मलयालम साहित्यिक संस्कृति में आत्म-नवीकरण का संकट

SHARE:

मलयाली समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में—जहाँ साहित्यिक आलोचना का कोई सिद्धांत पूरी तरह अपने ही बौद्धिक धरातल से विकसित नहीं हुआ—डॉ. डी. बेंजामिन जैसे

मलयालम साहित्यिक संस्कृति में आत्म-नवीकरण का संकट


लयाली समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में—जहाँ साहित्यिक आलोचना का कोई सिद्धांत पूरी तरह अपने ही बौद्धिक धरातल से विकसित नहीं हुआ—डॉ. डी. बेंजामिन जैसे अकादमिक आलोचक प्रायः पूर्वी और पश्चिमी दोनों प्रकार के साहित्यिक सिद्धांतों को समझाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। इसी विमर्श के भीतर एक महत्वपूर्ण अवलोकन उभरकर सामने आता है: संसार के महानतम लेखकों ने अपनी रचनात्मक दुनिया को आगे बढ़ाया है अपने ही भीतर के दानव से संघर्ष करके—अपने ही चेतन में मौजूद अंधकार, विरोधाभास और नैतिक अस्पष्टताओं से जूझकर।

मलयालम साहित्यिक संस्कृति में आत्म-नवीकरण का संकट
सच्ची साहित्यिक महानता केवल अर्जित ज्ञान को अपनी मातृभाषा में अनुवाद कर देने से उत्पन्न नहीं होती। वह कहीं अधिक जोखिमपूर्ण और कठिन प्रयास से जन्म लेती है—विरोधी विचारधाराओं और परस्पर विपरीत चिंतन को अपनी कल्पनाशक्ति के संसार में समाहित करने से। विश्व के अनेक महान लेखकों ने इस खतरनाक बौद्धिक श्रम को बिना किसी हिचक के स्वीकार किया। इन आंतरिक संघर्षों के माध्यम से वे स्वयं को निरंतर नवीनीकृत करते रहे—कभी सचेत रूप से और कभी सहज वृत्ति के माध्यम से।

ग्रीक लेखक निकोस कज़ान्ज़ाकिस इस रचनात्मक संघर्ष का एक शक्तिशाली उदाहरण हैं। उनकी कृति द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ क्राइस्ट केवल स्थापित धार्मिक कथाओं की पुनरावृत्ति नहीं करती; वह उनसे बहुत आगे तक जाती है। कज़ान्ज़ाकिस ने अपने सृजनात्मक भाग्य को विरोधाभास और द्वंद्वात्मक तनाव के मार्ग पर आगे बढ़ाया। इसी कारण वे कभी भी निष्प्राण आत्म-पुनरावृत्ति के जाल में नहीं फँसे। उनकी रचनात्मक दुनिया सदैव गतिशील, बेचैन और विकसित होती रही।

दुर्भाग्य से हमारे अनेक लेखकों की स्थिति इससे भिन्न प्रतीत होती है।

मलयालम के कई लेखक अपने स्वभाव की सहज धारा के सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं और उसी को कलात्मक विकास समझ बैठते हैं। किंतु वे अपनी कल्पना या बौद्धिक अन्वेषण में विरोधी विचारों को शामिल करने में असफल रहते हैं। परिणामस्वरूप उनकी रचनात्मक दुनिया सीमित वैचारिक दायरों में ही बंद रह जाती है।

भारतीय साहित्य के कुछ महापुरुषों ने इन सीमाओं को पार करने का प्रयास किया। उदाहरण के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर ने स्वयं को केवल कविता तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने गीत, नाटक, निबंध और उपन्यास लिखे; चित्रकला की, संगीत रचा, और दार्शनिक तथा राजनीतिक चिंतन में भी गहरी भागीदारी की। इस बहुआयामी सृजन के माध्यम से उन्होंने एक ही कलात्मक साँचे की सीमाओं को पार कर लिया।

इसके विपरीत, हमारे साहित्य का एक बड़ा हिस्सा मानो एक ही साँचे में ढली हुई कलाकृतियों जैसा प्रतीत होता है। वे सुंदर और तकनीकी रूप से प्रभावशाली अवश्य हो सकती हैं, किंतु मूलतः वे दोहराव से भरी रहती हैं। इस ठहराव के कारण हमारे कई लेखक विश्व साहित्य के महान रचनाकारों—जैसे कज़ान्ज़ाकिस—की रचनात्मक ऊँचाइयों के आसपास भी नहीं पहुँच पाते।

