हिंदी में दलित साहित्य का उद्भव एवं विकास

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हिंदी में दलित साहित्य का उद्भव एवं विकास

लित साहित्य हिंदी साहित्य की उस धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें उत्पीड़ित, शोषित और वंचित वर्ग की पीड़ा, संघर्ष, अस्मिता तथा प्रतिरोध की अभिव्यक्ति प्रमुख रूप से होती है। 'दलित' शब्द संस्कृत के 'दल' धातु से निकला है जिसका अर्थ है टूटा हुआ, कुचला हुआ या दबाया हुआ। यह शब्द ज्योतिबा फुले और डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से लोकप्रिय हुआ, जो जाति-व्यवस्था के खिलाफ एक व्यापक विद्रोह का प्रतीक बन गया। हिंदी में दलित साहित्य न केवल साहित्यिक रचना है बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा भी है, जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था की जड़ों को चुनौती देता है और समतामूलक समाज की कल्पना प्रस्तुत करता है। इसका उद्भव प्राचीन काल की प्रतिरोधी परंपराओं से जुड़ा है, जबकि विकास आधुनिक युग में अम्बेडकरवादी चेतना और दलित पैंथर आंदोलन के प्रभाव से हुआ। यह साहित्य मुख्यतः दलित लेखकों द्वारा रचित है, जिसमें अनुभव की सच्चाई और आत्मकथात्मक तत्व प्रमुख हैं।

वर्तमान समय में हिन्दी का दलित साहित्य हिन्दी साहित्य से अलग अपनी स्वतन्त्र पहचान बना चुका है. इतना ही नहीं उसने हिन्दी के परम्परागत सौन्दर्य शास्त्र को नकारते हुए अपना पृथक् सौन्दर्य शास्त्र भी निर्मित कर लिया है. दलित साहित्य का अपना चिन्तन-दर्शन और विचारधारा है. उसकी अपनी प्रतिबद्धता है जो निश्चित ही कई अर्थों में हिन्दी साहित्य से भिन्न है. दलित साहित्य को विगत दो-ढाई दशकों में मिली लोकप्रियता और काफी जद्दोजहद के बाद मिली सामाजिक मान्यता का ही यह प्रभाव है कि साहित्य और सामाजिक ज्ञान के क्षेत्र में दलित विमर्श लगभग अनिवार्य - सा हो गया है. दलित साहित्य पर एक नज़र डालने से पहले 'दलित' शब्द का अर्थ, दलित साहित्य की अवधारणा, प्रेरणास्रोत, चिन्तन के आधार को जानना-समझना प्रासांगिक होगा.

दलित शब्द का अर्थ

दलित शब्द का शाब्दिक अर्थ है- कुचल हुआ. गरीब और शोषित. महाराष्ट्र में सन् 1970 के दशक में 'दलित पैंथर' नामक दलितों के एक राजनीतिक दल ने 'दलित' शब्द का सबसे अधिक प्रचार किया. 'दलित पैंथर्स' ने दलितों में अनुसूचित जाति/जनजाति, नव बौद्ध, मजदूर, भूमिहीन एवं गरीब किसान उच्च वर्ण/वर्ग से आर्थिक एवं धार्मिक रूप से पीड़ित एवं शोषित सदस्यों को सम्मिलित किया. 'दलित' शब्द की इस व्यापक अवधारणा को डॉ. शरणकुमार लिम्बाले ने 'दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र' में स्वीकार किया है किन्तु हिन्दी के दलित साहित्य और दलित आलोचनात्मक लेखों पर यदि नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि दलित साहित्य में 'दलित' शब्द से आशय अस्पृश्य जातियों से है. दलित साहित्य के केन्द्र में भी अस्पृश्य जाति ही है.
 

दलित साहित्य की अवधारणा 

कँवल भारती के शब्दों में- “दलित साहित्य से अभिप्राय उस साहित्य से है जिसमें दलितों ने स्वयं अपनी पीड़ा को रूपायित किया है. अपने जीवन संघर्ष में दलितों ने जिस यथार्थ को भोगा है, दलित साहित्य उसी की अभिव्यक्ति करता है. यह कला के लिए कला का नहीं बल्कि जीवन का और जीवन की जिजीविषा का साहित्य है." 

