दूरदराज गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी की चुनौती

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दूरदराज गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी की चुनौती भले ही आज भारत फ़ास्ट नेटवर्क उपलब्ध कराने वाले दुनिया के गिने चुने देशों में शामिल है

दूरदराज गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी की चुनौती


ले ही आज भारत फ़ास्ट नेटवर्क उपलब्ध कराने वाले दुनिया के गिने चुने देशों में शामिल है, लेकिन देश के कई ऐसे ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां लोगों को मामूली नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं हो पाता है. उन्हें इंटरनेट स्पीड मिलना तो दूर की बात है, अपनों से फोन पर भी बात करने के लिए गांव से कई किमी दूर चलकर नेटवर्क एरिया में आना पड़ता है. बागेश्वर जिले के एक छोटे से गांव सुराग की स्थिति इस समस्या की सच्चाई को उजागर करती है।

इस गांव में करीब चार साल पहले मोबाइल टावर लगाया गया था। गांव के लोगों ने सोचा था कि अब उनकी जिंदगी बदल जाएगी, वे अपने परिजनों से आसानी से संपर्क कर पाएंगे, बच्चों की पढ़ाई में सुधार होगा और दुनिया की जानकारी उनके हाथों में होगी। लेकिन आज भी वह टॉवर सिर्फ एक लोहे का ढांचा बनकर खड़ा है, क्योंकि उसका कनेक्शन अब तक चालू नहीं किया गया है। इस वजह से गांव के लोग आज भी अपनों से जुड़ने के लिए तरसते हैं। किसी की तबीयत खराब हो जाए या कोई जरूरी सूचना देनी हो, तो उन्हें कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, जहाँ नेटवर्क मिलता है।

दूरदराज गांवों में मोबाइल कनेक्टिविटी की चुनौती
इस समस्या का सबसे ज्यादा असर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने वाली गांव की लड़कियों पर पड़ता है। जो लड़के इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, वे मजबूरी में शहरों के हॉस्टल का रुख करते हैं, क्योंकि वहां इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की सुविधा उपलब्ध होती है। लेकिन गांव की लड़कियों के लिए यह विकल्प आसान नहीं होता है। सामाजिक और आर्थिक कारणों से वे गांव में ही रहकर पढ़ाई करने पर मजबूर हैं। ऐसे में मोबाइल कनेक्टिविटी की कमी उनके लिए एक बड़ी बाधा बन जाती है। वे ऑनलाइन क्लास, करंट अफेयर्स, फॉर्म भरने जैसी जरूरी चीजों से वंचित रह जाती हैं, जिससे वे प्रतियोगिता में पीछे रह जाती हैं।

हालांकि अगर व्यापक स्तर पर देखें तो उत्तराखंड में मोबाइल कनेक्टिविटी की स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है, लेकिन अभी भी बहुत काम बाकी है। भारत सरकार के दूरसंचार विभाग के अनुसार, उत्तराखंड में लगभग 85-90 प्रतिशत आबादी तक मोबाइल नेटवर्क की पहुँच है, लेकिन भौगोलिक दृष्टि से देखें तो यह आंकड़ा अलग नजर आता है। सुराग की तरह यहां के पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांव ऐसे मिल जाएंगे, जहाँ नेटवर्क या तो बहुत कमजोर है या बिल्कुल भी नहीं है। खासकर बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जैसे जिलों के दूरदराज इलाकों में यह समस्या अधिक गंभीर है।

सरकार ने इस दिशा में कई प्रयास किए हैं। डिजिटल इंडिया अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। ‘भारतनेट परियोजना’ के माध्यम से गांव-गांव तक ब्रॉडबैंड कनेक्शन पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना के तहत देश के लगभग 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने का लक्ष्य है, जिसमें उत्तराखंड की हजारों ग्राम पंचायतें भी शामिल हैं। इसके अलावा, यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड के तहत दूरदराज क्षेत्रों में मोबाइल टावर लगाने के लिए वित्तीय सहायता दी जा रही है। दरअसल इसकी स्थापना का उद्देश्य गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को किफायती और उचित कीमतों पर गैर-भेदभावपूर्ण तरीके से दूरसंचार सेवाओं तक पहुंच प्रदान करना है, जिससे ग्रामीण-शहरी डिजिटल विभाजन को पाटा जा सके।

दूसरी तरफ, देश की निजी टेलीकॉम कंपनियां भी इस दिशा में काम कर रही हैं। इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियां पहाड़ी क्षेत्रों में अपने नेटवर्क का विस्तार करने का प्रयास कर रही हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में 4G नेटवर्क कवरेज में लगभग 20-25 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। हालांकि, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और कम जनसंख्या घनत्व के कारण इन कंपनियों के लिए हर गांव तक नेटवर्क पहुंचाना चुनौतीपूर्ण और महंगा साबित होता है।

फिर भी, सुराग जैसे गांवों की स्थिति यह बताती है कि सिर्फ टॉवर लगाना ही पर्याप्त नहीं है। उसे चालू करना, उसका रखरखाव करना और लगातार सेवा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। कई बार तकनीकी समस्याओं, बिजली की कमी या काम में लापरवाही के कारण टावर होने के बावजूद सेवा शुरू नहीं हो पाती है। मोबाइल कनेक्टिविटी की कमी का असर सिर्फ संचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। आज के समय में जब अधिकतर सरकारी सेवाएं ऑनलाइन हो गई हैं, तब नेटवर्क न होना लोगों को उनके अधिकारों से भी दूर कर देता है। टेलीमेडिसिन जैसी सुविधाएं, जो दूरदराज क्षेत्रों के लिए वरदान साबित हो सकती हैं, नेटवर्क की कमी के कारण प्रभावी नहीं हो पातीं।

इस समस्या का समाधान केवल सरकार या कंपनियों के प्रयासों से नहीं होगा, बल्कि इसके लिए समन्वित प्रयास की आवश्यकता है। स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लगाए गए टॉवर समय पर चालू हों और उनकी निगरानी की जाए। साथ ही, सोलर पावर जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके बिजली की समस्या को भी दूर किया जा सकता है। निजी कंपनियों को भी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत कम लाभ वाले क्षेत्रों में निवेश करना चाहिए।

हकीकत यह है कि मोबाइल कनेक्टिविटी आज के समय की एक बुनियादी आवश्यकता बन चुकी है, खासकर उन क्षेत्रों के लिए जो भौगोलिक रूप से अलग-थलग हैं। सुराग गांव के टॉवर हमें यह एहसास दिलाते हैं कि विकास सिर्फ योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन से होता है। अगर सरकार, कंपनियां और समाज मिलकर प्रयास करें, तो वह दिन दूर नहीं जब दूर दराज के इन पहाड़ी क्षेत्रों में भी मोबाइल की घंटियां गूंजेंगी और हर व्यक्ति अपनों से जुड़ा हुआ महसूस करेगा। वास्तव में, अगर देश को विकसित बनाना है तो हमें विकास के सभी पहलुओं और दूर दराज़ के गांवों को साथ लेकर चलना होगा।(यह लेखिका के निजी विचार हैं)


- कुमारी किरण
सुराग, उत्तराखंड

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