जर्मनी का एकीकरण 19वीं सदी की यूरोप की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं में से एक था। इस पूरे घटनाक्रम के मुख्य सूत्रधार प्रशा (Prussia) के चांसलर ऑटो
जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क का योगदान | Otto von Bismarck unification of Germany
ओटोबान बिस्मार्क 19वीं शताब्दी का यूरोप का महान राजनीतिज्ञ था । उसने अपनी कूटनीति और राजनीति के बल पर एक तरफ तो जर्मनी का एकीकरण कर उसे महान देश बना दिया दूसरी तरफ अपनी नीति के बल पर अपने शत्रुओं को कमजोर कर दिया ताकि वे जर्मनी के विरुद्ध अपना सिर न उठा सकें।विस्मार्क 1862 से 1890 तक प्रशिया और जर्मनी का प्रधानमंत्री था।इस काल में उसकी विदेश नीति इतनी सफल रही कि यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्रों को उसका लोहा मानना पड़ा । विस्मार्क की विदेश नीति को दो भागों में बांटा जा सकता है । सन् 1862 से 1871 तक जर्मनी के एकीकरण के लिये अपनाई गयी विदेशनीति तथा 1871 से 1890 तक जर्मन राज्य की सुरक्षा और विकास के लिए निर्मित विदेश नीति।
प्रधानमंत्री बनते ही विस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण का प्रयास किया। वह प्रशिया के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण का आकांक्षी था । जर्मनी के एकीकरण के लिए उसे डेनमार्क, आस्ट्रिया एवं फ्रांस से युद्ध करना पड़ा जिसका वर्णन निम्नलिखित है -
डेनमार्क से युद्ध और श्लेशविग की प्राप्ति
जर्मन जाति की पूरी जनसंख्या वाली होलेस्टाइन तथा जर्मन जाति की बहुसंख्या वाला श्लेशविग प्रान्त डेनमार्क के अधीन थे । होलस्टाइन जर्मन परिसंघ का सदस्य था परन्तु श्लेशविंग नहीं था । श्लेशविंग के जर्मन लोग परिसंघ में सम्मिलित होना चाहते थे परन्तु यहाँ के कुछ निवासी इनके विरुद्ध थे । 1863 ई. में होलस्टाइन, श्लेशविग की इस समस्या के हल के लिए प्रशा ने आस्ट्रिया को अपनी ओर मिलाया । दोनों की संयुक्त सेनाओं ने 1864 ई. में डेनमार्क पर हमला कर दिया । डेनमार्क में विवश होकर दोनों ठिकानों को आस्ट्रिया एवं प्रशा को दे दिया ।
गेस्टीन समझौता - 14 अगस्त 1865 ई. को गेस्टीन समझौता द्वारा आस्ट्रिया को होलेस्टाइन और प्रशा को श्लेसविग प्रदेश प्राप्त हुआ । इस समझौते में भी विस्मार्क की कूटनीति झलकती है। श्लेसविग जिसमें तीन लाख जर्मन तथा डेढ़ लाख डेन लोग थे, प्रशा को मिल गया । 6 लाख की जर्मन जनसंख्या वाला प्रदेश आस्ट्रिया को दिया गया जिसे वह नियंत्रण में नहीं रख सकता था क्योंकि जर्मन जनसंख्या वाला प्रदेश होने के कारण यह प्रशा के साथ जर्मन संघ में रहना चाहता था ।
आस्ट्रिया के साथ युद्ध एवं होलस्टाइन की प्राप्ति
प्रशा का चांसलर विस्मार्क आस्ट्रिया का जर्मन राज्यों से प्रभुत्व समाप्त करने के लिए युद्ध का बहाना ढूढ़ रहा था । उसने आस्ट्रिया के सामने प्रश्न उठाया कि होलेस्टाइन की जनता खुश नहीं है । वह प्रशा में मिलना चाहती है। आस्ट्रिया ने होलतेस्टाइन की समस्या को संदिग्ध परिषद डायट में रखा । प्रशा ने इसे गेस्तीन समझैतो का उल्लंघन कह कर आस्ट्रिया पर आक्रमण कर दिया ।
साडोवा का युद्ध - 16 जून 1866 ई. को आस्ट्रिया के साथ लड़े गये इस युद्ध के पूर्व विस्मार्क ने कूटनीतिक तैयारी पूरी कर ली थी । पोलैण्ड के विरुद्ध विद्रोह में रूस की मदद कर उसने रूस की तटस्ता तथा फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय से स्वयम् भेंट कर उससे युद्ध में उसकी तटस्थता का बचन प्राप्त कर लिया था । नेपोलियन की कल्पना थी कि इस तटस्थता के बदले फ्रांस को कुछ भू - भाग अवश्य प्राप्त होंगे। युद्ध के बाद इटली को वेनेशिया का प्रदेश दिला देने का वचन देकर उसने इटली को अपनी तरफ से युद्ध में शामिल कर लिया था।
