भारत के भविष्य का निर्माण गांवों के बच्चों के हाथों में है

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शिक्षा को देश के विकास की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, लेकिन आज भी बिहार के अनेक ग्रामीण इलाकों में यह नींव कमजोर दिखाई देती है।

गांव के स्कूल शहर से पीछे क्यों रह जाते हैं?


शिक्षा को देश के विकास की सबसे मजबूत नींव माना जाता है, लेकिन आज भी बिहार के अनेक ग्रामीण इलाकों में यह नींव कमजोर दिखाई देती है। शिक्षा मंत्रालय के UDISE+ आंकड़ों के अनुसार बिहार में 94 हजार से अधिक स्कूल हैं, जिनमें लगभग 2.1 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं। राज्य का छात्र-शिक्षक अनुपात लगभग 30:1 है, जो राष्ट्रीय औसत 24:1 से अधिक है। हालांकि पहले की अपेक्षा स्कूल के बुनियादी सुविधाओं में सुधार आया है, लेकिन अभी भी ऐसे कई स्कूल हैं जहां आज भी पुस्तकालय, खेल मैदान, कंप्यूटर, बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी है।

ग्रामीण और शहरी स्कूलों के बीच का अंतर केवल भवनों या संसाधनों का नहीं है, बल्कि अवसरों का भी है। शहरों के स्कूलों में बच्चों को बेहतर कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, इंटरनेट और पर्याप्त शिक्षक मिल जाते हैं, जबकि गांवों के सरकारी स्कूल अक्सर सीमित संसाधनों के सहारे चल रहे हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर पड़ता है। जब एक बच्चा शहर के आधुनिक स्कूल में स्मार्ट क्लास और विज्ञान प्रयोगशाला का उपयोग कर रहा होता है, वहीं गांव का बच्चा कभी-कभी टूटी बेंच, जर्जर भवन और शिक्षकों की कमी के बीच पढ़ने को मजबूर होता है।
गांव के स्कूल शहर से पीछे क्यों रह जाते हैं?

बिहार के सीतामढ़ी जिले के रामनगर गांव का माध्यमिक विद्यालय इस स्थिति की एक तस्वीर प्रस्तुत करता है। इस स्कूल में लगभग 800 बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए केवल 14 शिक्षक हैं। यानी एक शिक्षक के हिस्से औसतन 57 से अधिक छात्र आते हैं। ऐसे में प्रत्येक छात्र पर व्यक्तिगत ध्यान देना लगभग असंभव हो जाता है। कई बार शिक्षकों को एक साथ कई कक्षाओं को संभालना पड़ता है। इससे न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि बच्चों की सीखने की गति भी धीमी हो जाती है। शिक्षक अपनी पूरी क्षमता के बावजूद छात्रों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते। आठवीं में पढ़ने वाला एक छात्र अंकित बताता है कि स्कूल में टीचर अक्सर पढ़ाने से अधिक रजिस्टर भरने का काम करते हैं। कक्षाएं बहुत कम लगती हैं, लेकिन हमें रोजाना स्कूल आना जरूरी है। 

ग्रामीण स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या बुनियादी ढांचे की कमी है। कई स्कूलों में पर्याप्त कक्षाएं नहीं हैं, जिसके कारण बच्चों को एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के साथ बैठकर पढ़ना पड़ता है। बिहार के कई जिलों में निरीक्षण के दौरान यह सामने आया कि पांच-पांच कक्षाओं के बच्चों को एक ही कमरे में पढ़ाया जा रहा है। कहीं कहीं पीने के पानी की बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं है तो कहीं शौचालय उपयोग के योग्य नहीं हैं। ऐसे माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना कठिन हो जाता है।

