कार्ल मार्क्स कौन थे | मार्क्सवाद के मुख्य सिद्धांत और विशेषताएँ

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कार्ल मार्क्स कौन थे मार्क्सवाद के मुख्य सिद्धांत और विशेषताएँ कार्ल मार्क्स को आधुनिक समाजवाद का जन्मदाता कहा जाता है कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो दास कैपिट

कार्ल मार्क्स कौन थे | मार्क्सवाद के मुख्य सिद्धांत और विशेषताएँ


कार्ल मार्क्स को आधुनिक समाजवाद का जन्मदाता कहा जाता है।काल्पनिक समाजवादियों के समाजवाद में निश्चित उद्देश्य तो था किन्तु उद्देश्य की पूर्ति के लिये यथार्थ विधि उन्होंने नहीं दी। मार्क्स ने उसे एक नयी दृष्टि तथा दिशा प्रदान कर उसके दोष को दूर किया। उसने समाजवाद को निश्चित रूप देकर उसे शक्तिमान बना दिया।

कार्ल हेनरिच मार्क्स (Karl Heinreich Marx ) का जन्म 5 मई 1818 को प्रशिया ट्रीविज नगर में हुआ था। मार्क्स की प्रारम्भिक शिक्षा प्रशिया में हुई। मार्क्स ने बान (Bonn) एवं बर्लिन (Berlin) विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षा प्राप्त की । इतिहास और दर्शन शास्त्र उसके प्रिय विषय थे। 1814 में उसने वियना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की । अध्ययन के बाद उसने पत्रकारिता का व्यवसाय अपनाया एवं रेनिश गजट नामक समाचार पत्र का सम्पादन करने लगा । तत्कालीन प्रशिया सरकार द्वारा यह समाचार पत्र अपने उत्तेजक विचारों के कारण प्रतिबन्धित कर दिया गया एवं कार्ल मार्क्स को प्रशिया से देश निकाला दे दिया गया । इसके बाद मार्क्स पेरिस पहुँचा । वहाँ उनकी मुलाकात फ्रेडरिक एन्जेल (Fredrick Engels) से हुई । वे दोनों एक अच्छे मित्र बने एवं वैज्ञानिक समाजवाद के क्षेत्र में जीवन पर्यन्त योगदान देते रहे।क्रान्तिकारी विचारों के कारण मार्क्स को 1845 में फ्रान्स से भी निर्वासित कर दिया गया। इसके बाद वह ब्रुसेल्स पहुँचा । एन्जेल भी ब्रुसेल्स पहुँचा । एन्जेल के सहयोग से कठिन परिश्रम के बाद कार्ल मार्क्स ने वैज्ञानिक समाजवाद या साम्यवाद (Scientific Socialism or Communism) का दर्शन तैयार किया ।

कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो (Communist Manifesto) - मार्क्स ने एक संगठन कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से बनाया । इस दल ने 1847 में लन्दन में आयोजित दूसरे अधिवेशन में कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो प्रकाशित कराया । इस प्रकार 1848 में कम्यूनिस्ट मैनिफेस्टो प्रकाश में आया । इस प्रचार पत्र के माध्यम से मार्क्स ने समाजवाद के सम्बन्ध में अपनी व्याख्या प्रस्तुत की थी और विश्व भर के मजदूरों को एक होकर संघर्ष करने का आह्वान किया । उस प्रचार पत्र में निम्नलिखित कार्यक्रम दिये गये - 
  • भू सम्पत्ति के व्यक्तिगत अधिकारों की समाप्ति तथा लगान में प्राप्त धन को सार्वजनिक उपभोग । 
  • उत्तराधिकार के अधिकारों का उन्मूलन। 
  • देशद्रोहियों की सम्पत्ति को जब्त करना। 
  • भारी आयकर-श्रेणी बद्ध रूप में वसूल किया जाय। 
  • बैंकों का राष्ट्रीयकरण और इसके द्वारा प्राप्त सारी सम्पत्ति पर राज्य का स्वामित्व । 
  • यातायात के साधनों पर राज्य का अधिकार। 
  • भूमि सुधार - कल-कारखानों का राष्ट्रीयकरण। 
  • कृषि कार्य के लिये औद्योगिक सेना का गठन। 
  • गावों व शहरों का अन्तर समाप्त करना। 
  • शिक्षा के साथ उद्योगों का एकीकरण। 
यह मैनिफेस्टो ही समय पाकर साम्यवादियों के लिये बाइबल की भाँति महत्वपूर्ण ग्रन्थ बन गया । इसने समकालीन विचारकों को एक नयी दृष्टि प्रदान की एवं विश्व में साम्यवादी प्रजातन्त्र की बुनियाद डाली ।

