वोटर की आत्मकथा

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वोटर की आत्मकथा मैं पैदा हुआ तो मेरे हाथ में कोई खिलौना नहीं था, एक पहचान थी। घरवालों ने कहा,“बेटा, तुम बड़े होकर कुछ भी बन सकते हो।

वोटर की आत्मकथा

                 
मैं पैदा हुआ तो मेरे हाथ में कोई खिलौना नहीं था, एक पहचान थी। घरवालों ने कहा,“बेटा, तुम बड़े होकर कुछ भी बन सकते हो।बस पहले यह समझ लो कि तुम हो क्या?” तब मुझे लगा था कि “मैं” होना ही काफी है।

पर धीरे-धीरे समझ आया कि “मैं” कई हिस्सों में बंटा हुआ हूँ,जाति, वर्ग, वोट, आंकड़ा, और चुनावी गणित का एक छोटा-सा अंक।

मेरी राजनीतिक चेतना का पहला संस्कार एक नारे से हुआ—“तिलक, तराजू और तलवार…”। यह नारा मेरे कानों में ऐसे गूंजा जैसे कोई बच्चा पहली बार अपना नाम सुनता है। फर्क बस इतना था कि यह नाम मेरा नहीं, मेरे “वर्ग” का था। तब मैं छोटा था, समझ नहीं पाया कि नारा किसी को उठाने के लिए है या किसी को गिराने के लिए।
            
वोटर की आत्मकथा
पर भीड़ में जोश था, और जोश में तर्क की जरूरत नहीं होती। वर्षों बाद जब मैंने राजनीति को थोड़ा-बहुत समझना शुरू किया, तो महसूस हुआ कि नारे दरअसल आईने नहीं होते, वे चश्मे होते हैं,जिससे आप दुनिया को वैसे देखते हैं, जैसा आपको दिखाना चाहा जाता है।
           
मैं भी उसी चश्मे से देखता रहा। मुझे बताया गया कि सत्ता में आने के लिए कुछ को जोड़ना पड़ता है, कुछ को तोड़ना पड़ता है, और कुछ को बस याद दिलाते रहना पड़ता है कि वे कौन हैं।
              
समय बीता, नारे बदले, चेहरे बदले, लेकिन राजनीति का मनोविज्ञान नहीं बदला। एक दिन मैंने अखबार में पढ़ा कि शिक्षा से जुड़ा एक कानून संशोधित हो रहा है। पहली नजर में यह एक शैक्षणिक मुद्दा लगा। पर जैसे ही बहस शुरू हुई, उसमें अचानक वही पुराने चेहरे दिखने लगे।तिलक, तराजू और तलवार।
          
मुझे आश्चर्य हुआ कि शिक्षा के कानून में भी जाति का प्रवेश कैसे हो गया। फिर समझ आया।यह प्रवेश नहीं, यह तो पहले से ही अंदर बैठा था, बस अब उसे नाम दे दिया गया।
        
मैंने अपने भीतर झांककर देखा। मेरे अंदर एक छोटा-सा वोटर बैठा है, जो हर बार चुनाव के समय जाग जाता है। वह मुझसे पूछता है,“तुम किसके साथ हो?” 
..और मैं! हर बार उलझ जाता हूँ। क्योंकि मेरा “मैं” कई टुकड़ों में बंटा हुआ है। एक हिस्सा कहता है,“देखो, यह नीति तुम्हारे खिलाफ है।” दूसरा हिस्सा कहता है,“नहीं, यह तो विकास के लिए है।” तीसरा हिस्सा चुप रहता है, क्योंकि उसे सिर्फ रोटी और रोज़गार चाहिए।
        
मुझे याद है, एक बार मैंने अपने दादा से पूछा था,“दादा, ये नेता लोग हमेशा हमें क्यों याद दिलाते हैं कि हम कौन हैं?” दादा हंसे थे। उन्होंने कहा था,“बेटा, जब तक तुम खुद नहीं जानोगे कि तुम कौन हो, तब तक कोई और तुम्हें बताता रहेगा। 
  
..और जब तुम जान जाओगे, तब भी वह तुम्हें बार-बार याद दिलाएगा, ताकि तुम भूल न जाओ कि तुम्हारा वोट किसके पास जाना चाहिए।”
     
अब जब मैं यूजीसी संशोधन पर हो रही बहस को देखता हूँ, तो मुझे वही पुराना खेल नजर आता है। फर्क बस इतना है कि पहले यह खेल खुले मैदान में होता था, अब यह फाइलों और नियमों के बीच खेला जाता है। पहले नारे सड़कों पर गूंजते थे, अब वे टीवी डिबेट और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते हैं।
       