इस युद्ध में इटली की सेना ने आस्ट्रिया की सेना को विभाजित कर एक तरफ चेनेशिया में रोके रखा दूसरी तरफ प्रशा की सेना आस्ट्रिया सेना को जीतती चली गयी । होलेस्टाइन पर प्रशा ने अधिकार कर लिया। बहुत से जर्मन राज्य जो युद्ध में सम्मिलित थे उन पर प्रशा का अधिकार हो गया । अन्ततः पराजय के कगार पर खड़े आस्ट्रिया और प्रशा में प्राग की संधि की गयी ।
प्राग की संधि
प्राग की संधि में एक बार फिर विस्मार्क ने अपनी कूट नीतिज्ञता दिखलायी । इटली को तो आस्ट्रिया से वेनेशिया दिला दिया लेकिन स्वयम् उसने आस्ट्रिया की एक इंच भी भूमि नहीं ली। आस्ट्रिया को एक छोटी सी रकम युद्ध के हरजाने के रूप में देनी पड़ी । जर्मन संघ भंग कर दिया गया और इसके स्थान पर राइन नदी के उत्तर में स्थित सभी जर्मन राज्यों का एक उत्तरी जर्मन संघ गठित किया गया। इसमें आस्ट्रिया को सम्मिलित नहीं किया गया। इस संघ का नेतृत्व प्रशा को दिया गया । दक्षिण के राज्यों को स्वतंत्र छोड़ दिया गया ताकि वे अपनी इच्छा अनुसार निर्णय कर सकेंगे । प्रशा को भू. भागीय लाभ के रूप में श्लेषविग, होलेस्टाइन, होनोवर निर्णय हेसनासो और फ्रैंककर्ट प्राप्त हुए । इस प्रकार राइन नदी से पोलैण्ड के बीच के भू भाग पर प्रशा का शासन स्थापित हुआ ।
फ्रांस से युद्ध
प्राग की संधि द्वारा प्रशा ने जर्मनी से आस्ट्रिया को निष्कासित कर दिया परन्तु उसके साथ उदारवादी व्यवहार करके भविष्य के फ्रांसीसी युद्ध के समय उसे तटस्थ रहने के लिए खुश रखने का प्रयास किया । सम्पूर्ण उत्तर जर्मनी पर प्रशा के ढंग से प्रशासन में बाँध विस्मार्क ने फ्रांस से युद्ध की तैयारी शुरू कर दी । विस्मार्क के पास लगभग दस लाख की एक आक्रामक सेना थी । नेपोलियन क्षुब्ध था कि साडोना के युद्ध में उसे तटस्थता के बदले कुछ नहीं मिला । दोनों देशों में युद्ध का तनाव बढ़ रहा था । ऐसे में कालासागर में नौसेना रखने की छूट की उम्मीद देकर प्रशा ने रूस को तटस्थ कर दिया । सैडोवा तटस्थता के बदले नेपोलियन ने पालेटीनेट भाग की जो ववेरिया का अंग था विस्मार्क ने दक्षिण जर्मन के शासक को यह बताकर उसे नेपोलियन के विरुद्ध भड़का दिया । सारे दक्षिण जर्मन राज्य में नेपोलियन के प्रति अविश्वास बढ़ा । फ्रांस द्वारा वेल्जियम माँगे जानेपर उसके मित्र एवं तटस्ता के संरक्षक इग्लैण्ड को बताया गया और इग्लैण्ड ने भी फ्रांस के इरादे से भौचक्का होकर भावी युद्ध में तटस्थ रहने की ठान ली।
प्रशा के उदार व्यवहार एवं प्रशा का साथ देने पर रूस की तरफ से खतरे की बात को सोचकर आस्ट्रिया ने भी तटस्थ रहना निश्चित कर लिया । वेनेशिया पाकर इटली प्रशा का अभारी था । इस प्रकार इस समय यूरोप में फ्रांस अकेला पड़ गया ।
इसी समय स्पेन के विद्रोहियों ने रानी इसावेला को देश से भगा दिया। 2 जुलाई 1870 को यह समाचार पेरिस में पहुँचा कि प्रशा के राजा के सम्बन्धी होहेनजोलर्न लियोपाल्ड को स्पेन का राजमुकुट दिया जा रहा है । फ्रांस की संसद एवं समाचार पत्रों ने इसका विरोध किया। 12 जुलाई को लिये पार्ड ने अपना नाम वापस ले लिया । शान्ति स्थापित हो रही थी कि तभी फ्रांस की मंत्री परिषद ने अपना दूत भेज कर प्रशा नरेश से इसकी माँग की कि राजा वचन दें कि भविष्य में होहेनजोलर्न वंश का कोई उम्मीदवार स्पेन की गद्दी नहीं माँगेगा । राजा ने वचन देने से इंकार कर दिया । इस खबर को विस्मार्क ने इस ढंग से प्रकाशित करवाया कि प्रशा की जनता ने सोचा कि उसके राजा का अपमान हुआ है तथा फ्रांसीसियों ने सोचा कि उसके राजदूत को अपमानित किया है । तनाव इतना बढ़ा कि 15 जुलाई को फ्रांस ने बिना समुचित तैयारी के आक्रमण कर दिया ।
