लेनिन कौन था | 1917 की रूसी क्रांति में लेनिन के योगदान का वर्णन

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लेनिन कौन था 1917 की रूसी क्रांति में लेनिन के योगदान का वर्णन रूसी इतिहास के जननायक सर्वहारा वर्ग के नेता समाजवादी विचारक लेनिन Home Policy of Lenin

लेनिन कौन था | 1917 की रूसी क्रांति में लेनिन के योगदान का वर्णन


रूसी इतिहास के जननायक सर्वहारा वर्ग के नेता समाजवादी विचारक लेनिन का पूरा नाम ब्लाडीमीर इलिच पूलिनोव (Valdimir Ilich Ulianov) था। इतिहास में वह अपने उपनाम निकोलाई लेनिन (Nikolai Lenin) के नाम से भी जाना जाता है। लेनिन का जन्म 10 अप्रैल 1860 को सिम्बर्स्क नामक नगर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था । कानून की शिक्षा प्राप्त करने के लिये लेनिन ने कजान विश्वविद्यालय में प्रवेश किया । क्रान्तिकारी विचारों के कारण उसे विश्व विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। बाद में सेन्ट पीटर्स वर्ग विश्व विद्यालय से लेनिन ने कानून की डिग्री प्राप्त की । विद्यार्थी जीवन से ही शोषित जनों के प्रति सहानुभूति एवं शोषकों के प्रति घृणा का भाव उसमें विद्यमान था । क्रान्तिकारी विचार के विकास में उसके परिवार का उस पर प्रभाव था । लेनिन के भाई एलेक्जेन्डर को जार को मृत्यु के षडयन्त्र के आरोप में मृत्युदण्ड दिया गया था । क्रान्तिकारी विचारों के प्रचार में लगे रहने के कारण 1895 में उसे गिरफ्तार कर दिया गया एवं 1897 में उसे साइबेरिया निर्वासित कर दिया गया । 1900 ई. में वह स्विटजरलैण्ड चला गया। उसने पश्चिमी यूरोप के विभिन्न देशों की यात्राएँ कीं । सोसल डेमोक्रेटिक पार्टी समाजवादी विचारों को लेकर जब बोल्शेविक और मेन्शेविक दो दलों में विभाजित हो गया तब लेनिन बोल्शेविक दल का नेता चुना गया। 1904 में लेनिन लन्दन जा बसा । लेनिन ने 'इस्क्रा' दि स्पार्क और प्रावदा आदि पत्रों के माध्यम से क्रान्तिकारी विचारों का निरन्तर प्रचार-प्रसार करता रहा। 1917 में लेनिन जर्मनी के सहयोग से रूस पहुँचा एवं सर्वहारा वर्ग के क्रान्ति को नेतृत्व प्रदान किया। नवम्बर क्रान्ति के बाद लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक सरकार की स्थापना की गयी ।
 

लेनिन की गृहनीति (Home Policy of Lenin)

शासन के स्वरूप के सम्बन्ध में लेनिन का कहना था कि - "हमें किसी संसदात्मक गणतंत्र की आवश्यकता नहीं है न ही हमें बुर्जुआ प्रजातंत्र चाहिए। हमें ऐसी सरकार चाहिए जिसमें केवल मजदूरों, सैनिकों और किसानों के प्रतिनिधि हो ।" इस प्रकार लेनिन ने पूँजीवाद के स्थान पर समाजवादी व साम्यवादी व्यवस्था स्थापित की। बोल्शेविक दल के प्रमुख नारे शान्ति, भूमि और रोटी (Peace, Land, Bread ) ने जनसाधारण को आकर्षित किया और लेनिन रूस में मजदूरों और किसानों की सरकार स्थापित करने में सफल हो गया।
 
रूस में समाजवादी व्यवस्था की स्थापना - लेनिन ने बोल्शेविक सरकार के अन्तर्गत रूस में समाजवादी व्यवस्था की स्थापना की। समस्त भूमि किसानों में वितरित की गयी ।
 
कारखानों का प्रबन्ध श्रमिकों को सौंपा गया। समस्त व्यापार सरकार के हाथ में ले लिया गया । चर्च की सम्पत्ति भी जब्त कर ली गयी । ऐसी व्यवस्था की गयी कि प्रत्येक व्यक्ति को रोटी पाने के लिये मेहनत करनी पड़े ।
 

