महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन Revolutionary movement in Maharashtra क्रान्ति की जन्म भूमि प्रथम क्रान्तिकारी बासुदेव बलवन्त फड़कमहाराष्ट्र ही है ।
महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन | Revolutionary movement in Maharashtra
क्रान्ति की जन्म भूमि महाराष्ट्र ही है ।महाराष्ट्र में क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अत्यंत गौरवशाली और उग्र अध्याय था। 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 20वीं सदी के पूर्वार्ध तक, महाराष्ट्र सशस्त्र क्रांति और गुप्त संगठनों का एक प्रमुख केंद्र बना रहा।
महाराष्ट्र के प्रथम क्रान्तिकारी बासुदेव बलवन्त फड़के थे । उनका जन्म सन् 1845 ई. में महाराष्ट्र में कोलवा जिले के सिरधर नामक गाँव में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था । म. गो. रानाडे के भाषणों से प्रभावित होकर सन् 1876 ई. में फड़के ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध एक दल संगठित किया । उन्होंने जहाँ-तहाँ सरकारी चौकियों पर छापा मरवाना आरम्भ किया । 10 जुलाई सन् 1819 ई. को वे पकड़े गये और उन्हें अदन जेल में डाल दिया गया जहाँ सन् 1883 ई. में उनका देहान्त हो गया । फड़के की मृत्यु के बाद भी क्रान्तिकारी आन्दोलन समाप्त नहीं हुआ । उनकी मृत्यु के बाद महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में गुप्त समितियों की स्थापना हुई । 'गणपति' एवं 'शिवाजी उत्सव' मनाकर महाराष्ट्र की जनता से कहा गया कि जिस प्रकार शिवाजी ने विद्रोह किया था उसी प्रकार के विद्रोह की आवश्यकता अंग्रेजों के विरोध में भी आवश्यक है।
1895 में दामोदर चापेकर तथा बालकृष्ण चापेकर नामक दो भाइयों ने महाराष्ट्र में अध्यात्मवादी गुप्त संस्था की स्थापना की । 1897 में पूना में प्लेग की बीमारी फैली । उस समय ब्रिटिश सरकार ने जिस प्रकार की सहायता की उससे राहत तो मिली नहीं उल्टे जनता की परेशानियां बढ़ीं । सरकार के कुप्रबन्ध से क्रुद्ध होकर चापेकर बन्धुओं ने मि. रेण्ड और उसके एक सहयोगी मि0 आयर्स्ट की हत्या कर दी। चापेकर बन्धुओं को फाँसी दे दी गयी । जिन दो गुप्तचरों ने इन दो बन्धुओं को गिरफ्तार कर लिया था वे भी चापेकर के साथी क्रान्तिकारियों द्वारा मार डाले गये ।
महाराष्ट्र के क्रान्तिकारियों में चापेकर बन्धुओं के बाद श्यामजी कृष्ण बर्मा का नाम लिया जाता है । वे सन् 1857 ई. में कच्छ के मन्दावी गाँव में एक गरीब परिवार में पैदा हुये थे । सन् 1879 ई. में श्यामजी इंगलैण्ड चले गये और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत, गुजराती और माराठी भाषाओं के अध्यापक नियुक्त हुए। सन् 1884 ई. में वे बैरिस्टर बने और इंगलैण्ड से लौटकर बम्बई के हाईकोर्ट में बैरिस्टरी करने लगे । थोड़े दिनों के बाद वे उदयपुर के दीवान बने और पीछे जूनागढ़ स्टेट के दीवान नियुक्त हुए। मि. रैण्ड की हत्या के सिलसिले में जब सरकार उन पर सन्देह करने लगी तो सन् 1897ई. में दीवानी छोड़कर वे इंगलैण्ड चले गये और वहाँ रहकर जीवनभर भारत की आजादी के लिए प्रयत्न करते रहे । सन् 1930 ई. में जेनेवा में उनका स्वर्गवास हुआ।
