बहुत बड़ा सवाल एकांकी की समीक्षा | मोहन राकेश

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बहुत बड़ा सवाल एकांकी की समीक्षा मोहन राकेश मोहन राकेश आधुनिक हिंदी नाटक और एकांकी के क्षेत्र में एक युगांतरकारी नाम हैं।

बहुत बड़ा सवाल एकांकी की समीक्षा | मोहन राकेश


मोहन राकेश आधुनिक हिंदी नाटक और एकांकी के क्षेत्र में एक युगांतरकारी नाम हैं। उनके द्वारा रचित 'बहुत बड़ा सवाल' एक अत्यंत सजीव, व्यंग्यात्मक और यथार्थवादी एकांकी है।यह एकांकी हमारे समाज, सरकारी तंत्र और तथाकथित बौद्धिक वर्ग की खोखली कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करती है।

समीक्षकों एवं आचार्यों ने एकांकी के निम्नलिखित तत्त्व स्वीकार किये हैं -
  • कथानक अथवा कथावस्तु, 
  • पात्र और उनका चरित्र-चित्रण, 
  • संवाद अथवा कथोपकथन, 
  • भाषा-शैली, 
  • देश-काल एवं वातावरण, 
  • उद्देश्य, 
  • शीर्षक, 
  • अभिनेयता, 
  • संकलन-त्रय 
एकांकी के उपर्युक्त तत्वों के आधार पर मोहन राकेश द्वारा विरचित एकांकी 'बहुत- बड़ा सवाल' की समीक्षा प्रस्तुत है- 

कथानक अथवा कथावस्तु

महाकाव्य, खण्डकाव्य, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं एकांकी सभी की रचना में कथानक अथवा कथावस्तु आधार अथवा नींव का कार्य करता है। महाकाव्य आदि का महल कथानक की नींव पर ही खड़ा होता है। मोहन राकेश द्वारा विरचित एकांकी 'सबसे बड़ा सवाल' का कथानक इस प्रकार है- 

एक स्कूल के कमरे में लो ग्रेड वर्कर्स वेल्फेयर सोसायटी की मीटिंग शाम के साढ़े पाँच बजे होने वाली थी । स्कूल के चपरासी रामभरोसे और श्यामभरोसे कमरे की डेस्क, कुर्सी आदि की धूल साफ कर रहे थे। सोसाइटी के सेक्रेटरी शर्मा पौने छः बजे आये और लोगों के समय पर न आने के लिए झल्लाने लगे। उन्होंने दोनों चपरासियों से सफाई पूरी कराई और उन्हें दरवाजे के बाहर बैठने का आदेश दिया।

बहुत बड़ा सवाल एकांकी की समीक्षा | मोहन राकेश
इसके बाद मनोरमा, सन्तोष और गुरप्रीत आती हैं और डेस्कों पर बैठ जाती हैं। इसके बाद कपूर साहब आये। कपूर साहब ने प्रस्ताव किया कि जब तक अध्यक्ष महोदय आते हैं, तब तक एक-एक प्याली चाय पी जाये। रामभरोसे को आधा सेट चाय, तीन प्यालियाँ और पचास पैसे की मूँगफलियाँ लाने के लिए दस रुपये का नोट कपूर साहब देते हैं। रामभरोसे चाय और मूँगफली लिये हुए आया। तभी प्रेमप्रकाश और दीनदयाल आ गये। दीनदयाल ने एक प्याली चाय पी ली और दूसरी प्याली प्रेमप्रकाश ने पी। तभी मोहन आता है और तीसरी प्याली वह पी लेता है। तभी रमेश और सत्यपाल आ जाते हैं। वे मूँगफली खा लेते हैं। कपूर साहब को कुछ नहीं मिलता।

शर्मा ने अध्यक्षता के लिए कपूर साहब का नाम प्रस्तावित किया और सत्यपाल ने इसका समर्थन किया। कपूर साहब अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ गये। शर्मा मीटिंग की कार्यवाही आरम्भ करता हुआ भाइयों और बहनों शब्द बोलता है। मोहन के आग्रह पर उसे बहनो और भाइयो कहना पड़ता है। शर्मा इसके बाद बताते हैं कि लो ग्रेड वर्कर्स वेल्फेयर हन सोसाइटी की स्थापना किस उद्देश्य से की गयी। पिछली बार सरकार से छोटे कर्जों की माँग की गयी। शर्मा ने आज की मीटिंग का एजेण्डा प्रस्तुत किया। शर्मा ने निम्नस्तरीय गृह-निर्माण योजना के अन्तर्गत छोटे कर्जे दिये जायें। इन शब्दों पर बहुत विवाद होता है।

