दवा दुआ और गरीब वही गरीब, जो हर युग में प्रयोगशाला का सबसे सस्ता उपकरण रहा है।कभी इतिहास के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर और अब दवाओं के ट्रायल के नाम पर
दवा दुआ और गरीब
विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है।इतना आगे कि अब उसे पीछे मुड़कर देखने की भी फुर्सत नहीं।
...और पीछे कौन खड़ा है?
गरीब।
वही गरीब, जो हर युग में प्रयोगशाला का सबसे सस्ता उपकरण रहा है।कभी इतिहास के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर और अब दवाओं के ट्रायल के नाम पर।
आजकल अस्पतालों के बाहर जो लंबी लाइनें लगती हैं,वो सिर्फ इलाज के लिए ही नहीं होतीं ।
वो “वैज्ञानिक प्रगति की भर्ती रैली” होती हैं।
डॉक्टर साहब बड़े प्यार से समझाते हैं ,
“देखो भाई, ये नई दवा है… दुनिया बदल देगी।”
गरीब पूछता है —“मुझे क्या मिलेगा?”
डॉक्टर मुस्कुराते हुए कहता हैं —“फ्री इलाज
… और मन ही मन बुदबुदाता है ,अगर किस्मत खराब हुई तो फ्री स्वर्ग यात्रा।”
गरीबी एक अलग प्रकार की ही यूनिवर्सिटी है। यहाँ डिग्री नहीं मिलती। यहां गरीबों को ऑब्जेक्ट बनाया जाता है। ऑब्जेक्ट बनने की इनसे फीस नहीं ली जाती बल्कि इन्हें 500 या 1000 रुपये देकर इनसे “मानवता की सेवा” करवाईं जाती हैं।कितनी महान बात है?
जो इंसान अपनी दवाई नहीं खरीद सकता,
वही इंसान पूरी दुनिया की दवाइयाँ अपने आप पर टेस्ट करवा रहा है।
गरीब अब सिर्फ मरीज ही नहीं रहा, इन्वेस्टिगेशन की दुनिया में वह चलता-फिरता “डेमो वर्जन” है।
जो व्यक्ति पढ़ना नहीं जानता, ट्रायल से पहले उसे सहमति पत्र का एक मोटा सा फॉर्म थमा दिया जाता है।जिसमें लिखा होता है।—“उसे सब कुछ समझाया गया है।”
...और गरीब ने क्या समझा?
उसे सिर्फ इतना समझ होता है,“अगर साइन नहीं किया तो इलाज नहीं मिलेगा।”इसलिए वह साइन कर देता है।वैसे भी उसके जीवन में पहली बार कोई कागज उसे इतना महत्व दे रहा होता है। गरीबों को अपना इलाज लेने के लिए के बड़ी कंपनियों के इस “सिग्नेचर अभियान” का हिस्सा बनना ही पड़ता है।
आजकल दवाइयाँ भी शेयर की तरह हैं।पहले गरीबों पर ट्रायल की जाती है फिर अमीरों को बाजार में बेची जाती है।अगर दवा सफल हो गई तो कंपनी के शेयर आसमान छू लेते हैं।
अगर असफल हो गई —तो गरीब को जमीन नसीब हो जाती है। दोनों ही मामलों में “विकास” होता है।
विदेशों से बड़े-बड़े प्रतिनिधि आते हैं।
कहते हैं —“हम मानवता के लिए काम कर रहे हैं।”वे गरीबों के फोटो खींचते हैं,रिपोर्ट बनाते हैं,सम्मेलन में स्लाइड दिखाते हैं —
“देखिए, हमने कितने लोगों की मदद की।”
गरीब भी खुश होता है —कम से कम उसकी फोटो तो विदेश घूम आई।वह खुद कभी गाँव से बाहर नहीं जा पाया।
अगर ट्रायल में कुछ हो गयातो मुआवजे की बात होती है।इतनी जटिल गणना होती है
कि लगता है न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम भी आसान था।आखिर में निष्कर्ष निकलता है —
“मुआवजा मिलेगा… पर पहले साबित करो कि तुम जिंदा हो।”और अगर मर गए —तो साबित करो कि मरने का कारण वही दवा थी।
गरीब सोचता है —“काश, मरने से पहले थोड़ा वकील पढ़ लिया होता।”
पहले समाज सेवा के लिए अमीर लोगों का ध्येय होता था —“गरीबी हटाओ।”
अब उनका नया ध्येय हो गया है —“गरीबों को ट्रायल में लगाओ।”
उनके लिए अपनी जेबें भरना। नए-नए दवाइयां की खोज कर और गरीबों पर ट्रायल कर अमीर बनना ही विकास करना हो गया है।
विकास तेजी से हो रहा है।इस विकास के इंजन में पेट्रोल नहीं,गरीबों की उम्मीदें जल रही हैं।विज्ञान की प्रगति जरूरी है।नई दवाएँ भी जरूरी हैं,लेकिन हर बार प्रयोगशाला की पहली सीढ़ी गरीब ही बन रहा है।
विज्ञान ऐसे ही आगे बढ़ता रहेगा और पीछे खड़े लोग“मानवता की सेवा” करते-करते इतिहास के फुटनोट बनते रहेगें।
- हनुमान मुक्त,
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