्दी में अधिकांश ऐतिहासिक नाटकों का नामकरण कृति के नायक या नायिका के नाम पर ही किया गया है, किन्तु कुछ नाटकों का काल विशेष और घटना या स्थान विशेष के आधार पर भी नामकरण हुआ है। जो भी हो, नाटक के नामकरण के विषय में उसका स्रष्टा स्वतन्त्र है किन्तु उसका नामकरण कथा के अनुकूल और सार्थक हो, यह एक अनिवार्य शर्त है।
 
लहरों के राजहंस नाटक का नामकरण की सार्थकता
'लहरों के राजहंस' मूलतः ऐतिहासिक नाटक है। नाटककार ने इसके नामकरण के आधार को अन्य नाटककारों की परम्परा के विपरीत रखा है। मोहन राकेश यदि चाहते तो इसका नाम सुन्दरी या नन्द या नन्द-सुन्दरी कुछ भी रख सकते थे, किन्तु उन्होंने पात्रों की अपेक्षा नाटक के मूल उद्देश्य को ही नाटक के नामकरण का आधार बनाया है। नाटककार ने अपनी भूमिका में स्वयं यह स्वीका है कि इसकी रचना की प्रेरणा उसे कवि अश्वघोष के 'सौन्दरनन्द' से मिली और नाटककार ने उसे आधुनिक युग-बोध के साँचे में ढालकर प्रतीकात्मक स्वरूप दे दिया। 'सौन्दरनन्द' में जो कथा मिलती है उसमें कपिलवस्तु के विलासी एवं रूपगर्विता सुन्दरी के प्रेम-पाश में उलझे राजकुमार नन्द के अस्थिर मन की उपमा लहरों पर तैरते राजहंस से की गई है। यह उपमा इसलिए दी गई है क्योंकि नन्द का मन एक ओर तो सुन्दरी के रूपाकर्षण में उलझा रहता है और दूसरी ओर गौतम बुद्ध के निवृत्ति मार्ग से भी वह प्रभावित है और उसका अस्थिर मन इन दो प्रभावों के मध्य ही डोलता रहता है। इस प्रकार सुन्दरी का रूपाकर्षण और बुद्ध का आकर्षण इन दोनों के बीच नन्द का मन उलझा रहता है और वह निर्णय के बिन्दु को नहीं छू पाता। बाद में जब नन्द बुद्ध के पास क्षमा-याचना करने जाता है तो वहाँ बुद्ध उसके केश कटवाने का आदेश दे देते हैं और अप्रतिहत नन्द मौन रूप से अपने केश कटवा देता है किन्तु जब बुद्ध उसे भिक्षा पात्र थमाते हैं तो उसकी अस्वीकृति उसे वर्जित कर देती है और वह विक्षिप्त-सा वन की ओर चला जाता है। इससे पूर्व वह सुन्दरी का श्रृंगार-प्रसाधन कर रहा होता है और उससे प्यार भरी अठखेलियाँ कर रहा होता है और दूसरी ओर नेपथ्य से बौद्धों के समवेत स्वर से आतंकित भी होता रहता है।

बौद्धों का यह स्वर- 'धम्मं शरणं गच्छामि संघं शरणं गच्छामि बुद्धं शरणं गच्छ मे' उसकी चेतना को दो स्तरों में विभक्त कर देता है। एक ओर अनुपम लावण्यमयी सुन्दरी है और दूसरी ओर आध्यात्मिक शांति तथा उसका मन तरंगों में प्रवाहित होने लगता है। ये तरंगें उसके मानस-ताल की हैं जिसमें उसका मनरूपी हंस तैरता रहता है किन्तु अन्ततः उड़कर वह कमलताल को छोड़ गौतम बुद्ध की शरण में चला जाता है। नन्द के इस द्वन्द्व को अश्वघोष ने एक श्लोक में बड़े मार्मिक और सशक्त रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया है-
 
तं गौरवं बुद्ध गतं चकर्ष भार्यानुरागः पुनराचकर्षः। 
सोऽनिश्चयन्नापि ययौ न तस्यौ तरस्तरंगेष्विव राजहंसः।
 
अर्थात् बुद्ध का गौरव नन्द को अपनी ओर खींच रहा था और सुन्दरी का अनुराग अपनी ओर। इसी दुविधा में उससे न जाते बन रहा था न रुकते, उसकी स्थिति लहरों पर डोलते हुए राजहंस की सी हो रही थी।
 
