भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वराज पार्टी का गठन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी घटना थी। असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) के अचानक रुक जाने
स्वराज पार्टी की स्थापना,उद्देश्य,कार्यक्रम और पतन के कारण
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में स्वराज पार्टी का गठन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी घटना थी। असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) के अचानक रुक जाने से उत्पन्न देशव्यापी निराशा के माहौल में इस पार्टी ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी।
स्वराज दल की स्थापना के कारण
स्वराजदल की स्थापना के प्रमुख कारण हैं -
- असहयोग आन्दोलन के स्थगित हो जाने एवं गाँधी जी के जेल चले जाने के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन शिथिल पड़ गया। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने शिथिल जनता में चेतना के संचार के लिये स्वराज दल जैसे एक मार्ग की आवश्यकता महशूस की ।
- खिलाफत आन्दोलन के कारण हिन्दू मुस्लिम एकता जो प्रारम्भ में स्थापित हुई थी वह समाप्त हो गयी थी । इस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए स्वराज दल की स्थापना की गयी ।
- सरकार विरोधी तत्वों के विरुद्ध सरकार ने दमन चक्र तेज कर दिया था। ऐसी परिस्थितियों में कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने कौन्सिलों में जाकर अपनी असहयोग नीति से सरकार के विरोध की नीति अपनाने का निश्चय किया ।
- उदारवादियों एवं सरकार से व्यक्तिगत लाभ के इच्छुक लालची लोगों को विधान मण्डलों में जाने से रोकने के लिये प्रतिद्वन्द्वी के रूप में स्वराज दल की स्थापना का निश्चय ) किया गया ।
- ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लायड जार्ज ने भारतीय सिविल सर्विस की प्रसंशा करनी शुरू कर दी थी । अतः नौकरशाहों द्वारा जनता पर अत्याचार बढ़ता जा रहा था । स्वराजियों की इस परिस्थिति में सोच बनी कि कौन्सिल प्रवेश के द्वारा ही स्वराज प्राप्त करने का अपेक्षाकृत सुरक्षित मार्ग है ।
स्वराज दल का उद्देश्य और कार्यक्रम
1923 में स्वराज दल का चुनाव घोषणा पत्र प्रकाशित हुआ जिसमें दल का लक्ष्य यह बतलाया गया कि भारतीय शासन तंत्र पर भारतीय जनता का अधिकार स्वीकार किया जाय तथा इसे कार्य रूप में परिणित किया जाय । यदि सरकार हमारे इस अधिकार को स्वीकार न करे तो हम शासन कार्य का चलना असम्भव कर दें । इस प्रकार स्वराज दल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य था -
- भारत को स्वराज दिलाना
- उस व्यवस्था का अन्त करना जो ब्रिटिश सत्ता के अधीन भारत में विद्यमान थी। चुनाव द्वारा कौंसिलों में प्रवेश के पीछे उनका उद्देश्य 1919 के अधिनियम को क्रियान्वित करना नहीं था बल्कि असहयोग द्वारा सरकार के कार्यों में बाधा डालना था ।
इसके लिये उन्होंने निम्नलिखित कार्यक्रम निश्चित किया था
- शासन कार्य मे बाधा डालने के उद्देश्य से स्वराजियों ने कौन्सिल में प्रवेश कर सरकारी आय व्यय के वार्षिक व्योरे ( वजट ) को अस्वीकार करने का निश्चय किया ।
- उन्होंने अपने कार्यक्रम में निश्चित किया कि सरकार के उन प्रस्तावों का विरोध किया जाय, यदि सम्भव हो तो अस्वीकार किया साथ जिनके द्वारा नौकरशाही शक्तिशाली बनने का प्रयास करती है ।
