आज के संदर्भ में कबीर का मूल्यांकन 21वीं सदी के भूमण्डलीकरण के दौर में भारतीय समाज यदि छः सौ वर्ष पूर्व मध्य युग के कबीर की प्रासंगिकता का अनुभव कर
आज के संदर्भ में कबीर का मूल्यांकन
21वीं सदी के भूमण्डलीकरण के दौर में भारतीय समाज यदि छः सौ वर्ष पूर्व मध्य युग के कबीर की प्रासंगिकता का अनुभव कर रहा है, तो स्पष्ट है कि धर्म, सम्प्रदाय और जाति व्यवस्था का पाखण्ड और अहंकार आज भी समाज को दंशित कर रहा है. वोटों की राजनीति ने धर्म-सम्प्रदाय और जातियों को अपने-अपने हथियार के रूप में प्रयोग करना सिखा दिया है. दूसरी तरफ भूमण्डलीकरण के दौर में धर्म और धार्मिक कर्मकाण्ड बाजार की चकाचौंध में जनसंचार माध्यमों की आकर्षक साज-सज्जा के साथ सामने आ रहे हैं. दोनों ही स्थितियों में आम जनता पिस रही है. साम्प्रदायिक दंगे हों या जातीय संघर्ष-सदैव गरीब असहाय ही पिसने के लिए अभिशप्त है.
धर्म और सम्प्रदाय
कबीर के समय में हिन्दू और इस्लाम दो मुख्य धर्म थे. हिन्दू धर्म में अनेक सम्प्रदाय थे-नाथ, सिद्ध, जैन, सगुण- निर्गुण आदि. इसी प्रकार इस्लाम में भी शिया-सुन्नी प्रमुख सम्प्रदाय थे. राज धर्म होने के नाते इस्लाम का वर्चस्व था. हिन्दू धर्म का सत्ताच्युत होते हुए भी अपने समाज में कम प्रभुत्व नहीं था. इस तरह कबीर के समय का दो प्रमुख धर्मों-हिन्दू और इस्लाम का संघर्ष आज भी साम्प्रदायिक दंगों के रूप में समय-समय पर दिखाई पड़ता रहता है.कबीर सबसे पहले इन दोनों धर्मों के द्वैत भाव को समाप्त करके दोनों में ही एक ही परमसत्ता की बात करते हैं-कबीर के लिए राम-रहीम, केशव करीम एक ही सत्य के अलग-अलग रूप हैं. बिसमिल्लाह कहो या विश्वम्भर-कबीर के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता-
हमारे राम रहीम करीमा केसो, अलह राम सति सोई ।
बिसमिल मेटि बिसंभर एकै और न दूजा कोई ||
हिन्दू और मुसलमान को बनाने वाला कर्त्ता तो एक ही है. इसलिए कबीर धार्मिक भेद-भाव और कट्टरता के लिए दोनों को ही फटकारते हैं. उनकी दृष्टि में उपासना की अलग-अलग पद्धतियों को धर्म या मजहब मानलेना और उसके लिए हठ करना ही संघर्ष की मुख्य जड़ है.
इसी तरह कबीर ने दोनों धर्म के अनेकानेक सम्प्रदायों को पाखण्ड कहा है. ये सम्प्रदाय एक ही धर्म को मानने वाले हर समाज को अलग-अलग कुनबों में बाँटकर अपनी श्रेष्ठता का दम्भ भर रहे हैं. ये भगवान के नाम पर लोगों को जोड़ने के बजाय तोड़ रहे हैं. ये सच्चा ज्ञान नहीं कराते. सच्चा ज्ञान तो आत्मज्ञान है जो किसी में भी भेदभाव नहीं करता. कबीर कहते हैं कि मैंने पूरी दुनिया में खोज कर यह देख लिया है कि भगवान के सिवा सब कुछ अज्ञान या झूठा है-
आलम दुनी सबै फिरि खोजी, हरि बिन सकल अयाना।
इसके साथ ही कबीर ने सबसे अधिक तीखा प्रहार धर्म से जुड़े पाखण्डों पर किया है. हिन्दू हो या मुसलमान उन्होंने दोनों के कर्मकाण्डों को व्यर्थ बताया है. इसी पाखण्ड और कर्मकाण्डों के कारण संघर्ष होता है. कबीर कहते हैं-
आपस में दोउ लरि-लरि मुए, मर्म न काहू जाना।
काशी से कबीर का मगहर आना भी एक प्रतीक है. काशी जो मुक्ति, ज्ञान और पाण्डित्य का केन्द्र रहा हो, उसे छोड़कर अन्तिम समय में कबीर मगहर आते हैं. मानो वे कह रहे हों कि उन्हें ऐसी पाखण्डपूर्ण मुक्ति नहीं चाहिए.