दास कैपिटल (Das Capital) - मार्क्स ने 1867 में इंग्लैण्ड में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक दास कैपिटल की रचना की । यह पुस्तक मार्क्स की अमर कृति है । इसने वर्तमान अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया और इस युग की आर्थिक विचारधारा में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया । इस पुस्तक की विषय वस्तु तीन खण्डों में विभाजित है । प्रथम खण्ड में आय की उत्पत्ति, सम्पत्ति के श्रोत, मूल्य आदि का वैज्ञानिक विवेचन है । विषय वस्तु को उदाहरण तथा आंकड़े प्रस्तुत कर समझाया गया है कि कैसे लाभ होता है, और कैसे उस पर पूँजीपति अधिकार कर लेते हैं । इसके अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त की व्याख्या भी प्रस्तुत की गयी है । दूसरे खण्ड में पूँजीपतियों की स्थिति का विवेचन है. उत्पादन, तैयारी, तैयारी, खपत और मुनाफा की चार अवस्थायें लगातार कायम रहती हैं और सारी पूँजी कुछ पूँजीपतियों की तिजोरी में चली जाती है । तीसरे खण्ड में मुनाफे के वितरण की पूँजीवादी व्यवस्था की विस्तृत व्याख्या है ।

मार्क्सवाद के मुख्य सिद्धांत (Key Theories of Marxism)

मार्क्स के सिद्धान्त मुख्यतः भौतिकवादी एवं पदार्थगत हैं तथा वे आर्थिक क्षेत्र से सम्बन्धित हैं । मार्क्स के उन सिद्धान्तों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है - 

(1) वर्ग संघर्ष का सिद्धान्त (Theory of class struggle)
(2) ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धान्त (Theory of historical materialism) 
(3) अतिरिक्त मूल्य का सिद्धान्त (Theory of Surplus value) 
(4) श्रम मूल्य का सिद्धान्त (Theory of Labour value)
 
मार्क्स के अनुसार समाज में व्याप्त आर्थिक असमानता विभिन्न वर्गों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा करती है। आदिम समाज में सभी व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से समान अधिकार रखते थे । धीरे-धीरे समाज में कुछ लोगों ने व्यक्तिगत पूँजी बना ली और समाज में धनी- निर्धन, शासक-शासित, स्वामी दास तथा मालिक - मजदूर जैसे वर्ग स्थापित हो गये । परस्पर विरोधी होने के कारण इनके बीच संघर्ष चला। मार्क्स ने कहा कि यह संघर्ष तब तक चलता रहेगा जबतक आर्थिक समानता स्थापित नहीं हो जाती । आधुनिक युग में सर्वहारा वर्ग और पूँजीपति वर्ग टकरा रहा है जिसके फलस्वरूप पूँजीपति वर्ग नष्ट होगा और वर्गहीन समाज स्थापित होगा।
 
