भारत का विभाजन और हिंदी उपन्यास Partition Novels in Hindi Literature देश विभाजन की कीमत पर मुसलमानों को धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान मिला,
भारत का विभाजन और हिंदी उपन्यास | Partition Novels in Hindi Literature
भारत में प्राचीन काल से ही अनेक धर्मों, जातियों और संस्कृतियों के लोगों का आवागमन रहा है. इनमें से अनेक धर्म-संस्कृतियों के लोग चाहें वे व्यापारी के रूप में यहाँ आए अथवा आक्रमणकारी शासक के रूप में, कालान्तर में वे यहीं के होकर रह गये. इस प्रकार भारत बहुधर्मी व अनेक संस्कृतियों का देश बनता गया. भारत में हिन्दुओं की संख्या बहुसंख्यक होने के बावजूद मुसलमानों की संख्या महत्वपूर्ण है. विगत एक हजार वर्षों से साथ रहने के बावजूद दोनों धर्मों के लोगों में समय-समय पर टकराव होता रहा है. अंग्रेज हों या स्वतन्त्र भारत के सत्ताधारी-दोनों ने ही हिन्दू- मुसलमानों को अपने स्वार्थ के लिए टकराव की स्थिति में ही रखना बेहतर समझा.
भारत को आजादी मिली, किन्तु देश विभाजन की कीमत पर मुसलमानों को धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान मिला, किन्तु भारत ने धर्माधारित राष्ट्रीयता के सिद्धान्त को नहीं माना. यहाँ धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ, किन्तु हिन्दू-मुसलमानों में साम्प्रदायिकता की समस्या का अन्त तब भी नहीं हुआ.
भारत-विभाजन के समय सम्पूर्ण उत्तर भारत साम्प्रदायिकता की आग में जल उठा. हजारों लोग मारे गए, लाखों विस्थापित हुए तथा स्त्रियों और बच्चों के साथ अमानुषिक अत्याचार हुए. देश की विशाल जनसंख्या अपना वतन छोड़कर भारत या पाकिस्तान में शरणार्थी के रूप में बसने को विवश हुई. भारत के इतिहास में यह सबसे बड़ी अमानवीय त्रासदी थी जिसे हिन्दी लेखकों ने अनेक ढंग से अपने उपन्यासों में अत्यन्त यथार्थ रूप में चित्रित किया.
हिन्दी के निम्नलिखित उपन्यासों में देश विभाजन से उत्पन्न त्रासदी का प्रामाणिक और संवेदनापूर्ण चित्रण हुआ है-
- कठपुतली - सन् 1954 में लिखा गया है देवेन्द्र सत्यार्थी के इस उपन्यास में साम्प्रदायिक दंगों का यथार्थ चित्रण हुआ है. देश विभाजन के बाद हुए दंगों के फलस्वरूप पाकिस्तान से भारत और भारत से पाकिस्तान आने-जाने वाले शरणार्थियों के काफिलों का वर्णन अत्यन्त रोमांचक है. लेखक ने हिन्दू- मुस्लिम प्रेम की भी अनेक मिसालें प्रस्तुत की हैं.
- झूठासच - यशपाल ने इस उपन्यास में देश विभाजन की त्रासदी का वर्णन करने के साथ ही इसके कारणों का भी विश्लेषण किया है. आजादी से पूर्व विभाजन की आशंका, मुस्लिम लीग और सिख नेताओं के भड़काऊ भाषणों और बहुसंख्यक मुस्लिम समाज के आक्रामक तेवरों की छाया में लाहौर के गली-कूचों में कुलबुलाती दहशत की मानसिकता में घुटती अल्पसंख्यकों की जिन्दगी का ऐसा यथार्थ और जीवन्त अंकन इसके पूर्व किसी उपन्यास में नहीं मिलता.