- कौन्सिलों में उन प्रस्तावों, योजनाओं और विधेयकों को प्रस्तुत करना जिनके द्वारा राष्ट्र की शक्ति में वृद्धि हो तथा नौकरशाही की शक्तियों का अन्त किया जाना सम्भव हो ।
- कौन्सिल के बाहर गाँधी जी के रचनात्मक कार्यों में सहयोग देना ।
- कौन्सिल के सदस्य के रूप में वे जिस किसी भी पद के अधिकारी थे उन सभी पर अधिकार करके सरकारी कार्यों में बाधा पहुँचाना ।
- स्वराजियों ने यह भी घोषणा कर दी थी कि यदि वे नौकरशाही को सही रास्ते पर लाने में असमर्थ रहे तथा सत्यग्राह ही एकमात्र उपाय बचेगा तो वे कौन्सिल में अपने पद को छोड़ देंगे तथा महात्मा गाँधी के नेतृत्व में बिना सोच विचार के कांग्रेस के झण्डे के नीचे एकत्रित होकर सत्याग्राह को सफल बनाने का प्रत्येक सम्भव प्रयास करेंगे ।
स्वराज दल के कार्य एवं सफलता का मूल्यांकन
कांग्रेस का समर्थन प्राप्त कर स्वराज दल ने नवम्बर 1923 के चुनाव में भाग लिया। स्वराज दल ने केन्द्रीय व्यवस्थापिका के 145 स्थानों में से 45 पर अधिकार प्राप्त किया। जिला के नेतृत्व में राष्ट्रवादी एवं स्वतंत्र 24 सदस्यों को साथ मिला कर कुल 72 सदस्यों का एक काम चलाऊ संयुक्त दल बनाया गया । केन्द्रीय विधान सभा में स्वराज दल के नेता मोती लाल नेहरू थे। मध्यप्रान्त में स्वराज दल ने बहुमत प्राप्त किया । बंगाल में सबसे बड़ा दल बना। पंजाब एवं मद्रास में भी इन्हें कुछ सीटें प्राप्त हुईं ।
प्रान्तीय विधान सभाओं में से बंगाल एवं मध्यप्रान्त में स्वराज दल ने सरकार का जबरजस्त विरोध कर संसदीय कार्य को चलना कठिन कर दिया। बंगाल में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद उसने मंत्रिमण्डल बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया । स्वराज दल ने लगातार तीन मंत्रिमण्डलों को पराजित कर उन्हें त्यागपत्र देने को बाध्य कर दिया । 1925 में चित्तरंजन दास ने अस्वस्थता के बावजूद भी द्वैध शासन प्रणाली के अन्त करने की कार्यवाही में भाग लिया । उन्होंने अपनी अवरोध नीति के अन्तर्गत मंत्रिमण्डल निर्माण को असम्भव कर दिया । अन्ततः बंगाल के गवर्नर लार्ड लिटन को विधान सभा भंग करनी पड़ी और उन्होंने घोषित किया कि बंगाल में वैध शासन प्रणाली पूर्णतया असफल रही। संयुक्त प्रान्त एवं बम्बई में भी इस दल का यदा कदा निर्णायक प्रभाव रहा ।
केन्द्रीय विधान सभा में 1924-25 के वार्षिक बजट को अस्वीकार दिया गया जिसे गवर्नर जनरल के विशेषाधिकारों से पारित किया गया । इसी प्रकार बंगाल के दमनकारी अध्यदेशों को बन्द करने का प्रस्ताव स्वीकृत कराया, सरकार के विरोध के वावजूद भी एक सैनिक विद्यालय के स्थापना का प्रस्ताव पास हुआ । रेल भाड़ा कम करने एवं डाक टिकट शुल्क कम कराने में भी स्वराजियों को सफलता मिली। भारत की करेन्सी समस्या की जाँच हेतु एक कमेटी बैठाने के निर्णय को प्राप्त करने में थी दल ने सफलता प्राप्त की । 