आषाढ़ का एक दिन नाटक में व्यक्त जीवन दर्शन

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आषाढ़ का एक दिन नाटक में व्यक्त जीवन दर्शन यह नाटक महाकवि कालिदास के काल्पनिक जीवन पर आधारित है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक गाथा सुनाना नहीं

आषाढ़ का एक दिन नाटक में व्यक्त जीवन दर्शन


मोहन राकेश द्वारा रचित 'आषाढ़ का एक दिन' (1958) हिंदी आधुनिक नाटक का एक मील का पत्थर है। यह नाटक महाकवि कालिदास के काल्पनिक जीवन पर आधारित है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक गाथा सुनाना नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य के अंतद्वंद्व, नियति और जीवन के यथार्थ को उजागर करना है।

आषाढ़ का एक दिन, नाटक में नाटककार ने भौतिक दर्शन और प्रवृत्ति-मार्ग और निवृत्ति मार्ग घनीभूत द्वन्द्व का ही चित्रण किया है। नाटककार ने प्रवृत्ति-दर्शन के प्रति आग्रह प्रदर्शित कर इस सनातन सत्य को ही उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है कि भौतिकवादी दर्शन अपनी अस्थिरता, अनिश्चितता और निराधारता के कारण अन्त में निवृत्ति मार्गी दर्शन से पराजित हो ही जाता है। भोग कुछ समय तक मानव-मन को अपनी ओर आकृष्ट तो किये रहते हैं किन्तु अन्त में वे अपना महत्व खो देते हैं क्योंकि वे सत्य नहीं, क्षणिक हैं।भोगों के प्रति मानव-मन का आकर्षण क्षणिक होता है। निश्चय ही प्रवृत्ति की अपेक्षा निवृत्ति-मार्ग अधिक प्रभाव रखता है। नाटक में भौतिकवादी चार्वाक दर्शन और बौद्ध-दर्शन के द्वन्द्व को भी चित्रित किया गया है।

आषाढ़ का एक दिन नाटक में व्यक्त जीवन दर्शन
नाटक के प्रमुख पात्र कालिदास, मल्लिका और विलोम के जीवन-दर्शन में मूलतः भिन्नता है। कालिदास जहाँ प्रवृत्ति से ऊबकर निवृत्ति की ओर अग्रसर होते हैं, वहीं मल्लिका प्रवृत्ति-मार्ग पर ही विवश होकर आती है। वास्तव में कालिदास और मल्लिका एवं विलोम का द्वन्द्व-आकर्षण औचित्य का द्वन्द्वं है, आसक्ति और अनासक्ति का द्वन्द्व है। नाटक का कथानक एक ऐसे ऐतिहासिक काल पर आधारित है जिसे हम दर्शन का सन्धि-काल कह सकते हैं।

नाटक के दो प्रमुख पात्र कालिदास और मल्लिका क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति-मार्ग के प्रतिनिधि पात्रों के रूप में ही चित्रित हुए हैं। नाटक का नायक कालिदास भोगों से ऊबकर संन्यास ग्रहण करता है। मल्लिका भौतिक आवश्यकतावश विलोम के साथ रहने को विवश होती है।

आषाढ़ का एक दिन' नाटक कालिदास की कीर्ति और जीवन पर आधारित है। नाटककार ने इसमें स्पष्ट किया है कि भावात्मक प्रेम का आश्रय लेकर मनुष्य जीवन के यथार्थ से अलग नहीं रह सकता। कथानक की नायिका मल्लिका को विलोम के सामने आत्म-समर्पण करना ही पड़ता है। इस उद्देश्य को नाटककार ने प्रारम्भ में मल्लिका की माँ अम्बिका के द्वारा उठाया है -

मल्लिका - "मैंने भावना में एक भावना का वरण किया है। मेरे लिए वह सम्बन्ध और सब सम्बन्धों से बड़ा है। मैं वास्तव में अपनी भावना से प्रेम करती हूँ। जो पवित्र है, कोमल है, अनश्वर है ..........." 

अम्बिका -"तुम जिसे भावना कहती हो, वह केवल छलना और आत्म-प्रवंचना है। भावना ने भावना का वरण किया है। मैं पूछती हूँ, भावना में भावना का वरण क्या होता है ? उससे जीवन की आवश्यकताएँ किस प्रकार पूरी होती हैं।"

नाटककार ने सिद्ध किया है कि आवश्यकताओं की पूर्ति भावना से नहीं हो सकती है। आवश्यकताओं को यथार्थ में ही पूरा किया जा सकता है। मल्लिका को विलोम के समक्ष आत्म-समर्पण करना ही पड़ता है। वह कालिदास से कहती है- 'तुम जीवन से तटस्थ हो सकते हो, परन्तु मैं तो अब तटस्थ नहीं हो सकती। क्या जीवन को तुम मेरी दृष्टि से देख सकते हो ? जानते हो मेरे जीवन के ये वर्ष कैसे व्यतीत हुए थे ? मैंने क्या देखा है ? क्या से क्या हुई हूँ इस जीवन को देखते हो ? पहचान सकते हो ? यह मल्लिका है। जो धीरे-धीरे बड़ी हो रही है और माँ के स्थान पर अब मैं उसकी देखभाल करती हूँ। यह मेरे अभाव की सन्तान है। जानते हो मैंने अपना नाम खोकर एक विशेषण उपार्जित किया है और अब मैं अपनी दृष्टि में नाम नहीं केवल विशेषण हूँ।"
 
अंततः, यह नाटक एक गहरे अस्तित्ववादी दर्शन पर समाप्त होता है जहाँ हर व्यक्ति अपने निर्णयों के लिए स्वयं उत्तरदायी है, और नियति के आगे मनुष्य की बेबसी ही जीवन का अंतिम और शाश्वत सच बन कर उभरती है।

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