इस समस्या का सबसे अधिक असर किशोरियों पर पड़ता है। रामनगर के इस विद्यालय में माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड की कोई व्यवस्था नहीं है। स्कूल में पर्याप्त माहवारी से जुड़े प्रबंधन सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण कई किशोरियों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कई लड़कियां माहवारी के दिनों में स्कूल आना छोड़ देती हैं या उनकी उपस्थिति कम हो जाती है। लगातार अनुपस्थित रहने से उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है और वे धीरे-धीरे शिक्षा में पिछड़ने लगती हैं। यह केवल स्वास्थ्य और स्वच्छता का मुद्दा नहीं है, बल्कि लड़कियों के शिक्षा के अधिकार और उनके भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। जब स्कूल किशोरियों की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पाते, तब उनके लिए शिक्षा की राह और कठिन हो जाती है। माध्यमिक विद्यालय, रामनगर की आठवीं कक्षा की छात्रा अंशु कुमारी (बदला हुआ नाम) कहती है माहवारी के समय वह स्कूल नहीं जाती है क्योंकि वह का शौचालय भी ठीक नहीं है और न ही पैड निस्तारण की कोई व्यवस्था है। इसलिए माहवारी के दौरान वह स्कूल नहीं जाती है। फिर वह क्लास में पढ़ाए गए विषयों को कैसे पूरा करती है? इस सवाल के जवाब में वह चुप हो जाती है। 

डिजिटल संसाधनों की कमी भी ग्रामीण स्कूलों को शहरों से पीछे धकेलती है। आज शिक्षा तेजी से तकनीक आधारित हो रही है। ऑनलाइन सामग्री, स्मार्ट क्लास और डिजिटल लर्निंग बच्चों के सीखने के नए साधन बन चुके हैं। लेकिन बिहार के अधिकांश सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर और इंटरनेट की पहुंच अब भी सीमित है। राज्य में बड़ी संख्या में स्कूल ऐसे हैं जहां कंप्यूटर उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप ग्रामीण बच्चे डिजिटल कौशल विकसित करने में पीछे रह जाते हैं, जबकि शहरों के बच्चे नई तकनीकों से परिचित हो रहे हैं। 

शिक्षकों की कमी भी एक गंभीर चुनौती है। UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार बिहार में अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे स्कूल हैं जहां शिक्षकों की संख्या जरूरत से कम है। कुछ स्कूल तो ऐसे भी हैं जहां केवल एक शिक्षक पूरे विद्यालय को संभाल रहा है। जब शिक्षक कम होंगे तो बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना स्वाभाविक रूप से कठिन होगा। शिक्षक पढ़ाने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यों में भी व्यस्त रहते हैं, जिससे कक्षा शिक्षण का समय और कम हो जाता है।

ग्रामीण स्कूलों में पुस्तकालय और खेल सुविधाओं की कमी भी बच्चों के समग्र विकास को प्रभावित करती है। शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं होती। पुस्तकालय बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करते हैं और खेल उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में मदद करते हैं। लेकिन बिहार के हजारों स्कूलों में पुस्तकालय नहीं हैं और बड़ी संख्या में स्कूल खेल के मैदानों से वंचित हैं। इससे बच्चों को सीखने और विकसित होने के समान अवसर नहीं मिल पाते।

यह स्थिति केवल संसाधनों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि ग्रामीण शिक्षा के प्रति लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का भी संकेत है। यदि गांवों के स्कूलों को शहरों के बराबर लाना है तो केवल भवन निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति, स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय, किशोरियों के लिए मासिक धर्म प्रबंधन सुविधाएं, पुस्तकालय, खेल मैदान, कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि उपलब्ध सुविधाएं केवल कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से बच्चों तक पहुंचें।

भारत के भविष्य का निर्माण गांवों के बच्चों के हाथों में भी है। यदि ग्रामीण स्कूल संसाधनों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझते रहेंगे तो शिक्षा में समानता का सपना अधूरा रह जाएगा। सीतामढ़ी के रामनगर जैसे स्कूल हमें यह याद दिलाते हैं कि शिक्षा के अधिकार को केवल स्कूल खोल देने से पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए ऐसे विद्यालयों की आवश्यकता है जहां हर बच्चा सम्मानजनक वातावरण में पढ़ सके, हर शिक्षक प्रभावी ढंग से पढ़ा सके और हर किशोरी बिना किसी बाधा के अपनी शिक्षा जारी रख सके। तभी गांव और शहर के स्कूलों के बीच की दूरी वास्तव में कम हो पाएगी।(यह लेखिका के निजी विचार हैं)



- लाडली खातून
सीतामढ़ी, बिहार

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