डॉ. शरणकुमार लिम्बाले के अनुसार- "दलितों का दुःख, परेशानी, गुलामी, अधःपतन और उपहास के साथ ही दरिद्रता का कलात्मक शैली से चित्रण करने वाला साहित्य ही दलित साहित्य है." स्पष्ट है कि दलित साहित्य के केन्द्र में दलित और उसके द्वारा भोगा हुआ अस्पृश्यता का दंश, भूख, गरीबी, शोषण, सामाजिक विषमता की पीड़ा-वेदना और इन सबको लेकर समाज के सवर्णों के प्रति अत्यन्त तीखी घृणा तथा विद्रोह का भाव है.

दलित साहित्य की चेतना समाज से सहानुभूति की माँग नहीं करती वरन् सामाजिक न्याय के अधिकार की माँग करती है. उसमें बराबरी के स्तर पर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर समाज की भागीदारी का आग्रह अधिक है. 

गैर दलितों का लेखन दलित साहित्य क्यों नहीं है ?

हिंदी में दलित साहित्य का उद्भव एवं विकास
प्रायः यह प्रश्न उठाया जाता रहा है कि दलित जीवन को लेकर हिन्दी साहित्य में लिखने वालों की लम्बी परम्परा रही है. इसमें प्रेमचन्द, निराला, अमृतलाल नागर जैसे सवर्ण लेखकों का नाम लिया जाता है फिर इनका लेखन दलितों पर केन्द्रित होने के बावजूद दलित साहित्य में क्यों नहीं आता ? इस प्रश्न के उत्तर में कँवल भारती 'दलित साहित्य की अवधारणा' शीर्षक अपने लेख में लिखते हैं-

“सवाल अनुभूतियों और चिन्तन का है. दलित जीवन की पीड़ा की जैसी अनुभूतियाँ एक दलित को होती हैं, वैसी अनुभूतियाँ एक सवर्ण को नहीं हो सकती. मार्क्स, गांधी या उदारवादी हिन्दू विचारधारा से प्रभावित सवर्ण लेखक की दलित पीड़ा या सवालों के साथ सह-अनुभूति हो सकती है और उसी आधार पर वह अपने समाधान भी प्रस्तुत कर सकता है जैसाकि प्रेमचन्द, निराला गिरिराज किशोर, नागार्जुन, अमृतलाल नागर और डॉ. जगदीश गुप्त आदि ने प्रस्तुत किये हैं किन्तु वह दलित साहित्य का अंग इसलिए नहीं बन सकते क्योंकि दलित चेतना इन विचारधाराओं को पूरी तरह नकारती है." 

सवर्ण लेखकों के दलित लेखन को दलित साहित्य में स्वीकार न करने का मुख्य कारण उनमें दलित चेतना दृष्टि का अभाव रहा है. इसे रमणिका गुप्ता भी स्वीकार करती हैं. 'दलित साहित्य की मूल विचारधारा की भूमिका' शीर्षक लेख में उन्होंने लिखा है-

"प्रेमचन्द या निराला ने कतई दलित दृष्टि से नहीं लिखा बल्कि मानवीय दृष्टि या जनवादी और प्रगतिशील दृष्टि से अथवा समाज की विकृतियों के विरोध स्वरूप लिखा था और उनकी इस जनवादी दृष्टि का केन्द्र भी मनुष्य था. यह उनकी दलितों के प्रति सहानुभूति थी, दलितों की चेतना दृष्टि नहीं. उसमें वर्गीय समानता की बात मुखर थी."

अतः यह निसंकोच मान लेना चाहिए कि "वास्तव में दलितों द्वारा लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य की कोटि में आता है.'

दलित साहित्य का दर्शन व विचारधारा

दलित साहित्य ने अपनी ऊर्जा और चेतना डॉ. अम्बेडकर के दर्शन से प्राप्त की है. आज डॉ. अम्बेडकर के विचार और चिन्तन की व्यापकता ही दलित साहित्य की मुख्य धारा है. कँवल भारती के शब्दों में- “डॉ. अम्बेडकर की दलित मुक्ति की चेतना और विचारधारा से जुड़ने के बाद न सिर्फ दलित साहित्य को नया अर्थ मिला, अपितु सामाजिक परिवर्तन की सम्पूर्ण विद्रोही चेतना ही उसकी अवधारणा बन गई. आधुनिक हिन्दी दलित साहित्य वह है जो दलित मुक्ति के सवालों पर पूरी तरह अम्बेडकरवादी है. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सभी : क्षेत्रों में उसके सरोकार वही हैं जो डॉ. अम्बेडकर के थे."