कार्ल मार्क्स कौन थे | मार्क्सवाद के मुख्य सिद्धांत और विशेषताएँ
मार्क्स का विचार है कि आर्थिक असमानता से जन्में संघर्ष के फलस्वरूप ही सामाजिक, धार्मिक अथवा राजनीतिक क्षेत्रों में विभिन्न आन्दोलन, क्रान्तियां और युद्ध होते रहे हैं।मार्क्स ने संघर्ष के कारणों में पदार्थ को महत्व दिया है क्योंकि पदार्थ का अभाव ही विचार संघर्ष को जन्म देता है। मार्क्स ने विचार संघर्ष के स्थान पर आर्थिक शक्ति संघर्ष का उल्लेख किया । मानव इतिहास इसी आर्थिक अथवा भौतिक संघर्ष के कारण निरन्तर गतिशील बना रहता है। भौतिक पदार्थ ही जगत का आधार है तथा संसार का विकास भी भौतिक संघर्ष के कारण हो रहा है .

मार्क्स का विचार है कि श्रमिक के श्रम से ही उत्पादन होता है किन्तु उत्पादन मूल्य का बहुत कम भाग ही श्रमिक को प्राप्त होता है । उत्पादन मूल्य का अतिरेक भाग (Surplus value) पूँजीपति के अधिकार में चला जाता है। श्रमिकों को उसकी मजदूरी से जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होती तथा भोजन - वस्त्र नहीं मिल पाता । अतः विक्षुब्ध श्रमिक पूँजीपति से संघर्ष करने को तैयार हो जाता है । अर्थात अतिरिक्त मूल्य ही वर्ग संघर्ष का कारण है।
 
उत्पादित वस्तुओं का मूल्य निर्धारण कारखाने का मालिक कोई पूँजीपति ही करता है । वह वस्तु के निर्माणार्थ लगायी गयी अपनी पूँजी के आधार पर ही मूल्य निर्धारण करता है । श्रमिकों के लगाये गये श्रम पर लाभ देने की बात वह नहीं सोचता बल्कि अधिक से अधिक अपने लिये लाभांश की व्यवस्था करता है । इससे श्रमिकों को अपने श्रम का उचित मूल्य ही अर्थात मजदूरी नहीं मिल पाती और वह असहाय बना रहता है। समय पाकर यही मजदूर संगठित होकर पूँजीपतियों से संघर्ष करता है और अपना अधिकार प्राप्त करता है । अधिकारों की यह लड़ाई वर्ग संघर्ष कहलाती है। मार्क्स के अनुसार सारे उत्पादन पर मजदूरों का अधिकार होना चाहिए । इससे उनकी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों में सुधार होगा।
 
वर्गहीन समाज के स्थापना का विश्वास - मार्क्स ने विश्वास प्रकट किया कि वर्ग संघर्ष की सफलता के बाद वर्गहीन समाज स्थापित होगा । राज्य की समस्त सम्पत्ति पर समाज का सामूहिक अधिकार होगा । उत्पादित वस्तुओं का लाभ हानि समाज में समान रूप से वितरित होगा । न कोई धनी होगा न गरीब । आर्थिक सम्पन्नता एवं विपन्नता में बंटे समाज की स्थिति को बदलने के लिये मार्क्स ने विश्व के मजदूरों को एकबद्ध होकर संघर्ष छेड़ने का सन्देश दिया ।उसने नारा दिया - "विश्व के मजदूर एक हों।" संघर्ष में विजयी होने के लिये आन्दोलन, क्रान्ति, युद्ध, हिंसा आदि समस्त उपायों को मार्क्स ने उचित ठहराया।

14 मार्च सन् 1883 को कार्ल मार्क्स की मृत्यु लन्दन में हुई । वर्तमान शताब्दी में मार्क्स के विचार एवं कार्य योजना ने विश्व को प्रभावित किया है । यद्यपि कि मार्क्सवादी विचारों को सभी जगह स्वीकार नहीं किया गया है फिर भी उसके विचारों के कारण विकसित एवं अर्धविकसित देश के श्रमिकों के स्थिति में काफी सुधार आया है।

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