महावीरप्रसाद द्विवेदी अपने युग की नव चेतना के संवाहक थे. वे साहित्यकार, आलोचक, सम्पादक कम एक महान शिक्षक अधिक थे. उनका उद्देश्य हिन्दी प्रदेश में नवीन
हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
हिन्दी के सर्वांगीण विकास के लिए नवजागरण काल में जो बीजारोपण भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने किया था, उसे आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' के माध्यम से विशाल वट वृक्ष के रूप में साकार किया. एक युग प्रवर्तक के रूप में आचार्य द्विवेदी की भूमिका इस अर्थ में ऐतिहासिक और विशिष्ट है कि उन्होंने अपने समय के हिन्दी साहित्य के 'कलात्मक विकास' की चिन्ता नहीं की, वरन् उसके अभावों की चिन्ता की. 'सरस्वती' के सम्पादन द्वारा उन्होंने साहित्य के नए मूल्यों और आदर्शों की प्रतिष्ठा की साथ ही ज्ञान के विविध क्षेत्रों-इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, पुरातत्व, चिकित्सा, राजनीति, जीवनी आदि से सामग्री लेकर हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया.
अपने युग के लेखकों / कवियों पर द्विवेदीजी के व्यक्तित्व की गहरी छाप थी. एक 'युग विधायक' के रूप में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के योगदान को निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत मूल्यांकित किया जा सकता है-
द्विवेदी जी मूलतः कवि नहीं थे. काव्य रचना उनके लिए कठिन थी - "कविता करना आप लोग चाहें जैसा समझते हों, हमें तो एक तरह से दुःसाध्य ही जान पड़ता है." किन्तु काव्य-पथ-प्रदर्शक के रूप में उनकी ख्याति थी. काव्य विषय, काव्य भाषा, छन्द विधान आदि पर उन्होंने अपने समकालीन कवियों को मौलिक दिशा निर्देश दिए हैं. उन्हीं के प्रेरणा और प्रयासों से काव्य रचना में ब्रजभाषा का एकछत्र अधिकार समाप्त हुआ और खड़ी बोली हिन्दी कविता की मुख्य भाषा बनी. द्विवेदीजी की मान्यता थी कि मध्ययुगीन मानसिकता की ब्रजभाषा आधुनिक युगधर्म का निर्वाह नहीं कर सकती.
भारतेन्दु की इस स्थापना के बावजूद कि 'सब विषय काव्योपयुक्त हो सकते हैं', काव्य के विषय सीमित ही रहे. द्विवेदीजी ने 'कवि कर्तव्य' लेख में भारतेन्दु की इस मान्यता को दृढ़ता से स्थापित किया. उनका मानना था- "चींटी से लेकर हाथीपर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजापर्यन्त पशु, बिन्दु से लेकर समुद्रपर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत- सभी पर कविता हो सकती है."
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने काव्य विषय की विविधता के साथ शिक्षाप्रद सोद्देश्यपूर्ण काव्य रचना पर भी बल दिया. वे मानते थे कि काव्य से केवल मनोरंजन ही न हो, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म हो. वस्तुतः यह काव्यादर्श द्विवेदी- युगीन कवियों का मूलमन्त्र बना-
केवल मनोरंजन न कवि कर्म होना चाहिए।
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए। - मैथिलीशरण गुप्त
आचार्य द्विवेदी ने प्रबन्ध काव्य रचना पर जोर दिया. उनकी प्रेरणा से खड़ी बोली के प्रथम दो महाकाव्य 'प्रियप्रवास' और 'साकेत' लिखे गए. साथ ही ऐतिहासिक व पौराणिक आदर्श चरित्रों को लेकर अनेक खण्ड काव्यों की भी रचना हुई. इसके अतिरिक्त द्विवेदीजी ने 'प्लेग स्तवराज' की रचना गद्य काव्य के रूप में की जो हिन्दी कविता की सर्वथा नई विधा की पहली रचना है. लघु प्रबन्ध मुक्तक के रूप में इस नई विधा का विकास छायावादी कवियों में मिलता है.
छन्द विधान में आचार्य द्विवेदी की मौलिक देन है- अतुकान्त छन्द को प्रोत्साहन. संस्कृत और अंग्रेजी की अतुकान्त कविता की तरह द्विवेदीजी ने भी अतुकान्त छन्दों में कविता लिखने पर बल दिया- “हमारा यह मत है कि पादान्त में अनुप्रास हीन छन्द भी भाषा में लिखे जाने चाहिए. गद्य और पद्य दोनों में कविता हो सकती है. यह समझना अज्ञानता है कि जो कुछ छन्दोबद्ध है, सभी काव्य है. उन्हीं की प्रेरणा से अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने संस्कृत के अतुकान्त छन्द में 'प्रियप्रवास' की रचना की.