डॉ. अम्बेडकर ने धर्म को ईश्वर और कर्मकाण्डों पर आधारित होने का विरोध इसलिए किया था कि ये दोनों ही व्यवस्थाएं सवर्णों की देन है, जो दलितों का सामाजिक शोषण करती हैं. इसलिए डॉ. अम्बेडकर ने अनीश्वरवादी, अनात्मवादी और वैज्ञानिक दृष्टि से धर्म का समर्थन किया. ब्राह्मणवाद, सामंतवाद और पूंजीवाद सहित डॉ. अम्बेडकर वर्णव्यवस्था के भी कट्टर विरोधी थे.

सवर्णों का श्रेष्ठत्व, सामाजिक जीवन में बेमेल आचार- विचार, स्त्री और शूद्रों की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन, पवित्रता और अपवित्रता की भ्रामक कल्पनाएं आदि सामाजिक व्यवस्थाओं को डॉ. अम्बेडकर ने सदैव नकारने का संघर्ष किया. वे मनुष्य और मानवतावाद को सर्वोच्च मानते थे. अतः जो संस्कृति या सामाजिक व्यवस्था मनुष्य को उसके आत्मसम्मान से अपदस्थ करे, उसके प्रति डॉ. अम्बेडकर ने विद्रोह किया. अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर की विद्रोह चेतना ही दलित साहित्य की मुख्य शक्ति है.
 
अतः डॉ. अम्बेडकर के विचारों और दर्शन को समझे बिना दलित साहित्य की मुख्य चेतना को समझना कठिन नहीं तो आधा-अधूरा समझना अवश्य कहा जाएगा.