कबीर की समाज दृष्टि
कबीर ने अपने समय में समाज में व्याप्त जाति-पाँत, छुआ-छूत, ऊँच-नीच जैसी विकृतियों को देखा ही नहीं था, बल्कि जुलाहा होने के कारण भोगा भी था. सबसे पहले कबीर ने जन्म के आधार पर जाति निर्धारण के नियम को ही नकार दिया. उनकी दृष्टि में सभी जातियों के लोग एक ईश्वर की रचना है. सबके शरीर में एक ही तरह का रक्त, अस्थि और मांस-मज्जा है. सबका जन्म एक ही तरह से और एक ही रूप में होता है और अन्त में सबकी एक ही गति होती है. तो फिर कौन ब्राह्मण है, कौन शूद्र ?
तुम कत ब्राह्मण हम कत सूद।
हम कत लोहू तुम कत दूध।
यदि ब्राह्मण श्रेष्ठ होता तो वह गर्भ से ही वेद पढ़कर आता, किन्तु कबीर का कहना है- 'पेट न काहू वेद पढ़ाया।' ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि कबीर ने सबसे अधिक ब्राह्मणवाद पर प्रहार किए हैं क्योंकि जाति-पांत, अस्पृश्यता, ऊँच-नीच आदि के लिए वे ब्राह्मण को ही उत्तरदायी मानते हैं. उस समय धार्मिक कर्मकाण्ड में प्रचलित बलि प्रथा को देखकर कबीर पंडितों को कसाई कहने से भी नहीं चूकते-
'संतो, पांडे निपुन कसाई ।
बकरा मारि भैंसा पर धावें, दिल में दर्द न आयी।
कबीर सामाजिक भेदभाव के लिए बार-बार पंडितों को फटकारते हैं. सामाजिक भेदभाव ईश्वर के बनाए हुए न होकर ब्राह्मणों की देन है जो किसी भी प्रकार तार्किक नहीं. सामाजिक भेदभाव के नाम पर धर्मग्रन्थों के उदाहरण मूर्खतापूर्ण और काल्पनिक हैं. यही विचार कर कबीर ब्राह्मणों को चेताते हैं-
बेद कितेब छाँड़ि देहु पांडे, ई सब मन के भरमा ।
कहैं कबीर सुनो हे पांडे, ई सब तुम्हरे करमा॥
इस तरह कबीर धर्म और सम्प्रदाय को लेकर जहाँ ईश्वर/खुदा की एक परमसत्ता पर जोर देते हैं, वहीं वे सामाजिक समता की बात करते हैं जो स्वतन्त्रता के आधुनिक मूल्यों की अनिवार्य शर्त है. आदमी-आदमी में भेद करने वाली हर बात पर कबीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. कबीर का विश्वास मनुष्य और मनुष्य की बराबरी में है. इसी को वे सामाजिक व्यवहार में भी देखने का आग्रह करते हैं. इसके लिए वे धर्म ग्रन्थों और परम्पराओं को भी नकारने का साहस दिखाते हैं.
कबीर की प्रासंगिकता और मूल्यांकन
आज भारतीय समाज धर्म, सम्प्रदाय और जातियों में खण्ड-खण्ड विभाजित है. श्रेष्ठता का अहंकार अपने चरम पर है. सम्प्रदायों में संघर्ष, खून-खराबा आम बात हो गई है. एक तरफ दलित जातियाँ अपने अधिकारों के लिए, समानता के लिए संघर्ष कर रही हैं तो दूसरी तरफ राजनीति उनकी ताकत को अपने स्वार्थ के लिए यथास्थिति पर जोर दे रही है. आरक्षण व्यवस्था ने मानों जातियों के उपनिवेश बना दिए हैं जिनका शोषण और दुरुपयोग राजनीति में हो रहा है. संविधान की व्यवस्थाएं जो दबे-कुचले समाज के विकास के लिए की गई थीं, उनकी गति सबके सामने है.