1919 के अधिनियम की कमियों की जाँच के लिये सरकार को मुडीमैन की अध्यक्षता में एक कमीशन बनाने के लिये स्वराजियों ने बाध्य किया। सरकार पर दबाव बनाने में स्वतंत्र दल के सदस्यों का सहयोग काफी महत्वपूर्ण रहा। जब इस दल ने सहयोग देना बन्द कर दिया तो स्वराज दल के सदस्य संसद में विरोध स्वरूप वाक आऊट करने की नीति अपनाने लगे । स्वराजियों को यद्यपि स्वराज का लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता नहीं प्राप्त हुई। फिर भी उन्होंने 1919 के अधिनियम की निरर्थकता अपने अवरोध नीति के अन्तर्गत सिद्ध कर दी । सरकार कई बार अनेक प्रस्ताव पर पराजित हो गयी और उसे वीटो (Veto) का सहारा लेना पड़ा । ऐसे ही मौके पर विट्ठल भाई पटेल ने सरकार से कहा - "हम चाहते हैं कि आप अपना प्रशासन वीटो से और हर पराजित विधेयक को वैधता का प्रमाण पत्र देकर चलायें । हम जानते हैं कि आप गवर्नमेण्ट आफ इण्डिया ऐक्ट को रद्दी कागज समझें ।" जब भी विधान मण्डल में नौकरशाही पराजित हो जाती थी जनता में खुशी की लहर दौड़ जाती थी । असहयोग आन्दोलन के स्थगन से उत्पन्न निराशा के समय जनता ने अपने वैधानिक संघर्षों से नये उत्साह का संचार किया। देश में नवीन राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न हुई जिसने स्वराज को नजदीक लाने में सहायता प्रदान की ।
स्वराज दल का पतन
1926 के अन्त तक स्वराज दल की शाक्ति बिल्कुल समाप्त हो गयी । स्वराज दल के पतन के निम्नलिखित कारण थे -
- चितरंजन दास की मृत्युः 1925 में दल के संस्थापक चित्तरंजन दास की मृत्यु से स्वराज दल को बड़ी क्षति उठानी पड़ी। बंगाल में जो दल का सबसे बड़ा गढ़ था वहाँ दल की शक्ति तेजी से शिथिल होने लगी ।
- दल की नीति में परिवर्तन:- प्रारम्भ में स्वराज दल ने सरकार के साथ असहयोग की नीति अपनायी । बाद में विशेषतया चित्तरंजन दास की मृत्यु के बाद दल ने स्पष्टतया सहयोग की नीति अपनानी शुरू कर दी। लेकिन जनता की इच्छा थी कि अत्याचारियों से किसी प्रकार का सहयोग न किया जाय । अतः स्वराज दल जनता के मन से उतरने लगा ।
- हिन्दू मुस्लिम दंगे- स्वराज दल की स्थापना के बाद ही देश में साम्प्रदायिक दंगे तेज होने लगे । हिन्दू - मुसलमानों में तीव्र मतभेद के कारण स्वराज दल की एकता भी प्रभावित हुई । इस प्रकार इसकी शाक्ति को ठेस पहुँची ।
- 1926 के निर्वाचन में कम स्थान प्राप्त होना - 1926 के चुनाव में 1923 की तुलना में स्वराज दल को बहुत कम सफलता मिली जिससे दल के सक्रिय कार्यकर्ताओं का मनोबल कम हो गया ।
- कांग्रेस में एक अन्य दल की स्थापना - केन्द्रीय विधान सभा में पंडित मदन मोहन मालवीय और लाला लाजपत राय ने हिन्दुओं के हित की रक्षा हेतु एक अलग स्वतंत्र कांग्रेस दल की स्थापना कर ली । यह 1915 में हरिद्वार कुम्भ मेलों में मालवीय जी द्वारा स्थापित हिन्दू महासभा का ही मोर्चा था । कांग्रेस में ही इस दल की स्थापना से स्वराज दल की शक्ति में और अधिक कमी आ गयी ।
- स्वराज दल में फूट:- चित्तरंजन दास की मृत्यु के बाद स्वराज दल सहयोगी तथा असहयोगी दो पक्षों में विभाजित हो गया । स्वराज दल में इस तरह की फूट से दल का कमजोर हो जाना स्वाभाविक था । पार्टी को और अधिक टूटने से बचाने, संसदीय भ्रष्टाचार को रोकने और कार्यकर्ताओं को और अधिक निराश होने से बचाने के लिये पार्टी नेतृत्व ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन में अपनी आस्था दोहराई और मार्च 1926 से विधान मण्डल में हिस्सा न लेने का फैसला किया ।
इस प्रकार भले ही स्वराज पार्टी का जीवनकाल छोटा रहा, लेकिन इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय नेता न केवल सड़कों पर आंदोलन कर सकते हैं, बल्कि ब्रिटिश सरकार के अपने ही बनाए गए नियमों और परिषदों के भीतर घुसकर उन्हें राजनीतिक पटखनी भी दे सकते हैं।


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