धार्मिक सहिष्णुता पर निबंध धार्मिक सहिष्णुता किसी भी सभ्य, मानवीय और प्रगतिशील समाज की बुनियाद होती है। इसका सीधा और सरल अर्थ है अपने धार्मिक विश्वासो
धार्मिक सहिष्णुता पर निबंध
धार्मिक सहिष्णुता किसी भी सभ्य, मानवीय और प्रगतिशील समाज की बुनियाद होती है। इसका सीधा और सरल अर्थ है अपने धार्मिक विश्वासों पर अडिग रहते हुए दूसरों के धर्म, आस्था, पूजा पद्धति और विचारों के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता का भाव रखना। यह केवल दूसरे धर्मों को 'सहन' करने या उन्हें झेलने की मजबूरी नहीं है, बल्कि यह इस बात की गहरी समझ है कि सत्य के मार्ग अनेक हो सकते हैं और हर मनुष्य को अपनी चेतना के अनुसार ईश्वर या साधना का मार्ग चुनने का मौलिक अधिकार है। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने धार्मिक कट्टरता को अपनाया, वे आंतरिक संघर्षों, गृहयुद्धों और विनाश की आग में झुलस गए, जबकि जिन्होंने सहिष्णुता को अपनी जीवनशैली बनाया, वे ज्ञान, समृद्धि और शांति के शिखर पर पहुंचे।
विभिन्न धर्मों का मूल तत्व और मानवीय दृष्टिकोण
मानव इतिहास में विभिन्न भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण अनेक धर्मों, संप्रदायों और विचारधाराओं का उदय हुआ। इन सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मनुष्य को नैतिक बनाना, उसमें करुणा का संचार करना और समाज में व्यवस्था बनाए रखना था। जब हम गहराई से विचार करते हैं, तो पाते हैं कि सभी प्रमुख धर्म प्रेम, दया, सत्य, अहिंसा और मानवता की सेवा का ही संदेश देते हैं। बाहरी कर्मकांड, पहनावा, भाषा और पूजा की विधियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन उनका आंतरिक तत्व एक ही है। धार्मिक सहिष्णुता इसी आंतरिक तत्व को पहचानने और बाहरी विविधताओं को उत्सव की तरह स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। जब कोई व्यक्ति या समाज इस सत्य को भूलकर केवल बाहरी प्रतीकों को ही सर्वोपरि मान लेता है, तब कट्टरता का जन्म होता है, जो अंततः समाज को टुकड़ों में बांट देती है।
भारतीय संस्कृति और 'सर्व-धर्म समभाव'
भारत हिन्दू बहुल देश होते हुए भी इस्लाम, जैन, बौद्ध और सिख धर्म का गढ़ रहा है। हिन्दुत्व भारत में किसी धर्म का नाम नहीं, जीवन शैली का नाम है। भारतीय संस्कृति के पर्याय शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व, अन्तर्राष्ट्रीय भ्रातृत्व और एकता की बात पश्चिम में भी पिछले कुछ वर्षों से शुरू हुई है।लेकिन 'वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा और सब की खैर माँगने वाली हमारी परम्पराएँ सदियों से चली आ रही हैं।भारत एक धार्मिक सहनशीलता वाला राष्ट्र है; यहाँ के वेद ग्रंथों ने सारी सृष्टि व समस्त मानव जाति के कल्याण की कामना की है-
"सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु, मा कश्चित दुःख भाग भवेत् ।।"
गुरूओं, पीरों और देवी-देवताओं की इस भारत भूमि पर विभिन्नताएँ हमारी जीवंतता, समृद्धि और वैचारिक स्वतन्त्रता की सूचक हैं। भौगोलिक और सामाजिक भिन्नताएँ हमें कमजोर नहीं, शक्तिशाली बनाती हैं। हमारे खान-पान, भाषा, पहनावे और रीति-रिवाजों के साथ-साथ उपासना पद्धतियाँ और धार्मिक निष्ठाएँ भी विभेदों से भरी पड़ी हैं फिर भी धार्मिक एकता और सहिष्णुता का ऐसा अदृश्य बंधन है जो सारे राष्ट्र को एक सुदृढ़ सांस्कृतिक डोरी से बाँधे रहता है।