- लौटे हुए मुसाफिर - कमलेश्वर के इस उपन्यास में साम्प्रदायिक हिंसा के अमानवीय पक्षों और पाकिस्तान के नाम पर छले गए मुसलमानों के मोह भंग का चित्रण किया है. लगभग इसी विषय को बदीउज्जमाँ ने 'छाको की वापसी' में आधार बनाया है. इसमें देश विभाजन के बाद बिहार से पूर्वी पाकिस्तान गए मुसलमानों के मोह भंग का चित्रण हुआ है. अपने वतन की कीमत उन्हें पराए मुल्क में जाकर पता चलती है. 'बंगाली' और 'बिहारी' मुसलमान का भेद उन्हें वहाँ अजनबी बना देता है. वे वहाँ 'मुहाजिर' कहलाते हैं. वे अपने सम्बन्धियों से मिलने को भारत आने के लिए तड़पते हैं किन्तु कानून इसके लिए इजाजत नहीं देता.
- तमस - देश विभाजन की त्रासदी का सम्पूर्ण उपन्यास भीष्म साहनी का 'तमस' कहा जा सकता है. भीष्म साहनी ने इस अमानवीय त्रासदी को स्वयं भोगा था. इसलिए उनके उपन्यास में इसकी गहरी वेदना मिलती है. 'तमस' को उस अन्धकार का प्रतीक कहा गया है जो आदमी की इन्सानियत और संवेदना को ढँक लेता है और उसे हैवान बना देता है. भीष्म साहनी ने देश विभाजन और उससे उत्पन्न साम्प्रदायिकता के कारणों का विश्लेषण करते हुए इसके लिए ब्रिटिश शासक और उसके पिछलग्गुओं को जिम्मेदार माना है.
- आधा गांव - देश विभाजन से पूर्व हिन्दू-मुस्लिम सद्भाव और सौहार्द तथा देश विभाजन की त्रासदी से उत्पन्न घुटन भरे साम्प्रदायिक माहौल का चित्रण करने वाले लेखकों में राही मासूम रजा का नाम उल्लेखनीय है. राही मासूम रजा ने 'आधा गाँव', 'टोपी शुक्ला' 'हिम्मत जौनपुरी', 'ओस की बूँद' और 'दिल एक सादा कागज' उपन्यासों में इन स्थितियों का सूक्ष्म चित्रण किया है. 'आधा गाँव' में राही मासूम रजा ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंगौली गाँव देश विभाजन से पूर्व गाँव के मुसलमानों की खुशहाल जिन्दगी से लेकर आजादी के बाद उनकी दयनीय स्थिति और अपने ही वतन में बेगाना बन कर सामान्य जीवन धारा से कट जाने का अत्यन्त मर्मस्पर्शी वर्णन किया है. आजादी और बँटवारे के बाद मुसलमानों में आए सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को राही मासूम रजा ने अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया है.
'टोपी शुक्ला' और 'हिम्मत जौनपुरी' उपन्यासों में भी हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धों का मार्मिक चित्रण हुआ है. भारतीय मुसलमान बेहतर जीविका और सम्मानपूर्ण जिन्दगी की आशा लेकर पाकिस्तान गए थे किन्तु वहाँ वे 'मुजाहिर' बनकर उपेक्षित हो गए. पूर्वी पाकिस्तान गए बिहार और पूर्वी उ. प्र. के मुसलमानों के इसी मोह भंग की कथा का राही मासूम रजा ने 'दिल एक सादा कागज' उपन्यास में मार्मिक रूप में वर्णन किया है. राही के सभी उपन्यासों में मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार ही मुख्य कथा का आधार रहा है.
इसके अतिरिक्त मंजूर एहतेशाम के उपन्यास 'सूखा बरगद' में भी आजादी के बाद मुसलमानों के अजनबी - बोध से ग्रस्त होने, राष्ट्रीय जीवन धारा से कट जाने तथा पाकिस्तान में बसे मुजाहिरों की बँटी हुई मानसिकता का संवेदनशील चित्रण हुआ है. लेखक ने इस उपन्यास में मुसलमानों की घरेलू जिन्दगी, उनके रीति-रिवाजों, रहन-सहन के तौर-तरीकों, बोली-बानी, आपसी सम्बन्धों आदि का सजीव अंकन किया है.