मैंने एक दिन अपने आप से पूछा,“क्या यह भी सत्ता में आने का एक तरीका है?” जवाब तुरंत नहीं मिला। मैंने अपने अनुभवों की डायरी खोली। उसमें दर्ज था।जब किसी वर्ग को यह महसूस कराया जाता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, तो वह एकजुट हो जाता है।
     
जब किसी वर्ग को यह डर दिखाया जाता है कि उसका अधिकार छीना जा रहा है, तो वह और मजबूती से अपनी पहचान पकड़ लेता है।...और जब दो वर्गों को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, तो तीसरा वर्ग चुपचाप सत्ता तक पहुंच जाता है।

यह मनोविज्ञान है,भीड़ का, भय का, और पहचान का। राजनीति इसे भली-भांति समझती है।मैंने महसूस किया कि हर सत्ता अपने विरोधी को खुद गढ़ती है। कभी वह विरोधी कोई व्यक्ति होता है, कभी कोई विचार और कभी कोई जाति।क्योंकि बिना विरोधी के सत्ता की कहानी अधूरी लगती है। यह कहानी भी वैसी ही है।जहां एक तरफ “संशोधन” है, और दूसरी तरफ “असंतोष”। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
      
मेरे अंदर का व्यंग्यकार अब मुस्कुराने लगा। उसने कहा,“देखो, यह कितना सुंदर खेल है। पहले नारे से सत्ता मिलती है, फिर नियम से असंतोष पैदा किया जाता है, और फिर उस असंतोष को शांत करने के लिए अगला चुनाव लड़ा जाता है।”
     
मैंने अपने जीवन को एक प्रयोगशाला की तरह देखना शुरू किया। यहां मैं खुद एक “सब्जेक्ट” हूँ।जिस पर नीतियों का परीक्षण होता है, नारों का असर देखा जाता है, और चुनावी रणनीतियों का परिणाम मापा जाता है। फर्क बस इतना है कि इस प्रयोगशाला में कोई रिपोर्ट कार्ड नहीं मिलता, सिर्फ परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
         
एक दिन मैंने सपना देखा कि मैं एक विशाल मंच पर खड़ा हूँ। मेरे सामने भीड़ है। मैं उनसे कह रहा हूँ,“दोस्तों, अब समय आ गया है कि हम नारे नहीं, सवाल पूछें।” 
         
भीड़ चुप है। फिर अचानक कोई पीछे से चिल्लाता है।“पहले यह बताओ कि तुम हो कौन?” और मैं फिर उसी पुराने चक्र में फंस जाता हूँ।
       
मैं जाग गया। पसीने से भीगा हुआ। मुझे एहसास हुआ कि यह सपना नहीं, हकीकत है। हम सब उसी मंच पर खड़े हैं, बस हमें लगता है कि हम दर्शक हैं।अब जब मैं यूजीसी संशोधन और उससे जुड़ी राजनीति को देखता हूँ, तो मुझे यह एक “रणनीति” कम और एक “रचना” ज्यादा लगती है।जहां हर पात्र का अपना रोल है। कोई आक्रोश व्यक्त करता है, कोई सफाई देता है, और कोई इस पूरे नाटक को देखकर ताली बजाता है।

तो क्या यह सत्ता में आने का तरीका है? शायद हाँ।लेकिन यह सिर्फ एक तरीका नहीं, एक आदत भी है।...और आदतें इतनी आसानी से नहीं बदलतीं।मेरी आत्मकथा का निष्कर्ष बहुत साधारण है।
             
मैं अब भी वही “मैं” हूँ, जो अपने अस्तित्व को समझने की कोशिश कर रहा है। फर्क बस इतना है कि अब मैं नारे सुनकर ताली नहीं बजाता, बल्कि यह सोचता हूँ कि यह नारा किसके लिए है और क्यों है।क्योंकि अंततः सत्ता बदलती है, नारे बदलते हैं, कानून बदलते हैं।…लेकिन अगर कुछ नहीं बदलता, तो वह है।हमारा “मैं”
     
जो हर बार नए तरीके से पुराने खेल का हिस्सा बन जाता है और शायद सबसे बड़ी विडम्बना भी यही है कि हम इस खेल को समझते हुए भी हर बार उसी में शामिल हो जाते हैं।



- हनुमान मुक्त,
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