संपादक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
सन् 1903 से 1920 तक द्विवेदीजी 'सरस्वती' मासिक पत्रिका के सम्पादक रहे. सत्रह वर्षों के सम्पादन काल में 'सरस्वती' के माध्यम से सम्पादन कला और कर्तव्य के नये आयामों की प्रतिष्ठा की. सम्पादक के रूप में हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य के लिए उनकी साधना ऐतिहासिक महत्व रखती है. कहानी, जीवनी, निबन्ध, सूचनापरक लेख, वैज्ञानिक और पुरातात्विक लेख, नाटक, गीतिनाट्य, व्यंग्य आदि विविध साहित्यिक विधाओं के द्वारा उन्होंने हिन्दी गद्य को समृद्ध किया.
द्विवेदीजी ने 'सरस्वती' को साहित्य और ज्ञान की पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित किया. साथ ही उसे नवजागरण की चेतना का संवाहक भी बनाया. डॉ. रामविलास शर्मा के शब्दों में- "ज्ञान की पत्रिका होने के अलावा वह कलात्मक साहित्य की पत्रिका थी. ऐसे साहित्य की जो रूढ़िवादियों का नाश करके नवीन सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था. इसलिए उसने हिन्दी साहित्य में और उसके बाहर व्यापक स्तर पर भारतीय साहित्य में वह प्रतिष्ठा प्राप्त की जो बीसवीं सदी में अन्य किसी पत्रिका को न प्राप्त हुई."
एक सम्पादक के रूप में अपने समकालीन लेखकों/ कवियों को प्रोत्साहित करने, उन्हें मार्गदर्शन देने से कवियों
और लेखकों की एक नयी पीढ़ी सामने आयी, जो किसी न किसी रूप में द्विवेदीजी के व्यक्तित्व और साहित्यिक मूल्यों से प्रभावित थी.
आलोचक के रूप में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
महावीरप्रसाद द्विवेदी के आलोचक व्यक्तित्व का बोध उनके निबन्धों में होता है. उनके अधिकतर निबन्ध 'सरस्वती' में प्रकाशित हुए हैं, जिनमें भाषा व साहित्य के प्रति उनकी आलोचना दृष्टि का पता चलता है. उनकी आलोचना दृष्टि आधुनिकता से पूर्ण और साहित्य में रूढ़िवादिता की प्रखर विरोधी है. उन्होंने हिन्दी कविता को दरबारी काव्य-रूढ़ियों से मुक्त करने का सफल प्रयास किया.
सर्वप्रथम तो उन्होंने कवियों की इस धारणा का खण्डन किया कि सरस काव्य रचना ब्रजभाषा में ही हो सकती है. खड़ी बोली हिन्दी को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए द्विवेदीजी को अपने समकालीनों से प्रखर विरोध झेलना पड़ा किन्तु वे सफल हुए.
कविता में शृंगार रस के प्रति कवियों के अतिरिक्त मोह को वे 'साहित्य को भीतर से खोखला करना' मानते थे. इसी प्रकार अलंकार, छन्द के सन्दर्भ में भी द्विवेदी की मान्यताएं रीतिकालीन काव्य रूढ़ियों के विरुद्ध और सर्वथा नवीन थी. वस्तुतः आलोचक के रूप में द्विवेदीजी की भूमिका एक आदर्श शिक्षक की भूमिका तक सीमित है. अतः उनके आलोचना कर्म को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए.
हिन्दी भाषा और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
'सरस्वती' के सम्पादन काल में हिन्दी भाषा को परिष्कृत करने और उसे व्याकरण सम्मत बनाने में द्विवेदीजी का ऐतिहासिक योगदान है. खड़ी बोली हिन्दी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित और समृद्ध करने में उन्होंने मुख्यतः निम्नलिखित कार्य किए-
- गद्य साहित्य और काव्य रचना में एक भाषा की प्रतिष्ठा
- भारतीय भाषाओं का समर्थन
- शिक्षा में मातृभाषा का समर्थन और अंग्रेजी का विरोध
- लिखित भाषा में व्याकरण का अनुशासन
- हिन्दी भाषा को स्थिर रूप प्रदान करना.
आचार्य द्विवेदीजी लिखित भाषा में व्याकरण सम्मत भाषा के प्रबल पक्षधर थे तो भी उनका मानना था कि “भाषा जड़ और स्थिर वस्तु नहीं है. पर लादी गई बाहरी चीज न बने."
भाषा परिष्कार में व्याकरण भाषा द्विवेदीजी के योगदान को स्वीकारते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हिन्दी साहित्य के इतिहास' में लिखा है- व्याकरण की शुद्धता और भाषा की सफाई के प्रवर्तक व द्विवेदीजी ही थे. गद्य की भाषा पर उनके इस शुभ प्रभाव का स्मरण, जब तक भाषा के लिए शुद्धता आवश्यक समझी जाएगी, तब तक बना रहेगा. यदि द्विवेदीजी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध, ऊट-पटांग स भाषा चारों ओर दिखाई देती थी, उसकी परम्परा जल्दी न रुकती."
वस्तुतः महावीरप्रसाद द्विवेदी अपने युग की नव चेतना के संवाहक थे. वे साहित्यकार, आलोचक, सम्पादक कम एक महान शिक्षक अधिक थे. उनका उद्देश्य हिन्दी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना था, जिसको उन्होंने 'सरस्वती' के माध्यम से पूरा किया.


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