उत्तराखंड के दूर-दराज़ पहाड़ी गांव दिखने में जितने सुंदर होते हैं, वहां का जीवन उतनी ही जटिल और चुनौतीपूर्ण होती है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घुमावदार रास्त
क्या मुश्किल है ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने में?
उत्तराखंड के दूर-दराज़ पहाड़ी गांव दिखने में जितने सुंदर होते हैं, वहां का जीवन उतनी ही जटिल और चुनौतीपूर्ण होती है। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घुमावदार रास्तों के बीच सीमित संसाधनों के साथ यहां के लोगों का जीवन अपनी रफ्तार से चलता है। वैसे तो यहां के दूर दराज गांवों में लगभग सभी बुनियादी सुविधाओं का अभाव दिख जाता है, लेकिन जब बात स्वास्थ्य सुविधाओं की आती है, तो यह मुश्किल पहाड़ जैसी बड़ी नजर आती है। खासकर महिलाओं, किशोरियों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आज भी यहां के कई ग्रामीण क्षेत्रों में एक संघर्ष की तरह है।हालांकि बीते कुछ वर्षों में इस दिशा में काफी सुधार भी हुए हैं, लेकिन अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है।
बागेश्वर जिले के गरुड़ ब्लॉक स्थित जवाड़ा स्टेट गांव इसका एक जीवंत उदाहरण है। यह गांव आबादी के लिहाज़ से बड़ा है, लेकिन यहाँ कोई समुचित अस्पताल सुविधा उपलब्ध नहीं है। ग्रामीणों को इलाज के लिए लगभग 15 किमी दूर बैजनाथ अस्पताल जाना पड़ता है। यह दूरी सुनने में भले छोटी लगे, लेकिन पहाड़ी रास्तों, सीमित परिवहन और खराब मौसम के बीच यह सफर किसी चुनौती से कम नहीं होता। खासकर रात के समय या आपातकालीन स्थिति में जब एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती है, तब यह दूरी कई बार जीवन और मृत्यु के बीच का मामूली फासला बन जाती है।
इसका सबसे अधिक असर महिलाओं और किशोरियों पर पड़ता है। गर्भवती महिलाओं को नियमित जांच और प्रसव के लिए दूर जाना पड़ता है, जिससे उनका स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाता है। किशोरियों को माहवारी के दौरान होने वाली समस्याओं के लिए भी बैजनाथ या जिला अस्पताल बागेश्वर तक जाना पड़ता है। कई बार सामाजिक झिझक और दूरी के कारण वे इलाज ही नहीं करवा पाती, जिससे उनकी समस्याएं और गंभीर हो जाती हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी यह स्थिति समान रूप से चुनौतीपूर्ण है।
हालांकि, अगर पिछले पांच वर्षों पर नज़र डालें तो उत्तराखंड के ग्रामीण स्वास्थ्य तंत्र में कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिले हैं। राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या में वृद्धि हुई है। वर्तमान में उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में लगभग 250 से अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 60 से अधिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कार्यरत हैं। इसके अलावा उप-केंद्रों की संख्या भी हजारों में है, जो गांव-स्तर पर बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं। पिछले पांच वर्षों में संस्थागत प्रसव दर में वृद्धि हुई है और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में गिरावट आई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी सेवाओं ने गांव-गांव तक स्वास्थ्य जागरूकता पहुंचाई है। टीकाकरण अभियान और पोषण कार्यक्रमों ने बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वर्ष 2026-27 के बजट में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए लगभग 90,000 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया है, जिसमें ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर दिया गया है। वहीं उत्तराखंड सरकार ने भी अपने बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए करीब 4,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। इसमें ग्रामीण अस्पतालों के उन्नयन, नए स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना और चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता पर ध्यान दिया गया है। नई योजनाओं के तहत ‘आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर’ को और मजबूत किया जा रहा है, जिससे गांव स्तर पर ही प्राथमिक उपचार और जांच की सुविधा उपलब्ध हो सके। मोबाइल हेल्थ यूनिट्स और डिजिटल हेल्थ मिशन के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इसके अलावा, गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं और किशोरियों के स्वास्थ्य पर केंद्रित कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।
फिर भी, जवाड़ा स्टेट जैसे गांवों की स्थिति यह दर्शाती है कि केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। अगर इस गांव में एक बेहतर सुविधा वाला अस्पताल स्थापित किया जाए, तो न केवल जवाड़ा स्टेट बल्कि इसके आसपास के मेगडी स्टेट, रोल्याना, छत्यानी और कुलवान जैसे गांवों के हजारों लोगों को लाभ मिलेगा। इससे समय पर इलाज संभव होगा, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आएगी और लोगों का जीवन स्तर बेहतर होगा।
यह केवल स्वास्थ्य सुविधा का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह समानता और गरिमा का प्रश्न भी है। जब एक महिला को अपने स्वास्थ्य के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, तो यह केवल उसकी शारीरिक परेशानी नहीं होती, बल्कि यह उसके अधिकारों की भी अनदेखी होती है। एक सशक्त समाज वही होता है, जहाँ हर व्यक्ति को बुनियादी सुविधाएं समान रूप से उपलब्ध हों, चाहे वह किसी भी भौगोलिक क्षेत्र में क्यों न रहता हो। उत्तराखंड के पहाड़ों में अब बदलाव की हवा चल रही है। सड़कें बन रही हैं, डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ रही है और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो रहा है। लेकिन इस बदलाव को जमीनी हकीकत में बदलने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है।जवाड़ा स्टेट जैसे गांवों की आवाज़ को सुनना और उनकी जरूरतों के अनुसार योजनाएं बनाना ही असली विकास होगा। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
- कविता बिष्ट,
बागेश्वर, उत्तराखंड


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