हिन्दी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य भूमण्डलीकरण और जनसंचार क्रान्ति के वर्तमान दौर में हिन्दी पत्रकारिता के साथ ही देश की प्रान्तीय भाषाओं की पत्रक
हिन्दी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य
भूमण्डलीकरण और जनसंचार क्रान्ति के वर्तमान दौर में हिन्दी पत्रकारिता के साथ ही देश की प्रान्तीय भाषाओं की पत्रकारिता में जो विस्फोटक रूप से परिवर्तन हुआ है; उसे न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही उसके बहुआयामी प्रभावों से बचा जा सकता है. बीसवीं शताब्दी के आखिरी दो दशकों से हिन्दी सहित भारत की अन्य प्रमुख प्रान्तीय भाषाओं के समाचार-पत्रों की वर्ष दर वर्ष बढ़ती प्रसार संख्या को देखकर यदि सुखद आश्चर्य होता है तो जनप्रिय होने की प्रतिस्पर्धा में जन-जीवन में समाचार-पत्रों की सकारात्मक भूमिका की उपेक्षा को देखकर गहरी चिन्ता भी होती है.
इसमें कोई संदेह नहीं कि विगत दो दशकों में हिन्दी समाचार-पत्रों की प्रसार संख्या, प्रभाव क्षमता और मुनाफे में गुणात्मक वृद्धि हुई है. इण्डियन रीडरशिप सर्वे के अनुसार हिन्दी का 'दैनिक भास्कर' देश का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला समाचार-पत्र है. दूसरा स्थान 'दैनिक जागरण' का है. हिन्दी समाचार-पत्रों की पहुँच नगर-महानगर से निकलकर कस्बों और देहातों तक हुई है. स्पष्ट है कि पढ़े-लिखे प्रबुद्ध पाठकों के अतिरिक्त हिन्दी समाचार-पत्रों से कस्बों और देहातों का सामान्य पढ़ा-लिखा आम आदमी भी जुड़ा है. निश्चय ही हिन्दी पत्रकारिता की यह स्थिति सुखद है.
इसके बावजूद हिन्दी की वर्तमान पत्रकारिता के स्वरूप और उसके निहितार्थ को लेकर कुछ प्रश्न गहरी चिन्ता के कारण बनते हैं जिनको आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता. पत्रकारिता आज मुद्रित शब्दों का सबसे मुनाफे वाला कारोबार बन गई है और हिन्दी पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है. आजादी से पहले हिन्दी पत्रकारिता में जो मिशनरी भावना थी, वह आजादी के बाद भी कई दशकों तक बनी रही किन्तु भूमण्डलीकरण के दौर में आते-आते पत्रकारिता से मिशनरी भावना बिल्कुल समाप्त हो गई. वर्तमान हिन्दी पत्रकारिता एक सफल उद्योग के रूप में स्थापित हो चुकी है. समाचार-पत्रों में सम्पादक का महत्व घटा है. उसकी भूमिका न्यूज मैनेजमेंट तक ही सीमित रह गयी है, जिसका एक मात्र लक्ष्य ऐसी न्यूज पॉलिसी तैयार करना है, जिससे समाचार-पत्र की प्रसार संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती रहे. यही एक सफल सम्पादक की कसौटी है. समाचार-पत्र एक उत्पाद (Product) के रूप में स्थापित हो चुके हैं और उनके समक्ष पाठक उपभोक्ता (Consumer) है. उत्पाद - उपभोक्ता के इस सम्बन्ध को बाजार की शक्तियाँ अपने ढंग से प्रभावित और नियंत्रित कर रही हैं. मार्केटिंग प्रबन्धक उपभोक्ता के नए-नए क्षेत्र विकसित कर रहे हैं. उसी की आवश्यकता के अनुरूप समाचार-पत्र भी पाठ्य सामग्री परोस रहे हैं. निसंदेह इसमें बड़ी-बड़ी विज्ञापन कम्पनियों का भी सहयोग मिल रहा है.