देश विभाजन की त्रासदी कई दशकों तक हिन्दी उपन्यासकारों को उद्वेलित करती रही है. इसलिए इस सदी के अन्त तक इस विषय को लेकर उपन्यासों की रचना होती रही है. सदी के अन्तिम दशक में अमृतलाल मदान का 'सिन्धु पुत्र', दीपचन्द निर्मोही का 'कितने अँधेरे', प्रताप सहगल का 'अनहदनाद' आदि उपन्यासों में भी देश-विभाजन की त्रासदी और साम्प्रदायिक दंगों से बचकर आए शरणार्थी परिवारों की कथा कही गई है.
देश विभाजन ने भारतीय हिन्दू-मुस्लिम समाज को गहरे तक प्रभावित किया है. देश विभाजन से उत्पन्न हुए साम्प्रदायिक दंगों ने देश में स्थायी रूप ले लिया है. बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हिन्दू-मुस्लिम समाज का तेजी से ध्रुवीकरण हुआ है. इस ध्रुवीकरण को राजनीति के खिलाड़ियों ने समय-समय पर और गहरा किया है. रही-सही कसर जम्मू-कश्मीर और सीमापार के मुस्लिम आतंकवादी संगठनों ने पूरी कर दी है. कहना न होगा कि इन सब कारणों से मुस्लिम समाज में असुरक्षा की भावना बढ़ी है, साम्प्रदायिकता बढ़ी है और दोनों धर्मों के लोगों का परस्पर विश्वास कम हुआ है.
देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद, मजहबी कट्टरता आदि अनेक विषयों को लेकर आज भी हिन्दी उपन्यासों की रचना हो रही है. अब देश विभाजन और उससे उत्पन्न त्रासदी के बजाय साम्प्रदायिक उन्माद हिन्दी उपन्यासों की मुख्य कथा बन गई है जो देश विभाजन की त्रासदी से उत्पन्न समस्याओं की अगली कड़ी के रूप में उपन्यासों में चित्रित हो रही है.
इस संदर्भ में अब्दुल बिस्मिल्लाह का 'गुखड़ा क्या देखे' ज्योतिष जोशी का 'सोनबरसा', भगवानदास मोखाल का 'काला पहाड़', गौरी शंकर कपूर का 'उल्का साकेत' राजीव कुमार का 'टुकड़े', उषा प्रियंवद का 'वे वहाँ कैद हैं', गीतांजलि श्री का 'हमारा शहर उस वरस', भगवान सिंह का 'उन्माद' आदि उपन्यास उल्लेखनीय हैं. इनमें कुछ उपन्यासों में हिन्दू साम्प्रदायिक उन्माद का भी चित्रण हुआ है जैसे 'हमारा शहर उस बरस' में.
यदि देश विभाजन की त्रासदी से जुड़े उपन्यासों का विश्लेषण किया जाय तो इस विषय पर उपन्यास रचना के तीन पड़ाव सामने आते हैं. पहले पड़ाव के उपन्यासों में मुख्य रूप से देश विभाजन से उत्पन्न साम्प्रदायिक तनाव और उससे जुड़ी हिंसा, लूटपाट, आगजनी, पलायन और शरणार्थी जीवन से जुड़े उपन्यास आते हैं. दूसरे पड़ाव के उपन्यासों में देश के विभाजन के बाद भारत में रह गए मुसलमानों की जिन्दगी और नियति का चित्रण हुआ है. तीसरे पड़ाव के उपन्यासों में देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिक भावना, धार्मिक उन्माद से जुड़ी कथाएं हैं जिनमें हिन्दू-मुस्लिम समाज में बढ़ती धार्मिक कट्टरता और ध्रुवीकरण के राजनीतिक गठजोड़ का भी विश्लेषण किया गया है. एक तरह से इन उपन्यासों को साम्प्रदायिक विमर्श के उपन्यास कहा जा सकता है.
मुख्य बात यह है कि लगभग सभी उपन्यासों में लेखकों ने बिना किसी पूर्वाग्रह के मानवीय संवेदना से उदात्त मानव मूल्यों का परिचय दिया है.हिंदी उपन्यासकारों ने विभाजन को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी के रूप में देखा है। इन रचनाओं ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि लकीरें जमीन पर खिंचती हैं, लेकिन उनका घाव इंसानी रूह पर होता है।



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