अन्त में कपूर साहब शर्मा से प्रस्ताव पढ़ने को कहते हैं। प्रस्ताव शर्मा की फाइल में नहीं मिलता तो उसे दूसरे कमरे में जाकर नया प्रस्ताव बनाने को कहा गया। समय बिताने के लिए मनोरमा की गीत और मोहन की कविताओं में से पहले कौन सुनाये, इस पर विवाद होता है। तभी शर्मा अपना वही प्रस्ताव लेकर आता है जो बाहर गिर गया था। शर्मा प्रस्ताव पढ़ता है, जिसके कुछ शब्द मिट गये हैं। सदस्यों की सहायता से उनके स्थान पर नये शब्द जोड़कर प्रस्ताव पास कराने का प्रयत्न किया जाता है, पर मोहन के विरोध के कारण वह पास नहीं हो पाता। कुछ सदस्य उठकर चले गये थे, इसलिए कोरम पूरा नहीं हो सका था। इसके बाद रामभरोसे श्यामभरोसे को नींद से उठाता है। उसके द्वारा यह पूछने पर कि क्या प्रस्ताव पास हुआ, रामभरोसे ने कहा कि सब लोग अपने-अपने घरों में रहेंगे। मूँगफली के आधे छिलके रामभरोसे उठायेगा, आधे श्यामभरोसे उठायेगा। 

पात्र और उनका चरित्र चित्रण

इस एकांकी में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है। इसमें पात्रों की संख्या बारह है। स्त्री पात्र तीन और पुरुष पात्र नौ हैं। इनमें से बहुत कम पात्रों के चरित्र पर प्रकाश पड़ा है। रामभरोसे और श्यामभरोसे स्कूल के चपरासी हैं। दोनों को अपने कार्य अर्थात् कमरे की सफाई से असन्तोष है। मीटिंग प्रायः होती रहती है। मीटिंग में उपस्थित रहना उनकी ड्यूटी नहीं है, इसलिए वे मन से काम नहीं करते हैं। वे इस प्रकार के उत्तर देते हैं, जिससे उनका असन्तोष स्पष्ट झलकता है।
 
शर्मा उस सोसाइटी का सेक्रेटरी है, जिसकी मीटिंग इस कमरे में होती है। शर्मा को इस बात से असन्तोष है कि लोग मीटिंग में समय से नहीं आते। वह स्वयं मीटिंग आरम्भ होने के निश्चित समय से पन्द्रह मिनट बाद आया है। आने वालों में वह पहला व्यक्ति है। अध्यक्ष तो मीटिंग के अन्त तक नहीं आये। कपूर साहब को अध्यक्ष बनाया' जाता है जो संस्कृत के तत्सम शब्दों का ठीक से उच्चारण नहीं कर पाते। वे अध्यक्ष को 'अधिअक्ष' सदस्य को 'सदसिय' और संशोधन को 'संशोदन' कहते हैं। वे अध्यक्ष का कर्तव्य पूर्ण रूप से निभाते हैं। तीनों महिला सदस्य बहुत कम बोलती हैं । जब उन पर छींटाकशी की जाती है, उन्हें तभी बोलना पड़ता है। इनमें से गुरप्रीत चाय बनाती है। मनोरमा के गीत गाने का प्रस्ताव होता है। इससे स्पष्ट है कि मनोरमा गीत गाने में कुशल है। शर्मा ढीला-ढाला है। उसके पास तीस पैसे निकलते हैं। उसकी असावधानी इसी से प्रकट होती है कि वह जो प्रस्ताव अपने घर से बनाकर लाया है, उसे कूड़े में गिरा देता है। सत्यपाल, प्रेमप्रकाश, दीनदयाल, रमेश और मोहन बिल्कुल भी गम्भीर नहीं हैं। ये लोग बार-बार हर बात का विरोध करके मीटिंग के कार्य में बाधा डालते हैं। इनमें मोहन सबसे योग्य और निर्भीक जान पड़ता है। उसी के संवाद सबसे लम्बे हैं। उसकी बातों से लगता है कि वह बाल की खाल निकालने में बहुत कुशल है । उसी के कारण प्रस्ताव पास नहीं हो पाता और सदस्य एक-एक करके चले जाते हैं। कोरम पूरा न होने से मीटिंग सफल नहीं हो पाती, प्रस्ताव पास नहीं होता। इस संस्था के अधिकांश सदस्य गम्भीर नहीं हैं। अध्यक्ष तो अन्त तक नहीं आते। अध्यक्ष पर मीटिंग के समय किसी महिला के साथ होने का आरोप लगाया जाता है जो गुरप्रीत की सहेली है। कुछ लोग ऐसे संकेत करते हैं जो महिलओं को अनुचित लगते हैं। सभी लोग देर से आये हैं, पर सभी को जाने की जल्दी है। किसी न किसी बहाने से अधिकांश लोग चले जाते हैं। पात्रों की संख्या अधिक है, फिर भी इनके चरित्र को उजागर करने में एकांकीकार को पूर्ण सफलता मिली है। तीस पृष्ठ के एकांकी में बारह सदस्यों के चरित्र को उजागर करना लेखक के रचना - कौशल का प्रमाण है।