मीरा, कबीर,रामानन्द, भूषण, भारती और दूसरे महाकवियों, लेखकों को क्षेत्रों, धर्मों, जातियों और भाषाओं के बन्धनों में नहीं बाँधा जा सकता। ये सभी भारतीय संस्कृति के वरद पुत्र हैं। इनकी रचनाओं ने सारे भारत को 'एक' रूप में देखा है। विभिन्नताओं के बावजूद भारतीय दर्शन एक है।हमारे पर्व, त्योहार सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ता देते हैं। यहाँ होली हिन्दू, मुसलमान, जात-पांत और छोटा-बड़ा नहीं देखती; दीपावली सारे भारत को रोशन करती है; ईद सभी मतावलंबियों के हृदयों में उल्लास और हर्ष का संचार करती है। गुरुद्वारे के द्वार सभी धर्मों और जातियों के लोगों को आमंत्रित करते हैं। भारतीय संस्कृति सुदृढ़ आधारों, परम्पराओं, मान्यताओं और दर्शन के स्तभों पर खड़ी है इसलिए शाश्वत है । उदार व समय के साथ चलने वाली और सभी को अपना लेने वाली इस संस्कृति का आक्रांतकारी कुछ न बिगाड़ पाए ।
संयम, अहिंसा, सन्तोष और धार्मिक सहनशीलता के गुणों से ओत-प्रोत भारतीय संस्कृति वास्तव में मानव की श्रेष्ठता की द्योतक है, मानव मूल्यों से सम्पन्न है और सर्व-धर्म समभाव की अवधारणा की पोषक है। 'त्याग के साथ उपभोग' हमारी संस्कृति की परम्परा है। भारतीय संस्कृति धार्मिक सहनशीलता और सहिष्णुता के इस आदर्श का अनुपालन करती है।
वैश्विक संदर्भ में सहिष्णुता की प्रासंगिकता
आज के वैश्विक संदर्भ में धार्मिक सहिष्णुता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। वैश्वीकरण के कारण आज दुनिया एक वैश्विक गाँव में बदल चुकी है, जहाँ अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के लोग एक साथ काम कर रहे हैं और रह रहे हैं। ऐसे में यदि वैचारिक संकीर्णता और धार्मिक विद्वेष को बढ़ावा दिया जाएगा, तो यह न केवल स्थानीय शांति को भंग करेगा बल्कि वैश्विक विकास को भी रोक देगा। धार्मिक असहिष्णुता से समाज में अविश्वास, भय और घृणा का माहौल बनता है, जिससे रचनात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। इसके विपरीत, जहाँ सहिष्णुता होती है, वहाँ विभिन्न विचारों के मिलन से नए दृष्टिकोण पैदा होते हैं, विज्ञान और कला को बढ़ावा मिलता है, और आर्थिक प्रगति के रास्ते खुलते हैं।
सुधार के उपाय और समाज की भूमिका
धार्मिक सहिष्णुता को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए शिक्षा और पारिवारिक संस्कारों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। बच्चों को बचपन से ही केवल अपने धर्म की श्रेष्ठता सिखाने के बजाय सभी धर्मों के अच्छे मूल्यों और उनके प्रति सम्मान का भाव सिखाया जाना चाहिए। मीडिया और सोशल मीडिया को भी जिम्मेदारी से काम करते हुए ऐसी सामग्रियों से बचना चाहिए जो समाज में वैमनस्य फैलाती हैं। कानून और प्रशासन की भूमिका भी इसमें अहम है, ताकि धर्म के नाम पर नफरत फैलाने वाले तत्वों पर लगाम कसी जा सके।
अंततः, धार्मिक सहिष्णुता कोई थोपी गई व्यवस्था नहीं बल्कि एक आंतरिक चेतना है। जब तक हर नागरिक यह महसूस नहीं करेगा कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता दूसरे की स्वतंत्रता का सम्मान करने में ही सुरक्षित है, तब तक एक आदर्श समाज का निर्माण असंभव है। हमें यह समझना होगा कि धर्म जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं, और मानवता से बड़ा कोई दूसरा धर्म नहीं हो सकता।


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