हिन्दी भाषा के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान

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हिन्दी भाषा के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान सरस्वती बीसवीं सदी की हिन्दी भाषा और साहित्य की प्रमुख पत्रिका थी. इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दी भाष

हिन्दी भाषा के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान


रस्वती बीसवीं सदी की हिन्दी भाषा और साहित्य की प्रमुख पत्रिका थी. इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सांस्कृतिक पुनर्जागरण करना था. महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में 'सरस्वती' ने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास को किस तरह नई दिशा दी, यह जानने से पहले 'सरस्वती' का परिचय देना आवश्यक होगा.

सरस्वती का परिचय

इंडियन प्रेस, इलाहाबाद के स्वामी चिन्तामणि घोष द्वारा 'सरस्वती' के प्रकाशन की योजना बनी. जनवरी 1900 से मासिक पत्रिका के रूप में इसका प्रकाशन नागरी प्रचारणी सभा के सम्पादन में आरम्भ हुआ. एक वर्ष तक इसके सम्पादन मण्डल में श्यामसुन्दरदास, राधाकृष्णदास, जगन्नाथ दास रत्नाकर, कार्तिक प्रसाद और किशोरी लाल गोस्वामी थे. एक वर्ष बाद अर्थात् 1901 से इसका सम्पादन भार अकेले श्यामसुन्दरदास ने सम्भाला. 1903 में महावीर प्रसाद द्विवेदी रेलवे विभाग की अपनी नौकरी छोड़कर 'सरस्वती' के सम्पादक बने और 1920 तक अर्थात् सत्रह वर्ष तक सम्पादन कार्य किया.

'सरस्वती' वस्तुतः अपने युग के हिन्दी साहित्य और भाषा के पुनर्जागरण युग की संवाहक पत्रिका थी. इस पत्रिका के माध्यम से मैथिलीशरण गुप्त, विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक, रूपनारायण पाण्डेय, चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी', सुमित्रानन्दन पंत, वृन्दावन लाल वर्मा जैसे अनेक कवि, कहानीकार, निबन्धकार सामने आए और उनकी पहली रचना 'सरस्वती' में प्रकाशित हुई. संस्कृत साहित्य और साहित्यकार तथा विदेशी लेखकों की अनेक श्रेष्ठ रचनाएं 'सरस्वती' में छपती थीं. यह पत्रिका केवल साहित्य तक सीमित नहीं थी, वरन् इसमें धर्म, अध्यात्म, इतिहास, शिक्षाशास्त्र, अर्थशास्त्र, सामाजिक विज्ञान, इतिहास, राजनीतिशास्त्र तथा विज्ञान सम्बन्धी लेख भी प्रकाशित होते थे. इस तरह 'सरस्वती' हिन्दी के रचनात्मक साहित्य की प्रमुख पत्रिका होने के साथ ही ज्ञान-विज्ञान की सम्पूर्ण पत्रिका थी.

हिन्दी भाषा के विकास में 'सरस्वती' के योगदान को निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत देखा जा सकता है-

हिन्दी की एकरूपता और व्याकरण सम्मत बनाने का अभियान

'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति कौ मूल' का शंखनाद कर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने खड़ी बोली का प्रचार- प्रसार तो पर्याप्त किया, किन्तु उनके युग के लेखकों में भाषा की अव्यवस्था बनी रही. खड़ी बोली पर ब्रज का प्रभाव स्पष्ट था. संज्ञाओं और क्रियापदों के रूप भी बिगड़े हुए प्रयुक्त होते थे. व्याकरण और विराम चिह्नों पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता था. एक शब्द अलग-अलग ढंग से लिखा जाता था.

हिन्दी भाषा के विकास में सरस्वती पत्रिका का योगदान
'सरस्वती' का सम्पादन कार्य आरम्भ करते ही महावीर प्रसाद द्विवेदी का ध्यान हिन्दी की एकरूपता और उसे व्याकरण सम्मत बनाने के लिये गया. इसके लिए द्विवेदीजी ने एक तरह से अभियान ही छेड़ दिया. 'सरस्वती' में छपने वाले लेखकों की भाषा को व्याकरण की कसौटी पर कसा गया. रचना का मूल्यांकन भाषा की शुद्धता के आधार पर होने लगा. द्विवेदीजी ने 'सरस्वती' में 'भाषा और व्याकरण' शीर्षक से एक लम्बा लेख लिखा जिसमें उन्होंने हिन्दी के किसी सर्वमान्य व्याकरण के अभाव पर खेद व्यक्त करते हुए हिन्दी भाषा के प्रयोगों में एकरूपता लाने पर बल दिया.