संवाद अथवा कथोपकथन

नाटक और एकांकी दोनों में संवादों का बहुत महत्व है। पात्र संवाद ही अधिक बोलते हैं, शेष गतिविधि कम करते हैं। वैसे संवाद कथानक को आगे बढ़ाने के साथ-साथ पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालते हैं। जो संवाद बोलता है और संवाद से जिसका सम्बन्ध होता है, उन दोनों के चरित्र पर प्रकाश पड़ता है। संवाद बोलते हुए पात्र जीवन्त प्रतीत होते हैं। संवाद सरल, छोटे और पात्रोचित होने चाहिए। इस एकांकी के कुछ संवाद अधिक बड़े होने के कारण दोषपूर्ण हैं। मोहन का एक संवाद तो आधे पृष्ठ का है। वैसे अधिकांश संवाद छोटे हैं। छोटे, आदर्शपूर्ण और प्रस्तुत पात्रानुकूल संवादों का एक स्थल उदाहरण के रूप में है-

शर्मा- मुझे पानी नहीं चाहिए । 
दीनदयाल - थोड़ा पी लो, तरावट आ जायेगी । 
शर्मा- नहीं, नहीं, (रामभरोसे की तरफ) पानी नहीं चाहिए। 
प्रेमप्रकाश - चाय मँगवा लो। 
शर्मा- नहीं, चाय भी नहीं चाहिए। मैं जो बात आपके सामने रख रहा हूँ। कपूर-सीधे आज का परस्ताव ही क्यों नहीं पढ़ देते ? जो बात है, वह सब लोग जानते हैं। 
रमेश - बोल लेने दीजिए उन्हें। अगली मीटिंग न जाने कब होगी । 
सत्यपाल - शर्मा साहब ! सीधे उस बात पर आ जाइये.......जब से इन्दिरा सरकार बनी है, तब से ... | 
रमेश - बल्कि उससे भी आगे से शुरू कीजिए. जब से आपने सेक्रेटरी पद सम्भाला है, तब से । 
कपूर - आर्डर-आर्डर। शर्मा तुम परस्ताव पढ़ दो अब । संतोष - क्षमा कीजिए, परस्ताव नहीं प्रस्ताव । 
कपूर - परस्ताव । 
संतोष- (जोर देकर) प्रस्ताव । 
कपूर - (जोर देकर) परस्ताव । 
दीनदयाल - पी ए आर ए एस नहीं, पी आर ए स-प्रस्ताव । 
कपूर - जो भी हो वह रेजोल्यूशन की हिन्दी। वह पढ़ दो तुम।
शर्मा-तो मैं आपका अधिक समय न लेकर आपके सामने प्रस्ताव पेश कर रहा हूँ। 

भाषा शैली

इस एकांकी की भाषा वैसे तो सरल और सुबोध खड़ी बोली है, पर पात्रों के अनुसार भाषा में पर्याप्त परिवर्तन हुआ है। रामभरोसे और श्यामभरोसे के अतिरिक्त अन्य कुछ पात्रों की भाषा भी सरल है। जहाँ सेक्रेटरी शर्मा के कथनों और प्रस्ताव की भाषा पर पात्रों की प्रतिक्रिया की बात है, वहाँ भाषा क्लिष्ट भी हो गयी है। कहीं-कहीं तो भाषा हास्य का आधार बन गयी है। मोहन जब शर्मा से सेक्रेटरी द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में 'निम्नस्तर' शब्द की आलोचना करने लगता है तो वहाँ भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता के साथ ही भाषाविज्ञान की छटा दिखायी देती है। भाषा का सबसे रोचक स्थल मोहन का वह कथन है जो बाल की खाल निकालने का उदाहरण होने के कारण हास्यास्पद बन गया है। उदाहरण के रूप में वह स्थल प्रस्तुत है-
 
