प्रथम विश्व युद्ध के कारण | Causes of First World War प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक था।
प्रथम विश्व युद्ध के कारण | Causes of First World War
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) मानव इतिहास की सबसे विनाशकारी घटनाओं में से एक था। यह किसी एक अकेली घटना का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे दशकों से सुलग रहे कई गहरे और जटिल कारण थे।जहाँ तक युद्ध के उद्देश्य का प्रश्न था मूल रूप से यह युद्ध आस्ट्रिया और सर्विया का टकराव था। केवल यह समझा गया था कि आस्ट्रिया के साम्राज्य को सर्विया से सुरक्षित रखने के लिये और पूर्वी योरोप तथा बाल्कन क्षेत्रों में रूसी महात्वाकांक्षाओं की पूर्ति को रोकने हेतु यह युद्ध लड़ा जा रहा है। प्रारम्भ में उसे सुरक्षात्मक युद्ध कहा गया ।
राजनीतिज्ञों का विचार था कि निश्चित उद्देश्य के पूर्ति के बाद यह युद्ध समाप्त हो जायेगा । लेकिन गुटीय राजनीति के प्रभाव से युद्ध का स्वरूप एवं प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन विस्तृत होता गया और युद्ध ने महायुद्ध का रूप ले लिया । इस प्रथम महायुद्ध या विश्व युद्ध के आरम्भ होने के निम्नलिखित कारण थे -
गुटबन्दी तथा गुप्त संधियाँ
प्रो० यस० वी. फे. ने लिखा है कि - "महायुद्ध का सबसे बड़ा एक कारण गुप्त संधियों की प्रणाली थी जिसका विकास फ्रान्स - प्रशा युद्ध के बाद हुआ ।' 1879 में जर्मनी ने आस्ट्रिया से गुप्त संधि कर द्विगुट का निर्माण किया । 1882 में इटली भी इस संधि में शामिल हो गया जिससे त्रिगुट बना । विस्मार्क के पतन के बाद रूस और फ्रान्स ने 1894 में एक समझौते द्वारा अलग गुट का निर्माण किया । इंग्लैण्ड अब योरोप में अपने को अकेला महशूस करने लगा था, जिससे मुक्ति पाने हेतु उसने जर्मनी से समझौते का असफल प्रयास किया। बाद में उसने 1902 में जापान से 1904 में फ्रान्स से तथा 1907 में रूस से संधि करके एक अलग त्रिगुट का निर्माण किया । इधर जर्मनी ने तुर्की को अपनी ओर मिला लिया । इन सब गुटबन्दियों के कारण सम्पूर्ण योरोप दो खेमें में बँट गया । एक ओर इग्लैण्ड, फ्रान्स, रूस और जापान थे और दूसरी ओर जर्मनी, आस्ट्रिया, इटली और टर्की थे। दोनों दल एक दूसरे को सन्देह, घृणा और द्वेषपूर्ण दृष्टि से देखते थे । दोनों गुटों की आपसी शत्रुता की चरम परिणति 1914 का प्रथम विश्व युद्ध रहा।
उग्र राष्ट्रीयता
प्रथम विश्व युद्ध का दूसरा आधारभूत कारण उग्रराष्ट्रीयता थी । इस उग्र राष्ट्रीयता के नशे के अन्तर्गत आने वाले राष्ट्र का व्यक्ति यह सोचने लगता है कि वे संसार में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हैं, उनकी सभ्यता, धर्म, परम्परा और भाषा संसार में सबसे उन्नत है । उनका जन्म इस संसार में इसलिये हुआ है कि वे विश्वभर में अपने प्रभाव का विस्तार करके अन्य जातियों को सभ्यता का पाठ पढ़ायें। इस प्रकार की उग्र राष्ट्रीयता क नशा प्रथम विश्व युद्ध के पूर्व जर्मनी, फ्रान्स, इंग्लैण्ड आदि शक्तिशाली देशों पर ही नहीं बल्कि बाल्कन प्रायद्वीप के यूनान, बल्गेरिया, सर्विया इत्यादि छोटे-छोटे देशों पर भी चढ़ चुका था । ये बृहत्तर यूनान, बृहत्तर बल्गेरिया तथा बृहत्तर सर्विया के निर्माण का स्वप्न देखने लगे थे । इन देशों की उग्र राष्ट्रीयता के अलावा चेक, पोल, स्लाव इत्यादि अनेक योरोपीय जातियाँ भी अपनी राष्ट्रीय आकांक्षा की पूर्ति हेतु योरोप में अशान्ति पैदा कर रही थीं ।