हिन्दी का दलित साहित्य

हिन्दी में विगत दो-ढाई दशकों में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, आलोचना, पत्रकारिता-सभी विधाओं में प्रचुर दलित साहित्य की रचना हुई है. स्थानाभाव के कारण प्रमुख रचनाओं व रचनाकारों का नामोल्लेख यहाँ दिया जा रहा है- 
  1. कविता - स्वामी अछूतानन्द के 'आदि वंश का डंका' से लेकर बल्ली सिंह चीमा के 'सुनो ब्राह्मण' तक दलित कविता की दीर्घ परम्परा रही है. दलित काव्य में दलितों के शोषण, उत्पीड़न के दर्द को गहरे व्यक्त किया गया है. साथ ही उनके आत्मविश्वास, विद्रोह और हार न मानने का संकल्प भी प्रकट हुआ है. अम्बेडकर, एकलव्य, झलकारी बाई आदि दलित नायकों को लेकर प्रबन्ध काव्यों की रचना भी हुई है. उल्लेखनीय रचनाओं में 'आग और आन्दोलन (मोहनदास नैमिष राय), अम्बेडकर की कविताएं (कँवल भारती), मूरख नहीं बनेंगे हम ( रमणिका गुप्ता), मैं गूंगा नहीं था (जयप्रकाश कर्दम), क्रान्ति अभी शेष है (लाल चन्द्र राही), मैं कौंच हूँ (श्योराज सिंह बेचैन), हार नहीं मानूँगी (ईश कुमार), रात के इस शहर में (सुदेश तनवर), खामोश नहीं हूँ मैं (असंघ घोस), समय बहुत कम है (निशान्त), बस्स! (ओमप्रकाश वाल्मीकि), मोर्चा (भास्कर सुमन), भीख नहीं बस्स! बहुत हो चाहिए (सुरेश पंजम) आदि का नाम लिया जा सकता है. दलित पत्र-पत्रिकाओं के अतिरिक्त देश की प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में भी दलित कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित हो रही हैं. 
  2. उपन्यास- दलितों को केन्द्र में रखकर हिन्दी उपन्यास गैर दलित लेखकों (प्रेमचन्द, रेणु, रांगेव राघव, अमृतलाल नागर आदि) ने भी उपन्यास लिखे हैं, किन्तु दलित उपन्यासकारों ने दलित जीवन को अधिक यथार्थ और विद्रोही चेतना के साथ चित्रित किया है. इनमें पहला खत (धर्मवीर), छप्पर (जयप्रकाश कर्दम), जसतस भई सबेर (सत्यप्रकाश), मिट्टी की सौगन्ध (प्रेम कपाड़िया), मुक्ति पर्व, क्या मुझे खरीदोगे (मोहनदास नैमिषराय) और काली रेत ( ओमप्रकाश वाल्मीकि) उल्लेखनीय उपन्यास हैं. 
  3. आत्मकथा - हिन्दी की दलित आत्मकथाएं मराठी दलित आत्मकथाओं से अत्यन्त प्रभावित हैं. सन् 1960 के दशक में मराठी में प्रकाशित दलित लेखकों की आत्मकथाओं ने मराठी समाज को ही नहीं हिन्दी समाज को भी गहराई से उद्वेलित किया. शरणकुमार लिम्बाले की 'अक्करमाशी' आत्मकथा अत्यन्त चर्चित हुई. इस आत्मकथा ने दलित लेखकों को आत्मकथा लेखन के लिए प्रेरित किया. साथ ही रमाबाई रानाडे, दया पवार, कुमुद पांवड़े, बसंत मनु आदि की आत्मकथाओं ने भी प्रभावित किया. फलतः अपने-अपने पिंजरे (मोहनदास नैमिषराय), जूठन (ओमप्रकाश वाल्मीकि), दोहरा अभिशाप (कौशल्या), तिरस्कार (सूरजपाल), मेरा सफर मेरी जिन्दगी (डॉ. जाटव) और मैं भंगी हूँ (भगवानदास) जैसी चर्चित आत्मकथाएं लिखी गईं. दलित आत्मकथाओं में सवर्ण समाज द्वारा दलित शोषण के वीभत्स प्रसंग उजागर हुए हैं, जिन्हें दलित लेखकों ने स्वयं भोगा है. दलित लेखकों ने जिस विश्वसनीयता, तथ्यपरकता और संवेदना से अपने जीवन संघर्षों को व्यक्त किया है, इन आत्मकथाओं को पढ़कर यह धारणा बलवती होती है कि गैर दलित लेखकों के लिए यह निश्चित ही सम्भव नहीं है. 
  4. कहानी - हिन्दी के दलित लेखकों ने प्रचुर मात्रा में कहानियाँ लिखी हैं. जो दलित पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही हंस, कथादेश, कथाक्रम आदि प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो रही हैं. 
  5. नाटक- दलित नाटकों की संख्या कम होने के बावजूद प्रभावशाली नाटक लिखे गये. अनेक चर्चित नाटकों का मंचन भी हुआ. उल्लेखनीय नाटकों में हैलो कामरेड, अदालतनामा (मोहनदास नैमिषराय) दो चेहरे (ओमप्रकाश वाल्मीकि), जब रोम जल रहा था नीरो बंशी बजा रहा था (कँवल भारती) आदि के नाम लिए जा सकते हैं. 
  6. आलोचना- दलित आलोचना ग्रंथों में दलित साहित्य के जीवन दर्शन सौन्दर्य शास्त्र और दलित समाज की सामाजिक विवेचना ही मुख्यतः अभिव्यक्त हुई है. दलित आलोचकों में डॉ. ए. एन. सिंह, डॉ. धर्मवीर, कँवल भारती, डॉ. के. एम. संत, डॉ. दयानन्द बटोही, डॉ. सुखवीर सिंह, डॉ. रमणिका गुप्ता, डॉ. जयप्रकाश कर्दम, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि प्रमुख हैं. इसके साथ ही विविध विश्वविद्यालयों में प्रस्तुत शोध प्रबन्धों के द्वारा दलित समाज और हिन्दी दलित साहित्य से सम्बन्धित अनेक समीक्षा ग्रन्थ सामने आए हैं. 
हिन्दी में दलितों के जीवन पर केन्द्रित बहु आयामी साहित्य को देखकर यह निष्कर्ष निकलता है कि दलित साहित्य हिन्दी साहित्य की एक पृथक् और विशिष्ट साहित्य धारा है. दूसरी, दलित साहित्य में अन्य वर्गों के गैर दलित लेखकों की उपस्थिति के बावजूद दलित लेखकों का साहित्य अधिक प्रभावी, यथार्थपरक है और इसलिए प्रामाणिक भी है. डॉ. शुकदेव सिंह के शब्दों में- "कोई विद्याधर दलित शब्दों के नहीं अपने संकल्पों का सिपाही नहीं बन सकता है. यह कला-कर्म नहीं बल्कि मनुष्य मुक्ति और कलंक से हाथापाई का मोर्चाबन्द अभियान है.

इस प्रकार हिंदी दलित साहित्य का विकास एक निरंतर संघर्ष की कहानी है। यह मुख्यधारा के साहित्य की सीमाओं को तोड़कर वंचितों की आवाज को केंद्र में लाया है। इसने साहित्य को समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया और दलित चेतना को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया। भविष्य में यह साहित्य और अधिक समावेशी, वैश्विक संदर्भों से जुड़कर तथा डिजिटल माध्यमों के माध्यम से आगे बढ़ेगा। अंततः दलित साहित्य न केवल पीड़ा का दस्तावेज है, बल्कि न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की अमर ज्योति भी है, जो हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाता जा रहा है।

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