महाराष्ट्र के युवक चापेकर बन्धुओं के त्याग से बहुत प्रभावित हुए। अतः इन युवकों ने चापेकर बन्धुओं की यादगार में महाराष्ट्र के विभिन्न भागों में बाल समाज, आर्य बान्धव समाज आदि संस्थाओं की स्थापना की । विनायक दामोदर सावरकर तथा उनके भाई गणेश सावरकर महाराष्ट्र के क्रान्तिकारी आन्दोलन की रीढ़ बने । गणेश सावकर एक क्रान्तिकारी कवि थे । सन् 1900ई. में सावरकर ने 'मित्र मेला' नामक दल का संगठन किया था जिसका नाम चार वर्ष बाद 'अभिनव भारत' हो गया। सन् 1909 में गणेश सावरकर ने 'लघु अभिनव भारत मेला' नामक पुस्तक में राष्ट्रीयता पर कवितायें लिखीं। इस समय नासिक के मजिस्ट्रेट ने उन पर मुकदमा चलाकर उन्हें आजीवन करावास का दंड दिया।
अभिनव भारत के सदस्यों में मदनलाल धींगरा भी थे जिन्होंने इंगलैण्ड में कर्जन वाइली की हत्या की थी । इसी संस्था के सदस्य अनन्त लक्ष्मण कन्हेरे ने नासिक के कलक्टर जैक्शन की हत्या की थी क्योंकि जैक्शन ने वी.डी. सावरकर के भाई गणेश सावरकर को गिरफ्तार कर उन्हें कालेपानी की सजा दिलवायी थी। जैक्शन की हत्या के अपराध में सात आदमियों पर मुकदमा चलाया गया जिसमें तीन को फाँसी दे दी गयी । नासिक में एक षड्यन्त्र केस चला जिसमें 28 आदमियों पर मुकदमा चलाया गया।27 आदमी दोषी ठहराये गये और उनको भिन्न-भिन सजाएँ हुईं ।नासिक षड्यन्त्र केस का समाचार सुनकर बी. डी. सावरकर फ्रांस से, जहाँ पर वे उस समय रह रहे थे, इंगलैण्ड चले गये और गिरफ्तार कर भारत भेज दिये गये । नासिक में 22 मार्च सन् 1911 को उन्हें पचास वर्ष के लिए कालेपानी की सजा हुई । सन् 1937 ई. में बम्बई में जब कांग्रेस का मंत्रिमंडल बना तब बी.डी. सावरकर मुक्त हुए । वी. डी. सावरकर ने अपना सम्पूर्ण जीवन और परिवार मातृभूमि की सेवा में अर्पित कर दिया ।
9 नवम्बर सन् 1909 ई. को अहमदाबाद में लार्ड और लेडी मिटो की ट्रेन को उड़ा देने की कोशिश की गयी लेकिन बम ठीक समय पर नहीं फटे ।सन् 1910 ई. में सतारा षड्यंत्र केस चला। इसमें अभिनव भारत समिति की एक शाखा के तीन ब्राह्मण युवकों को सजा दी गयी ।
ग्वालियर में भी दो षड्यन्त्र केस चले । पहले में बाइस और दूसरे में उन्नीस व्यक्तियों पर मुकदमा चला, ये सभी व्यक्ति ब्राह्मण थे और 'नव-भारत सोसाइटी' के सदस्य थे । इनमें से बहुतों को सजी दी गयी । प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने के बाद महाराष्ट्र का क्रान्तिकारी आंदोलन प्रायः दब गया ।
इस प्रकार यद्यपि ब्रिटिश सरकार के कड़े दमन, कठोर कानूनों और सामूहिक गिरफ्तारियों के कारण यह आंदोलन जन आंदोलन का रूप नहीं ले सका, लेकिन इसने भारतीयों के मन से ब्रिटिश सत्ता का खौफ पूरी तरह खत्म कर दिया। इन क्रांतिकारियों के सर्वोच्च बलिदान ने आगे चलकर महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले व्यापक जन आंदोलनों के लिए एक मजबूत नैतिक और देशभक्ति की पृष्ठभूमि तैयार की।


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