"प्रस्ताव में तीन जगह एक शब्द आया है-निम्नस्तर। इसका अर्थ है, चूँकि आज हम निम्न स्तर के कर्मचारी हैं, इसलिए जीवनभर हमें निम्न स्तर के ही बने रहना है। हमारे लिए आवास व्यवस्था हो तो कैसी ? निम्न स्तर की। हमारे लिए घर बनाये जायें तो कैसे ? निम्न स्तर के । इसके बाद शायद हम लोग माँग करें कि हमारे निम्न स्तर बच्चों के लिए निम्न स्तर बाल-संरक्षण व्यवस्था के अन्तर्गत निम्न स्तर पालन की एक योजना बनायी जाये, जिससे हर ऐसे बच्चे को जिसकी कि उम्र पाँच साल से अधिक की है, कम-से-कम आधा पाव दूध उपलब्ध हो सके।"
 

देश काल और वातावरण

इस एकांकी का देश अर्थात् स्थान किसी शहर या कस्बे के स्कूल का एक कमरा है। गाँव में इतने निम्न स्तर के कर्मचारी नहीं हो सकते और न स्कूल के पास शीत ऋतु में शाम के समय चाय और मूँगफलियाँ मिल सकती हैं। इस एकांकी का काल अर्थात् समय इन्दिरा गाँधी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद का अर्थात् बीसवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध है। इस एकांकी का वातावरण है तो मीटिंग का, पर उसमें गम्भीरता नहीं है। हर बात बहुत हल्के रूप में ली जाती है। यहाँ तक कि का चपरासी ठीक से न बात करता है और न किसी का आदर करता है। तीन महिला स्कूल सदस्यों पर बार-बार कटाक्ष किया जाता है। अध्यक्ष अनुपस्थित है, इससे स्पष्ट है कि इस मीटिंग का कोई महत्व नहीं है। सेंक्रेटरी शर्मा का कोई आदर नहीं करता है। वातावरण का हल्कापन वहाँ विद्रूप बन जाता है, जहाँ संस्था तक को चेलेंज किया जाता है ।

उद्देश्य

इस एकांकी का उद्देश्य मीटिंग के प्रति लोगों के गम्भीर न होने को प्रस्तुत करना है। जाड़े का मौसम है। लोग शाम के बाद भी लेट आये हैं। चाय पीने और मूँगफलियाँ खाने के बाद मीटिंग का प्रदर्शन आरम्भ होता है। मीटिंग के प्रति कोई गम्भीर नहीं है। गम्भीरता के इस अभाव के कारण मीटिंग में कुछ भी निश्चित नहीं हो पाता। मीटिंग की व्यर्थता रामभरोसे के इन शब्दों में है कि तमाशा खत्म हुआ। वास्तव में यह मीटिंग नहीं थी, एक प्रकार का पढ़े-लिखे लोगों का तमाशा ही था। 

शीर्षक

इस एकांकी का शीर्षक 'बहुत बड़ा सवाल' है, पर पूरे एकांकी में इस शब्द समूह का कहीं भी प्रयोग नहीं हुआ है। सबसे बड़ा सवाल क्या है, इसे भी कहीं पर स्पष्ट नहीं किया गया है। वैसे समान स्तर के लोगों में मीटिंग करके कुछ निश्चय कर पाना ही वह सवाल है जो बहुत बड़ा है। रामभरोसे और श्यामभरोसे के अतिरिक्त इस एकांकी के सभी पात्र पढ़े-लिखे एवं वेतनभोगी हैं। वास्तव में निम्न स्तर तो रामभरोसे और श्यामभरोसे दोनों चपरासियों का है। शेष पात्रों की बातों से नहीं लगता कि वे निम्न स्तर के हैं। एकांकी का शीर्षक उत्सुकता अवश्य अन्त तक बनायें रखता है कि बहुत बड़ा सवाल क्या है? जब सवाल ही सामने नहीं आता तो उसका हल कैसे सामने आ सकता है। 