ऐसे समय में कबीर स्वाभाविक रूप से याद आते हैं क्योंकि वह आँखिन देखी यथार्थ को पूरी निर्भीकता के साथ कहने और पाखण्ड को नकारने वाला ऐसा व्यक्तित्व है जो आज के समय में सम्भवतः कहीं नहीं दिखाई पड़ता. कबीर का यथार्थ कहना और पाखण्ड पर प्रहार करना हमें स्वधर्म याद दिलाने, विवेक जाग्रत करने और कथनी-करनी में समानता लाने के लिए प्रेरित करता है. इस दृष्टि से कबीर हमारे समाज के नैतिक शिक्षक के रूप में सामने आते हैं.
कबीर ने जिस साहस और निर्भीकता के साथ मध्य- युगीन सामंती परिवेश में सामाजिक भेद-भाव व धार्मिक पाखण्डों पर प्रहार किये हैं, वह अपने-आप में एक ऐसा उदाहरण है जो लोकतांत्रिक युग में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता होते हुए भी दुर्लभ है. इसी कारण कबीर पिछले छः सौ वर्षों के दौरान हुए सामाजिक आन्दोलनों के नायक रहे हैं. वस्तुतः कबीर की वाणी (विशेषकर सामाजिक सन्दर्भ में) उन लोगों की वाणी है जो बोल नहीं सकते.
आज कबीर हर वर्ग को प्रासांगिक लग रहे हैं. सदानन्द शाही के शब्दों में- “दलित आन्दोलन के उभार के दौर में कुछ लोग कबीर को दलित चेतना के प्रतीक रूप में देख रहे हैं. इसलिए राजनीतिक हलकों में कबीर में वोट की सम्भावना भी देखी जा रही है. समतावादी विचारों के दुश्मन और वर्ण-व्यवस्था के समर्थक भी कबीर को सामाजिक अभिप्राय से विरत कर केवल उनके अनहद नाद को ले उड़े हैं? कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी कबीर के मुक्तनाद का झंडा लेकर स्वयं को प्रासांगिक बनाने में लगी हैं." कोई आश्चर्य नहीं कि माया को ठगिनी कहने वाले कबीर को बाजार की शक्तियाँ भी भविष्य में इस्तेमाल कर ले जायँ.
किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कबीर इतनी आसानी से भुनाए जा सकते हैं? कबीर की कबीरियत के मर्म को समझे बिना क्या कबीर को पचाना इतना सरल है ? कबीर ने कहा था- 'जो घर जालै अपना, चलै हमारे साथ.' किन्तु क्या कबीर को ऐसा कोई व्यक्ति मिला? मिला होता तो सम्भवतः कबीर अपना दर्द इस तरह न व्यक्त करते-
ऐसा कोई न मिलै, जासूँ कहूँ निसंक।
जायूँ हिरदै की कहूँ, सो फिरि मारै डंक ।।
कबीर भारत के सुकरात थे. उनके समान निर्भय, विद्रोही व्यक्ति भारतीय इतिहास में दूसरा नहीं मिलता. कबीर के विचारों का ओज अन्यत्र दुर्लभ है. कबीर का जीवन भारतीय सामन्ती व्यवस्था की रूढ़ियों, पाखण्डों और मिथ्याचारों के प्रति सक्रिय विद्रोह का जीवन था. वे मृत्यु पर्यन्त अन्याय और असमानता के विरुद्ध अपनी वाणी से संघर्ष करते रहे. मनुष्य-मनुष्य में समानता और कथनी-करनी में समानता स्थापित करना ही कबीर का उद्देश्य था. वे भारतीय समाज के एक ऐसे प्रकाश स्तम्भ हैं जो सदियों तक मानवता का पथ-प्रदर्शक बना रहेगा.


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