सिडान का युद्ध एवं नेपोलियन का पतन
इस युद्ध में दक्षिण जर्मनी की रियासतों ने प्रशा का साथ दिया । सितम्बर 1870 में सिडान के युद्ध में नेपोलियन तृतीय की पराजय हुई और प्रशा की सेना के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा । इस हार के बाद नेपोलियन तृतीय का पतन हो गया तथा फ्रांस में तृतीय गणतन्त्र की स्थापना हो गयी ।
फ्रैंकपर्ट की संधि
मई 1871 में फ्रैंकपर्ट की संधि द्वारा शान्ति स्थापित की गयी । संधि के अनुसार आल्सेस लारेन का प्रदेश जर्मनी को देना पड़ा । फ्रान्स ने हर्जाने के रूप में तीन वर्ष के अन्दर 20 करोड़ पौण्ड देने का वचन दिया। इस अवधि में जर्मन सेना फ्रांस के खर्च पर फ्रान्स में रहेगी ऐसा तय किया गया ।
युद्ध का परिणाम
जर्मनी का एकीकरण पूर्ण हो गया । 18 जनवरी 1871 ई. को वर्साय के महल में विलियम प्रथम को जर्मनी का सम्राट घोषित कर दिया गया । दक्षिण जर्मन राज्यों को जर्मन संघ में मिला लेने की व्यवस्था की गयी । इस प्रकार विस्मार्क ने रक्त एवं लौह के सफल प्रयोग से जर्मनी का राजनीतिक एकीकरण पूर्ण कर लिया। जर्मनी को यूरोपीय राष्ट्रों के मध्य प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हुआ।
1871 ई. में जर्मनी के एकीकरण के बाद विस्मार्क ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन कर जर्मन राज्य की सुरक्षा की नीति अपनाई।उसने घोषणा की कि जर्मनी पूर्ण राज्य है और उसे अब अपना राज्य विस्तार नहीं करना है। विस्मार्क जानता था कि फ्रांस का कमजोर रहना जर्मनी के राष्ट्र हित में है। उसने 1872 में रूस, आस्ट्रिया और जर्मनी के बीच एक संघ बनाया जिसे त्रिसम्राट संघ (Trei - Kaiser bund) कहा गया। इस संघ का उद्देश्य था - प्रादेशिक व्यवस्था की रक्षा करना, समाजवाद का दमन करना तथा पूर्वी समस्या का समाधान । छः वर्षो बाद रूस जर्मनी में मतभेद के कारण यह संघ टूट गया ।
सन् 1879 में विस्मार्क ने आस्ट्रिया के साथ संधि की जिसे द्विगुट संधि (Dual Alliance) कहा गया । संधि में निर्णय लिया गया कि यदि दोनों देशों में किसी पर भी फ्रांस आक्रमण करेगा तो दूसरा राष्ट्र तटस्थ रहेगा पर यदि रूस आक्रमण करेगा तो दोनों मिलकर लड़ेंगे। 1883 में विस्मार्क ने इस संघ में इटली को मिलाकर (Triple Alliance) बनाया । इस संधि के बाद 1883 में बिस्मार्क ने पुनः रूस से मित्रता किया तथा जर्मनी, रूस एवं आस्ट्रिया में समझौता हुआ। सन् 1887 में वाल्कन समस्या को लेकर आस्ट्रिया और रूस में मतभेद हो गया । विस्मार्क ने उसी वर्ष रूस से अलग संधि की जिसे पुन सुरक्षा संधि कहते हैं । फ्रांस एवं ब्रिटेन में मतभेद बना रहे इसके लिए विस्मार्क ने ब्रिटेन से अपना सम्बन्ध सुधारा। इस प्रकार से विस्मार्क ने अनेक देशों से संधियां कर जर्मनी को पूर्ण सुरक्षा प्रादान की। विस्मार्क ने अपनी संधियों द्वारा यूरोप में गुटबन्दी को प्रोत्साहन दिया जिसने भाविष्य के लिए युद्ध का बीज बो दिया।


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