आन्तरिक क्रान्ति का दमन

बोल्शेविक क्रान्ति के बाद रूस में मध्यमवर्गीय सरकार समर्थकों ने 1918 में प्रतिक्रान्ति कर ही । इस प्रतिक्रान्ति को दबा देने के लिये चेका (cheka) नामक गुप्त पुलिस संगठन बनाया गया । इसको यह अधिकार दिया गया कि प्रतिक्रान्तिकारी चाहे वह कृषक, मजदूर, सैनिक या सामन्त हो उन्हें गोली से उड़ा दिया जाय। इस गुप्त पुलिस संगठन ने रूस में आतंक राज्य स्थापित किया। सरकार विरोधी दबा दिये गये । इस प्रकार आन्तरिक क्रान्ति का दमन करने में लेनिन ने सफलता प्राप्त की।
 

विदेशी शक्तियों से संघर्ष

लेनिन कौन था | 1917 की रूसी क्रांति में लेनिन के योगदान का वर्णन
साम्यवाद के प्रसार से यूरोप के अन्य राष्ट्र आतंकित हो गये । मित्र राष्ट्र बोल्शेविकों से असन्तुष्ट हो गये क्योंकि रूस ने जर्मनी से संधि कर ली । इसके साथ ही बोल्शेविक सरकार ने उस ऋण को चुकता करने से इन्कार कर दिया जो जार ने अपने शासन काल में लिये थे। उन्होंने जार के द्वारा विभिन्न देशों से की गयी गुप्त संधियों को भी प्रकाशित कर दिया । बोल्शेविक विश्व के मजदूरों एक हो का नारा देकर सभी देशों के मजदूरों को भड़का रहे थे। इसलिये भी कई देश रूस से नाराज थे। योरोप के विभिन्न मित्र राष्ट्रों ने प्रतिक्रान्ति के समर्थन में अपनी सेनायें लगा दीं। इन विदेशी सेनाओं से सामना के लिये बोल्शेविक सरकार ने 1919 में लाल सेना का गठन किया । लाल सेना की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर कुछ राष्ट्रों ने रूस के आन्तरिक झगड़े से अपना हाथ खींच लिया। इंग्लैण्ड, इटली तथा अमेरिका ने रूस की नाकेबन्दी समाप्त कर दी। 1920 तक रूसी लाल सेना ने विदेशी सेना को बाहर खदेड़कर उन समस्त क्षेत्रों पर अधिकार स्थापित कर लिया जो स्वतंत्र हो गये थे।

गृह युद्ध का अन्त- मध्यमवर्गीय सरकार समर्थकों द्वारा 1918 में शुरू किये गये प्रतिक्रान्ति या गृहयुद्ध का बड़ी कड़ाई से दमन किया । गृहयुद्ध में शामिल क्रान्तिकारियों को विदेशी सैन्य सहायता भी प्राप्त हो रही थी। बोल्शेविक सरकार ने लाल सेना के माध्यम से इन विदेशी सेनाओं को रूस के बाहर खदेड़ दिया। इस तरह प्रतिक्रान्तिकारियों की शक्ति कम हो गयी और गृह युद्ध का अन्त आसानी से कर दिया गया ।

नये संविधान का निर्माण लेनिन ने रूस के लिये एक नये संविधान का निर्माण किया । इस संविधान के अनुसार प्रत्येक ग्राम एवं नगर में सोवियत (Soviet) अर्थात् पंचायत स्थापित की गयी जिसके सदस्य जिलों के सोवियत का निर्माण करते थे। जिले के सोवियत के सदस्य प्रान्तीय सोवियत को गठित करते थे । प्रान्तीय सोवियत के सदस्य मिलकर राष्ट्रीय महासभा (National Congress) का निर्माण करते थे । शासन की समस्त शक्ति इस कांग्रेस के हाथ में थी । राष्ट्रीय महासभा एक केन्द्रीय कार्य समिति (Central Excutive Committee) का निर्वाचन करती थी। यह समिति मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) का गठन करती थी मंत्रिपरिषद के सदस्य पिपुल्स कमीसार (Peoples Commissars) कहलाते थे । इसके अतिरिक्त 40 सदस्यों की एक सभा प्रेसिडियम थी जो केन्द्रीय कार्यसमिति के अवकाश के दिनों में, मंत्रिमण्डल पर नियंत्रण रखती थी ।

इस नये संविधान में मताधिकार 18 वर्ष से या इससे अधिक उम्र वाले सभी स्त्री पुरुषों को प्रदान किया गया जो उत्पादक श्रम द्वारा आजीविका कमाते थे । जमीन्दारों, पादरियों एवं मध्यम वर्ग के लोगों को मताधिकार से वंचित रखा गया। इस प्रकार राजनीतिक सत्ता केवल सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रित हो गयी। इस संविधान ने श्रमिकों के अधिनायक तंत्र (Dictatorship of the Proletariat ) की स्थापना की ।