सौन्दरनन्द के इसी काव्य-चित्र से राकेश जी ने अपने इस नाटक का शीर्षक लिया है। यह काव्य-चित्र इस नाटक के मूल द्वन्द्व-भाव को व्यंजित करता है। नाटक के इस नामकरण के पीछे जो प्रेरणा-स्रोत थे उनके विषय में नाटककार ने लिखा है-" अपने वर्तमान की संगति में ऐतिहासिक संदर्भ का जिस रूप में उपयोग किया जा सकता है यह बात तब मन में स्पष्ट होने लगी है-विशेषकर के इनके दो कथानकों को लेकर जो बहुत दिनों से-'आषाढस्य प्रथम दिवसे' (कालिदास का मेघदूत) तथा 'तरंस्तरंगेष्विव राजहंस' (सौन्दरनन्द) इन दो पंक्तियों के रूप में थे।"
 
इस दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो नाटक का नामकरण पूर्णत: संगत, सामान्य एवं सकारण है। नाटक की वस्तु-योजना में तो यह सकारणता पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है। नाटक में लहरों को नन्द एवं सुन्दरी के जीवन की परिस्थितियाँ माना जा सकता है और नन्द की आत्मा को उन परिस्थिति रूपी लहरों पर डोलता राजहंस कहा जा सकता है। नाटककार ने नन्द के साथ सुन्दरी को भी राजहंस माना है किन्तु नाटक में इस प्रतीक का पूर्ण निर्वाह नहीं हुआ है क्योंकि सुन्दरी का मन विचलित होकर भी अपने प्रवृत्ति मार्ग से विचलित नहीं हुआ है। वह प्रारम्भ से अन्त तक भोगवादिनी है। हाँ; नन्द का मन अस्थिर अवश्य है। वह नन्द को अपने प्रेमाकर्षण में उलझाये रखना चाहती है किन्तु आहत नन्द अन्ततः उड़ ही जाता है तो सुन्दरी कहती है-"क्या उनके पंखों में इतनी शक्ति रही होगी कि अपनी इच्छा से उड़कर कहीं चले जाते ? और जिस ताल में इतने दिनों से थे, उसका अभ्यास, उसका आकर्षण क्या इतनी आसानी से छूट सकता था ?"
 
स्पष्ट है कि सुन्दरी की स्थिति राजहंस जैसी नहीं है। यदि है तो केवल नन्द की । नद की चेतना ही श्यामांग के द्वारा आहत होती है। उसके आहत मन का स्पष्टीकरण करते हुए अलका कहती भी है-"सम्भव है आहत होना ही कारण रहा हो उनके उड़कर चले जाने का..!" अलका के इस तर्क को सुन्दरी भी स्वीकारती हुई कहती है- " फिर यह भी विचार आता है कि राजहंस आहत थे. कम से कम एक उनमें अवश्य आहत था।" और यह आहत हंस नन्द ही है जो आहत होने के कारण लहरों पर डोल नहीं पाता और मुक्त होने के लिए अलक्षित दिशा की ओर उड़ जाता है।
 
नाटक में कमलताल और उसके हंसों का प्रसंग अनेक बार आया है और उसने नाटकीय कथा को प्रभावित भी किया है। बल्कि मुख्य पात्र के द्वन्द्व से तो यह प्रसंग पूर्णत: सम्बद्ध है। जिससे नाटक के नामकरण की सार्थकता और सामान्यता स्वतः स्पष्ट हो जाती है। संध्याकाल में कामोत्सव के आयोजन की तैयारी हो रही है और दूसरे दिन देवी यशोधरा परिव्रज्या ग्रहण करने वाली हैं, यह प्रसंग चल ही रहा है कि तभी राजहंसों का कलरव सुनाई देता है और सुन्दरी व्यंग्यपूर्वक कहने लगती है- "इस स्वर की कहीं तुलना है ! कह नहीं सकती क्या अधिक सुन्दर है-ओस में लदे कमलों के बीच राजहंसों के इस जोड़े की किलोल या इस झुटपुटे अँधेरे में दूर से सुनायी देता इनका कूजन ! कोई गौतम बुद्ध से कहे कि कमलताल के पास आकर इनसे भी वे निर्वाण और अमरत्व की बात कहें। ये एक बार चकित दृष्टि से उनकी ओर देखेंगे, फिर काँपती हुई लहरें जिधर ले जाएँगी, उधर को तैर जाएँगे। शायद उस टिन एक बार गौतम बुद्ध का मन नदी-तट पर जाकर उपदेश देने को नहीं होगा।"
 
