औद्योगिक क्रांति क्या है औद्योगिक क्रांति के मुख्य परिणाम 18वीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगिक उत्पादन और यातायात के साधनों में जो विकास हुआ उसे औद्य
औद्योगिक क्रांति क्या है | औद्योगिक क्रांति के मुख्य परिणाम
18वीं शताब्दी में यूरोप में औद्योगिक उत्पादन और यातायात के साधनों में जो विकास हुआ उसे औद्योगिक क्रान्ति के नाम से जाना जाता है। प्रथम चरण की औद्योगिक क्रान्ति वस्त्र उद्योग के पर्याय के रूप में जानी जाती है, पर द्वितीय चरण में औद्योगिक विकास बहुआयामी था । कोयला एवं लोहे के उपयोग ने इसी क्रान्ति को विशेष रूप से प्रभावित किया । कोयले एवं लोहने के कारण रेलवे का विकास तीव्रगति से हुआ। रेलवे के विकास के कारण उद्योग के प्रत्येक क्षेत्र में विकास हुआ। इसके अतिरिक्त विज्ञान के क्षेत्र में नित नये- नये आविष्कार होने लगे । इन आविष्कारों की सहायता से उत्पादन में तेजी से वृद्धि होने लगी । यही कारण है कि उत्पादन वृद्धि की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को औद्योगिक क्रान्ति कहा जाता है ।
कुछ इतिहासकारों ने इस प्रक्रिया को क्रान्ति का नाम देने का विरोध किया है । उनका मानना है कि उद्योग के क्षेत्र में कोई क्रान्ति हुई ही नहीं क्योंकि क्रान्ति एकाएक होती है जबकि उद्योगों का विकास धीरे- धीरे हुआ और यह प्रक्रिया आज भी अपने मार्ग पर अग्रसर है । पर उत्पादन की इस प्रक्रिया को क्रान्ति का नाम देना पूर्णतया गलत नहीं है । क्योंकि उत्पादन पद्धति में जो परिवर्तन आया वह आमूल था, पुरानी प्रणाली के स्थान पर सर्वथा नयी प्रणाली अपनायी गयी। इस क्रान्ति के कारण मानव श्रम का स्थान मशीनों ने ले लिये तथा उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई । उत्पादन में वृद्धि के साथ व्यापार भी तेजी से बढ़ा । अतः उत्पादन के क्षेत्र में आये एकाएक परिवर्तन को औद्यौगिक क्रान्ति का नाम देना उचित ही है ।
औद्योगिक क्रांति के मुख्य परिणाम
वैसे तो इन क्रान्ति का प्रारम्भ सर्वप्रथम इंग्लैण्ड में हुआ । धीरे-धीरे अन्य यूरोपीय राष्ट्र इसके प्रभाव क्षेत्र में आये । इस औद्योगिक क्रान्ति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया। इसने पूरे विश्व की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति को प्रभावित किया, जिसे हम निम्न रूपों में देख सकते हैं -
आर्थिक परिवर्तन
औद्योगिक क्रान्ति ने इंगलैण्ड के आर्थिक जीवन में महान परिवर्तन ला दिया है। इंग्लैण्ड एक कृषि प्रधान देश से औद्योगिक राष्ट्र बन गया। पूरे देश में कल कारखानों की भरमार हो गयी तथा पूरे देश की चिमनियाँ धुआँ उगलने लगीं । कुटीर उद्योग धन्धों का अंत हो गया । धनी लोग धनी होने लगे तथा कुटीर उद्योगों में लगे लोग बेकार होकर भुखमरी का शिकार होने लगे । वे गांवों को छोड़कर रोटी की खोज में शहरों की ओर दौड़ने लगे । पूंजीवाद का जन्म होने के साथ बैंकों की स्थापना प्रारम्भ हो गयी।
उद्योगों के बढ़ने से यूरोप के माल से विश्व का बाजार भर गया। पूरे विश्व का धन इंगलैण्ड के पूंजीपतियों के पास जाने लगा। उद्योग स्थलों पर बड़े- बड़े नगरों का विकास होने लगा तथा नगरों की जनसंख्या बढ़ने लगी । औद्योगिक नगरों के प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ने लगा। उद्योगों के बढ़ने तथा पूंजीपति के बढ़ने से समाज में धनी गरीब के बीच खाई बढ़ने लगी । धनी धनी और गरीब अधिक गरीब होने लगे । गरीबों का जीवन नारकीय हो गया। कुटीर उद्योगों के विनाश के कारण बेकारी की भयावह समस्या ने जन्म लिया। लोगों की आत्मनिर्भरता समाप्त हो गयी।
उद्योगों से नित नवीन वस्तुओं का उत्पादन होने से लोग उनका उपयोग करने लगे । इससे लोगों का जीवन स्तर उन्नत हो गया। यूरोपीय देश एशिया एवं अफ्रिका के देशों से कच्चा माल लाते थे एवं उन कच्चे मालों से तैयार तैयारी माल को पुनः उन देशों में बेच कर लाभ कमाते थे । इससे इन देशों की गरीबी बढ़ने लगी और यूरोपीय देश सम्पन्न होने लगे ।
सामाजिक परिवर्तन