साम्राज्यवाद
औद्योगिक क्रान्ति के कारण योरोपीय देशों के सम्मुख तैयार माल की खपत और कल कारखानों के लिये कच्चे माल की प्राप्ति की समस्या उत्पन्न हुई जिसका हल उन्हें साम्राज्य विस्तार में ही दिखायी दिया ।
योरोप के सभी राज्यों की उपनिवेशवादी भावनाओं के कारण उनमें आपस में प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हो गयी । संसार के प्रत्येक कोने से व्यापार बाजार स्थापित करने का प्रयास प्रारम्भ हुआ । बाजार स्थापित करने की प्रतिस्पर्द्धा भी विश्व युद्ध का एक कारण बनी । व्यापार-बाजार स्थापित करने के प्रयास में जर्मनी और इंग्लैण्ड एक दूसरे के प्रबल विरोधी बन गये । इस प्रयास में जर्मनी तथा इंग्लैण्ड ने अपनी नाविक शक्ति को बढ़ाने का प्रयास प्रारम्भ किया । उपनिवेश विस्तार के लिये किये जाने वाली तैयारी से भी देशों के सम्बन्ध आपस में बिगड़ते चले गये । अन्त में इस बिगड़े हुए सम्बन्ध ने विश्व युद्ध आमंत्रित किया ।
सैनिकवाद
राष्ट्रीयता एवं साम्राज्यवाद की मनोवृत्ति ने यूरोपीय राष्ट्रों का ध्यान सैनिकवाद की तरफ आकर्षित किया। सभी देश उस मनोवृत्ति की पूर्ति हेतु सैनिक शक्ति बढ़ाने का प्रयत्न करने लगे । फ्रान्स, जर्मनी आदि प्रमुख योरोपीय राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय आय का 85% तक का भाग सैनिक तैयारी पर व्यय करने लगे । योरोप के अधिकांश देश 'अधिकाधिक हथियार निर्माण में संलग्न थे।
युद्ध सामग्री के उत्पादन एवं सैनिक तैयारी ने साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा को और अधिक बढ़ाया । प्रत्येक राष्ट्र अपने तथा अपने सहयोगी राष्ट्रों की सैनिक सहायता पर विश्वास करके किसी भी सीमा तक जाने के लिये तैयार था। बढ़ते हुए सैन्यवाद को देखकर रूसी राजनीतिज्ञ काउण्ट बिटे ने कहा था - "यह सब कब और कैसे समाप्त होगा ? मात्र युद्ध एक मुद्दा दिखलायी देता है ।" इस प्रकार शस्त्रीकरण एवं सैन्यवाद ने योरोप को बारूद के एक विशाल ढेर में बदल दिया, जिसे विस्फोट के लिये साधारण चिनगारी की आवश्यकता थी ।
समाचार पत्रों द्वारा उत्तेजना का प्रसार
प्रो. फे ने युद्ध के कारणों में समाचार पत्रों द्वारा उत्तेजना बढ़ाने को प्रमुख स्थान दिया है। इस विषय में फे (Fay) ने लिखा है कि "युद्ध का एक कारण सभी बड़े देशों में समाचार पत्रों के द्वारा जनता की विचारधारा को दूषित करना था ।" जनमत निर्माण में समाचार पत्रों की प्रमुख भूमिका होती है । जब कभी समाचार पत्रों ने अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिये दूसरे देशों के जनमत पर मार्मिक आघात किया तब साधारण समस्यायें जटिल बन गयी एवं संघर्ष की सम्भावनायें बढ़ गयीं । इंग्लैण्ड, फ्रान्स, जर्मनी, इटली, रूस तथा अन्य देशों के समाचार पत्रों ने देशभक्ति को सजग बनाये रखने के लिये उत्तेजनाओं को मिटने नहीं दिया ।