यही कारण है कि विगत कुछ वर्षों में हिन्दी समाचार- पत्रों की विषय सामग्री में आश्चर्यजनक रूप में एकरूपता दिखाई पड़ने लगी है. उदाहरण के लिए सभी हिन्दी समाचार- पत्रों में मनोरंजन को समान रूप से सर्वोपरि प्रमुखता दी जाने लगी है. यहाँ तक कि खबरों को भी मनोरंजक ढंग से दिया जाने लगा है. ऐसा लगता है कि हिन्दी के समाचार-पत्र मनोरंजन उद्योग के जनसम्पर्क माध्यम के रूप में कार्य कर रहे हैं. प्रत्येक समाचार-पत्र के बैनर के दाएं-बाएं देश-विदेश की नायिकाओं को प्रमुखता मिली है. फिल्म, टी. वी. से जुड़ी मसाला गासिप और खबरों के लिए अर्द्धनग्न चित्रों सहित एक पृष्ठ प्रतिदिन के लिए निर्धारित है. इसी प्रकार सौन्दर्य प्रसाधन, सौन्दर्य प्रतियोगिताओं की प्रचुर सामग्री चित्रों सहित प्रमुखता से प्रकाशित होती है. खान-पान, घर की साज-सज्जा आदि सामग्री से नया बाजार तलाशने की मुहिम जारी है.
इस प्रकार विदेशी उत्पादों तथा विदेशी सहयोग से बने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्थानीय उत्पादों के लिए नया बाजार बनाने में हिन्दी पत्रकारिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इनसे सम्बन्धित विज्ञापनों को देखकर तो यही लगता है कि बाजार के भूमण्डलीकरण के प्रति समाचार-पत्रों का दृष्टिकोण सेवक जैसा है.
हिन्दी समाचार-पत्रों से बच्चों का पन्ना और साहित्य का पन्ना धीरे-धीरे गायब हो गया है. उसकी जगह भी विश्व की रोमांचक और मनोरंजनपूर्ण रोचक खबरों ने ले ली है. हिन्दी समाचार-पत्रों से साहित्य का गायब होना भले ही चिन्ता का विषय हो किन्तु न्यूज मैनेजमेंट के अनुसार वह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है. स्पष्ट है कि समाचार-पत्र में वही सब कुछ या अधिकतर होगा जो उनकी प्रसार संख्या में वृद्धि करता है. विषय सामग्री की ही बात काफी नहीं है; समाचार-पत्रों की भाषा पर भी यदि ध्यान दें तो उसमें भी गहरा परिवर्तन दिखाई पड़ता है. खबरों की भाषा आमजन तक पहुँचने का प्रयास करती दिखाई देती है. भाषा की शुचिता और व्याकरण सम्मत होना वर्तमान हिन्दी पत्रकारिता के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना आम आदमी तक पहुँचना.
तो क्या यह मान लिया जाय कि बाजार के दबाव में हिन्दी पत्रकारिता समाज के प्रति सकारात्मक भूमिका से मुँह मोड़ चुकी है. अथवा भारतीय लोकतन्त्र का चौथा खम्भा कही जाने वाली हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका सीमित हो गयी है. विज्ञापन पर चलने वाले और मुनाफे को लक्ष्य बनाने वाले हिन्दी समाचार-पत्र, खबरों के सच को जिन्दा रखने के लिए अजीब कशमकश के दौर से गुजर रहे हैं.विश्वसनीयता के प्रश्न ने उनको इस दौर में अपेक्षाकृत अधिक जिम्मेदार बनने के लिए विवश किया है. ब्लॉक स्तर से देश की राजधानी तक की नौकरशाही के भ्रष्ट कारनामों की खबरें कम-से-कम यही दर्शाती हैं. पुलिस और प्रशासन के अत्याचार और अन्याय की खबरें आज भी प्रमुखता से प्रकाशित होती हैं. यही हिन्दी पत्रकारिता की मूल आत्मा है.
अन्त में यही कहा जा सकता है कि हिन्दी समाचार पत्रों की बढ़ती प्रसार संख्या केवल बाजारवाद के कारण ही नहीं है बल्कि वह देश की आम जनता की आकाँक्षाओं का भी प्रतीक है. अतः उस आम जनता की आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक प्रहरी की अपनी जिम्मेदारी भी निभानी होगी. इसके लिए उसे अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए पूरी ईमानदारी के साथ प्रयास करने होंगे.


COMMENTS