भाषा के लिए व्याकरण ज्ञान की आवश्यकता पर द्विवेदीजी का विचार था -“नियम रचना के द्वारा सब प्रान्तों के लिए एक-सी भाषा संगठित करें. व्याकरण की सहायता से भाषा में स्थिरता आ जाती है और वह अधिक दिन तक जीवित रहती है. व्याकरण के नियमों को जानकर लोग अतीत के साहित्य को अच्छी तरह समझ सकते हैं."
 
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' के सम्पादक के रूप में अनेक रचनाकारों की रचनाओं में व्याकरण सम्बन्धी त्रुटियाँ दिखाकर उनका ध्यान भाषा की शुद्धता की ओर दिलाया. प्रकाशनार्थ आई रचनाओं में व्याकरण और भाषा वर्तनी की त्रुटियों को दूर कर हिन्दी भाषा के स्वरूप में एकरूपता लाने का प्रयास किया. यद्यपि इस प्रयास में द्विवेदीजी का अनेक लेखकों से विवाद भी हुआ जिसमें द्विवेदीजी के 'अनस्थिरता' शब्द को लेकर बालमुकुन्द गुप्त से चला विवाद अत्यन्त चर्चित हुआ.

श्यामसुन्दरदास जो 'सरस्वती' के सम्पादक भी रहे हैं, उनका कहना है- "महावीरप्रसाद द्विवेदी का महत्व उनके लेखों में नहीं है. उनका महत्व विशेषकर इस बात में है कि उन्होंने हिन्दी भाषा को परिमार्जित और सुन्दर रूप देने का सफलतापूर्वक उद्योग किया है."
 

हिन्दी उर्दू की एकता का प्रयास

महावीरप्रसाद द्विवेदी अंग्रेजी भाषा की कूटनीति से भली-भाँति परिचित थे. अंग्रेज हिन्दी को हिन्दुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताकर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपना रहे थे. इस तरह वे हिन्दी-उर्दू के भाषागत भेद को धर्म के आधार पर गहरा कर रहे थे. द्विवेदीजी ने उर्दू को हिन्दी की एक शाखा बताते हुए 'सरस्वती' में लिखा है-
 
"जिस समय ब्रज भाषा के रूप में हिन्दी अपना आधिपत्य जमा रही थी, उसी समय उसकी एक दूसरी शाखा उससे पृथक् हो गयी. इस शाखा का नाम उर्दू है. उर्दू कोई भिन्न भाषा नहीं है. वह भी हिन्दी है. उसमें चाहे कोई जितने फारसी, अरबी और तुर्की शब्द भर दे, उसकी क्रियाएं हिन्दी की ही बनी रहती हैं, उसकी रचना हिन्दी के ही व्याकरण का अनुसरण करती है. 

इस प्रकार हिन्दी-उर्दू की बुनियादी एकता के बारे में 'सरस्वती' में अनेक लेखकों के लेख प्रकाशित हुए. ध्यान रहे, कि “सम्पादक के रूप में महावीर प्रसाद द्विवेदी एक ओर ठेठ अरबी-फारसी के अप्रचलित शब्द भर देने के विरोधी थे, दूसरी ओर हिन्दी के जातीय स्वरूप की रक्षा करते हुए वह आम जनता में प्रचलित अरबी-फारसी के शब्द लेने के समर्थक थे.” द्विवेदीजी हिन्दी को संस्कृत के कठिन तथा अप्रचलित शब्दों से बचाना चाहते थे. उनका मानना था कि हिन्दी में संस्कृत के सरल शब्द जिन्हें सब समझते हैं, प्रयुक्त होने चाहिए
महावीर प्रसाद द्विवेदी इस तथ्य से परिचित थे कि हिन्दी भाषी लोगों का क्षेत्र काफी व्यापक है. अतः हिन्दी भाषा के माध्यम से ही हिन्दी भाषी जनता में सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक जागरण की भावना विकसित की जा सकती है. इसलिए जनशिक्षा के लिए सरल सुबोध हिन्दी ही उपयोगी हो सकती है.
 

गद्य पद्य की एक भाषा

भारतेन्दु के समय में ही खड़ी बोली में गद्य की विधाएं - निबन्ध, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि खड़ी बोली में लिखी जाने लगी थीं, किन्तु काव्य भाषा के रूप में ब्रज भाषा का ही वर्चस्व था. यहाँ तक कि 'सरस्वती' में भी ब्रजभाषा की कविताएं प्रकाशित होती थीं. द्विवेदी-युग के प्रायः सभी कवियों की प्रारम्भिक रचनाएं ब्रज भाषा में ही लिखी गईं. नवजागरण के युग की चेतना के संवाहक के रूप में ब्रजभाषा पूर्णतः असमर्थ थी क्योंकि वह सामंती मूल्यों की प्रतीक और दरबारी संस्कृति की अंग रह चुकी थी.
 