मोरक्को संकट
अफ्रीका में फ्रेन्च उपनिवेशों की स्थिति को सुदृढ़ करने के लिये फ्रांस अफ्रिका में मोरक्को पर अधिकार बनाये रखने के लिये बड़ी तेजी से कार्य कर रहा था । 1904 में फ्रान्स के विदेश मंत्री वेल्कासे ने इंग्लैण्ड तथा स्पेन से संधि कर अपनी स्थिति मजबूत कर ली । इस संधि के बाद जर्मनी अत्यन्त चिन्तित हुआ क्योंकि इससे अफ्रीका में उसके उपनिवेशों को हानि पहुँचने का भय था । 1905 में मोरक्को में हुए विद्रोह को दबाने के लिये फ्रान्स ने सेना भेजी, जिसका जर्मनी ने घोर विरोध किया । मोरक्को के प्रश्न पर जर्मनी ने फ्रान्स को एक सम्मेलन बुलाने के लिये कहा । 1906 में अल्जेसिराज के सम्मेलन में सभी बड़े देशों ने मोरक्को पर फ्रान्स को स्पेन के साथ मिलकर शान्ति सुरक्षा स्थापित करने का दायित्व सौंपा। इस निर्णय से जर्मनी चिढ़ गया ।
1908 में मोरक्को के सुल्तान को उसके भाई ने गद्दी से उतार 7. अगादीर संकट कर स्वयं सुल्तान बन गया। मोरक्को की जनता ने नये सुल्तान के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तब नये सुल्तान ने फ्रान्स से सहायता माँगी । 1911 में फ्रान्स ने मोरक्को में सेना भेजा दी जो स्थिति शान्त होने के बाद भी डटी रही। इस पर जर्मनी ने अपना एक युद्ध पोत पैन्थर (Panther) मोरक्को के अगादीर नामक बन्दरगाह पर बन्दरगाह की रक्षा करने के उद्देश्य का बहाना बनाकर भेजा । अगादीर संकट से भी युद्ध छिड़ सकता था, किन्तु ग्रेट ब्रिटेन ने इस समय फ्रान्स का समर्थन किया, अतः जर्मनी दब गया और जर्मन लोग अगादीर से हट गये अगादीर संकट टलने के बाद जर्मनी एवं फ्रान्स ने बातचीत शुरू की जिसके फलस्वरूप कार्मनी ने मोरक्को के ऊपर फ्रान्स का शासन इस शर्त के साथ स्वीकार कर लिया कि अन्य देश भी मोरक्को में मुक्त व्यापार कर सकेंगे। 1912 में फ्रान्स ने मोरक्को को अपना संरक्षित राज्य (Protectorate) घोषित कर दिया, लेकिन जर्मनी एवं फ्रान्स के कटु सम्बन्ध बढ़ते गये जो भावी युद्ध का कारण बना ।
बाल्कन युद्ध
प्रथम तथा द्वितीय बाल्कन युद्धों के बाद योरोप की स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। सर्विया को इस युद्ध के बाद अत्यधिक भू-भाग का लाभ प्राप्त हुआ जिसका अप्रत्यक्ष लाभ रूस को मिला। इस युद्ध में आस्ट्रिया एवं जर्मनी का अधिक अहित हुआ । अतः यह स्पष्ट हो गया कि यदि आस्ट्रिया व जर्मनी अपने हितों की पूर्ति का प्रयास करेंगे तो एक नया युद्ध अवश्य शुरू होगा ।
अन्तर्राष्ट्रीय संस्था का अभाव
प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के समय तक विश्व में कहीं भी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था की स्थापना नहीं हो पायी थी, जिसके द्वारा विभिन्न देशों की समस्याओं को शान्ति पूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता। इस प्रकार की संस्था के अभाव में राष्ट्रों का आपसी वैमनस्य बढ़ता गया, जिसका अन्त विश्व युद्ध के रूप में हुआ।
तात्कालिक कारण
