अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे की व्याख्या | मुक्तिबोध

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अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे की व्याख्या मुक्तिबोध कवि कहता है कि सत् चित वेदना जो उसके मस्तक की शिराओं में दिन-रात घुलते हुए तनाव पैदा क

अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे की व्याख्या | मुक्तिबोध


ब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे। 
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब 
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार 
तब कहीं देखने को मिलेंगी हमको 
नीली झील की लहरीली थाहें 
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता 
अरुण कमल एक, 
धँसना ही होगा 
झील के हिम-शीत सुनील जल में । 
जादुई झील को करनी ही होगी मेरी प्रतीक्षा।

संदर्भ - 'अँधेरे में' कविता की शुरूआत जिस रहस्यमय व्यक्ति के प्रति कवि की जिज्ञासा से होती है, वह कवि की 
आत्माभिव्यक्ति होती है. कवि स्वप्नलोक से निकलकर सोचता है कि अब समय आ गया है, जब चुप रहना आत्मघाती होगा. अपने को हर तरह से अभिव्यक्त करना ही होगा, उसके लिए चाहे जितने खतरे उठाने पड़ें. 

व्याख्या - कवि कहता है कि सत् चित वेदना जो उसके मस्तक की शिराओं में दिन-रात घुलते हुए तनाव पैदा करती है; उसकी अभिव्यक्ति करनी ही होगी. इसके लिए उसे चाहे जितने खतरों का सामना करना पड़ा. यह अभिव्यक्ति कविता के परम्परागत ढाँचे में नहीं हो सकती. इसलिए उसे कविता के परम्परागत ढाँचे (रचनाकर्म और आलोचना कर्म) को भी तोड़ना होगा. इस तरह यह मार्ग भले ही कितना ही दुर्गम हो किन्तु उसके पार जाना ही होगा. तब कहीं उसे नीली झील की लहरीली थाह देखने को मिलेगी, जिसमें खिला हुआ अरुण कमल लहरों के झोखों से प्रतिपल काँपता रहता है.

कवि कहता है कि अरुण कमल को पाने के लिए नीले जल वाली बर्फ के समान ठंडी झील में गहरे तक धँसना होगा. इसके लिए इस जादुई झील को मेरी प्रतीक्षा करनी ही होगी.

विशेष - उपरोक्त पंक्तियों में निम्नलिखित विशेषताएं हैं - 
  1. यहाँ अभिव्यक्ति के खतरों, मठों, गढ़ों को तोड़ने से तात्पर्य मात्र कविता से सम्बन्धित अभिव्यक्ति से नहीं है अथवा केवल शब्दाभिव्यक्ति से भी नहीं है. यह अभिव्यक्ति कवि की आत्मा अभिव्यक्ति भी है और कर्म की अभिव्यक्ति भी. 
  2. इस संदर्भ में 'कविता के नए प्रतिमान' में नामवर सिंह लिखते हैं- " अभिव्यक्ति से अभिप्राय कविता भी है और व्यक्ति भी. जिन मठों और गढ़ों को तोड़ने का संकल्प यहाँ किया गया है, वे केवल साहित्यिक मठ और गढ़ ही नहीं हैं. अभिव्यक्ति के इन गढ़ों के साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि अन्ततः यह अभिव्यक्ति काव्यनायक के अपने व्यक्तिगत ख्यालों के दायरों से निकलकर क्रान्ति के लिए सन्नद्ध जन- समूह में घुल-मिल कर उसके साथ एकाकार हो जाती है. इस तरह यह अभिव्यक्ति पूरी कविता पर आदि से अन्त तक मँडराती रहती है और इसके साथ ही उसे खोजने वाले काव्यनायक की छटपटाहट भी." 
  3. 'अरुण कमल' सम्पूर्ण क्रान्ति का प्रतीक कहा जा सकता है. 
  4. अशोक वाजपेयी की यह उक्ति प्रस्तुत पद्यांश के संदर्भ में अत्यन्त सटीक रूप में व्यक्त हुई है-"मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाये. उनकी कविता समकालीन भारतीय मनुष्य की पीड़ा की 'खंडित रामायण' है."
  5. भाषा: तत्सम प्रधान खड़ी बोली, जिसमें एक प्रकार की बेचैनी और सक्रियता का स्वर है।

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