अभिनेयता

नाटक और एकांकी अभिनय के लिए ही लिखे जाते हैं। एकांकी भी एक प्रकार का नाटक ही होता है। यह बात अलग है कि उसमें एक ही अंक होता है। एकांकी में अभिनय की क्षमता होनी ही चाहिए। इस एकांकी में ऐसा कुछ भी. नहीं है, जिसका अभिनय न हो सके। स्कूल के कमरे का दृश्य ब्लैकबोर्ड अर्थात श्यामपट, कुर्सी, मेज और डेस्क रखकर सरलता से बनाया जा सकता है। पात्रों की वेशभूषा का कोई निर्देश नहीं है। महिला पात्र कुर्ता शलवार पहन सकती हैं। चपरासियों के अतिरिक्त सभी की वेशभूषा पेण्ट-शर्ट या पेण्ट बुशशर्ट हो सकती हैं। शर्मा के पेण्ट पहनने का तो स्पष्ट उल्लेख है। प्रस्ताव खो जाने पर उससे अपनी पेण्ट की जेब देखने को कहा जाता है। सर्दी का मौसम होने के कारण सभी स्वेटर या कोट पहने हो सकते हैं। महिलाएँ स्वेटर या शाल ओढ़े हो सकती हैं। स्त्री पात्र अपने वास्तविक रूप में हैं, इसलिए वेश निर्माण या वेश परिवर्तन की समस्या नहीं है। अध्यक्ष की मेज पर घण्टी नहीं है। यह कमरा स्कूल का है, इसलिए मेज पर डस्टर रखा है। अध्यक्ष महोदय अर्थात् कपूर साहब लोगों के हल्ला करने अथवा अनुशासन न मानने पर डस्टर को मेज पर पटककर 'आर्डर-आर्डर' शब्द का उच्चारण करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे कोई न्यायाधीश अपनी मेज पर लकड़ी का हथौड़ा मारकर शान्ति और व्यवस्था स्थापित कर रहा हो। दृश्य बदला नहीं जाता, इससे रंगमंच के व्यवस्थापकों को कोई समस्या नहीं आती। जब पात्र लम्बे-लम्बे संवाद बोलते हैं, तब दर्शकों को अवश्य असुविधा हो सकती है .
 

संकलनत्रय

भारतीय काव्यशस्त्र के अनुसार एक अंक वाले भाण आदि रूपक के भेद बताये गये हैं, पर एकांकी का रचना विधान अंग्रेजी साहित्य से लिया गया है। एकांकी शब्द अंग्रेजी के 'वन एक्ट प्ले' (One Act Play) का हिन्दी अनुवाद है। अंग्रेजी के वन एक्ट प्ले (One Act Play) में 'थ्री यूनिटीज' (Three Unities) का निर्वाह अवश्य बताया गया है। हिन्दी के एकांकी में भी संकलनत्रय का निर्वाह आवश्यक माना जाने लगा है। इस एकांकी में संकलनत्रय की स्थिति निम्नलिखित है- 
  • कार्य संकलन - यह शब्द अंग्रेजी के 'यूनिटी ऑफ वर्क' (Unity of Work) का अनुवाद है। एकांकी में एक ही कार्य की स्थिति होनी चाहिए। इस एकांकी में एक ही कार्य है-मीटिंग करने को 'बहुत बड़ा सवाल' सिद्ध करना। बारह पात्रों में दो चपरासी तो नाममात्र के पात्र हैं। शेष आठ पात्र कार्य की एकता को सिद्ध करते हैं। वैसे दोनों चपरासी भी शेष पात्रों के समान ही गम्भीरता से रहित हैं। 
  • स्थान संकलन- इसे अंग्रेजी में 'यूनिटी ऑफ प्लेस' (Unity of Place) कहा जाता है। इसका तात्पर्य पूरे एकांकी का एक ही स्थान पर अभिनय होने से है। इस एकांकी का अभिनय एक ही कमरे में हो जाता है और दृश्य परिवर्तन नहीं होता, इसलिए इसमें स्थान संकलन का निर्वाह भी स्पष्ट है। 
  • समय संकलन - इसे अंग्रेजी में 'यूनिटी ऑफ टाइम' (Unity of Time) कहा जाता है। एकांकी के अभिनय में उतना ही समय लगना चाहिए, जितना वास्तविक घटना में लगता हो । इए एकांकी में इसका भी निर्वाह है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि इस एकांकी में संकलनत्रय का पालन हुआ है। 'बहुत बड़ा सवाल' केवल एक बैठक की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक व्यवस्था की उस मानसिकता का दस्तावेज है जहाँ 'काम कम और शोर ज्यादा' होता है। मोहन राकेश जी ने अपनी पैनी दृष्टि से समाज की इस कमजोरी को पकड़ा है और उसे अत्यंत रोचक व प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह एकांकी आज के समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने रचनाकाल में थी।

कहा जा सकता है कि यह एकांकी के तत्वों की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है।

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