गरीबी मौत से भी भयानक होती है विषय पर हिंदी निबंध

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गरीबी मौत से भी भयानक होती है विषय पर हिंदी निबंध मानव जीवन में दुख के अनेक रूप हैं, परंतु इनमें सबसे क्रूर और लंबा दुख गरीबी का है।

गरीबी मौत से भी भयानक होती है विषय पर हिंदी निबंध


मानव जीवन में दुख के अनेक रूप हैं, परंतु इनमें सबसे क्रूर और लंबा दुख गरीबी का है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि गरीबी मौत से भी अधिक भयानक होती है। मौत तो एक क्षणिक घटना है, वह पीड़ा को समाप्त कर देती है, लेकिन गरीबी जीवित रहते हुए प्रतिपल मृत्यु की पीड़ा देती है। वह मनुष्य को शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से तोड़ देती है, फिर भी उसे जीने के लिए मजबूर करती है। यह एक ऐसी यातना है जो न तो रात में नींद आने देती है और न दिन में चैन।

हमारे देश को स्वतंत्र हुए लगभग 70 वर्ष हो चुके हैं, किन्तु इस अवधि में गरीबी कम होने के स्थान पर बढ़ी है, दूसरी ओर धनी वर्ग और भी अवधि धनी होता जा रहा है, परिणामस्वरूप लाखों-करोड़ों लोग भोजन, वस्त्र एवं आवास के लिए तरस रहे हैं।

गरीबी मौत से भी भयानक होती है विषय पर हिंदी निबंध
यद्यपि राष्ट्र ने गत वर्षों में पर्याप्त आर्थिक प्रगति की है तथापि गरीबी के अभिशाप से मुक्त होने में वह पूर्णतया असफल रहा है। इसका प्रमुख कारण शासन की दूषित आर्थिक नीतियाँ हैं जिसके परिणामस्वरूप गरीबी मिटाने का शासकीय संकल्प फलीभूत नहीं हो पाया है। यदि राष्ट्र के आर्थिक विकास का लाभ उद्योगपतियों तथा पूँजीपतियों को ही मिलता रहेगा, निर्धन वर्ग को नहीं पहुँचेगा और जन-जन को पेट भरने के लिए भोजन, तन ढकने के लिए वस्त्र तथा निवास के लिए मकान उपलब्ध नहीं होगा, तो फिर लोकतंत्र की उनके लिए क्या उपादेयता ?

भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की 75 प्रतिशत से अधिक जनता गाँवों में रहती है। भारतीय किसान जो हमारा अन्नदाता है, दुर्भाग्य से वह भूखा है। दुनिया का पेट भरकर भी वह अपने लिए अन्न नहीं जुटा पाता। भूख और गरीबी उसके जीवन-संगी हैं। मुंशी प्रेमचंद के अनुसार 'एक किसान अभाव और विवशता के बीच जन्मता है तथा इसी स्थिति में चल बसता है। घर के नाम पर किसानों के पास घास-फूस की झोंपड़ी है, जिसमें वह सर्दी, लू और वर्षा की मार सहता है।'

हालांकि कुछ लोग गरीबी से निकलकर सफल होते हैं, लेकिन वे अपवाद हैं। अधिकांश गरीब पीढ़ी दर पीढ़ी इसी चक्र में फंसे रहते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं महंगी होने के कारण यह चक्र और मजबूत होता जाता है। समाज को समझना चाहिए कि गरीबी केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक असफलता है। जब तक हम गरीबी को जड़ से नहीं मिटाते, हमारा कोई भी विकास सार्थक नहीं होगा।

किसानों की निर्धनता के कारण-किसानों की निर्धनता के अनेक कारण हैं। पहला अशिक्षित होने के कारण न तो वह खेती के उन्नत तरीकों को जानता है, और न अपने अधिकारों के प्रति सजग है। परिणामस्वरूप उसकी पैदावार अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है। दूसरे उसकी सरलता का लाभ उठाकर साहूकार, व्यापारी और आढ़ती उसे खूब लूटते हैं। तीसरे, किसानों में संगठन का अभाव है। वे बात-बात पर परस्पर लड़ते-झगड़ते हैं और सारा धन कचहरियों में दफन कर आते हैं। संगठन के अभाव में यह सरकार से गेहूँ, चावल, मकई, बाजरा का उचित मूल्य नहीं ले पाते। चौथे, सरकार की सारी योजनाएँ नगर- केन्द्रित हैं, इसलिए किसानों को हर बात के लिए नगरों का मुँह देखना पड़ता है। इसी कारण कृषि का विकास उद्योग के स्तर पर नहीं हो पाया। किसान के पतन का पाँचवाँ कारण उसका अंधविश्वासी होना है।

देश की उन्नति किसान की उन्नति से जुड़ी हुई है, इसलिए किसान को उन्नत बनाना आवश्यक है। इसके लिए पहल किसानों को ही करनी पड़ेगी। सौभाग्य से किसानों की आवाज को देखते हुए सरकार उचित एवं आवश्यक कदम उठा रही है। आशा है जल्द ही किसान की दशा में संतोषजनक प्रगति हो सकेगी। गरीब किसान कभी-कभी भुखमरी के कगार पर पहुँच जाता है तो आत्महत्या तक कर लेता है। अतः गरीबी मौत से भी भायनक होने के साथ-साथ देश के लिए भी अत्यन्त हानिकारक है।

अंत में यही कहना पर्याप्त है कि मौत प्रकृति का नियम है, वह अनिवार्य है और निश्चित समय पर आती है। लेकिन गरीबी मनुष्य द्वारा निर्मित अभिशाप है, जिसे दूर किया जा सकता है। फिर भी हम इसे सहन करते जा रहे हैं। गरीबी मौत से इसलिए भी भयानक है क्योंकि वह मौत को भी बार-बार याद दिलाती है—कि जीवन कितना कष्टपूर्ण हो सकता है। अगर हम सचमुच मानवता में विश्वास रखते हैं, तो हमें इस अभिशाप के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए। क्योंकि एक समाज तभी सभ्य कहलाता है जब उसमें कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए, कोई भी बच्चा सपने देखने से वंचित न हो और कोई भी बुजुर्ग असहाय न मरे। गरीबी को जितना जल्दी हम हरा देंगे, उतना ही जल्दी हम वास्तविक मानवता की ओर बढ़ेंगे।

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