इसके स्थान पर अक्सर यह होता है कि कोई लेखक एक विशिष्ट “शैली” का निर्माण कर लेता है। एक बार यह शैली स्थापित हो जाने पर वह उसी में स्थायी रूप से शरण ले लेता है और समय के साथ अपनी रचनाओं को विकसित करने का प्रयास नहीं करता। विडंबना यह है कि ऐसे स्थिर सर्जकों को ही अक्सर दूरदर्शी कहा जाता है।

हम उन्हें मानो किसी विचित्र बौद्धिक जीव की तरह प्रशंसा से देखते हैं—आधा कुत्ता, आधी बिल्ली जैसे संकर प्राणी—जिनका अजीब रूप हमें चकित करता है। विज्ञान और तकनीक से गहराई से प्रभावित इस युग में भी न तो बहुसंख्यक समाज और न ही विरोधी अल्पसंख्यक इस बौद्धिक जड़ता पर शर्म महसूस करते हैं। शायद यही हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक दरिद्रता है।

जो लेखक जीवन भर एक ही वैचारिक चौकी से बँधे रहते हैं, उन्हें भी महान चिंतक घोषित कर दिया जाता है। दीमक के टीले की तरह वे चुपचाप फैलते रहते हैं और हर वैचारिक शिविर से प्रशंसा प्राप्त करते हैं। अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत से अंत तक वे उसी मानसिक संरचना में बंद रहते हैं और बिना किसी संकोच के स्वयं को दोहराते रहते हैं।

चाहे वे स्वयं को हृदय के व्याख्याकार कहें या बौद्धिक प्रतिभा के निर्माता—वास्तव में वे सब एक ही प्रवृत्ति के पक्षी हैं। फिर भी ऐसे रचनात्मक कट्टरपंथियों को देखकर शायद ही कोई निराशा की साँस भरता है।

हमारा युग अत्यधिक सकारात्मकता का उत्सव मनाता है। परिणामस्वरूप हमारे तथाकथित रचनात्मक अभिजात वर्ग को भी एक संकीर्ण वैचारिक क्षेत्र में स्वयं को सीमित कर लेने पर कोई पछतावा नहीं होता। यह प्रवृत्ति उन्हें उन दूरदर्शी विचारधारात्मक ढाँचों को अस्वीकार करने तक ले जाती है जो कभी सामूहिक मानव कल्याण के लिए निर्मित हुए थे।

ऐसी मानसिकता गहरे दार्शनिक चिंतन की उपज नहीं होती; प्रायः यह अधूरे रह गए व्यक्तिगत स्वप्नों की कड़वाहट से जन्म लेती है।

ये लेखक संसार की हर अन्यायपूर्ण व्यवस्था का विरोध करने का साहस रखते हैं—यहाँ तक कि समाज द्वारा “अच्छा” माने जाने वाले मूल्यों पर भी आक्रमण कर देते हैं। किंतु उनमें स्वस्थ आत्म-आलोचना की क्षमता का अभाव होता है। जब समय उनके बनाए हुए नाजुक दीमक-टीलों को नष्ट कर देता है, तब वे अत्यंत व्यथित हो जाते हैं। अपनी प्रतिभा की सीमाओं को स्वीकार न कर पाने के कारण वे विलाप के पीछे अपना चेहरा छिपा लेते हैं।

केरल के गुप्त पुनर्जागरण काल से लेकर आज तक कई “विशिष्ट” माने जाने वाले लेखक इसी एक-पहचान वाले ढाँचे में फँसे दिखाई देते हैं। उनकी कल्पना, उनका चिंतन और उनका विद्रोह—सब एक ही आत्म-विनाशकारी दिशा में आगे बढ़ते हैं।

मलयालम साहित्य में बौद्धिक गंभीरता के लिए प्रसिद्ध मेथिल राधाकृष्णन भी इस समस्या से पूरी तरह मुक्त नहीं दिखाई देते। जिस आदर्शवादी बौद्धिक क्रांति का उन्होंने स्वप्न देखा था, उसके असफल हो जाने के बाद उन्होंने खुलकर साम्यवाद-विरोधी रुख अपनाने में गर्व महसूस करना शुरू किया। साथ ही वे पूँजीवाद की कल्पनाशील संरचनाओं के प्रति एक प्रकार का आकर्षण भी दिखाते हैं।

उनकी तीव्र पर्यावरणवादी धारणाएँ भी उसी एकांगी लेखक-दृष्टि का परिणाम प्रतीत होती हैं। मेथिल यह स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखते कि प्रकृति में हर जीव किसी दूसरे जीव को खाकर ही जीवित रहता है। जीवित रहने का यह नियम—जहाँ शक्तिशाली टिकता है—प्रकृति का मूल सिद्धांत है। मनुष्य को छोड़कर किसी भी जीव को इस सत्य पर नैतिक पीड़ा नहीं होती।