राजकुमार फर्डिनेन्ड की हत्या : वोस्निया को 1908, में आस्ट्रिया ने अपने साम्राज्य का अंग बना लिया था । आस्ट्रिया की गद्दी का उत्तराधिकारी राजकुमार फर्डिनेन्ड अपनी पत्नी सहित अपने साम्राज्य के नवीन प्रान्त की यात्रा में गया। वहीं पर 28 जून 1914 को वोस्निया की राजधानी सराजेवो (Serajevo) में एक सर्व क्रान्तिकारी ने फर्डीनेन्ड एवं उसकी पत्नी को बम से मार दिया । आस्ट्रिया को पूरा विश्वास था कि इस हत्या के पीछे सर्विया का हाथ था।
युवराज की हत्या से आस्ट्रिया की जनता सर्विया के विरुद्ध युद्ध के लिये उत्तेजित हो उठी।आस्ट्रिया साम्राज्य के स्थायित्व में सर्विया बाधक था । अतः सर्विया को कुचल डालने का अच्छा मौका आस्ट्रिया को मिल गया ।
आस्ट्रिया ने सर्विया को एक कड़ी चेतावनी भेजी एवं 48 घंटे के अन्दर इसके उत्तर की माँग की। सर्विया ने चेतावनी की लगभग सभी माँगों को मानने की इच्छा जाहिर की एवं सुझाव दिया कि सारा झगड़ा हेग न्यायालय अथवा महाशक्तियों के पंच फैसले को सौंपा जाय, परन्तु आस्ट्रिया युद्ध के लिये कटिबद्ध था । महाशक्तियों ने भी समझौता कराने का प्रयास किया । परन्तु दोनों पक्षों में समझौता न हो सका। 28 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया ने सर्विया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध की शुरूआत हो गयी ।
प्रथम विश्व युद्ध के प्रारम्भ करने में जर्मनी का उत्तरदायित्व
प्रथम विश्व युद्ध किन कारणों से प्रारम्भ हुआ कह पाना संभव नहीं है क्योंकि अनेक कारणों के कारण यह युद्ध हुआ था । पर कुछ इतिहासकार एवं राजनीतिज्ञ इस विश्व युद्ध के लिए जर्मनी को ही दोषी मानते हैं। उनके अनुसार जर्मनी में राष्ट्रीयता की भावना सबसे उग्र थी जिसने अन्य राष्ट्रों के प्रति उसमें द्वेष की भावना भर दी । जर्मनी की इच्छा थी कि वह भी उपनिवेशों की स्थापना कर ब्रिटेन की तरह सम्पन्न राष्ट्र बने तथा विश्व पर उसका झंडा फहराये। इसके लिए उसने अपनी जल शक्ति को मजबूत करना शुरू किया । अपनी उग्र राष्ट्रीयता एवं सामरिक शक्ति के कारण उसने पूरे यूरोप में दहशत पैदा कर दी। विस्मार्क ने त्रिगुट संधि कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। विस्मार्क ने विभिन्न संधियों द्वारा यूरोप को विभिन्न गुटों में बाँट दिया। जर्मनी ने वाल्कन प्रदेश में विस्तारवादी नीति अपनाई तथा आस्ट्रिया को भी युद्ध के लिए उसकाया ।
अतः प्रथम विश्व युद्ध के लिए जर्मनी की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, पर इंगलैण्ड भी इस युद्ध के लिए कम दोशी नहीं है क्योंकि ब्रिटेन ने भी विश्व पर अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए त्रिगुट ऐक्य का गठन किया। फ्रांस भी अपना बदला जर्मनी, से लेना चाहता था, अतः वह भी त्रिगुट ऐक्य में शामिल हो गया। रूस भी बर्लिन की संधि के अपमान को भूला नहीं था। अतः यूरोप का प्रत्येक देश, विशेष रूप से प्रत्येक महाशक्ति इस युद्ध के लिए जिम्मेवार हैं।
इस प्रकार आर्चड्यूक की हत्या तो महज एक बहाना थी; असली वजह वह नफरत, अविश्वास, हथियारों की होड़ और गुप्त संधियां थीं जो यूरोप के देश पिछले कई दशकों से तैयार कर रहे थे। इसी वजह से यह युद्ध देखते ही देखते एक वैश्विक महायुद्ध में तब्दील हो गया।


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