इस उद्धरण में जहाँ एक ओर राजहंसों के लहरों पर डोलने की बात बड़ी सार्थक लगती है वहाँ प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग के द्वन्द्व का भावी संकेत भी इसमें मिल जाता है और यह संकेत क्रमश: खुलता चला जाता है। कालान्तर में आहत नन्द गौतम बुद्ध के पास क्षमा-याचना करने जाता है और कुछ पल चकित होकर उनकी ओर देखता रह जाता है विमूढ़-सा, और फिर स्वतः ही उनके पीछे-पीछे चल देता है विहार के अन्दर और अन्ततः सुन्दरी का हंस उड़ जाता है। श्यामांग इसकी घोषणा बहुत पहले ही कर देता है और इस घोषणा में नाटक के नामकरण की सार्थकता भी छिपी है-"वहाँ देखा, ताल की लहरों पर वह छाया उतर रही है। लहरें उसमें गुम हुई जा रही हैं; कमलनाल, कमलपत्र सब उसमें खोये जा रहे हैं। मुझे लगा कि वह छाया धीरे-धीरे उन सबको लील जायेगी, ताल में तैरते हुए राजहंसों के जोड़े को भी। मुझे डर लगा। मैं छाया पर पत्थर फेंकने लगा।" और श्यामांग की यह आशंका अंत में सच निकलती है। हंस उड़ जाते हैं।

श्यामांग का ज्वर-प्रलाप भी लहरों को प्रतीक रूप में प्रस्तुत करता है और इससे नन्द के द्वन्द्व को गहराई मिलती है। श्यामांग कहता है- "इन लहरों पर से लहरों पर से यह छाया हटा दो मुझसे यह छाया नहीं ओढ़ी जाती...।" यह छाया है गौतम बुद्ध की जो नन्द के मन-रूपी हंस पर छाती जा रही है। छाया हंसों को लील रही है और लहरें एक आवर्त के रूप में घूम रही हैं। नन्द के अन्तर्द्वन्द्वग्रस्त मन की यही स्थिति है, तभी तो श्यामांग कहता है-"पानी की लहरों का स्वर सब कुछ एक आवर्त में घूम रहा है ।" यह लहरों का आवर्त नन्द को घेर लेता है और उसमे घिरा नन्द अपने को मुक्त करने को उद्यत हो उठता है किन्तु आहत होने के कारण जिस प्रकार हंस लहरों के विरुद्ध नहीं चल पाता, उसी प्रकार नन्द भी अपने विद्रोह को मुखर नहीं कर पाता-"मुझमें साहस नहीं है........ किसी में साहस नहीं है। लहरों में पानी नहीं है कहीं भी पानी नहीं है.....।" और नन्द का द्वन्द्व बढ़ता चला जाता है और अंततः हंसों को मुक्त होने के लिए कमलताल छोड़ देना पड़ता है। उसी प्रकार नन्द भी सुन्दरी के प्रेम-पाश से भागकर गौतम बुद्ध की शरण में जाकर फिर लौट आता है और एक अलक्षित दिशा की ओर चला जाता है।
 
इस प्रकार यह अन्तर्द्वन्द्व नन्द को न इधर का रखता है न उधर का। न वह सुन्दरी के पास रह पाता है, न बौद्ध प्रत को स्वीकार कर पाता है। अन्त तक उसकी चेतना दो दर्शनों के मध्य लटकती रह जाती है और उसका मन लहरों पर डोलते राजहंस की भाँति बना रहता है। इसी द्वन्द्वात्मक स्थिति में वह कहता है-
 
लगता है मैं चौराहे पर खड़ा एक नंगा व्यक्ति हूँ जिसे सभी दिशाएँ लील लेना चाहती हैं और अपने को ढकने के लिए उसके पास कोई आवरण नहीं है। परन्तु....... मैं इस असहायता की स्थिति में नहीं रह सकता। जीने की इजा को कितने-कितने प्रश्नों ने एक साथ घेर लिया है...।"और नन्द अपने प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए पुनः बुद्ध के पास चला जाता है। उसका मन रूपी हंस अपने प्रश्नों के समाधान पाने के लिए उड़ जाता है। उसके प्रश्नों का उत्तर उसे मिला या नहीं, यह अलग बात है। इस प्रकार नाटक का नामकरण द्वन्द्व को मुखर करने में सहायक हुआ है। अस्तु 'लहरों के राजहंस' का यह नामकरण सार्थक एवं साभिप्राय है।

संक्षेप में कहें तो, मोहन राकेश ने इस नाटक का नाम किसी पात्र या स्थान के नाम पर न रखकर, इसके मूल भाव (Theme) पर रखा है। 'लहरों के राजहंस' शीर्षक दर्शक या पाठक को नाटक की मूल संवेदना से सीधे जोड़ता है। कौतूहल, काव्यात्मकता और दार्शनिकता से युक्त होने के कारण यह नामकरण शत-प्रतिशत सार्थक और सटीक है।

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