गद्य और पद्य की भाषा भेद स्थिति की तरफ सर्वप्रथम सन् 1901 में श्यामसुन्दर दास ने सम्पादकीय लेख लिखा. आगे चलकर महावीरप्रसाद द्विवेदी ने 'कवि कर्त्तव्य' नामक अपने लेख में हिन्दी कवियों को लगभग सावधान करते हुए लिखा-"कवियों को चाहिए कि वे गद्य की भाषा (खड़ी बोली हिन्दी) में कविता करना प्रारम्भ करें. बोलना एक भाषा में और कविता में प्रयोग करना दूसरी भाषा का प्राकृतिक नियम के विरुद्ध है."
 
द्विवेदी जी के प्रयास से मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध', सियाराम शरण गुप्त जैसे कवियों ने खड़ी बोली में काव्य रचनाएं कीं.
 

हिन्दी को ज्ञान विज्ञान की भाषा बनाना

'सरस्वती' के समय में राष्ट्रीय नवजागरण की चेतना देश के कोने-कोने में फैल चुकी थी. जनमानस को नवीन ज्ञान-विज्ञान की आवश्यकता थी. 'सरस्वती' केवल रचनात्मक साहित्य की ही पत्रिका नहीं थी बल्कि अपने समय में वह केवल अकेली हिन्दी पत्रिका थी जिसमें ज्ञान-विज्ञान से सम्बन्धित सर्वाधिक लेख प्रकाशित होते थे. इस तरह हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान और चिन्तन की भाषा बनाने के लिए 'सरस्वती' सदैव प्रयासरत रही.
 
हरप्रकाश गौड़ के शब्दों में- “हिन्दी को ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में स्वीकारने पर दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हुई कि हिन्दी भाषा की शब्द-सम्पदा में वृद्धि हुई. आधुनिक भाव बोध वाले अनेक शब्दों का निर्माण हुआ. पुराने शब्दों में नया अर्थ भरा गया. वैज्ञानिक शब्दावली का हिन्दी में अनुवाद हुआ."
 
इसके साथ ही 'सरस्वती' ने हिन्दी और भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने पर जोर दिया. 'सरस्वती' में अनेक लेखक अहिन्दी भाषाओं के लेखकों के होते थे. इनके माध्यम से 'सरस्वती' ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आन्दोलन चलाया. इस सम्बन्ध में 'सरस्वती' में अनेक लेख प्रकाशित हुए. इसके साथ-साथ महावीरप्रसाद द्विवेदी तथा अनेक लेखकों ने अंग्रेजी भाषा की शोषण नीति का विरोध करते हुए 'सरस्वती' में अनेक लेख लिखे.

अदालतों में हिन्दी

अंग्रेजों के समय में कचहरियों में उर्दू का वर्चस्व था. सामान्य प्रशासन में अंग्रेजी चलती थी. कचहरी की भाषा फारसी शब्दों से बोझिल उर्दू थी जो सामान्य जनता की समझ से परे थी. कामताप्रसाद गुरु ने 'सरस्वती' में 'कानूनी भाषा' लेख लिखकर सरकार और जनता का ध्यान कचहरियों की भाषा की ओर खींचा. पुनः कामताप्रसाद ने 'कानूनी हिन्दी' लेख के द्वारा हिन्दी में कानूनी पुस्तकों की रचना और अनुवाद पर बल दिया. इस प्रकार अपने युग में 'सरस्वती' ही एक मात्र ऐसी पत्रिका थी जिसने सरकारी हिन्दी और कानूनी हिन्दी की दशा सुधारने के लिए सक्रिय प्रयास किया.

निष्कर्षतः 'सरस्वती' ने अपने लेखकों के माध्यम से हिन्दी भाषा को व्याकरण सम्मत बनाकर उसके स्वरूप स्थिर करने और उसके प्रयोगों में एकरूपता लाने का जो कार्य किया है, हिन्दी भाषा के विकास में उसका ऐतिहासिक महत्व है. “हिन्दी भाषा को देशव्यापी भाषा बनाने, उसे ज्ञान- विज्ञान, सरकारी कार्यालयों, अदालतों-कचहरियों तथा शिक्षा का माध्यम स्वीकार करने के लिए सरकार से संघर्ष किया. खड़ी बोली आन्दोलन में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित किया. शिक्षित वर्ग को हिन्दी भाषा के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. इस तरह 'सरस्वती' ने हिन्दी भाषा के विकास के लिए बहुआयामी कार्य किए हैं, जिनका मूल्यांकन करना अभी शेष है.

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