नवीन आर्थिक नीति

रूस में शुद्ध साम्यवाद की नीति के अन्तर्गत बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करके उन्हें चलाने का उत्तरदायित्व मजदूर वर्गों को दिया जाने लगा, व्यक्तिगत व्यापार पर रोक लगा दिया गया । विनिमय के साधनों, प्राकृतिक संसाधनों पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित किया गया । कृषकों को आज्ञा दी गयी कि वे पारिवारिक एवं बीज की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद अतिरिक्त अन्न सरकार को सौंप दें। मजदूर वर्ग अभी उद्योगों का संचालन हाथ में लेने को पूर्णरूप से तैयार नहीं थे । अतः उद्योगों में उत्पादन घटने लगा । कृषकों ने असन्तुष्ट होकर कृषि उत्पादन घटा दिया, अतः अकाल की स्थिति आ गयी । गृह युद्ध (1918- 21) ने बोल्शेविक सरकार को राजनीतिक एवं सैनिक रूप में हिला दिया था। तभी आर्थिक संकट ने घेर लिया। सोवियत जनों में घोर निराशा छाने लगी। ऐसी परिस्थितियों में लेनिन ने आर्थिक नीति में परिवर्तन अत्यन्त आवश्यक समझा । अतः साम्यवादी दल के सम्मेलन (1921) में नवीन आर्थिक नीति का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।नवीन आर्थिक नीति की विशेषतायें निम्नलिखित थीं -
  • अनिवार्य रूप से अतिरिक्त अन्न प्राप्त करने के स्थान पर उत्पादन पर कृषि कर लगाया गया। अतिरिक्त उत्पादन को बाजार में बेचने की आज्ञा दी गयी । 
  • साधारण नियंत्रण के अन्तर्गत फुटकर व्यापार की आज्ञा दी गयी। सरकार ने सहकारी उपभोक्ता समितियों की स्थापना की । 
  • वस्तु विनिमय के स्थान पर मुद्रा के व्यवहार को पुनः स्थापित किया गया ।
  • जिन औद्योगिक संस्थाओं में अधिक से अधिक बीस मजदूर कार्य करते थे, उन्हें छोटे पूंजीपतियों के हाथों में रहने दिया गया । 
  • मजदूरों के लिये मजदूर संघों में अनिवार्य रूप से सदस्य बनने की प्रणाली समाप्त कर दी गयी । 
  • मजदूरी देने की निश्चित व्यवस्था की गयी एवं राशन प्रणाली में संशोधन किया गया । बाजार में खुले तौर पर वस्तुएं खरीदने की आज्ञा दी गयी । 
  • पूंजी वृद्धि के लिये विदेशी पूँजीपतियों को आकर्षक लाभ की दरों पर कारखानों, यातायात की संस्थाओं में पूंजी लगाने के लिए प्रोत्साहित किया गया । 
  • राज्य के नियंत्रण के अन्तर्गत समस्त उद्योगों में समन्वय स्थापित करने की योजना बनायी गयी ।, 

नयी आर्थिक नीति के अन्तर्गत सामूहिक कृषि योजना बनायी गयी । उसको बढ़ावा देने के लिये ट्रेक्टर, उर्वरक आदि वस्तुएँ राज्य की ओर से देकर कृषकों को सामूहिक कृषि के लाभों की ओर आकृष्ट किया गया। परन्तु उससे उत्पादन में विशेष वृद्धि नहीं हुई। 1921 में सरकारी बैंक की स्थापना की गयी । उसके तीन वर्ष बाद नगर पालिक बैंक, कृषि बैंक, सहकारी बैंक आदि की स्थापना हुई। 1924 में मुद्रा प्रणाली में संशोधन किया गया। इस तरह नवीन आर्थिक नीति के अन्तर्गत राज्य ने उत्पादन एवं विदेशी व्यापार पर एकाधिकार स्थापित किया । परन्तु कृषि, लघु उद्योग एवं आन्तरिक व्यापार को राज्य नियंत्रण के अन्तर्गत छोटे-छोटे पूँजीपतियों के पास रहने दिया । इसी नीति के फलस्वरूप रूस की अर्थव्यवस्था, राज्य समाजवाद, राज्य पँजीवाद एवं व्यक्तिगत पूँजीवाद का विचित्र मिश्रण बन गयी।

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