औद्योगिक क्रान्ति ने समाज में आमूल परिवर्तन कर दिया । गांवों को छोड़कर लोग शहरों की ओर भागने लगे । इस क्रान्ति ने समाज को दो वर्गों पूंजीपति और मजदूर में बांट दिया। दोनों वर्ग में आपसी हितों को लेकर मतभेद बढ़ा । पूंजीपति मजदूर को कम से कम मजदूरी देना चाहता था और अपनी वचत का उपयोग और उद्योग धन्ध खोलने तथा विलासितापूर्ण जीवन बिताने में करता था। मजदूर वर्ग का जीवन कष्टमय हो गया था । अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए मजदूरों एवं उनके बच्चों को भी काम करना पड़ता था । इन्हें मजदूरी भी कम मिलती थी ।
उद्योग स्थल पर स्थान के अभाव के कारण अधिक मजदूरों को कम स्थान में रहना पड़ता था । प्रदूषण तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं के अभाव में मजदूरों को अनेक प्रकार के रोग होते थे । सफाई की व्यवस्था के अभाव में मजदूरों का जीवन जानवरों की तरह होने लगा । इसके अतिरिक्त मशीनों को चलाते समय कभी-कभी मजदूरों के शरीर का अंग कट जाता था और वे जीवन भर के लिए बेकार हो जाते थे। घायल मजदूरों को किसी प्रकार की क्षति पूर्ति नहीं होती थी तथा उन्हें काम से हटा दिया जाता था। इस प्रकार मजदूरों का जीवन नारकीय होने लगे। मजदूर यूनियनों के गठन के बाद मजदूरों के पक्ष में कुछ कानून अवश्य बने, पर वे पर्याप्त नहीं थे ।
औद्योगिक क्रान्ति के परिणामस्वरूप जनसंख्या में तो वृद्धि हुई ही इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम हुआ जनसंख्या का केन्द्रीकरण । एक स्थान पर अधिक जनसंख्या के कारण लोगों को रहने के लिए स्थानों का अभाव हो गया, प्रदूषण बढ़ा, मजदूर वस्तियाँ व्यभिचार का अड्डा बन गयीं । इस बिगड़ती स्थिति को देखकर ब्रिटिश संसद को कारखाना अधिनियम पारित करना पड़ा ।
राजनीतिक परिवर्तन
ब्रिटेन में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने के बावजूद भी औद्योगिक क्रान्ति के कारण पूंजीपतियों का प्रभाव बहुत बढ़ गया । पूंजीपति अपनी सम्पन्नता के कारण पैसे से वोट खरीद कर संसद सदस्य बनने लगे । वे संसद सदस्य के रूप में संसद में अपने फायदे के कानून बनवाते थे तथा मजदूरों के हित के बिलों को पास होने में वाधा उपस्थित करते थे । पूंजीपतियों के विरोध में ब्रिटेन में समाजवाद और साम्यवादी विचार फैली तथा अनेक विचारक हुए जिन्होंने पूंजीपतियों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई । इस विरोध के कारण सरकार को लाचार होकर फैक्टरी ऐक्ट पास करना पड़ा। कुटीर उद्योगों के विनाश के कारण बढ़ती बेरोजगारी से सरकार परेशान हो गयी । कुछ लोगों ने अन्धाधुन्ध मशीनीकरण के विरोध में आवाज उठाई। कई स्थानों पर विरोधों ने भयंकर रूप ले लिया तथा कारखानों तथा मशीनों की तोड़ फोड़ की गयी । इन विद्रोहों को दबाने के लिए सरकार को कठोर निर्णय लेने पड़े। पर सरकार आन्दोलनों पर पूर्ण नियंत्रण न लगा पायी और मजदूरों की दशा में सुधार के लिए सोचना पड़ा ।
फैक्टरियों के लिए कच्चे माल की पूर्ति एवं तैयारी माल के लिए बाजार दोनों की पूर्ति ब्रिटेन या यूरोप के देशों से संभव नहीं था, अतः यूरोप के देश उपनिवेश स्थापना के लिए आपस में होड़ करने लगे।वे अपना उपनिवेश भी बढ़ाने के लिए उत्सुक हुए । इसके कारण उनमें आपसी युद्ध भी हुआ तथा उपनिवेशों में भी युद्ध करना पड़ा । यूरोपीय साम्राज्यवाद की लिप्सा ने पूरे विश्व को युद्ध के मुंह में झोंक दिया जिससे धन अपार क्षति हुयी और मानवता कराह उठी।
सांस्कृतिक विकास
औद्योगिक क्रान्ति ने लोगों के जीवन स्तर में आमूल परिवर्तन ला दिया । यूरोप के साथ यूरोप का ईसाई धर्म पूरे विश्व में फैल गया। यूरोपीय माल के साथ यूरोपीय भोजन, पोषाक, रहन, सहन, शिक्षा एवं संस्कृति पूरे विश्व में फैल गयी । पूरे विश्व के पढ़े - लिखे लोग यूरोपीय सभ्यता में रंग गये। विश्व के लेखक, कवि एक दूसरे के पास आये तथा संस्कृतियों का आदान प्रदान तेजी से हुआ।
इस प्रकार से हम देखते हैं कि औद्योगिक क्रान्ति ने पूरी मानवता को जितना अधिक प्रभावित किया उतना अन्य किसी भी क्रान्ति ने प्रभावित नहीं किया । अधिकतर क्रान्तियाँ देशों, राजाओं एवं महादेशों तक सीमित रहीं, पर औद्योगिक क्रान्ति ने पूरी मानवता को एक साथ मिला दिया । आज भी औद्योगिक क्रान्ति अपने मार्ग पर सतत बढ़ रही है ।


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