फिर भी मेथिल, जो स्वयं को पशु-पक्षियों के साथ सहज रूप से जोड़ते हैं, मनुष्य के भोजन को नैतिक रूप से घृणित मानते हैं। विडंबना यह है कि वही पशु-संस्कृति, जहाँ जीव सीधे अपने शिकार को खा जाते हैं, उन्हें सुंदर प्रतीत होती है।

केरल के उस पाठक-समुदाय के लिए, जो भव्य वैचारिक घोषणाओं और रोमानी वाक्पटुता से थक चुका है, मेथिल की रचनाएँ कुछ भिन्न और ताज़ा लग सकती हैं। इस दृष्टि से “मेथिलीय” साहित्यिक विचित्रताओं के प्रति उत्साह समझ में आता है।

कवि और पागल के निकट संबंध की धारणा अक्सर उनके संदर्भ में गर्व से दोहराई जाती है। रूपकप्रिय कवि के लिए ऐसी प्रतिष्ठा आकर्षक भी हो सकती है। किंतु विख्यात आलोचक के. पी. अप्पन के अनुसार, मेथिल शायद ही कभी बौद्धिक विचित्रता की सीमा से आगे जा पाते हैं।

अनेक आत्ममुग्ध पूँजीवादी साहित्यकारों की तरह उनकी रचनाएँ भी अंततः केवल बौद्धिक अलंकरण की सतही चमक से ही दमकती हैं।उनमें गहरी कलात्मकता या स्थायी दार्शनिक महत्व कम ही दिखाई देता है—चाहे वह उनकी लिखित कृतियाँ हों या उनके आवेगपूर्ण सार्वजनिक भाषण।

एक समय तो उन्होंने मानव मुख—जो जीवन को बनाए रखने वाले मुख्य अंगों में से एक है—को भी अश्लील बताया। ऐसे विचार दार्शनिक अंतर्दृष्टि से अधिक जीवन की वास्तविकताओं से कटे हुए एक रचनात्मक अहंकार के प्रतीक लगते हैं।

इस पृष्ठभूमि में साम्यवाद की भूमिका पर पुनर्विचार करना आवश्यक हो जाता है। अपने ऐतिहासिक विकृत रूपों के बावजूद साम्यवाद ने मानवता को यह महत्वपूर्ण सत्य सिखाया कि श्रम बौद्धिक हीनता का चिह्न नहीं, बल्कि मानव गरिमा का मूल स्रोत है। साम्यवादी व्यवस्थाओं में जो विफलताएँ दिखाई दीं, वे प्रायः स्वयं विचारधारा की अंतर्निहित कमियों के कारण नहीं बल्कि कुछ नेताओं के भ्रष्टाचार और नैतिक पतन के कारण उत्पन्न हुईं।

इस भेद को समझे बिना साम्यवाद के संपूर्ण दार्शनिक आधार को अस्वीकार कर देना साम्राज्यवादी कल्पना की एक बड़ी बौद्धिक विफलता है।

इसी प्रकार यह प्रश्न—“राजनीतिक दलों को कला बेचने और अपने शरीर को बेचने में क्या अंतर है?”—सतही सौंदर्यवादी वक्तव्य से अधिक अर्थ नहीं रखता। राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध कलाकारों और देह-व्यापार से जुड़े लोगों के जीवन का साधारण समाजशास्त्रीय अध्ययन ही इस तुलना की निरर्थकता स्पष्ट कर सकता है।

अमूर्त ज्ञान से निर्मित कवि के लिए ऐसे यूटोपियाई विचार बौद्धिक सजावट का रूप ले सकते हैं। किंतु पूँजीवादी साहित्यिक संस्कृति में अक्सर यही रोमानी कल्पना मुक्ति का एकमात्र रास्ता बन जाती है।

फिर भी बौद्धिक शिष्टता यह मांग करती है कि इन विचारों की आलोचना की जाए। इसलिए इस चर्चा के समापन क्षणों में यह स्मरण करना उपयोगी होगा कि आध्यात्मिक चिंतक ओ. वी. विजयन ने भी साम्यवाद के संघर्ष की वैधता को स्वीकार किया था—केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समूची मानवता के अस्तित्वगत संघर्ष के लिए। इसी स्मरण के साथ यह विचार-यात्रा अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है—और सम्मानपूर्वक विदा लेती है।

COMMENTS

Leave a Reply

You may also like this -

Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy बिषय - तालिका